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Saturday, 29 August 2026
कालसर्प योग पर विचार
Wednesday, 26 August 2026
उपाकर्म निर्णय
Tuesday, 18 August 2026
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Sunday, 31 May 2026
33 करोड़ देवता निर्णय
Tuesday, 15 July 2025
ज्ञ वर्ण का उच्चारण
'ज्ञ' वर्ण के उच्चारण पर शास्त्रीय दृष्टि-
संस्कृत भाषा मेँ उच्चारण की शुद्धता का अत्यधिक महत्त्व है। शिक्षा व व्याकरण के ग्रंथोँ मेँ प्रत्येक वर्ण के उच्चारण स्थान और ध्वनि परिवर्तन के आगमलोपादि नियमोँ की विस्तार से चर्चा है। फिर भी "ज्ञ" के उच्चारण पर समाज मेँ बडी भ्रांति है।
ज्+ञ्=ज्ञ
कारणः-'ज्' चवर्ग का तृतीय वर्ण है और 'ञ्' चवर्ग का ही पंचम वर्ण है।
जब भी 'ज्' वर्ण के तुरन्त बाद 'ञ्' वर्ण आता है तो 'अज्झीनं व्यञ्जनं परेण संयोज्यम्' इस महाभाष्यवचन के अनुसार 'ज् +ञ'[ज्ञ] इस रुप मेँ संयुक्त होकर 'ज्य्ञ्' ऐसी ध्वनि उच्चारित होनी चाहिये।।
किँतु ये भी कुछ का एक भ्रामक मत है।।
प्रिय मित्रोँ!
"ज्ञ"वर्ण का यथार्थ तथा शिक्षाव्याकरणसम्मत शास्त्रोक्त उच्चारण 'ग्ञ्' ही है। जिसे हम सभी परंपरावादी लोग सदा से ही "लोक" व्यवहार करते आये हैँ।
कारणः- तैत्तिरीय प्रातिशाख्य 2/21/12 का नियम क्या कहता है-
स्पर्शादनुत्तमादुत्तमपराद् आनुपूर्व्यान्नासिक्याः।।
इसका अर्थ है- अनुत्तम, स्पर्श वर्ण के तुरन्त बाद यदि उत्तम स्पर्श वर्ण आता है तो दोनोँ के मध्य मेँ एक नासिक्यवर्ण का आगम होता है। यही नासिक्यवर्ण शिक्षा तथा व्याकरण के ग्रंथोँ मेँ यम के नाम से प्रसिद्ध है। 'तान्यमानेके' (तै॰प्रा॰2/21/13) इस नासिक्य वर्ण को ही कुछ आचार्य 'यम' कहते हैँ। प्रसिद्ध शिक्षाग्रन्थ 'नारदीयशिक्षा' मेँ भी यम का उल्लेख है।अनन्त्यश्च भवेत्पूर्वो ह्यन्तश्च परतो यदि। तत्र मध्ये यमस्तिष्ठेत्सवर्णः पूर्ववर्णयोः।। औदव्रजि के 'ऋक्तंत्रव्याकरण' नामक ग्रंथ मेँ भी 'यम' का स्पष्ट उल्लेख है।'अनन्त्यासंयोगे मध्ये यमः पूर्वस्य गुणः' अर्थात् वर्ग के शुरुआती चार वर्णो के बाद यदि वर्ग का पाँचवाँ वर्ण आता है तो दोनो के बीच 'यम' का आगम होता है,जो उस पहले अनन्तिम-वर्ण के समान होता है।
प्रातिशाख्य के आधार पर यम को परिभाषित करते हुए सरल शब्दों मेँ यही बात भट्टोजी दीक्षित भी लिखते हैँ-
"वर्गेष्वाद्यानां चतुर्णां पंचमे परे मध्य यमो नाम पूर्व सदृशो वर्णः प्रातिशाख्ये प्रसिद्धः" -सि॰कौ॰12/ (8/2/1सूत्र पर)
भट्टोजी दीक्षित यम का उदाहरण देते हैँ। पलिक्क्नी 'चख्खनतुः' अग्ग्निः 'घ्घ्नन्ति'।
यहाँ प्रथम उदाहरण मेँ क् वर्ण के बाद न् वर्ण आने पर बीच मेँ क् का सदृश यम कँ(अर्द्ध) का आगम हुआ है। दूसरे उदाहरण मेँ खँ कार तथैव गँ कार यम, घँ कार यम का आगम हुआ है।
अतः स्पष्ट है कि यदि अनुनासिक स्पर्श वर्ण के तुरंत बाद अनुनासिक स्पर्श वर्ण आता है तो उनके मध्य मेँ अनुनासिक स्पर्श वर्ण के सदृश यम का आगम होता है।
प्रकृत स्थल मेँ-
ज् + ञ्
इस अवस्था मेँ भी उक्त नियम के अनुसार यम का आगम होगा।
किस अनुनासिक वर्ण के साथ कौन से यम का आगम होगा।विस्तारभय से सार रुप दर्शा रहे हैँ। तालिक देखेँ-
स्पर्श अनुनासिक वर्ण यम
क् च् ट् त् प् कँ्
ख् छ् ठ् थ् फ् खँ्
ग् ज् ड् द् ब् गँ्
घ् झ् ढ् ध् भ् घँ्
यहाँ यह बात ध्यातव्य है कि यम के आगम मेँ जो'पूर्वसदृश' पद प्रयुक्त हुआ है , उसका आशय वर्ग के अन्तर्गत संख्याक्रमत्वरुप सादृश्य से है सवर्णरुप सादृश्य से नहीँ। ये बात उव्वट और माहिषेय के भाष्यवचनोँ से भी पूर्णतया स्पष्ट है ।जिसे भी हम विस्तारभय से छोड रहे हैँ।
अस्तु हम पुनः प्रक्रिया पर आते हैँ-
ज् ञ् इस अवस्था मेँ तालिका के अनुसार 'ग्'यम का आगम होगा-
ज् ग् ञ्
ऐसी स्थिति प्राप्त होने पर चोःकु [अष्टाध्यायी सूत्र 8/2/30]
सूत्र प्रवृत्त होता है।
'ज्' चवर्ग का वर्ण है और 'ग' झल् प्रत्याहार मेँ सम्मिलित है, अतः इस सूत्र से 'ज्' को कवर्ग का यथासंख्य 'ग्' आदेश हो जायेगा। तब वर्णोँ की स्थिति होगी-
ग् ग् ञ्
इस प्रकार हम देखते हैँ कि ज् का संयुक्त रुप से 'ज्ञ' उच्चारण की प्रक्रिया मेँ उपर्युक्त विधि से 'ग् ग् ञ्' इस रुप से उच्चारण होता है। यहाँ जब ज् रुप ही शेष नहीँ रहा तो 'ज् ञ्' इस ध्वनिरुप मेँ इसका उच्चारण कैसे हो सकता है? अतः 'ज्ञ' का सही एवं शिक्षाव्याकरणशास्त्रसम्मत उच्चारण 'ग्ञ्' ही है।।
जय श्री राम !!!
Thursday, 1 May 2025
पूजा आदि में सिर नहीं ढंका चाहिए
Tuesday, 19 May 2020
वैदिक प्रश्नोत्तर
#प्रश्नोत्तर
"सादर प्रणाम"
कुछ प्रश्नों के उत्तर देने की कृपा करें।
१-पिता के जीवित होते बेटा किन्हें किन्हें तर्पण कर सकता है?
२-मामा की पुत्री से विवाह अगर सम्मत है तो किन बातों का ध्यान रखना उचित है।
३-ऋतु स्नान के बाद स्त्री जिसे प्रथम बार देखती है वैसी छाप आने वाली सन्तान पर पड़ती है तो प्रश्न यह कि कौन सा ऋतु स्नान सर्व प्रथम वाला या गर्भाधान के पहले वाला स्नान?
४-श्रीगणपति जी पर अगर भूल वश तुलसी चढ़ जाती है तो इसके लिये क्या प्रायश्चित है?
५-पूजन में देवताओ को चंदन आदि लगाते समय किस प्रकार की मर्यादा है? ...यथा चरणों मे या पादुका में चंदन लगा कर मस्तक में लगाने में किसी प्रकार का निषेध आदि?
जयश्रीराम
#उत्तर -
1 जिसके पिता जीवित हों वे भी नित्य तर्पण कर सकते हैं, परंतु दिव्य पितरों तक ही, आगे अपने पितरोंका /मनुष्य पितरों का तर्पणादि न करें ।
और जिसके पिता जीवित हो वह पूर्ण अपसभ्य भी ना हो
#प्राचीनावीतीत्वाप्रकोष्ठठात्।
प्रकोष्ठ तक ही अपसव्य अवस्था में जनेऊधारण करें।
2 हमारे यहां वेदकी 1131 शाखाएं हैं उनके अनुसार पद्धतियां और विधान भी पृथक पृथक उपलब्ध होते हैं।
जिन विधानोंमें आपस में विरोध नहीं है और किसी शाखा में उसका उल्लेखभी नहीं है ,तो उस कार्य को दूसरी शाखा वाले के अनुसार भी दूसरी शाखा वाला कर सकता है।
परंतु किसी शाखा में किसी भी विधान पद्धति को अलग प्रकार से कहा गया है और दूसरी में अलग प्रकार से कहा गया है, तो उन दोनों का आपस में मेल नहीं हो सकता अर्थात दोनों को अपनी अपनी शाखा अनुसार ही बर्ताव करना चाहिए यही सभी शास्त्रों का निर्णय है ।
#पारक्यमविरोधीचेत्।
इसी नियमानुसार कुछ ऋग्वेद की और कुछ कृष्ण यजुर्वेदादिकी शाखा वालों ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्यों के लिए मामा की बेटी से विवाह करना शास्त्र ने वैध बताया है अर्थात विधान किया है, जिनके लिए विधान किया है अर्थात जिनके यहां वंश परंपरा से यह कार्य चलता आ रहा है उनके लिए यह धर्म एवं शास्त्र सम्मत है ऐसा दक्षिण के कई पवित्र ब्राह्मणों के यहां भी देखा सुना जाता है।
परंतु जिन शाखा वालों के यहां, जिस देश में अथवा जिन कुलों में परंपरा से यह प्राप्त नहीं है जिनके यहां यह काम नहीं होता बल्कि निंदित माना जाता है उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए ।
ऐसा निर्णय निर्णयसिंधुमें लिखा हुआ है विस्तार से आप वहां देख सकते हैं।
3 हमारे धर्म ग्रंथों के अनुसार तो प्रथम रजोदर्शन भी पति के घर पर ही होना चाहिए (आज की परिस्थिति अलग है) हर एक रजोदर्शन के बाद शुद्धि के उपरांत सर्वप्रथम अपने पति का ही मुख देखा जाए ऐसा माताओं के लिए शास्त्र में स्पष्ट उल्लेख है ।
इस बात को यूं समझ सकते हैं कि दिन में या संध्याकालमें गर्भाधान करने से संतान क्रूर होती है ,ऐसा कहा गया है।
तो क्या गर्भाधान न करने की दृष्टि से दिन में मैथन किया जा सकता है?
इसका उत्तर देते हुए टीका कारों ने लिखा है कि नहीं । तब भी निषिद्ध है , अगर उससे पुत्र नहीं हुआ तब भी अगले पुत्र में वह दोष आएगा, अगले जन्म में जाएगा , उसका तो वह दोषी होगा ही।
ठीक इसी प्रकार सभी रजोदर्शन ओं में नियम पालन करना जरूरी है ।
परंतु गर्भाधान से पूर्व में विशेष ध्यान रखा जाए ऐसा तात्पर्य शास्त्र कारों ने दर्शाया है ।
4 कई ऐसे अपराध हैं जिनका प्रायश्चित स्पष्ट रूप से शास्त्रों में नहीं लिखा है।
उनके लिए शास्त्रों ने एक नियम बनाया है ,एक निर्देश किया है कि जिन का प्रायश्चित नहीं लिखा है
उनका प्रायश्चित प्राणायाम है
देवता का स्मरण है
क्षमा याचना है
और भगवन्नाम है।
इसलिए अपनी शक्ति अनुसार प्राणायाम करें
गणेश जी से क्षमा याचना करें ।
और अपने इष्टदेव का नाम संकीर्तन करें।
तो कई प्रकार के दोषों का प्रायश्चित हो जाता है यहां भी यही कार्य करना चाहिए।
5 मुख्य रूप से साधारण पूजन में देवताओं के इष्ट देवों के मस्तक पर ही तिलक लगाने का विधान है, तो वहां कोई आपत्ति ही नहीं है।
परंतु विशेष पूजनमें चरणों का भी पूजन होता है, चरण पादुका ओं का भी होता है और देवता का तो होता ही है ।
तो ऐसी जगहों पर अलग-अलग पात्रों में चंदन रखना चाहिए
यह तंत्र शास्त्रों में विशेष पूजन की विधि में आप देखेंगे तो वहां पाद्यके लिए पात्र अलग रखा जाता है, अर्घ्य के लिए अलग रखा जाता है।
पूरी पात्रासाधन की प्रक्रिया बड़ी जटिल और कठिन है सादा रूप से किसी पंडित के भी बस की बात नहीं है बिना योग्य गुरु से पढ़े और उसका अभ्यास किए बिना ।
तो कहने का तात्पर्य यही है कि जहां चरणों का और देवता का पूजन दोनों का करना हो तो अलग-अलग पात्रों में चंदन रखें और अलग-अलग रूप से निवेदन करें ।
बीच-बीच में हाथ धुलने की परंपरा भी पूजन क्रम में ध्यान रखने योग्य है।
पूजन की पद्धति तो विशेष है बहुत विधि निषेध हैं तंत्र शास्त्रों में आगम शास्त्रों में अवश्य देखनी चाहिए।
वर्तमान में जो भी पूजन क्रम चल रहा है इसका मूल तंत्र ही हैं।
राजेश राजौरिया वैदिक वृन्दावन।
नमः पार्वतीपतये हर हर महादेव।
कालसर्प योग पर विचार
कालसर्प योग और एक आख्यान : एक वर्ष पूर्व की बात है, कोई हमारे परिचित अपने परिचित सरकारी विभाग में कार्यरत दम्पत्ति से बात करवाये और वे ...
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जन्मना जायते शूद्रः संस्काराद् द्विज उच्यते। वेदपाठाद् भवेद् विप्रः ब्रह्म जानाति ब्राह्मणः।। इसके आधार पर यदि आप इसका ये अर्थ करतें हैं क...
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रामपाल तो सामने आने से रहा , तथापि रामपाल के कथित चेलों के माध्यमेन इसे सामने ( लाइन हाजिर ) लाकर इसकी पोल खोली जा रही है , य...
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