Thursday, 8 October 2026

ज़ह्ळ को जालंधर कहने वालों का खंडन

देअ श्री श्री श्री खुडीज़ह्ळ जी को जालन्धर कहने वालों का भ्रमभंग - 

भ्रम - प्रभु श्री ज़ह्ळ जी के मुख के सिर में चंद्रमा है तो इन्हें शिव अंश जलंधर कहना भी सही रहेगा।

भ्रमभंग - आपको यह भ्रम देअ, ज़ह्ळ, भनूक में अभेद मानने से हुआ है जबकि इनमें भेद है। जिस मुख की आप बात कर रहे हैं उस पर दो मत है - पहला यह कि यह भनूक है। दूसरा यह कि यह देअ का पुराना भौम मौळिमुख है। अब इसमें पहला पक्ष अधिक प्रचलित है। इस बात से यह सिद्ध होता है कि यह मुख ज़ह्ळ का नहीं है, अतः इससे ज़ह्ळ को जालंधर मानने वाला भ्रम स्वत: निरस्त हो गया। दूसरी बात यह कि चंद्रमा से जालंधर की कल्पना क्यों कर रहे हो सीधे शिव की कल्पना क्यों नहीं करते? यदि कहो कि तो भनूक जालंधर है तो इस पर यह जानना चाहिए कि ऐसी कोई हमारी परम्परा ही नहीं है। येन-केन प्रकारेण जालंधर क्यों सिद्ध करना चाहते हो? 

भ्रम - जालंधर (जलंधर) को पुराणों में सामान्यतः “राक्षस” या “असुर” प्रकृति के पात्र के रूप में वर्णित किया जाता है, लेकिन अधिक सटीक शब्द “असुर” है। जलंधर का उल्लेख मुख्यतः शिव पुराण और अन्य पौराणिक परंपराओं में मिलता है। उसे अत्यंत शक्तिशाली असुर राजा बताया गया है। उसकी उत्पत्ति भगवान शिव के तेज/क्रोध से हुआ है। भनुक धराक्स देवता है वह जालंधर भी शिव जी का अंश था वह असुरों का राजा था। 

भ्रमभंग- पुराण आदि में अनेक ऐसे शक्तिशाली राक्षसों का वर्णन मिलता है आपने जालंधर की ही कल्पना क्यों? भनूक की उत्पत्ति शिव के तेज़ से हुई है ऐसी कोई प्रमाण हमारी देव परम्परा में नहीं है। न ही भनूक को असुरों का राजा कहा जाता है। जालंधर शिवांश होने पर भी पूरा राक्षस था पर भनूक आधा राक्षस कहा जाता है। इसलिए ध्राक्सअ कहा । ध्राक्से का अर्थ ही तमोगुण प्रधान देव समझना चाहिए। सामान्य लोक भाषा में आधा राक्षस कहा जाता है। जालंधर की उत्पत्ति भगवान शिव के तीसरे नेत्र की अग्नि और समुद्र के मिलन से हुई थी। यह एक ही बाल रूप में उत्पन्न हुआ था। जबकि भनूक की उत्पत्ति का ऐसा कोई प्रमाण हमारे यहां नहीं है। यदि कहो कि ज़ह्ळ की उत्पत्ति जल में हुई है इसलिए ज़ह्ळ जालंधर है तो इस पर भी यह जान लो कि ज़ह्ळ की उत्पत्ति सरोवर में हुई थी। समुद्र में नहीं। एक साथ सात भाईयों की उत्पत्ति हुई थी। एवं शिव के तेज़ से ज़ह्ळ की उत्पत्ति का कोई प्रमाण नहीं है। 

भ्रम - ज़ह्ळ जल से उत्पन्न हुआ है इसलिए ज़ह्ळ जालंधर है।

भ्रमभंग- जल से तो अमृत, शंख, हलाहल विष, लक्ष्मी, कुवेर, धन्वंतरि, ऐरावत एवं कामधेनु आदि अनेक दिव्य विभूतियों की उत्पत्ति हुई है। उनको जालंधर क्यों नहीं मानते आप? जो जो जल से उत्पन्न हुआ है बो बो जालंधर है ऐसा कोई नियम नहीं है।

इसलिए भनूक/ज़हळ को जालंधर कहना या मानना अनुचित है।  

हर हर महादेव 

Saturday, 26 September 2026

मंदिर में ढोल नगाड़े का महत्व

जिला प्रशासन की अनदेखी से आरती और पूजा के दौरान शहनाई और नगाड़ा वादन करने वालों के अस्तित्व को खतरा 
              लक्ष्मीनाथ मंदिर में आरती और पूजा के दौरान शहनाई और नगाड़ा वादन का बहुत अधिक धार्मिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्व है। सनातन परंपरा में इन वाद्यों को केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि देवताओं के आह्वान और सकारात्मक ऊर्जा का माध्यम माना गया है।
        पूजा के दौरान इनके महत्व को आप निम्नलिखित बिंदुओं से आसानी से समझ सकते हैं:
1. देव-आह्वान और मांगलिकता (Divine Invocation)
शहनाई: 
            शहनाई को एक परम मांगलिक (शुभ) वाद्य माना जाता है। इसकी सुरीली ध्वनि से वातावरण में पवित्रता का संचार होता है, जो भगवान के स्वागत का प्रतीक है।
नगाड़ा: 
                 नगाड़े की गंभीर और भारी ध्वनि देवताओं के आह्वान (बुलाने) के लिए की जाती है। ऐसा माना जाता है कि इसकी गूंज से अलौकिक शक्तियां जाग्रत होती हैं।
2. नकारात्मक ऊर्जा का नाश और ध्यान केंद्रित होना
ध्वनि तरंगें: 
               आरती के समय जब शहनाई की मधुर तान और नगाड़े की थाप एक साथ मिलती है, तो उससे तीव्र ध्वनि तरंगें (Vibrations) पैदा होती हैं।
एकाग्रता: 
                यह संयुक्त ध्वनि मंदिर में मौजूद भक्तों के मन को भटकने से रोकती है। इससे बाहरी शोर शांत हो जाता है और भक्त पूरी तरह से पूजा में लीन (एकाग्र) हो पाते हैं।
सकारात्मकता: 
               शास्त्रों के अनुसार, नगाड़े की गूंज से मंदिर परिसर और उसके आसपास की सभी नकारात्मक ऊर्जाएं और बुरी शक्तियां दूर भागती हैं।
3. राजोपचार पूजा का हिस्सा (Royal Rituals)
               हिंदू धर्म में भगवान को एक राजा के रूप में पूजा जाता है, जिसे राजोपचार पूजा कहते हैं।प्राचीन काल में राजाओं के दरबार या आगमन पर जैसे शंख, नगाड़े और वाद्य यंत्र बजाए जाते थे, ठीक वैसे ही मंदिरों में भगवान की आरती (सुबह की मंगला आरती या संध्या आरती) के समय उन्हें राजकीय सम्मान देने के लिए शहनाई और नगाड़ा बजाने की परंपरा है।
4. समय और सेवा का संकेत
               पुराने समय में जब घड़ियां नहीं होती थीं, तब मंदिरों से आने वाली नगाड़े और शहनाई की आवाज से ही आस-पास के ग्रामीणों को पता चलता था कि भगवान की आरती का समय हो गया है।यह ध्वनि लोगों को अपने घरों में भी भगवान का स्मरण करने का संकेत देती थी।
5. नाद ब्रह्म की साधना
              भारतीय दर्शन में ध्वनि को 'नाद ब्रह्म' (भगवान का ध्वनि रूप) माना गया है। शहनाई और नगाड़े का वादन इसी नाद ब्रह्म की उपासना है, जो सीधे आत्मा को परमात्मा से जोड़ती है।
              सदियों से लक्ष्मीनाथ मंदिर में शहनाई और नगाड़ा वादन केवल संगीत नहीं, बल्कि ईश्वर की 'अष्टयाम सेवा' और दिव्य पूजा का एक अनिवार्य आध्यात्मिक हिस्सा है। भारतीय शास्त्रीय संगीत और मंदिर परंपरा (विशेष रूप से पुष्टिमार्ग हवेली संगीत और काशी विश्वनाथ जैसी शैव परंपराओं) में समय और आरतियों के अनुसार रागों का बदलना एक गहरा विज्ञान है। वही अष्टयाम सेवा और दिव्य पूजा शहनाई और नगाड़ा वादन द्वारा संझोगड़े, विहागड़े आदि के माध्यम से लक्ष्मीनाथ मंदिर परिसर में मंगल आरती,श्रृंगार आरती,भोग आरती, संध्या आरती और शयन आरती के समय रियासत काल से एक सहस्त्रवादी से प्रचलन में हैं।
  बीबीएन नन्न न शहनाई को 'मंगलवाद्य' माना जाता है जो अपनी सुरीली ध्वनि से वातावरण को शुद्ध करती है, जबकि नगाड़ा (दुन्दुभि) अपनी गंभीर गर्जना से ब्रह्मांडीय ऊर्जा (नाद ब्रह्म) का संचार करता है।
1. विभिन्न आरतियों में रागों का परिवर्तन (समय चक्र के अनुसार)
          हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत का 'समय सिद्धांत' मंदिरों की आरतियों से सीधा जुड़ा है। जैसे-जैसे दिन का प्रहर बदलता है, भगवान के स्वरूप और भाव के अनुसार शहनाई के सुर और नगाड़े की थाप बदल जाती है:
         आरती का प्रकारसमय/प्रहरप्रमुख राग (शहनाई पर)संगीत का भाव और नगाड़े की गति
मंगला आरती
           भोर (प्रातः 4 से 5)राग भैरव, भैरवी, रामकलीभाव: 
           भगवान को जगाने का शांत और कोमल भाव। नगाड़े की थाप बहुत धीमी और गंभीर होती है।
शृंगार व भोग आरती
             सुबह (8 से 11)राग बिलावल, सारंग, जौनपुरी भाव: 
            उत्साह और राजसी ठाट-बाट। संगीत में चंचलता आती है, नगाड़े की गति मध्यम और लयबद्ध होती है।
संध्या आरती
              गोधूलि वेला (शाम 6 से 7)राग यमन, पूरिया धनाश्री, मारवाभाव: 
               समर्पण, शांति और भक्ति। आरती के समय नगाड़ा अपनी पूरी तीव्रता (द्रुत लय) पर होता है।
शयन आरती 
              रात्रि (9 से 10:30)राग केदार, बिहाग, दरबारी कांडा भाव:
            विश्राम, निद्रा और परम शांति। शहनाई के सुर बेहद कोमल और मंद हो जाते हैं। नगाड़े का उपयोग बंद या अत्यंत धीमा हो जाता है।
             लक्ष्मीनाथ मंदिर की शयन आरती विश्व प्रसिद्ध है। रात के समय महाराज श्री लक्ष्मीनाथ के शयन के समय शहनाई पर अत्यंत विरह और शांति प्रधान राग (जैसे राग बिहाग) बजाए जाते हैं।प्रातः से रात्रि शयन तक शहनाई की वायु-तरंगें (Wind Instrument) और नगाड़े का कंपन (Resonance) मंदिर परिसर के भीतर संचित नकारात्मक ऊर्जा को समाप्त करते हैं।मन की एकाग्रता बढ़तीं है । आरती के समय जब घंटियों और शंख के साथ नगाड़ा तीव्र गति से बजता है, तो भक्त का मन बाहरी दुनिया से कटकर पूरी तरह भगवान के विग्रह पर केंद्रित हो जाता है।
            वर्तमान में लक्ष्मीनाथ मंदिर में शहनाई और नगाड़ा वादन करने वाले पारंपरिक कलाकारों की आर्थिक स्थिति और मेहनताने की दुर्दशा एक अत्यंत गंभीर और चिंताजनक विषय है। सदियों से इन कलाकारों ने हमारी सांस्कृतिक और धार्मिक धरोहर को जीवित रखा है, लेकिन आज के इस आधुनिक युग में वे गंभीर आर्थिक संकट और उपेक्षा का सामना कर रहे हैं।देवालयों के इन पारंपरिक संगीतकारों की दुर्दशा के मुख्य कारण और उनकी स्थिति निम्नलिखित बिंदुओं के माध्यम से समझी जा सकती है:
अत्यंत कम और अपर्याप्त मानदेय (मेहनताना)नाममात्र का मानदेय: 
            प्रशासन और ट्रस्ट के नियंत्रण में आने के बाद इन वादकों को मिलने वाला मासिक मानदेय बेहद कम है। बढ़ती महंगाई के दौर में यह राशि इतनी कम है कि इससे परिवार का गुजारा करना भी असंभव हो जाता है।
न्यूनतम वेतन नियमों का अभाव: 
          देश के अधिकांश हिस्सों में मंदिरों के सेवादारों, पुजारियों और पारंपरिक संगीतकारों के लिए कोई न्यूनतम वेतन तय नहीं है। हाल ही में इस मुद्दे को लेकर न्यायालयों में जनहित याचिकाएं (PIL) भी दायर की गई हैं, ताकि इन सेवादारों को भी सम्मानजनक हक मिल सके।चढ़ावे और दक्षिणा पर रोकआधुनिक व्यवस्था की मार: 
            पहले के समय में भक्तगण खुश होकर इन कलाकारों को सीधी दक्षिणा या चढ़ावा दे देते थे। लेकिन अब मंदिर का सरकारीकरण हो चुका है, जहां हर जगह सीसीटीवी कैमरे और दानपात्र रख दिए गए हैं।नियमों की सख्ती: सीधे तौर पर पुजारियों या वादकों को पैसे देने पर रोक होने के कारण उनकी अतिरिक्त आय का यह एकमात्र जरिया भी बंद हो गया है।
रोजगार का अनिश्चित स्वरूप सीमित अवसर: 
           मंदिर परिसरों के बाहर, केवल शादियों और विशेष त्योहारों के सीजन में ही इन्हें काम मिल पाता है। लेकिन आधुनिक समय में डीजे, डिजिटल म्यूजिक और ब्रास बैंड के बढ़ते चलन ने पारंपरिक शहनाई और नगाड़ा वादकों की मांग को बहुत सीमित कर दिया है।
नई पीढ़ी का विमुख होना आजीविका का संकट: 
             आर्थिक बदहाली और समाज में उचित सम्मान न मिलने के कारण इन कलाकारों की नई पीढ़ी इस पुश्तैनी कला को अपनाने से कतरा रहे हैं।
            लेकिन वर्तमान में जिला प्रशासन द्वारा अनदेखी से यह परंपरा अब ह्रास की और अग्रसर है। दिन में पाँच बार नगाड़ा और शहनाई वादन के बाद भी मात्र 50/- रुपये दिन के प्रति व्यक्ति मेहनतना मिलता है।अर्थात् 1500/- रुपये मासिक।जोकि श्रम क़ानून के अनुसार न्यूनतम धियाड़ी से भी कम है।क्या ये प्रशासन स्वयं श्रम क़ानून का उलंघन नहीं कर रहा? इतने कम मानदेय से क्या परिवार का लालन पालन संभव है।मंदिर अधिकारी से नगाड़ा और शहनाई वादकों ने केई बार गुहार लगाई पर परिणाम शून्य।
            माननीय मुख्यमंत्री श्री सुखविंदर सिंह ठाकुर जी, माननीय विधानसभा अध्यक्ष श्री कुलदीप सिंह पठानिया जी, नवनियुक्त ट्रस्ट सदस्यों से निवेदन है कि लक्ष्मीनाथ मंदिर के इन दोनों नगाड़ा और शहनाई वादकों को न्यूनतम मानदेय दे कर कृतार्थ करें। ताकि भविष्य में भी यह अपनी सेवायें दे सकें।
                    डॉ. राजेश सहगल 
        पुरातत्वविद एवम स्थानीय निवासी 
                      चम्बा हिमाचल प्रदेश ।

Friday, 25 September 2026

मिट्टी से शौच विधान

मलमूत्रशुक्रत्याग के बाद शास्त्र ने जल और मिट्टी से गुह्याङ्ग और हाथ-पैर की शुद्धि निश्चित्त की हैं उसमें पवित्रता होना ही मुख्यत्वे प्रयोजन हैं। ऐसी शुद्धि साबुन शेम्पू सेनेटाईझर आदि से नहीं होती उपर से केमीकल अण्डे की जर्दी , प्राणियो की चरबी आदि से बने साबून-शेम्पू से तो अपवित्रता ही रहती हैं । 

हे आधुनिको ! ऐसी कोई वैज्ञानिकता नहीं हैं कि साबुनशेम्पू से शौचाचार करनेपर शास्त्रीय अधिकारीत्व प्राप्त होता हो !

चरबी , वीर्य(रज), रक्त , मज्जा , मूत्र , विष्ठा , नासिकामल , कर्णमल , कफ , आँसु , आँखो के चीपडे़ और प्रस्वेद -- यह बारह मनुष्य के मल हैं मनुस्मृति ५/१३५ , इसमें से प्रथम छह की शुद्धि जल और मिट्टी के संयोग से ही होती हैं ,दूसरे छहों की केवल जल से वैसे भी शुद्ध्याशुद्धि विषय शास्त्र का हैं "प्योर अथवा क्लिन " जैसा कोई शब्द हमारे शास्त्र में नहीं हैं । क्लिन का अर्थ होता हैं साफ करना साबुनशेम्पू से सफाई करने पर धूला केमिकल युक्त जहरीला पानी सुक्ष्मजीवों का नाशक हैं जबकि हमारे धर्मशास्त्र में मच्छर तक जीवो पर हिंसाभाव नहीं हैं। 

मिट्टी में रहे अपराध नाशक गुण ->  

हे वसुन्धरे ! तुम्हारे उपर अश्व और रथ चला करते हैं तथा वामनावतार में भगवान विष्णुने भी तुम्हें अपने पैरों से नापा था मृत्तिके मेरे किये हुए पूर्वसञ्चित पापो को हरे इत्यादि ...

"अश्वक्रान्ते रथक्रान्ते विष्णुक्रान्ते वसुन्धरे। उद्धृतासि वराहेण कृष्णेन शतबाहुना।। मृत्तिके हर मे पापं यन्मया पूर्वसञ्चितम् ।।
~~~~~= ⚛️अग्नि पुराण⚛️=~~~

कैसी मिट्टी चाहिये , कितनी , किसे कहाँ कितनी बार मिट्टी लगाकर शौच करना आवश्यक हैं यह सब शास्त्र आज्ञा करते हैं और अक्कल के आधुनिक दुश्मनो ! आपके बहकावे में , आपके कहावें में हम क्यों आवे क्योंकि हम "मानव्यो हि प्रजाः " मनु की ही तो प्रजा हैं , दानव्यप्रजा नहीं हैं कि किसी के कहावे में आकर अमेध्यपदार्थ को शरीरपर घीसडचूपड करा करे ।

अकेला शौचाचार नहीं अपितु कौनसे द्रव्य , वस्त्र , पात्र, पदार्थ की शुद्धि कैसे की जाती हैं वह भी स्मृतियों में उक्त हैं । मनुस्मृति अध्याय ५ / १०५ से १४५ अवलोकनीय हैं।

विशेष - जो ब्राह्मण मल- मूत्रत्याग, शुक्रमोचनोपरांत अपने गृह्यसूत्रादि शास्त्रप्रोक्त संख्यानुसार जल और मिट्टी से शौचाचार नहीं करते उस विप्र को चाहे वेदविद् भी क्यों न हो उसे किसी भी प्रकार का काम्यदान न दिया जाय , शौचाचारशून्य, ब्रह्मचर्यादि व्रतभ्रष्ट वेदविहीन विप्र को अन्नदान करनेपर , स्वयं अन्नदेवता रुदनपूर्वक विचार करते हैं कि मैरे ऐसे कौनसे पाप हैं कि मैं इनके भाण्ड में आ गया । शौचाचारहीन , ब्रह्मसूत्रविहीन विप्र के द्वारा किया हुआ होमहवन ,दान और तप आदि नष्ट हो जाते हैं --->
नष्टशौचे व्रतभ्रष्टे विप्रे वेदविवर्जिते। 
रोदित्यन्नं दीयमानं किं मया दुष्कृतं कृतम्।। शौचहीनाश्च ये विप्रा न च यज्ञोपवीतिनः। 
हुतं दत्तं तपस्तेषां नश्यत्यत्र न संशयः।। 
~~~~= दानसागरे व्यासः=~~~

मृत्तिका के बिना शौच करनेवाला विप्र सातदिन में बिना प्रायश्चित्त किये शूद्र के समान वेदादिकर्मो में अनधिकारी हो जाता हैं - >
चतुर्वर्ग चिंतामणि प्रायश्चित्त खण्डे -- मृत्तिकाभिर्विना शौचं स्नानमुष्णोदकेन वै। कूपोदकेन सप्ताहं कृत्वा विप्रः स शूद्रवान्।। ~~~~~~~~~~⚛️गौतम⚛️~~~~~~~~
उष्णोदकेन सप्ताहं तथा कूपोदकेन च । मृत्तिकाभिर्विना शौचं तथा कूपोदकेन च। कृत्वा शौचादिकं विप्रः शूद्र एव न संशयः।। ~~~~~~~~~⚛️जाबालिः⚛️~~~~~~~

अनधिकारी हुए इसलिये तो कहा हैं कि - शौचाचार में सदा प्रयत्नशील रहना चाहिये, क्योंकि त्रैवर्णिकद्विजो के द्विजत्व संरक्षण का मूल शौचाचार ही हैं। शौचाचार का पालन न करनेपर सारी क्रियाएँ निष्फल हो जाती हैं -

शौचे यत्नः सदा कार्यः
        शौचमूलो द्विजः स्मृतः।
शौचाचारविहीनस्य 
       समस्ता निष्फलाः क्रियाः।। 
~~~~~~⚛️वाधूल स्मृति ⚛️~~~~~

और शौचादि के आचार आदि विप्रो को अपनी अपनी वेदशाखा के गृह्यसूत्र से ही मान्य हैं अन्यथा अनाचारी होते ही वेद भी पावन नहीं कर सकते ->

कर्ममात्रं_स्वसूत्रशास्त्राद्
            #आचारादि_प्रचोदितम्।।((लौगाक्षीस्मृतौ।।)) तथा च

स्वकल्पोक्तं परित्यज्य    
             योऽन्यकल्पोक्तमाचरेत्।
#स्वाचारहीनोऽनाचारस्तं -
              - -- वेदा न पुनंति हि।। 
[स्वकल्पोक्तं यथा गृह्यसूत्राद्युक्तम्]
=====~ मन्त्रभ्रान्तिहर सूत्र~======

आचरण का परित्याग करने से ब्राह्मण का ब्राह्मणत्व विनाशोन्मुख हो जाता हैं - >

अनभ्यासेन वेदानां आचारस्य च वर्जनात्।
आलस्यादन्नदोषाच्च मृत्युर्विप्राञ्जिघांसति।।
=====⚛️((( मनुः ५/४।।))⚛️===== शास्त्रीय मार्गदर्शक 

❗जय महादेव❗
 ⭕प्रश्न नहीं स्वाध्याय करें‼️

Saturday, 12 September 2026

वेदादिक शास्त्र ग्रन्थों की प्रबलता का क्रम

वेदादिशास्त्रग्रन्थों की प्रबलता का क्रम
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माध्यन्दिनीय-वाजसनेयि-शुक्लयजुर्वेद के अनुयायियों के लिए शास्त्र-ग्रन्थों की मान्यता के साथ-साथ उनकी प्रबलता का क्रम इस प्रकार रहा है—

१. माध्यन्दिनीय-वाजसनेयि-शुक्लयजुर्वेद-मन्त्रसंहिता
२. माध्यन्दिनीय-वाजसनेयि-शुक्लयजुर्वेद-शतपथब्राह्मणम्
३. कात्यायनश्रौतसूत्रम्
४. पारस्करगृह्यसूत्रम्
५. कात्यायनीयाष्टादशपरिशिष्टानि
६. अन्यानि वेदाङ्गानि 
[शिक्षा-वाजसनेयिप्रातिशाख्यम्, व्याकरणम्- पाणिनीयव्याकरणाष्टाध्यायी (कात्यायनादिकृतवार्त्तिकेष्टिसहिता), निरुक्तम्-निघण्टुसहितं निरुक्तम् (यास्कीयम्), पिङ्गलच्छन्दःसूत्रम्, वेदाङ्गज्योतिषम् (लगधमुनिप्रोक्तमार्चं याजुषं च)]

७. जैमिनीय-धर्ममीमांसासूत्रम् (१-१६) , बादरायणीय-ब्रह्ममीमांसासूत्रम् (१-४)
८. याज्ञवल्क्यस्मृतिः 
९. मनुस्मृतिः इत्याद्या अन्याः स्मृतयः
१०. पुराणानि, रामायणम्, महाभारतञ्च ।

साथ ही वेदादिशास्त्र का बलाबलत्व और मर्यादा का क्रम तथा स्वसूत्र (स्वकल्प) का महत्त्व समझानेवाले वचन "कातीयमन्त्रभ्रान्तिहरसूत्र" में इस प्रकार हैं- 

अनाद्यनन्ता वै वेदा बह्वाचारप्रदर्शकाः। 
वेदविद्भिरतः कल्पाः प्रोक्तास्तत्त्वप्रदर्शकाः॥
सर्वे स्ववेदकल्पोक्तं कर्म कुर्युरतन्द्रिताः। 
मन्त्र-द्रव्यादिषु स्वत्वादधिकारोऽन्यथा न हि॥
ज्ञानतः सर्ववेदेषु स्वकल्पेष्वधिकारिणः । 
प्रामाण्यमादौ ज्ञात्वैव श्रुति-कल्प-स्मृतीषु च॥
बलाबलं च तत्राऽपि विरोधात् स्वत्वदर्शनात्।
वेदाः प्रमाणमङ्गानि परिशिष्टाः ससाधनाः॥
स्मृतयश्च पुराणानि तेषां स्वत्वे विशेषतः। 
श्रुत्योर् विरोधे स्वत्वादौ स्वश्रुतिश् च बलीयसी॥
मन्त्र-चोदनयोर् मन्त्रः प्रयोगित्वाद् बलं यतः। 
श्रुति-कल्पविरोधे तु श्रुतिर् वै कल्पसाधनात्॥
विरोधे कल्प-कल्पयोः स्वकल्पः स्वश्रुतिक्रमात्। 
कल्प-स्मृतिविरोधे तु कल्प एव प्रयोगितः॥
स्मृत्योर् विरोधे सम्प्राप्ते स्वस्मृतिः कल्पसाधनात्। 
स्मृतिर् बलीयसी ज्ञेया द्वैधे स्मृतिपुराणयोः॥
स्मृतीनां श्रुतिमूलत्वात् पुराणं स्मृतिसाधनम्। 
एवं बलाबलं ज्ञात्वा श्रुतिकल्पस्मृतीषु च॥
कर्माणि फलयुक्तानि कुर्युः कर्मविदोऽनिशम् । 
ज्ञात्वा कर्माणि यः कुर्यात् साङ्गानि विधिपूर्वकम्॥
फलं ब्रह्मार्पणं कृत्वा ब्रह्मलोकं स गच्छति॥
----------------मन्त्रभ्रान्तिहरसूत्रे, ९९-१०९ श्लोकाः ।

Saturday, 29 August 2026

कालसर्प योग पर विचार

कालसर्प योग और एक आख्यान : 

एक वर्ष पूर्व की बात है, कोई हमारे परिचित अपने परिचित सरकारी विभाग में कार्यरत दम्पत्ति से बात करवाये और वे दम्पत्ति हमारे पास स्वपुत्र की समस्या पर कुंडली भिजवाये , किन्हीं महानुभाव पंडित जी ने कालसर्पदोष बताया था तो कुछ चिन्तित थे । बेटा पढाई में मन नही लगाता , कुसंगति आदि समस्या ; जन्मांगचक्र देखकर हमने प्रामाणिक ज्योतिष ग्रन्थानुरूप शास्त्रीय उपाय जो हमें समझ आया , बता दिया तथा कालसर्प दोष की बात पर हमने इतना ही कहा कि हमें तो ऐसा कोई दोष इसमें नहीं दिखता , फिर भी जिनको लगता है , उस पर हम कुछ भी कहना उचित नहीं समझते। उस कुण्डली में वह बारह प्रकार के मुख्य कालसर्प में से कुछ था भी नहीं , जिसमें कि सारे ग्रह आरोह क्रम से राहू केतु की पकड़ में आ जायें, आंशिक कह सकते द्विवेदी जी के कथनानुसार क्योंकि श्री भोजराज द्विवेदी जी ने तो आंशिक कालसर्प दोष को भी पर्याप्त समर्थन करते हुए संख्या बहुत अधिक बता दी है, ऐसे में अधिकांश कुंडलियां सब चपेट में आती हैं, शास्त्र में विधान नहीं तो निषेध भी कहॉ है, ज्योतिष जैसे अपार विद्या में नवीन अनुसन्धानों को महत्त्व क्यों नहीं देना चाहिये इत्यादि तर्क इस कालसर्प समर्थक पक्ष से प्रस्तुत किये गये हैं । गीताप्रेस के ज्योतिषतत्त्वांक में भी इस प्रकरण पर श्री हरिनारायण शास्त्री जी व श्रीमनोहर वर्मा जी नामक विद्वानों के वक्तव्य हैं । चौखम्भा आदि संस्थानों से कालसर्पदोष शान्ति के ग्रन्थ छपे हैं, जो जिज्ञासावश हमने भी अध्ययनार्थ मंगाये । अब तो हमारी देवभूमि के प्रसिद्ध पंचांग में भी विशेष लेख और इस पर व्यापक विवरण प्राप्त कराया जा रहा है, जिसमें श्रीमद्देवी भागवत , नवम स्कन्ध से नागमाता मनसा देवी के स्तोत्र व मन्त्र की भी बात की गयी है । तो उन्होंने कालसर्प योग के प्रति ही अपना आकर्षण चरितार्थ किया , अब संयोग की बात ये भी थी कि जिन पंडित जी से उन्होंने कार्यक्रम करवाया , उनसे एक बार हमारी भेंट हो चुकी थी, हमारे घर पर आये थे कहीं किसी अनुष्ठान में जाते समय, थोड़े कुतर्की टाइप थे, सिगरट उनके मुख पर रहती थी । पूरा डिब्बा जेब रखे रखते । काफी जगहों पर शिवपुराण आदि कथाऐं भी करते रहते । जब उन दम्पत्ति ने फोन पर हमें बताया कि फलाने स्थान के अमुक पंडित जी हैं तो हम सारी कहानी समझ गये कि क्या ज्ञान कहा होगा उन्होंने , परन्तु यदि किसी की निष्ठा कहीं है तो हम क्यों बीच में बोलें । 
इस प्रकार ,बाद में जब उन परिचित महानुभाव ने बताया कि वे कालसर्प निवारण करवा आये चांदी के नाग बनवा के उनको नदी प्रवाहित करके और पंडित जी ने पर्याप्त दान दक्षिणा भी प्राप्त की , तो हमने कहा कि पंडित जी को दान दक्षिणा की है , श्रद्धा से ग्रह देवताओं का ध्यान किया है, ये तो उत्तम ही है, जेन केन बिधि दीन्हें दान करइ कल्यान । जैसे भी हो परिणाम आना चाहिये । तो हुआ क्या कि अभी कुछ दिनों पूर्व हमें पता चला कि वे दम्पत्ति ज्योतिषियों से रुष्ट थे, बोल रहे थे ज्योतिषियों का सब मूर्ख बनाने का धन्धा है पाखंड है , ज्योतिष भी परख लिया हमने इसमें भी कुछ नहीं सार, बेटा वैसे का वैसा ही है कुछ भी नही हुआ परिवर्तन आदि । इसे सुनने के उपरान्त हमने प्रथम तो ये ही विचार किया कि जब आपके पूर्वकर्मों के अनुरूप ग्रह गोचर कुछ विशेष ही विपरीत हों तो उपाय न तो आपको मिलता है, और कहीं मिल भी गया तो आप कर नही नहीं सकते । दूसरा ये कि इस कालसर्प मामले में हम किसे दोषी कहें , इस विधा को ? उस अनुष्ठान को ? उन ब्राह्मण को या यजमान को ? या काल को ही कारण समझ लिया जाये ! फलित ज्योतिष एक ऐसी विद्या है , कि उसमें भी कुछ ऐसे योग भी कहे जाते हैं , वे जिनके जन्मांगचक्र में हैं, वे जो कहते हैं , उनका कहा होता है और फिर ब्राह्मण का वाक्य भी तो स्वयं में एक महान् बल है, वो जो यजमान के कल्याणार्थ कह दें , वह ग्रह देवता न मानें , ऐसे भी कहना कितना सही है , परन्तु क्या तथाकथित गुटखा /सिगरट खाने पीने वाले , धर्म को न जानकर कुतर्क करने वाले, अन्धेरे में तीर मारकर लम्बा बिल फाड़ने वाले लोग ऐसी योग्यता रख सकते हैं ? किन्तु हम उनको भी दोष क्यों दें, श्री भगवान् ने जैसों के लिये तैसे ही भूदेव बनाये हैं ,यह भी तो एक तथ्य है । जिन्होंने कर्मों से अपने बृहस्पति को खराब किया है, उनको गुरुओं से कहॉ लाभ मिलेगा। जो श्राद्ध नहीं करते , नित्य नैमित्तिक कर्म विधिवत् नहीं करते , ऐसे लोग कितने समय तक देवताओं आदि को अपने अनुकूल रख सकते हैं , क्या कुछ धन खर्च करके स्मार्त्त धर्म की कर्त्तव्यविमुखता के दोष का सदा के लिये शमन हो सकता है ? अतः ब्राह्मणों का दायित्व तो यही है कि प्रयास यही करें कि जिन विषयों में संशय हो , वहॉ प्रामाणिक शास्त्रों में जो प्रामाणिक विधियॉ बताई गयी हैं , ग्रहदोष निवारणार्थ उन्हीं विधियों का अनुपालन करने का प्रयास करें , अपना आहार विहार शुद्ध रखें, निष्काम भाव से परोपकार का ही भाव रखें और लोगों को उनके लिये विहित गृहस्थ के स्मार्त्त आचार के महत्त्व को समझाने का प्रयास करें ।

#सन्मार्ग 
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Wednesday, 26 August 2026

उपाकर्म निर्णय

उपाकर्म २८ को करना ज्यादा प्रशस्त नही है क्योंकि भगवान् पारस्कर ने उपाकर्म के चार मुख्य काल माने हैं श्रवण नक्षत्र,
श्रावणपूर्णिमा, पंचमी, तथा हस्त चूंकि प्रायः श्रावणपञ्चमी मे हस्त होता ही है तथा पूर्णिमा में श्रवण होता है अतः प्रायः दो काल ही मुख्यतया प्राप्त होता है परन्तु इस वर्ष चार काल प्राप्त थे जिसमें तीन बीत गये चौथा काल है पूर्णिमा ।
२७ को पूर्णिमा ९ बजकर कुछ मिनट में लग रहा है अतः पूर्णिमा मध्याह्नकाल में प्राप्त हो रही है और परम्परातः उपाकर्म मध्याह्न स्नान मध्याह्न सन्ध्या और तर्पण के पश्चात् ही किया जाता है जो २८ को कथमपि सम्भव नही है ।
क्योंकि २८ को पूर्णमा ९ बजकर कुछ मिनट में समाप्त हो जारही है ।
यदि २८ को कोई उपाकर्म करता है तो मध्याह्न स्नान मध्याह्न सन्ध्या तर्पण करते ही करते पूर्णिमा व्यतीत हो जायेगी
उपाकर्म के समय भाद्रपद् कृष्ण प्रतिपद् तिथि होगी जो गृह्योक्त न होने से स्वीकार्य नही है ।
पौर्णमासेष्टि का एवं पक्षादि कर्म का काल विज्ञों ने पूर्णिमा का चतुर्थ चरण तथा प्रतिपद् के प्रारम्भ से तीन पाद बताया है चतुर्थ पाद में इष्टि निषेध है तथा पौर्णमास का प्रारम्भ सूर्योदय के पश्चात् करने को कहा है । (स्मार्तोल्लास )
अतः पौर्णमास व पक्षादि कर्म २८ को ही होगा ।
उपाकर्म में मुख्यतया अध्यापन कर्म में युक्त गृह्याग्नि धारक ही अधिकारी है (हरिहिरभाष्य - उपाकर्म प्रकरण )
२८ को यदि उपाकर्म होगा तब क्योंकि उपाकर्म अत्यन्त विस्तृत कर्म है इसमें शिष्यों को प्रत्येक अध्याय व काण्ड का आदि मन्त्र ब्राह्मण अनुवाचन कराना आवश्यक है।
साथ ही होम लाजादि प्राशन आदि भी है
तथा परम्परया सप्तर्षि पूजन यज्ञोपवीत संस्कार आदि भी होता है जिससे उपाकर्म में पूर्णिमा काल प्राप्त नही ही होगा यह तो निश्चित है ।
अतः अनुक्त काल में उपाकर्म उचित नही है जो काशी के पंचांगो में लिखा है
उपाकर्म के नित्य कर्म होने से उसमें भद्रा का विचार नही है
भद्रा का विचार श्रावणी (रक्षा बन्धन ) में है यह स्पष्ट भाष्य में लिखा है अतः
भद्रा के कारण अथवा किसी भी कारण से स्वगृह्योक्त काल का विद्वज्जन परित्याग न करें ।

Tuesday, 18 August 2026

देवता खुडीजह्ळ जी को शाळी लगाने का विचार

देऊआ खुडीजहळा रे शळऊणा होर छैऊणे रा बच़ार लिखिते - 

देऊआ रे सोबे तीह-थैर देऊआ री रेखा अंद्र करणे। ज़े तिथि, नछत्रा होर धैळे मंझ किछ ब्रोध होए ता देऊआ रे प्रोता होर कारदारा, च़करदारा, खुन्हधारी, देऊळु कठ बैठी निर्णय करणा जी। 

देऊआ जो शळऊण गणी च़ीळ्ही लाणा। तिथि, नछत्रा, लग्ना, भद्रा होर धैळे भाळी निर्णय करणा जी। इषु देऊआ ज़ो शळऊण 26 त्रीका बुधवारा ज़ो लाणा शुभ है जी। 

देऊआ छैणे रा बच़ार - शळऊणा लाई दुज्जे धैळे दूह़े देऊ छैणे। पुन्या ज़ो छैणा।छैणे जो भद्रा, नछत्रा होर रछ्या बंधना रा बच़ार नी करणा जी। 

👉 किछ पूछणा ज़ाचणा होए ता देऊआ रे प्रोता (मेरे पूज्य पिता जी) जो पूछणा जी। 

✍️ डॉ यज्ञदत्तशर्मा 

।। हर हर महादेव।।

ज़ह्ळ को जालंधर कहने वालों का खंडन

देअ श्री श्री श्री खुडीज़ह्ळ जी को जालन्धर कहने वालों का भ्रमभंग -  भ्रम - प्रभु श्री ज़ह्ळ जी के मुख के सिर में चंद्रमा है तो इन्हें शिव अं...