लक्ष्मीनाथ मंदिर में आरती और पूजा के दौरान शहनाई और नगाड़ा वादन का बहुत अधिक धार्मिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्व है। सनातन परंपरा में इन वाद्यों को केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि देवताओं के आह्वान और सकारात्मक ऊर्जा का माध्यम माना गया है।
पूजा के दौरान इनके महत्व को आप निम्नलिखित बिंदुओं से आसानी से समझ सकते हैं:
1. देव-आह्वान और मांगलिकता (Divine Invocation)
शहनाई:
शहनाई को एक परम मांगलिक (शुभ) वाद्य माना जाता है। इसकी सुरीली ध्वनि से वातावरण में पवित्रता का संचार होता है, जो भगवान के स्वागत का प्रतीक है।
नगाड़ा:
नगाड़े की गंभीर और भारी ध्वनि देवताओं के आह्वान (बुलाने) के लिए की जाती है। ऐसा माना जाता है कि इसकी गूंज से अलौकिक शक्तियां जाग्रत होती हैं।
2. नकारात्मक ऊर्जा का नाश और ध्यान केंद्रित होना
ध्वनि तरंगें:
आरती के समय जब शहनाई की मधुर तान और नगाड़े की थाप एक साथ मिलती है, तो उससे तीव्र ध्वनि तरंगें (Vibrations) पैदा होती हैं।
एकाग्रता:
यह संयुक्त ध्वनि मंदिर में मौजूद भक्तों के मन को भटकने से रोकती है। इससे बाहरी शोर शांत हो जाता है और भक्त पूरी तरह से पूजा में लीन (एकाग्र) हो पाते हैं।
सकारात्मकता:
शास्त्रों के अनुसार, नगाड़े की गूंज से मंदिर परिसर और उसके आसपास की सभी नकारात्मक ऊर्जाएं और बुरी शक्तियां दूर भागती हैं।
3. राजोपचार पूजा का हिस्सा (Royal Rituals)
हिंदू धर्म में भगवान को एक राजा के रूप में पूजा जाता है, जिसे राजोपचार पूजा कहते हैं।प्राचीन काल में राजाओं के दरबार या आगमन पर जैसे शंख, नगाड़े और वाद्य यंत्र बजाए जाते थे, ठीक वैसे ही मंदिरों में भगवान की आरती (सुबह की मंगला आरती या संध्या आरती) के समय उन्हें राजकीय सम्मान देने के लिए शहनाई और नगाड़ा बजाने की परंपरा है।
4. समय और सेवा का संकेत
पुराने समय में जब घड़ियां नहीं होती थीं, तब मंदिरों से आने वाली नगाड़े और शहनाई की आवाज से ही आस-पास के ग्रामीणों को पता चलता था कि भगवान की आरती का समय हो गया है।यह ध्वनि लोगों को अपने घरों में भी भगवान का स्मरण करने का संकेत देती थी।
5. नाद ब्रह्म की साधना
भारतीय दर्शन में ध्वनि को 'नाद ब्रह्म' (भगवान का ध्वनि रूप) माना गया है। शहनाई और नगाड़े का वादन इसी नाद ब्रह्म की उपासना है, जो सीधे आत्मा को परमात्मा से जोड़ती है।
सदियों से लक्ष्मीनाथ मंदिर में शहनाई और नगाड़ा वादन केवल संगीत नहीं, बल्कि ईश्वर की 'अष्टयाम सेवा' और दिव्य पूजा का एक अनिवार्य आध्यात्मिक हिस्सा है। भारतीय शास्त्रीय संगीत और मंदिर परंपरा (विशेष रूप से पुष्टिमार्ग हवेली संगीत और काशी विश्वनाथ जैसी शैव परंपराओं) में समय और आरतियों के अनुसार रागों का बदलना एक गहरा विज्ञान है। वही अष्टयाम सेवा और दिव्य पूजा शहनाई और नगाड़ा वादन द्वारा संझोगड़े, विहागड़े आदि के माध्यम से लक्ष्मीनाथ मंदिर परिसर में मंगल आरती,श्रृंगार आरती,भोग आरती, संध्या आरती और शयन आरती के समय रियासत काल से एक सहस्त्रवादी से प्रचलन में हैं।
बीबीएन नन्न न शहनाई को 'मंगलवाद्य' माना जाता है जो अपनी सुरीली ध्वनि से वातावरण को शुद्ध करती है, जबकि नगाड़ा (दुन्दुभि) अपनी गंभीर गर्जना से ब्रह्मांडीय ऊर्जा (नाद ब्रह्म) का संचार करता है।
1. विभिन्न आरतियों में रागों का परिवर्तन (समय चक्र के अनुसार)
हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत का 'समय सिद्धांत' मंदिरों की आरतियों से सीधा जुड़ा है। जैसे-जैसे दिन का प्रहर बदलता है, भगवान के स्वरूप और भाव के अनुसार शहनाई के सुर और नगाड़े की थाप बदल जाती है:
आरती का प्रकारसमय/प्रहरप्रमुख राग (शहनाई पर)संगीत का भाव और नगाड़े की गति
मंगला आरती
भोर (प्रातः 4 से 5)राग भैरव, भैरवी, रामकलीभाव:
भगवान को जगाने का शांत और कोमल भाव। नगाड़े की थाप बहुत धीमी और गंभीर होती है।
शृंगार व भोग आरती
सुबह (8 से 11)राग बिलावल, सारंग, जौनपुरी भाव:
उत्साह और राजसी ठाट-बाट। संगीत में चंचलता आती है, नगाड़े की गति मध्यम और लयबद्ध होती है।
संध्या आरती
गोधूलि वेला (शाम 6 से 7)राग यमन, पूरिया धनाश्री, मारवाभाव:
समर्पण, शांति और भक्ति। आरती के समय नगाड़ा अपनी पूरी तीव्रता (द्रुत लय) पर होता है।
शयन आरती
रात्रि (9 से 10:30)राग केदार, बिहाग, दरबारी कांडा भाव:
विश्राम, निद्रा और परम शांति। शहनाई के सुर बेहद कोमल और मंद हो जाते हैं। नगाड़े का उपयोग बंद या अत्यंत धीमा हो जाता है।
लक्ष्मीनाथ मंदिर की शयन आरती विश्व प्रसिद्ध है। रात के समय महाराज श्री लक्ष्मीनाथ के शयन के समय शहनाई पर अत्यंत विरह और शांति प्रधान राग (जैसे राग बिहाग) बजाए जाते हैं।प्रातः से रात्रि शयन तक शहनाई की वायु-तरंगें (Wind Instrument) और नगाड़े का कंपन (Resonance) मंदिर परिसर के भीतर संचित नकारात्मक ऊर्जा को समाप्त करते हैं।मन की एकाग्रता बढ़तीं है । आरती के समय जब घंटियों और शंख के साथ नगाड़ा तीव्र गति से बजता है, तो भक्त का मन बाहरी दुनिया से कटकर पूरी तरह भगवान के विग्रह पर केंद्रित हो जाता है।
वर्तमान में लक्ष्मीनाथ मंदिर में शहनाई और नगाड़ा वादन करने वाले पारंपरिक कलाकारों की आर्थिक स्थिति और मेहनताने की दुर्दशा एक अत्यंत गंभीर और चिंताजनक विषय है। सदियों से इन कलाकारों ने हमारी सांस्कृतिक और धार्मिक धरोहर को जीवित रखा है, लेकिन आज के इस आधुनिक युग में वे गंभीर आर्थिक संकट और उपेक्षा का सामना कर रहे हैं।देवालयों के इन पारंपरिक संगीतकारों की दुर्दशा के मुख्य कारण और उनकी स्थिति निम्नलिखित बिंदुओं के माध्यम से समझी जा सकती है:
अत्यंत कम और अपर्याप्त मानदेय (मेहनताना)नाममात्र का मानदेय:
प्रशासन और ट्रस्ट के नियंत्रण में आने के बाद इन वादकों को मिलने वाला मासिक मानदेय बेहद कम है। बढ़ती महंगाई के दौर में यह राशि इतनी कम है कि इससे परिवार का गुजारा करना भी असंभव हो जाता है।
न्यूनतम वेतन नियमों का अभाव:
देश के अधिकांश हिस्सों में मंदिरों के सेवादारों, पुजारियों और पारंपरिक संगीतकारों के लिए कोई न्यूनतम वेतन तय नहीं है। हाल ही में इस मुद्दे को लेकर न्यायालयों में जनहित याचिकाएं (PIL) भी दायर की गई हैं, ताकि इन सेवादारों को भी सम्मानजनक हक मिल सके।चढ़ावे और दक्षिणा पर रोकआधुनिक व्यवस्था की मार:
पहले के समय में भक्तगण खुश होकर इन कलाकारों को सीधी दक्षिणा या चढ़ावा दे देते थे। लेकिन अब मंदिर का सरकारीकरण हो चुका है, जहां हर जगह सीसीटीवी कैमरे और दानपात्र रख दिए गए हैं।नियमों की सख्ती: सीधे तौर पर पुजारियों या वादकों को पैसे देने पर रोक होने के कारण उनकी अतिरिक्त आय का यह एकमात्र जरिया भी बंद हो गया है।
रोजगार का अनिश्चित स्वरूप सीमित अवसर:
मंदिर परिसरों के बाहर, केवल शादियों और विशेष त्योहारों के सीजन में ही इन्हें काम मिल पाता है। लेकिन आधुनिक समय में डीजे, डिजिटल म्यूजिक और ब्रास बैंड के बढ़ते चलन ने पारंपरिक शहनाई और नगाड़ा वादकों की मांग को बहुत सीमित कर दिया है।
नई पीढ़ी का विमुख होना आजीविका का संकट:
आर्थिक बदहाली और समाज में उचित सम्मान न मिलने के कारण इन कलाकारों की नई पीढ़ी इस पुश्तैनी कला को अपनाने से कतरा रहे हैं।
लेकिन वर्तमान में जिला प्रशासन द्वारा अनदेखी से यह परंपरा अब ह्रास की और अग्रसर है। दिन में पाँच बार नगाड़ा और शहनाई वादन के बाद भी मात्र 50/- रुपये दिन के प्रति व्यक्ति मेहनतना मिलता है।अर्थात् 1500/- रुपये मासिक।जोकि श्रम क़ानून के अनुसार न्यूनतम धियाड़ी से भी कम है।क्या ये प्रशासन स्वयं श्रम क़ानून का उलंघन नहीं कर रहा? इतने कम मानदेय से क्या परिवार का लालन पालन संभव है।मंदिर अधिकारी से नगाड़ा और शहनाई वादकों ने केई बार गुहार लगाई पर परिणाम शून्य।
माननीय मुख्यमंत्री श्री सुखविंदर सिंह ठाकुर जी, माननीय विधानसभा अध्यक्ष श्री कुलदीप सिंह पठानिया जी, नवनियुक्त ट्रस्ट सदस्यों से निवेदन है कि लक्ष्मीनाथ मंदिर के इन दोनों नगाड़ा और शहनाई वादकों को न्यूनतम मानदेय दे कर कृतार्थ करें। ताकि भविष्य में भी यह अपनी सेवायें दे सकें।
डॉ. राजेश सहगल
पुरातत्वविद एवम स्थानीय निवासी
चम्बा हिमाचल प्रदेश ।