Saturday, 29 August 2026

कालसर्प योग पर विचार

कालसर्प योग और एक आख्यान : 

एक वर्ष पूर्व की बात है, कोई हमारे परिचित अपने परिचित सरकारी विभाग में कार्यरत दम्पत्ति से बात करवाये और वे दम्पत्ति हमारे पास स्वपुत्र की समस्या पर कुंडली भिजवाये , किन्हीं महानुभाव पंडित जी ने कालसर्पदोष बताया था तो कुछ चिन्तित थे । बेटा पढाई में मन नही लगाता , कुसंगति आदि समस्या ; जन्मांगचक्र देखकर हमने प्रामाणिक ज्योतिष ग्रन्थानुरूप शास्त्रीय उपाय जो हमें समझ आया , बता दिया तथा कालसर्प दोष की बात पर हमने इतना ही कहा कि हमें तो ऐसा कोई दोष इसमें नहीं दिखता , फिर भी जिनको लगता है , उस पर हम कुछ भी कहना उचित नहीं समझते। उस कुण्डली में वह बारह प्रकार के मुख्य कालसर्प में से कुछ था भी नहीं , जिसमें कि सारे ग्रह आरोह क्रम से राहू केतु की पकड़ में आ जायें, आंशिक कह सकते द्विवेदी जी के कथनानुसार क्योंकि श्री भोजराज द्विवेदी जी ने तो आंशिक कालसर्प दोष को भी पर्याप्त समर्थन करते हुए संख्या बहुत अधिक बता दी है, ऐसे में अधिकांश कुंडलियां सब चपेट में आती हैं, शास्त्र में विधान नहीं तो निषेध भी कहॉ है, ज्योतिष जैसे अपार विद्या में नवीन अनुसन्धानों को महत्त्व क्यों नहीं देना चाहिये इत्यादि तर्क इस कालसर्प समर्थक पक्ष से प्रस्तुत किये गये हैं । गीताप्रेस के ज्योतिषतत्त्वांक में भी इस प्रकरण पर श्री हरिनारायण शास्त्री जी व श्रीमनोहर वर्मा जी नामक विद्वानों के वक्तव्य हैं । चौखम्भा आदि संस्थानों से कालसर्पदोष शान्ति के ग्रन्थ छपे हैं, जो जिज्ञासावश हमने भी अध्ययनार्थ मंगाये । अब तो हमारी देवभूमि के प्रसिद्ध पंचांग में भी विशेष लेख और इस पर व्यापक विवरण प्राप्त कराया जा रहा है, जिसमें श्रीमद्देवी भागवत , नवम स्कन्ध से नागमाता मनसा देवी के स्तोत्र व मन्त्र की भी बात की गयी है । तो उन्होंने कालसर्प योग के प्रति ही अपना आकर्षण चरितार्थ किया , अब संयोग की बात ये भी थी कि जिन पंडित जी से उन्होंने कार्यक्रम करवाया , उनसे एक बार हमारी भेंट हो चुकी थी, हमारे घर पर आये थे कहीं किसी अनुष्ठान में जाते समय, थोड़े कुतर्की टाइप थे, सिगरट उनके मुख पर रहती थी । पूरा डिब्बा जेब रखे रखते । काफी जगहों पर शिवपुराण आदि कथाऐं भी करते रहते । जब उन दम्पत्ति ने फोन पर हमें बताया कि फलाने स्थान के अमुक पंडित जी हैं तो हम सारी कहानी समझ गये कि क्या ज्ञान कहा होगा उन्होंने , परन्तु यदि किसी की निष्ठा कहीं है तो हम क्यों बीच में बोलें । 
इस प्रकार ,बाद में जब उन परिचित महानुभाव ने बताया कि वे कालसर्प निवारण करवा आये चांदी के नाग बनवा के उनको नदी प्रवाहित करके और पंडित जी ने पर्याप्त दान दक्षिणा भी प्राप्त की , तो हमने कहा कि पंडित जी को दान दक्षिणा की है , श्रद्धा से ग्रह देवताओं का ध्यान किया है, ये तो उत्तम ही है, जेन केन बिधि दीन्हें दान करइ कल्यान । जैसे भी हो परिणाम आना चाहिये । तो हुआ क्या कि अभी कुछ दिनों पूर्व हमें पता चला कि वे दम्पत्ति ज्योतिषियों से रुष्ट थे, बोल रहे थे ज्योतिषियों का सब मूर्ख बनाने का धन्धा है पाखंड है , ज्योतिष भी परख लिया हमने इसमें भी कुछ नहीं सार, बेटा वैसे का वैसा ही है कुछ भी नही हुआ परिवर्तन आदि । इसे सुनने के उपरान्त हमने प्रथम तो ये ही विचार किया कि जब आपके पूर्वकर्मों के अनुरूप ग्रह गोचर कुछ विशेष ही विपरीत हों तो उपाय न तो आपको मिलता है, और कहीं मिल भी गया तो आप कर नही नहीं सकते । दूसरा ये कि इस कालसर्प मामले में हम किसे दोषी कहें , इस विधा को ? उस अनुष्ठान को ? उन ब्राह्मण को या यजमान को ? या काल को ही कारण समझ लिया जाये ! फलित ज्योतिष एक ऐसी विद्या है , कि उसमें भी कुछ ऐसे योग भी कहे जाते हैं , वे जिनके जन्मांगचक्र में हैं, वे जो कहते हैं , उनका कहा होता है और फिर ब्राह्मण का वाक्य भी तो स्वयं में एक महान् बल है, वो जो यजमान के कल्याणार्थ कह दें , वह ग्रह देवता न मानें , ऐसे भी कहना कितना सही है , परन्तु क्या तथाकथित गुटखा /सिगरट खाने पीने वाले , धर्म को न जानकर कुतर्क करने वाले, अन्धेरे में तीर मारकर लम्बा बिल फाड़ने वाले लोग ऐसी योग्यता रख सकते हैं ? किन्तु हम उनको भी दोष क्यों दें, श्री भगवान् ने जैसों के लिये तैसे ही भूदेव बनाये हैं ,यह भी तो एक तथ्य है । जिन्होंने कर्मों से अपने बृहस्पति को खराब किया है, उनको गुरुओं से कहॉ लाभ मिलेगा। जो श्राद्ध नहीं करते , नित्य नैमित्तिक कर्म विधिवत् नहीं करते , ऐसे लोग कितने समय तक देवताओं आदि को अपने अनुकूल रख सकते हैं , क्या कुछ धन खर्च करके स्मार्त्त धर्म की कर्त्तव्यविमुखता के दोष का सदा के लिये शमन हो सकता है ? अतः ब्राह्मणों का दायित्व तो यही है कि प्रयास यही करें कि जिन विषयों में संशय हो , वहॉ प्रामाणिक शास्त्रों में जो प्रामाणिक विधियॉ बताई गयी हैं , ग्रहदोष निवारणार्थ उन्हीं विधियों का अनुपालन करने का प्रयास करें , अपना आहार विहार शुद्ध रखें, निष्काम भाव से परोपकार का ही भाव रखें और लोगों को उनके लिये विहित गृहस्थ के स्मार्त्त आचार के महत्त्व को समझाने का प्रयास करें ।

#सन्मार्ग 
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Wednesday, 26 August 2026

उपाकर्म निर्णय

उपाकर्म २८ को करना ज्यादा प्रशस्त नही है क्योंकि भगवान् पारस्कर ने उपाकर्म के चार मुख्य काल माने हैं श्रवण नक्षत्र,
श्रावणपूर्णिमा, पंचमी, तथा हस्त चूंकि प्रायः श्रावणपञ्चमी मे हस्त होता ही है तथा पूर्णिमा में श्रवण होता है अतः प्रायः दो काल ही मुख्यतया प्राप्त होता है परन्तु इस वर्ष चार काल प्राप्त थे जिसमें तीन बीत गये चौथा काल है पूर्णिमा ।
२७ को पूर्णिमा ९ बजकर कुछ मिनट में लग रहा है अतः पूर्णिमा मध्याह्नकाल में प्राप्त हो रही है और परम्परातः उपाकर्म मध्याह्न स्नान मध्याह्न सन्ध्या और तर्पण के पश्चात् ही किया जाता है जो २८ को कथमपि सम्भव नही है ।
क्योंकि २८ को पूर्णमा ९ बजकर कुछ मिनट में समाप्त हो जारही है ।
यदि २८ को कोई उपाकर्म करता है तो मध्याह्न स्नान मध्याह्न सन्ध्या तर्पण करते ही करते पूर्णिमा व्यतीत हो जायेगी
उपाकर्म के समय भाद्रपद् कृष्ण प्रतिपद् तिथि होगी जो गृह्योक्त न होने से स्वीकार्य नही है ।
पौर्णमासेष्टि का एवं पक्षादि कर्म का काल विज्ञों ने पूर्णिमा का चतुर्थ चरण तथा प्रतिपद् के प्रारम्भ से तीन पाद बताया है चतुर्थ पाद में इष्टि निषेध है तथा पौर्णमास का प्रारम्भ सूर्योदय के पश्चात् करने को कहा है । (स्मार्तोल्लास )
अतः पौर्णमास व पक्षादि कर्म २८ को ही होगा ।
उपाकर्म में मुख्यतया अध्यापन कर्म में युक्त गृह्याग्नि धारक ही अधिकारी है (हरिहिरभाष्य - उपाकर्म प्रकरण )
२८ को यदि उपाकर्म होगा तब क्योंकि उपाकर्म अत्यन्त विस्तृत कर्म है इसमें शिष्यों को प्रत्येक अध्याय व काण्ड का आदि मन्त्र ब्राह्मण अनुवाचन कराना आवश्यक है।
साथ ही होम लाजादि प्राशन आदि भी है
तथा परम्परया सप्तर्षि पूजन यज्ञोपवीत संस्कार आदि भी होता है जिससे उपाकर्म में पूर्णिमा काल प्राप्त नही ही होगा यह तो निश्चित है ।
अतः अनुक्त काल में उपाकर्म उचित नही है जो काशी के पंचांगो में लिखा है
उपाकर्म के नित्य कर्म होने से उसमें भद्रा का विचार नही है
भद्रा का विचार श्रावणी (रक्षा बन्धन ) में है यह स्पष्ट भाष्य में लिखा है अतः
भद्रा के कारण अथवा किसी भी कारण से स्वगृह्योक्त काल का विद्वज्जन परित्याग न करें ।

Tuesday, 18 August 2026

देवता खुडीजह्ळ जी को शाळी लगाने का विचार

देऊआ खुडीजहळा रे शळऊणा होर छैऊणे रा बच़ार लिखिते - 

देऊआ रे सोबे तीह-थैर देऊआ री रेखा अंद्र करणे। ज़े तिथि, नछत्रा होर धैळे मंझ किछ ब्रोध होए ता देऊआ रे प्रोता होर कारदारा, च़करदारा, खुन्हधारी, देऊळु कठ बैठी निर्णय करणा जी। 

देऊआ जो शळऊण गणी च़ीळ्ही लाणा। तिथि, नछत्रा, लग्ना, भद्रा होर धैळे भाळी निर्णय करणा जी। इषु देऊआ ज़ो शळऊण 26 त्रीका बुधवारा ज़ो लाणा शुभ है जी। 

देऊआ छैणे रा बच़ार - शळऊणा लाई दुज्जे धैळे दूह़े देऊ छैणे। पुन्या ज़ो छैणा।छैणे जो भद्रा, नछत्रा होर रछ्या बंधना रा बच़ार नी करणा जी। 

👉 किछ पूछणा ज़ाचणा होए ता देऊआ रे प्रोता (मेरे पूज्य पिता जी) जो पूछणा जी। 

✍️ डॉ यज्ञदत्तशर्मा 

।। हर हर महादेव।।

Sunday, 31 May 2026

33 करोड़ देवता निर्णय

#तैंतीस_करोड़_देवता_कोटि_नहीं_हैं_ 
वास्तव में वैदिक दर्शन में "अनन्ता वै वेदा:"
प्रमाण से "मंत्र ब्राह्मणयोर्वेद नामधेयम्",पूर्वक "छंद ऋषिर्देवता शक्तत्यात्मकं मंत्रों" इस नियम से अनन्तों वैदिक मंत्रों के अनंतों देवता सिद्ध होते हैं।अतः" देवता ३३संख्यात्मक ही अथवा ३३ कोट्यात्मक ही"ऐसा कोई नियम प्रमाणित नहीं होता।हां असंख्य देवताओं में एक ही देवता का देवत्व है यह अवश्य ही प्रमाणित होता है यथा -"बहूनि देवानामसुरत्वमेकं"आदि।
केवल एक दृष्टांत का संदर्भ ग्रहण करें एवं तुल्यत: सभी में वैसा ही नियम लगा लें तो कोई संदेह नहीं रह जाएगा -
यथा यदि रुद्र एक (१)कोटि है तो ग्यारह (११) रुद्रों की एक (१)ही कोटि या प्रकार होनी चाहिए ग्यारह कोटि नहीं क्योंकि कुल ग्यारह रुद्र ही प्रसिद्ध हैं किन्तु यहां ३२कोटि देवताओं में ११ रुद्रों की ११कोटि के रुप में गणना करके ३२की संख्या पूरी कर ली गई है जबकि ३२कोटि में ३२ प्रकार के रुद्र आदि देवता दिखाने चाहिए थे किन्तु भ्रम वादियों द्वारा ऐसा न करके रुद्र, वसु,आदित्य,आदि चार पांच कोटियों में ही ३२की संख्या पूरी की गई है।और आप शास्त्रीय प्रमाण की बात कर रहे हैं तो शास्त्र एक ही रुद्र (एको हि रुद्रो न द्वितीयाय तस्थु...)के ग्यारह ही नहीं बल्कि असंख्यों रुपों का निर्विवाद निर्वचन करता है यथा -"असंख्याता सहस्राणि ये रुद्राsअधिभूम्याम्।तेषा ग्वंग् सहस्रयोजनेsव धन्वानि तन्मसि।।शुक्ल यजुर्वेद,रुद्रसूक्त,५४
इसके अतिरिक्त -"असंख्याता ह वै रुद्रा"
पूजनीयो ह वै देवा: (जो चतुर्विध पुरुषार्थों की सिद्धि के लिए मानवादिकों के लिए पूजनीय हैं वही देवता हैं) इस प्रमाण से माता, पिता, आचार्य से लेकर,देव,पितृ,आदि से ग्रहण करते हुए विष्णु शिव आदि पंचायतन देवताओं के समस्त अवतारों की गणना करते हुए ३२ करोड़ देवता भी कम ही ठहरेंगे।यद्यपि इससे शास्त्रीय अद्वैत वाद को कोई क्षति भी नहीं पहुंचती क्योंकि भारत में एक ही देवता (एकं सद् विप्रा:बहुधा वदन्ति)की महिमा में १८ पुराण लिखे गए हैं यह तथ्य अविस्मरणीय है।
मातृ देवो भव।पितृ देवो भव।। आचार्य देवो भव।।।(तैत्तिरीय उपनिषद्,शिक्षा वल्ली)
देवी-देवता 33 कोटि नहीं 33 करोड़ ही हैं, जानिए इस सत्य को!
देवता वास्तव में 33 करोड़ ही हैं, 33 प्रकार के नहीं। आमतौर पर जो लोग यह समझते हैं कि 33 कोटि शब्द में कोटि का अर्थ 'प्रकार' है, वे अपनी बात के समर्थन में निम्न बातें करते हैं।
भ्रमपूर्ण तर्क : - उनका कहना है कि हिन्दू धर्म को भ्रमित करने के लिए अक्सर देवी और देवताओं की संख्‍या 33 करोड़ बताई जाती रही है। धर्मग्रंथों में देवताओं की 33 कोटि बताई गई है, करोड़ नहीं। जिस प्रकार एक ही शब्द को अलग-अलग स्थान पर प्रयोग करने पर अर्थ भिन्न हो जाता है, उसी प्रकार देवभाषा संस्कृत में कोटि शब्द के दो अर्थ होते हैं।
कोटि का मतलब प्रकार होता है और एक अर्थ करोड़ भी होता है लेकिन यहां कोटि का अर्थ प्रकार है, करोड़ नहीं। इस बात के समर्थन में वे यह भी कहते हैं कि ग्रंथों को खंगालने के बाद कुल 33 प्रकार के देवी-देवताओं का वर्णन मिलता है। ये निम्न प्रकार से हैं-
12 आदित्य, 8 वसु, 11 रुद्र और इन्द्र व प्रजापति को मिलाकर कुल 33 देवता होते हैं। कुछ विद्वान इन्द्र और प्रजापति की जगह 2 अश्विनी कुमारों को रखते हैं। प्रजापति ही ब्रह्मा हैं।👌
12 आदित्य : 1. अंशुमान, 2. अर्यमा, 3. इन्द्र, 4. त्वष्टा, 5. धाता, 6. पर्जन्य, 7. पूषा, 8. भग, 9. मित्र, 10. वरुण, 11. विवस्वान और 12. विष्णु। 
8 वसु : 1. अप, 2. ध्रुव, 3. सोम, 4. धर, 5. अनिल, 6. अनल, 7. प्रत्यूष और 8. प्रभाष। 
11 रुद्र : 1. शम्भू, 2. पिनाकी, 3. गिरीश, 4. स्थाणु, 5. भर्ग, 6. भव, 7. सदाशिव, 8. शिव, 9. हर, 10. शर्व और 11. कपाली।
2 अश्विनी कुमार : 1. नासत्य और 2. दस्त्र।
कुल : 12+8+11+2=33
33 देवी और देवताओं के कुल के अन्य बहुत से देवी-देवता हैं तथा सभी की संख्या मिलाकर भी 33 करोड़ नहीं होती, लाख भी नहीं होती और हजार भी नहीं। वर्तमान में इनकी पूजा होती है।
उपरोक्त तर्क का खंडन!
प्रथम तो कोटि शब्द का अर्थ करोड़ भी है और प्रकार भी है, इसे हम अवश्य स्वीकार करते हैं, परंतु यह नहीं स्वीकार करते कि यहां कोटि का अर्थ करोड़ न होकर प्रकार होगा। पहले तो कोटि शब्द को समझें। कोटि का अर्थ प्रकार लेने से कोई भी व्यक्ति 33 देवता नहीं गिना पाएगा। कारण, स्पष्ट है कि कोटि यानी प्रकार यानी श्रेणी। अब यदि हम कहें कि आदित्य एक श्रेणी यानी प्रकार यानी कोटि है, तो यह कह सकते हैं कि आदित्य की कोटि में 12 देवता आते हैं जिनके नाम अमुक-अमुक हैं। लेकिन आप ये कहें कि सभी 12 अलग-अलग कोटि हैं, तो जरा हमें बताएं कि पर्जन्य, इन्द्र और त्वष्टा की कोटि में कितने सदस्य हैं?
ऐसी गणना ही व्यर्थ है, क्योंकि यदि कोटि कोई हो सकता है तो वह आदित्य है। आदित्य की कोटि में 12 सदस्य, वसु की कोटि या प्रकार में 8 सदस्य आदि-आदि। लेकिन यहां तो एक-एक देवता को एक-एक श्रेणी अर्थात प्रकार कह दिया है।
द्वितीय, उन्हें कैसे ज्ञात कि यहां कोटि का अर्थ प्रकार ही होगा, करोड़ नहीं? प्रत्यक्ष है कि देवता एक स्थिति है, योनि हैं जैसे मनुष्य आदि एक स्थिति है, योनि है। मनुष्य की योनि में भारतीय, अमेरिकी, अफ्रीकी, रूसी, जापानी आदि कई कोटि यानी श्रेणियां हैं जिसमें इतने-इतने कोटि यानी करोड़ सदस्य हैं। देव योनि में मात्र यही 33 देव नहीं आते। इनके अलावा मणिभद्र आदि अनेक यक्ष, चित्ररथ, तुम्बुरु, आदि गंधर्व, उर्वशी, रम्भा आदि अप्सराएं, अर्यमा आदि पितृगण, वशिष्ठ आदि सप्तर्षि, दक्ष, कश्यप आदि प्रजापति, वासुकि आदि नाग, इस प्रकार और भी कई जातियां देवों में होती हैं जिनमें से 2-3 हजार के नाम तो प्रत्यक्ष अंगुली पर गिनाए जा सकते हैं।
शुक्ल यजुर्वेद ने कहा : - अग्निर्देवता वातो देवता सूर्यो देवता चन्द्रमा देवता वसवो देवता रुद्रा देवतादित्या देवता मरुतो देवता विश्वेदेवा देवता बृहस्पतिर्देवतेन्द्रो देवता वरुणो देवता।
अथर्ववेद में आया है : अहमादित्यरुत विश्वेदेवै।
इसमें अग्नि और वायु का नाम भी देवता के रूप में आया है। अब क्या ऊपर की 33 देव नामावली में ये न होने से देव नहीं गिने जाएंगे? मैं ये नहीं कह रहा कि ये ऊपर के गिनाए गए 33 देवता नहीं होते बिलकुल होते हैं लेकिन इनके अलावा भी करोड़ों देव हैं।
भगवती दुर्गा की 5 प्रधान श्रेणियों में 64 योगिनियां हैं। हर श्रेणी में 64 योगिनी। इनके साथ 52 भैरव भी होते हैं। सैकड़ों योगिनी, अप्सरा, यक्षिणी के नाम मैं बता सकता हूं। 49 प्रकार के मरुद्गण और 56 प्रकार के विश्वेदेव होते हैं। ये सब कहां गए? इनकी गणना क्यों न की गई? 
33 कोटि बताने वालों का दूसरा खंडन!
शिव-सती : - सती ही पार्वती है और वही दुर्गा है। उसी के 9 रूप हैं। वही 10 महाविद्या है। शिव ही रुद्र हैं और हनुमानजी जैसे उनके कई अंशावतार भी हैं।
विष्णु-लक्ष्मी : - विष्णु के 24 अवतार हैं, वही राम हैं और वही कृष्ण भी। बुद्ध भी वही है और नर-नारायण भी वही है। विष्णु जिस शेषनाग पर सोते हैं वही नागदेवता भिन्न-भिन्न रूपों में अवतार लेते हैं। लक्ष्मण और बलराम उन्हीं के अवतार हैं।
ब्रह्मा-सरस्वती : - ब्रह्मा को प्रजापति कहा जाता है। उनके मानस पुत्रों के पुत्रों में कश्यप ऋषि हुए जिनकी कई पत्नियां थीं। उन्हीं से इस धरती पर पशु-पक्षी और नर-वानर आदि प्रजातियों का जन्म हुआ। चूंकि वे हमारे जन्मदाता हैं इसलिए ब्रह्मा को प्रजापिता भी कहा जाता है।
इनके तर्क का पुन: खंडन!
यदि कश्यप आदि को आप इसीलिए देव नहीं मानते, क्योंकि ब्रह्मा के द्वारा इनका प्राकट्य हुआ है, सो ये सब ब्रह्मरूप हुए सो इनकी गिनती नहीं होगी तो कश्यप के द्वारा प्रकट किए गए 12 आदित्य और 8 वसु तथा 11 रुद्रों को आप कश्यप रूप मानकर छोड़ क्यों नहीं देते? इनकी गिनती के समय आपकी प्रज्ञा कहां गई?
यदि सारे रूद्र शिव के अवतार हैं, स्वयं हनुमानजी भी हैं, तो क्या आप पार्वती को हनुमानजी की पत्नी कह सकते हैं? क्यों नहीं? इसीलिए क्योंकि हनुमान रुद्रावतार हैं उस समय अवतार यानी वही ऊर्जा होने पर भी स्वरूपत: और उद्देश्यत: भिन्न हैं। ऐसे ही समग्र संसार नारायण रूप होने पर भी स्वरूपत: और उद्देश्यत: भिन्न हैं। इसी कारण आप सीता को कृष्ण पत्नी और रुक्मिणी को राम पत्नी नहीं कह सकते, क्योंकि अभेद में भी भेद है। और जो सभी के एक होने की बात करते हैं वे यदि इतने ही बड़े ब्रह्मज्ञानी हैं तो क्या उन्हें शिव और विष्णु की एकाकारता नहीं दिखती?
शिव और विष्णु में इन्हें भेद दिखता है इसलिए इन्हें अलग-अलग गिनेंगे और राम और विष्णु में अभेद दिखता है, सो इन्हें नहीं गिनेंगे। समग्र संसार ही विष्णुरूप है, रुद्ररूप है, देवीरूप है। भेद भी है और अभेद भी है। लेकिन यदि अभेद मानते हो फिर ये जो 33 देव गिना रहे हो ये भी न गिना पाओगे, क्योंकि जब विष्णु के अवतार राम और कृष्ण को अभेद मानकर नहीं गिन रहे, सती के 10 महाविद्या अवतार को नहीं गिन रहे तो फिर शिवजी के 11 रुद्र अवतार को किस सिद्धांत से गिन रहे हो? सभी ग्रामदेव, कुलदेव, अजर आदि क्षेत्रपाल, ये सबको कौन गिनेगा? ये छोड़ो, इस 33 वाली गणना में तो गणेश, कार्तिकेय, वीरभद्र, अग्नि, वायु, कुबेर, यमराज जैसे प्रमुख देवों को भी नहीं गिना गया।
वेदों में कही-कहीं 13 देवता की भी बात आई है और कहीं-कहीं 36 देवता की भी चर्चा है। 3,339 और 6,000 की भी चर्चा है। अकेले वालखिल्यों की संख्या 60,000 है। तो वहां इन 33 में से कुछ को लिया भी गया है और कुछ को नहीं भी। तो क्या वह असत्य है? बिलकुल नहीं। जैसे जहां मनुष्य की चर्चा हो वहां आप केवल उनका ही नाम लेते हैं जिसका उस चर्चा से संबंध हो, सभी का नहीं। वैसे ही जहां जैसे प्रसंग हैं वहां वैसे ही देवों का नाम लिया गया है। इसका अर्थ ये नहीं कि जिनकी चर्चा नहीं की गई, या अन्यत्र की गई, उसका अस्तित्व ही नहीं। इस 33 की श्रेणी में गरूड़, नंदी आदि का नाम नहीं जबकि वेदों में तो है। विनायक की श्रेणी में, वक्रतुण्ड की श्रेणी में गणेशजी के सैकड़ों अवतार के नाम तंत्र में आए हैं।
हां, 33 कोटि देव की बात है जरूर और कोटि का अर्थ करोड़ ही है, क्योंकि देवता केवल स्वर्ग में नहीं रहते। उनके सैकड़ों अन्य दिव्यलोक भी हैं। और ऐसा कहा जाए तो फिर सभी एकरूप होने से सीधे ब्रह्म के ही अंश हैं तो ये 33 भी गिनती में नहीं आएंगे। फिर वैसे तो हम सब भी गिनती में नहीं आएंगे। सभी भारतीय ही हैं तो अलग-अलग क्यों गिनते हैं?
हर हर महादेव।।।
साभार 
डॉ. कमलेश पाठक आचार्य जी

Tuesday, 15 July 2025

ज्ञ वर्ण का उच्चारण

'ज्ञ' वर्ण के उच्चारण पर शास्त्रीय दृष्टि-

संस्कृत भाषा मेँ उच्चारण की शुद्धता का अत्यधिक महत्त्व है। शिक्षा व व्याकरण के ग्रंथोँ मेँ प्रत्येक वर्ण के उच्चारण स्थान और ध्वनि परिवर्तन के आगमलोपादि नियमोँ की विस्तार से चर्चा है। फिर भी "ज्ञ" के उच्चारण पर समाज मेँ बडी भ्रांति है। 

ज्+ञ्=ज्ञ

कारणः-'ज्' चवर्ग का तृतीय वर्ण है और 'ञ्' चवर्ग का ही पंचम वर्ण है।
जब भी 'ज्' वर्ण के तुरन्त बाद 'ञ्' वर्ण आता है तो 'अज्झीनं व्यञ्जनं परेण संयोज्यम्' इस महाभाष्यवचन के अनुसार 'ज् +ञ'[ज्ञ] इस रुप मेँ संयुक्त होकर 'ज्य्ञ्' ऐसी ध्वनि उच्चारित होनी चाहिये।।

किँतु ये भी कुछ का एक भ्रामक मत है।।

प्रिय मित्रोँ!

"ज्ञ"वर्ण का यथार्थ तथा शिक्षाव्याकरणसम्मत शास्त्रोक्त उच्चारण 'ग्ञ्' ही है। जिसे हम सभी परंपरावादी लोग सदा से ही "लोक" व्यवहार करते आये हैँ।

कारणः- तैत्तिरीय प्रातिशाख्य 2/21/12 का नियम क्या कहता है-
स्पर्शादनुत्तमादुत्तमपराद् आनुपूर्व्यान्नासिक्याः।।
इसका अर्थ है- अनुत्तम, स्पर्श वर्ण के तुरन्त बाद यदि उत्तम स्पर्श वर्ण आता है तो दोनोँ के मध्य मेँ एक नासिक्यवर्ण का आगम होता है। यही नासिक्यवर्ण शिक्षा तथा व्याकरण के ग्रंथोँ मेँ यम के नाम से प्रसिद्ध है। 'तान्यमानेके' (तै॰प्रा॰2/21/13) इस नासिक्य वर्ण को ही कुछ आचार्य 'यम' कहते हैँ। प्रसिद्ध शिक्षाग्रन्थ 'नारदीयशिक्षा' मेँ भी यम का उल्लेख है।अनन्त्यश्च भवेत्पूर्वो ह्यन्तश्च परतो यदि। तत्र मध्ये यमस्तिष्ठेत्सवर्णः पूर्ववर्णयोः।। औदव्रजि के 'ऋक्तंत्रव्याकरण' नामक ग्रंथ मेँ भी 'यम' का स्पष्ट उल्लेख है।'अनन्त्यासंयोगे मध्ये यमः पूर्वस्य गुणः' अर्थात् वर्ग के शुरुआती चार वर्णो के बाद यदि वर्ग का पाँचवाँ वर्ण आता है तो दोनो के बीच 'यम' का आगम होता है,जो उस पहले अनन्तिम-वर्ण के समान होता है।
प्रातिशाख्य के आधार पर यम को परिभाषित करते हुए सरल शब्दों मेँ यही बात भट्टोजी दीक्षित भी लिखते हैँ-
"वर्गेष्वाद्यानां चतुर्णां पंचमे परे मध्य यमो नाम पूर्व सदृशो वर्णः प्रातिशाख्ये प्रसिद्धः" -सि॰कौ॰12/ (8/2/1सूत्र पर)
भट्टोजी दीक्षित यम का उदाहरण देते हैँ। पलिक्क्नी 'चख्खनतुः' अग्ग्निः 'घ्घ्नन्ति'।
यहाँ प्रथम उदाहरण मेँ क् वर्ण के बाद न् वर्ण आने पर बीच मेँ क् का सदृश यम कँ(अर्द्ध) का आगम हुआ है। दूसरे उदाहरण मेँ खँ कार तथैव गँ कार यम, घँ कार यम का आगम हुआ है।

अतः स्पष्ट है कि यदि अनुनासिक स्पर्श वर्ण के तुरंत बाद अनुनासिक स्पर्श वर्ण आता है तो उनके मध्य मेँ अनुनासिक स्पर्श वर्ण के सदृश यम का आगम होता है।
प्रकृत स्थल मेँ-
ज् + ञ्
इस अवस्था मेँ भी उक्त नियम के अनुसार यम का आगम होगा।
किस अनुनासिक वर्ण के साथ कौन से यम का आगम होगा।विस्तारभय से सार रुप दर्शा रहे हैँ। तालिक देखेँ-

स्पर्श अनुनासिक वर्ण यम
क् च् ट् त् प् कँ्‌
ख् छ् ठ् थ् फ् खँ्‌
ग् ज् ड् द् ब् गँ्‌
घ् झ् ढ् ध् भ् घँ्‌

यहाँ यह बात ध्यातव्य है कि यम के आगम मेँ जो'पूर्वसदृश' पद प्रयुक्त हुआ है , उसका आशय वर्ग के अन्तर्गत संख्याक्रमत्वरुप सादृश्य से है सवर्णरुप सादृश्य से नहीँ। ये बात उव्वट और माहिषेय के भाष्यवचनोँ से भी पूर्णतया स्पष्ट है ।जिसे भी हम विस्तारभय से छोड रहे हैँ।

अस्तु हम पुनः प्रक्रिया पर आते हैँ-

ज् ञ् इस अवस्था मेँ तालिका के अनुसार 'ग्'यम का आगम होगा-
ज् ग् ञ्

ऐसी स्थिति प्राप्त होने पर चोःकु [अष्टाध्यायी सूत्र 8/2/30]
सूत्र प्रवृत्त होता है।
'ज्' चवर्ग का वर्ण है और 'ग' झल् प्रत्याहार मेँ सम्मिलित है, अतः इस सूत्र से 'ज्' को कवर्ग का यथासंख्य 'ग्' आदेश हो जायेगा। तब वर्णोँ की स्थिति होगी-
ग् ग् ञ्
इस प्रकार हम देखते हैँ कि ज् का संयुक्त रुप से 'ज्ञ' उच्चारण की प्रक्रिया मेँ उपर्युक्त विधि से 'ग् ग् ञ्' इस रुप से उच्चारण होता है। यहाँ जब ज् रुप ही शेष नहीँ रहा तो 'ज् ञ्' इस ध्वनिरुप मेँ इसका उच्चारण कैसे हो सकता है? अतः 'ज्ञ' का सही एवं शिक्षाव्याकरणशास्त्रसम्मत उच्चारण 'ग्ञ्' ही है।।

जय श्री राम !!!

Thursday, 1 May 2025

पूजा आदि में सिर नहीं ढंका चाहिए

शास्त्र प्रमाण:-
उष्णीषो कञ्चुकी चात्र मुक्तकेशी गलावृतः ।
 प्रलपन् कम्पनश्चैव तत्कृतो निष्फलो जपः ॥
अर्थात् -
पगड़ी पहनकर, कुर्ता पहनकर, नग्न होकर, शिखा खोलकर, कण्ठको वस्त्रसे लपेटकर, बोलते हुए, और काँपते हुए जो जप किया जाता है, वह निष्फल होता है ।'

शिर: प्रावृत्य कण्ठं वा मुक्तकच्छशिखोऽपि वा |
अकृत्वा पादयोः शौचमाचांतोऽप्यशुचिर्भवेत् ||
                   ( -कुर्म पुराण,अ.13,श्लोक 9)
अर्थात्-- सिर या कण्ठ को ढककर ,शिखा तथा कच्छ(लांग/पिछोटा) खुलने पर,बिना पैर धोये आचमन करने पर भी अशुद्ध रहता हैं(अर्थात् पहले सिर व कण्ठ पर से वस्त्र हटाये,शिखा व कच्छ बांधे, फिर पाँवों को धोना चाहिए, फिर आचमन करने के बाद व्यक्ति शुद्ध(देवयजन योग्य) होता है

Tuesday, 19 May 2020

वैदिक प्रश्नोत्तर

#प्रश्नोत्तर

"सादर प्रणाम"

कुछ प्रश्नों के उत्तर देने की कृपा करें।

१-पिता के जीवित होते बेटा किन्हें किन्हें तर्पण कर सकता है?

२-मामा की पुत्री से विवाह अगर सम्मत है तो किन बातों का ध्यान रखना उचित है।

३-ऋतु स्नान के बाद स्त्री जिसे प्रथम बार देखती है वैसी छाप आने वाली सन्तान पर पड़ती है तो प्रश्न यह कि कौन सा ऋतु स्नान सर्व प्रथम वाला या गर्भाधान के पहले वाला स्नान?

४-श्रीगणपति जी पर अगर भूल वश तुलसी चढ़ जाती है तो इसके लिये क्या प्रायश्चित है?

५-पूजन में देवताओ को चंदन आदि लगाते समय किस प्रकार की मर्यादा है? ...यथा चरणों मे या पादुका में चंदन लगा कर मस्तक में लगाने में किसी प्रकार का निषेध आदि?

जयश्रीराम

#उत्तर -

1 जिसके पिता जीवित हों वे भी नित्य तर्पण कर सकते हैं, परंतु दिव्य पितरों तक ही, आगे अपने पितरोंका /मनुष्य  पितरों का तर्पणादि न करें ।

और जिसके पिता जीवित हो वह पूर्ण अपसभ्य भी ना हो
#प्राचीनावीतीत्वाप्रकोष्ठठात्।
प्रकोष्ठ तक ही अपसव्य अवस्था में जनेऊधारण करें।

2 हमारे यहां वेदकी 1131 शाखाएं हैं उनके अनुसार पद्धतियां और विधान भी पृथक पृथक उपलब्ध होते हैं।

जिन विधानोंमें आपस में विरोध नहीं है और किसी शाखा में उसका उल्लेखभी नहीं है ,तो उस कार्य को  दूसरी शाखा वाले के अनुसार भी दूसरी शाखा वाला कर सकता है।

परंतु किसी शाखा में किसी भी विधान पद्धति को अलग प्रकार से कहा गया है और दूसरी में अलग प्रकार से कहा गया है, तो उन दोनों का आपस में मेल नहीं हो सकता अर्थात दोनों को अपनी अपनी शाखा अनुसार ही बर्ताव करना चाहिए यही सभी शास्त्रों का निर्णय है ।
#पारक्यमविरोधीचेत्।

इसी नियमानुसार कुछ ऋग्वेद की और कुछ  कृष्ण यजुर्वेदादिकी शाखा वालों  ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्यों के लिए मामा की बेटी से विवाह करना शास्त्र ने वैध बताया है अर्थात विधान किया है, जिनके लिए विधान किया है अर्थात जिनके यहां वंश परंपरा से यह कार्य चलता आ रहा है उनके लिए यह धर्म एवं शास्त्र सम्मत है ऐसा दक्षिण के कई पवित्र ब्राह्मणों के यहां भी देखा सुना जाता है।

परंतु जिन शाखा वालों के यहां, जिस देश में अथवा जिन कुलों में परंपरा से यह प्राप्त नहीं है जिनके यहां यह काम नहीं होता बल्कि निंदित माना जाता है उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए ।

ऐसा निर्णय निर्णयसिंधुमें लिखा हुआ है विस्तार से आप वहां देख सकते हैं।

3 हमारे धर्म ग्रंथों के अनुसार तो प्रथम रजोदर्शन भी पति के घर पर ही होना चाहिए (आज की परिस्थिति अलग है) हर एक रजोदर्शन के बाद शुद्धि के उपरांत सर्वप्रथम  अपने पति का ही मुख देखा जाए ऐसा माताओं के लिए शास्त्र में स्पष्ट उल्लेख है ।

इस बात को यूं समझ सकते हैं  कि दिन में या संध्याकालमें  गर्भाधान करने से संतान क्रूर होती है ,ऐसा कहा गया है। 

तो क्या  गर्भाधान न करने की दृष्टि से दिन में मैथन किया जा सकता है?

इसका उत्तर देते हुए टीका कारों ने लिखा है कि नहीं । तब भी निषिद्ध है , अगर उससे पुत्र नहीं हुआ तब भी अगले पुत्र में वह दोष आएगा, अगले जन्म में जाएगा , उसका तो वह दोषी होगा ही।

ठीक इसी प्रकार  सभी रजोदर्शन ओं में नियम पालन करना जरूरी है ।

परंतु गर्भाधान से पूर्व में विशेष ध्यान रखा जाए ऐसा तात्पर्य शास्त्र कारों ने दर्शाया है ।

4 कई ऐसे अपराध हैं जिनका प्रायश्चित स्पष्ट रूप से शास्त्रों में नहीं लिखा है।

उनके लिए शास्त्रों ने एक नियम बनाया है ,एक निर्देश किया है कि जिन का प्रायश्चित नहीं लिखा है

उनका प्रायश्चित प्राणायाम है
देवता का स्मरण है
क्षमा याचना है
और भगवन्नाम है।

इसलिए अपनी शक्ति अनुसार प्राणायाम करें

गणेश जी  से क्षमा याचना करें ।

और अपने इष्टदेव का नाम संकीर्तन करें।

तो कई प्रकार के दोषों का प्रायश्चित हो जाता है यहां भी यही कार्य करना चाहिए।

5 मुख्य रूप से साधारण पूजन में देवताओं के इष्ट देवों के मस्तक पर ही तिलक लगाने का विधान है, तो वहां कोई आपत्ति ही नहीं है।

परंतु विशेष पूजनमें चरणों का भी पूजन होता है, चरण पादुका ओं का भी होता है और देवता का तो होता ही है ।

तो ऐसी जगहों पर अलग-अलग पात्रों में चंदन रखना चाहिए

यह तंत्र शास्त्रों में विशेष पूजन की विधि में आप देखेंगे तो वहां पाद्यके लिए पात्र अलग रखा जाता है, अर्घ्य के लिए अलग रखा जाता है।

पूरी पात्रासाधन की प्रक्रिया बड़ी जटिल और कठिन है सादा रूप से किसी पंडित के भी बस की बात नहीं है बिना योग्य गुरु से पढ़े और उसका अभ्यास किए बिना ।

तो कहने का तात्पर्य यही है कि जहां चरणों का और देवता का पूजन दोनों का करना हो तो अलग-अलग पात्रों में चंदन रखें और अलग-अलग रूप से निवेदन करें ।

बीच-बीच में हाथ धुलने की परंपरा भी पूजन क्रम में ध्यान रखने योग्य है।

पूजन की पद्धति तो विशेष है बहुत विधि निषेध हैं तंत्र शास्त्रों में आगम शास्त्रों में अवश्य देखनी चाहिए।

वर्तमान में जो भी पूजन क्रम चल रहा है इसका मूल तंत्र ही हैं।

राजेश राजौरिया वैदिक वृन्दावन।
नमः पार्वतीपतये हर हर महादेव।

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