Sunday, 13 January 2019

वृक्षों की पूजा के फल

वृक्षों का देव स्वरूप एक दृष्टि ----
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भारतीय संस्कृति में वृक्षों को काटना हिंसा है। इनमें देवात्मा होती है।  सनातन संस्कृति में वृक्षों की पूजा होती है ।
अभिषेक , दीपदान , सुत्रबंधन , अक्षत-रोली-चन्दन-पुष्पों आदि से पूजन  किया जाता है और परिक्रमा की जाती है।

१ पीपल
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योगिराज भगवान् श्री कृष्ण श्रीमद भगवत गीता जी में कहते हैं :
" वृक्षेषु अश्वस्था: " अर्थात " वृक्षों में मैं पीपल हूँ" |

पीपल विष्णु वृक्ष है | पीपल के नीचे श्राद्ध क्रिया, गायत्री जप, कथा, स्तोत्र आदि संपन्न किये जाते हैं | पीपल का पेड़ काटने या कटवाने से पितर दोष लगता है...

इसके साथ ही प्रेतात्माओ का शाप भी लगता है जो रात को पीपल पर निवास करती हैं... (इसीलिए रात्री के समय पीपल की पूजा नहीं होती )

सूर्योदय के बाद पीपल पर माता लक्ष्मी का निवास मन गया है... पीपल की पूजा बृहस्पति और शनि दोषों से मुक्ति के लिए भी की जाती है |

२ बरगद
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वट शिव वृक्ष है | प्रलय के समय मुकुंद ने अक्षय वट पर विश्राम किया था | यह अक्षय वट प्रयाग में है | महिलाएं वट सावित्री की पूजा करती हैं सौभाग्य के वरदान के लिए | वट वृक्ष जटाधारी भगवान् शिव का ही रूप है |

३ कमल
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माता लक्ष्मी का निवास होता है | यह एक ऐसा पुष्प है जो अपने गुणों के कारण प्रत्येक देवी देवता को प्रिय है |

४) नारियल
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श्री देवी (माँ लक्ष्मी) ही बस्ती हैं | नारियल एक ऐसा फल है जो प्रत्येक देवी देवता को प्रिय है... इसे पौराणिक ग्रंथो में "कल्प वृक्ष" का नाम दिया गया है... शक्ति पूजा में और किसी अनुष्ठान में यह विशेष रूप से प्रयोग में लाया जाता है |

५ बिल्व
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वृक्ष में लक्ष्मी जी का निवास है... ऋग्वेद के "श्री सूक्तं" के अनुसार माता लक्ष्मी की कठोर तपस्या के परिणाम स्वरुप ही बिल्व वृक्ष उत्पन्न हुआ... "
"वनस्पतिस्तव वृक्शोथ बिल्व: "...

इसीलिए यह वृक्ष, इसके पत्ते और फल भगवान् शिव को अत्यंत प्रिय हैं | बिल्व पत्र महादेव के विग्रह की शोभा हैं | शास्त्रानुसार संध्या के समय बिल्व वृक्ष के नीचे दीप दान करने वाला व्यक्ति मृत्योपरांत शिवलोक को ही जाता है अर्थात उसकी सद्गति निश्चित होती है | देवी कात्यायनी की पूजा भी में भगवान् राम ने बिल्व पत्रों का प्रयोग किया था |

६) रुद्राक्ष
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शिव वृक्ष है | इसके बीजो से बनी माला पूजा में प्रयुक्त होती है | रुद्राक्ष भगवान् शंकर का श्रृंगार हैं |

७) तुलसी
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वृंदा देवी हैं | तुलसी के स्पर्श, दर्शन, सेवन से जन्म-जन्मान्तरों के पाप कर्मों का नाश होता है | यह भगवान् विष्णु को अत्यंत प्रिय है |कोई भी अनुष्ठान या पूजा कार्य संपन्न करने के लिए तुलसी पत्र का होना आवश्यक माना गया है | वर्ष भर तुलसी में जल अर्पित करना एवं सायंकाल तुलसी के नीचे दीप जलाना अत्यंत श्रेष्ठ माना जाता है |
कार्तिक मास में तुलसी के समक्ष दीपक जलाने से मनुष्य अनंत पुण्य का भागी बनता है एवं उसे माँ लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है क्योंकि तुलसी में साक्षात माता लक्ष्मी का निवास माना गया है |

८) धान
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"धान्य देवी" अर्थात "माता अन्नपूर्ण" का ही रूप हैं| प्रत्येक पूजा में अक्षत ( चावलों के साबुत दाने ) का प्रयोग होता है|

९) नीम
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शीतला देवी रहती हैं जो रोगों से रक्षा करती हैं | देश भर में शीतला देवी के मंदिरों में नीम के वृक्ष सहजता से मिल जाते हैं|

१०) आम के वृक्षों पर यक्ष किन्नर विहार करते हैं|

११) आंवला
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विष्णु और लक्ष्मी माँ का प्रिय है | कार्तिक मास में आंवले की परिक्रमा और पूजा होती है|

१२) कैंथ और जामुन
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के वृक्ष गणपति गणेश को प्रिय हैं और इनके फल गणेश पूजा में अर्पित किये जाते हैं|
          
            " कपित्थ जम्बू फल चारु भक्षणं "|

१३) बृहस्पति दोषों से मुक्ति पाने हेतु केले की पूजा की जाती है|

१४) आक और पलाश
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सूर्य वनस्पति है और पलाश चन्द्र वनस्पति ..
. सूर्य और चन्द्र के दोषों से मुक्ति पाने हेतु ज्योतिष में इन वनस्पतिओं का प्रयोग्किया जाता है |

वनस्पतियाँ विधाता का वरदान हैं | इनकी मधुरिमा को बने रखने के लिए वेद मंत्र है
" मधुमान्नोवनस्पते: "|

वृक्षों में देवात्मा होती है | वृक्षारोपण एक धार्मिक अनुष्ठान है | वृक्षों में खिले हुए पुष्पों की गंध और फलो के रसात्मक तत्वों को पाकर देवता तृप्त होते हैं | इसीलिए पूजा स्थलों के परिसर में पुष्प और फलदार वृक्ष लगाये जाते हैं | फूलो, फलो अथवा हरे भरे वृक्षों को काटने पर महापाप लगता है| और इसके विपरीत वृक्षारोपण से व्यक्ति महापुण्य का भागीदार होता है.।।।

Thursday, 10 January 2019

हवन समय पर ही होना चाहिए

गणितात् सिद्धितः कालः काले तिष्ठति देवताः। वरमेकाहुतिः काले अकाले कोटिसंख्यया।। कालातीते च यः कुर्यात् श्राद्धं होमं जपं तथा। व्यर्थं भवति तत् सर्वमपमृत्युं विषं तथा।।
कालातिक्रमदोषे तु राक्षसस्तस्य देवता। अशुचिर्यत्र होमेऽपि पिशाचस्तस्य देवता।तस्मात् काले शुचिर्द्रव्ये होतव्यं नान्यथा क्वचित्।।

Wednesday, 9 January 2019

भोजन पका कर इस विधि से अग्नि में डाले माता

कुमकुम+अक्षत से अग्नि की पूजा करे "ह्रीं पावकाग्नये नमः"

प्रार्थना करें - मुखं यः सर्वदेवानां हव्यभुक् कव्यभुक् तथा। पितृणां च नमस्तस्मै नमस्ते पावकाग्नये।।

घर में शुद्धता से पकी हुई भात में घी मिलाकर - मध्यमा+अनामिका और अंगूठे से थोडी थोड़ी मात्रा में छते हाथ से अग्नि में समर्पित करें (किसी उपवास के दिन भात न भी बनायी हो,तो केवल घी छोटी चम्मची से अग्नि में समर्पित करें / चम्मची को भी जैसे भात लेतें हैं इसी प्रकार पकड़ना चाहिये)--
(१) ह्रीं ब्रह्मणे नमः - इदं ब्रह्मणे न मम।
(२)ह्रीं प्रजापतये नमः - इदं प्रजापतये न मम।
(३) ह्रीं गृह्याभ्यो नमः - इदं गृह्याभ्यो न मम।
(४)ह्रीं कश्यपाय नमः - इदं कश्यपाय न मम।
(५) ह्रीं विश्वेभ्यो देवेभ्यो नमः - इदं विश्वेभ्यो देवेभ्यो न मम।
(६)ह्रीं अग्नये स्विष्टकृते नमः - इदं अग्नये स्विष्टकृते न मम।

धर्म की गम्भीरता

प्रिय मित्रों !

दूसरा जन्म वैसे ही होता है , जैसे ये जन्म हुआ है । दूसरा जन्म कैसा होगा, लोग सोचते हैं । ऐसा ही होगा जैसा अभी लग रहा है आपको कि हम जन्मे हैं ।

इस जन्म का होना ही प्रमाण है कि आपका जन्म होता है ।
आप की मृत्यु होना ही इस बात का प्रमाण है कि आप मरते भी हो !

आप जन्म भी लेते हो , आप मरते भी हो !

कभी खेतों में जा के देखा करो  ध्यान से ;
बीज फलित हो के धान बनता है , धान  पक के बीज - ये ही प्रकृति है ।

इतनी सी बात भी अनुभूत हो जायेगी आपको तो   धर्म की गम्भीरता अनुभव होगी ।

।। जय श्री राम ।।

राम नाम जप आवश्यक या सन्ध्या

////केवल २ से ३ मिनट लगेंगे!
एकबार काशीजी में एक ब्राह्मणदेवता ने पूज्य श्रीकरपात्री स्वामीजी को प्रणाम करके पुछा -
स्वामीजी! मैं सन्ध्या-यज्ञादि कर्म नहीं करता हूँ बस श्रीरामनाम का जप-कीर्तन एवं रामचरितमानस का मासपारायण पाठ कर लेता हूँ। तो क्या इससे मेरा कल्याण हो जायेगा?

इसपर पूज्य श्रीकरपात्री स्वामीजी ने कहा - यदी आप शुद्रकुल में उत्पन्न हुए होते तो निश्चित आपका कल्याण हो गया होता पर दुर्भाग्य से आपका जन्म ब्राह्मणकुल में हुआ है अतः आपके लिए सन्ध्या-यज्ञादि वैदिक कर्म करना अत्यंत आवश्यक है।

अब आप विचार करें, क्या करपात्री स्वामीजी भगवन्नाम विरोधी है ? क्या उनको नहीं ज्ञात था कि "राम नाम अवलम्बन एकु" का सिद्धांत कलिकाल में मुख्य है?
अरे भाई! जितना रामनाम प्रेमी करपात्री स्वामीजी हुए उतना शायद ही कोई और हुआ होगा। स्वामीजी श्वास-प्रश्वास में सतत रामनाम का जप करते थे, इतना की एकबार जब वे अस्वस्थ होकर कुछ समय तक मूर्छित रहें तो जगने पर उन्हें बहुत पश्चाताप हुआ कि उनका रामनाम का जप स्थगित हो गया था। तो विचार कीजिए की स्वामीजी ने उस ब्राह्मण को ऐसा क्यों कहा?

आईये कुछ बातों पर विचार करें।सबसे पहले तो नित्यानुष्ठान ना करने के लिये भगवन्नाम का ओट लेना बहुत बड़ा अपराध है। जिन भगवानका नाम हम रट रहें है क्या उनकी आज्ञा का पालन करना हमारा धर्म नहीं?  भगवान स्वयं कह रहें हैं -

श्रुतिस्स्मृति: ममैवाज्ञा यस्तामुल्लङ्घ्य वर्तते |
आज्ञाच्छेदी ममद्रोही  मद्भक्तोsपि  न वैष्णव: || (विष्णुधर्म)
(श्रुति और स्मृति यह मेरे आदेश है जो इसका पालन नहीं करते हैं वे विश्वासघाती - मेरे द्रोही  हैं। चाहे वें मेरी भक्ति करें तो भी उनको वैष्णव नहीं मानना चाहिये।)

सोइ सेवक प्रियतम मम सोई। मम अनुसासन मानै जोई॥ (रामचरितमानस)

और तो और​ प्रपन्न​-शरणागत के लिये भगवदाज्ञा का पालन करना ही मुख्य हैं - अग्या सम न सुसाहिब सेवा (रामचरितमानस)। भगवदाज्ञा का पालन करना यानि उनके अनुकूल रहना और प्रपन्न के लिये तो सर्वप्रथम निर्दिष्ट यहीं है - आनुकूलस्य संकल्पः (अहिर्बुधन्य संहिता)।

दुसरी बात जो कि गोस्वामीपाद श्रीतुलसीदासजी स्वयं कह रहें हैं  -

नाम राम को अंक है सब साधन हैं सून।
अंक गये कछु हाथ नहिं अंक रहें दस गून॥(दोहावली)

भगवान श्रीरामका नाम अंक है और सब साधन शून्य (०) हैं। अंक न रहने पर तो कुछ भी हाथ नहीं आता, परंतु शून्य के पहले अंक आने पर वे दस गुने हो जाते हैं, अर्थात राम-नाम के जप के साथ जो साधन होते हैं, वे दस गुना अधिक लाभदायक हो जाते हैं, परंतु राम-नाम के बिना जो साधन होता है वह किसी भी तरह का फल प्रदान नहीं करता।
इससे यह स्पष्ट हैं कि श्रीरामनाम के ही परमोपासक गोस्वामीजी अन्य साधन-कर्मों की उपेक्षा  करने के पक्षमें बिल्कुल नहीं हैं। विशेष जानकारी के लिये रामचरितमानसके उत्तरकाण्ड का अध्ययन करें। हाँ गोस्वामीजी निरस कर्मकाण्ड को भगवन्नाम से जोड़कर हमारे सभी कृत्यों को उपासनात्मक बनाने के पक्ष में जो कि गीताचार्य भगवान श्रीकृष्ण स्वयं कह रहें हैं  -
यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत्।यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम्॥
(हे कुन्तीपुत्र! तुम जो कुछ भी स्वतःप्राप्त कर्म करते हो, जो खातें हो, जो कुछ श्रौत या स्मार्त यज्ञरूप हवन करते हो, जो कुछ (स्वर्ण,अन्न, घृतादि वस्तु) सत्पात्रोंको दान देते हो और जो कुछ तपका आचरण करते हो वह सब मुझे समर्पित कर दो।)

अब एक और महत्पुर्ण बात पर ध्यान दीजिये। भगवन्नामजप​-कीर्तन तब ही सफल है जबतक हमनें नामापराधसे बचकर भगवन्नाम का आश्रय किया। इन दश नामापराधमें इन तीन पर विचार कीजिये  -
(१) अश्रद्धा श्रुतिशास्त्रदैशिकगिरां  (वेद-शास्त्र-सन्त आज्ञा का पालन नहीं करना)।
(२) विहितत्यागौ (यह सोचना की नामजप करतें हैं अतः सन्ध्या-पूजन​-तर्पण आदि कार्यों का त्याग कर देना)
(३) धर्मान्तरैः साम्यं (भगवन्नामाश्रय को अन्य पूण्यकर्मों के समान मानना तथा तूलना करना। क्योंकि भगवन्नामाश्रय से श्रेष्ठ कोई भी  यज्ञ- तीर्थ आदि नहीं हो सकते। इसलिये भगवन्नाम को सर्वोपरी जानकर सन्ध्या-यज्ञादि नित्यानुष्ठान की तुलना करनी ही नहीं चाहिये।)

तो मित्रों सौ बात की एक बात भगवन्नाम का आश्रय लेकर अपने वर्णाश्रमोचित कर्मों से ना भागें, नियमपूर्वक श्रद्धासहित नित्य कर्मानुष्ठान (सन्ध्यावन्दन​, अग्निहोत्र​, देवपूजन​, वेदादि शास्त्रों क अध्ययन​, पितृ तर्पण आदि) करें। भगवन्नाम तो साक्षात भगवान हैं! भगवन्नामसें भगवानकी अनुभूति करें। भक्त-प्रपन्न को तो अपने सभी कार्य भगवत्प्रीत्यर्थ करने चाहिये।

श्रीसीतारामनाम महाराज की जय​।

*संभव हो तो श्रीकरपात्री स्वामीजी द्वारा लिखित "संकीर्तन मीमांसा" नामक ग्रन्थ को एकबार अवश्य पढ़ लेंवे।///

Saturday, 5 January 2019

समुद्रोल्लघन करने वाले कथाकारों की समीक्षा

समुद्रोल्लंघन कर #म्लेच्छदेशगमन कर चुके बालशुक गोपेश आदि वृन्दावनिये पाखंडी कथाकारों  की #शास्त्रीय आलोचना -

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सूतसंहिता का वचन है कि विधि का पालन भले ही न करो किन्तु निषिद्ध से तो अवश्य निवृत्त हो - " अकुर्वन्नपि विध्युक्तं निषिद्धं परिवर्जयेत् | निषिद्धपरिहारेण विहिते लभते मतिम् "

यह वचन चन्द्रशेखर भारती जी ने विवेकचूड़ामणि भाष्य में उद्धृत किये और  स्वामी  निश्चलानंद जी ने भी कहा  -

" एक विधि हैं, अगर आपके मन में श्रद्धा हैं तो आप उसे मानिये | पर जहाँ शास्त्र में निषेध हैं, वहाँ मानो ख़तरा ही ख़तरा हैं | "

अतः स्पष्ट है कि निषेध की अवमानना करने पर   तत्कर्मजन्य अदृष्ट  से दूषित होकर प्राणी न केवल  आत्मनाश को प्राप्त होता है, वरन् वह  परम्परानुगमक लोक के लिये  भी  तत्तत्कर्मों में   अनादर्श होता है , जो  उन-उन निषिद्धकर्मसम्बद्ध    शास्त्र की फलश्रुतियों के प्रभाव की परिधि में आते हैं ।

इस दृष्टि से योग्यता का विभाजन दो भागों में किया जा सकता है -

१. विहितयोग्यता  ।

२.प्रतिषिद्धयोग्यता ।

विहितयोग्यता से तात्पर्य है , उन उन योग्यताओं से , जिनका विधान धर्मशास्त्रों द्वारा स्फुटित है तथा उनको  एक कथाकार स्वयं में धारण कर  कथाकारों की श्रेणी में अग्रगण्य बनता है ।

प्रतिषिद्धयोग्यता  से अभिप्राय है, ऐसी योग्यता , जिनका  निषेध धर्मशास्त्रों द्वारा स्फुटित है तथा उनको  एक कथाकार स्वयं में धारण कर  कथाकारों की श्रेणी में अधम  दशा का भागी  बनता है ।

श्रीमद्भागवतम्, श्री ब्रह्मवैवर्तपुराणम्  इत्यादि सनातनधर्म के परम पवित्र परम्परागत  धर्मशास्त्रों  का  कथानुष्ठान करने से पूर्व अथवा  उन उन शास्त्रों के  व्यासपीठ से प्रवाचनार्थ   व्यासपीठाधिरोहण   हेतु  विहित  आधिकारिकताओं का शास्त्रीय विचार   करने की शृंखला में  विहित  योग्यताओं का विचार करने पर  प्रतिषिद्धयोग्यता   का विचार   विशेष रूप से  अवश्यमेव  करना चाहिये ।

क्योंकि विहितयोग्यता का न्यूनातिरेक तत्कर्मजन्य अदृष्ट  -लाभ का ही साधक-बाधक होता है, किन्तु   प्रतिषिद्धयोग्यता  का न्यूनातिरेक  तत्कर्मजन्य अदृष्ट- हानि का साधक-बाधक होकर प्रकट होता है ।

अतः  यह अत्यन्त विचारणीय है कि कथानुष्ठान हेतु   वेदादि आर्ष शास्त्रों की दृष्टि  से  विषेष  प्रतिषिद्ध हो चुके     कथाकारों  को  आर्यावर्त की पवित्र भूमि में  खुलकर  प्रायोजित करना कितना धर्मसम्मत कृत्य है ?

।। जय श्री राम ।।

Saturday, 22 December 2018

पत्नी कैसी हो

अपने ही पति से  जिसे  निजी अहंकार समस्या (इगो प्रॉब्लम)  हो , उसे भ्रष्ट स्त्री समझना चाहिये  ।

मन्दोदरी जी का नाम हमारी संस्कृति में स्मरण किया जाता है ,  उनको  कभी रावण से  निजी अहंकार समस्या न हुई ।

///पत्नी को सीता होने की बात तब कहिये जब पति  राम हो ,  ///

-  ये इन्हीं भ्रष्ट  स्त्रियों और इन जैसे ही अन्य  मूर्खों का कुतर्क है । क्योंकि पति राम हो, ये तो अच्छी ही बात है , पर कदाचित्  न भी  हो , तब भी  पत्नी  को  मन्दोदरी अवश्य होनी चाहिये ।  ये है वैदिक संस्कृति ।

#अनृतं_साहसं_माया_मूर्खत्वमतिलोभिता।
#अशौचत्वं_निर्दयत्वं_स्त्रीणां_दोषाः_स्वभावजा:।।

स्त्री पुरुष के समानाधिकार की बातें करने वाले आजकल के  छद्म  लम्पटों को  ये अन्याय लगेगा , पर   प्राणियों के जन्मादि के मूल में  कर्मफल के सिद्धान्तों को जानने वाले , सांख्यादि विज्ञानपरक शास्त्रों के पारगामी  मनीषियों की दृष्टि में   यही न्याय संगत  तथ्य  है । 

और हॉ !
इस सिद्धान्त का ये   अभिप्राय बिल्कुल भी नहीं है कि स्त्रियों  के दमन की मानसिकता को बढ़ावा दिया गया है , नहीं ;  वरन् अभिप्राय ये है कि  स्त्रियों  से    पुरुषों के सापेक्ष  आशा  और  अपेक्षा  अधिक है ।  स्त्रियों के प्रति इससे अधिक बढ़प्पन और किस संस्कृति में मिलेगा भला ?

।। जय श्री राम ।।

ज़ह्ळ को जालंधर कहने वालों का खंडन

देअ श्री श्री श्री खुडीज़ह्ळ जी को जालन्धर कहने वालों का भ्रमभंग -  भ्रम - प्रभु श्री ज़ह्ळ जी के मुख के सिर में चंद्रमा है तो इन्हें शिव अं...