Sunday, 31 May 2026

33 करोड़ देवता निर्णय

#तैंतीस_करोड़_देवता_कोटि_नहीं_हैं_ 
वास्तव में वैदिक दर्शन में "अनन्ता वै वेदा:"
प्रमाण से "मंत्र ब्राह्मणयोर्वेद नामधेयम्",पूर्वक "छंद ऋषिर्देवता शक्तत्यात्मकं मंत्रों" इस नियम से अनन्तों वैदिक मंत्रों के अनंतों देवता सिद्ध होते हैं।अतः" देवता ३३संख्यात्मक ही अथवा ३३ कोट्यात्मक ही"ऐसा कोई नियम प्रमाणित नहीं होता।हां असंख्य देवताओं में एक ही देवता का देवत्व है यह अवश्य ही प्रमाणित होता है यथा -"बहूनि देवानामसुरत्वमेकं"आदि।
केवल एक दृष्टांत का संदर्भ ग्रहण करें एवं तुल्यत: सभी में वैसा ही नियम लगा लें तो कोई संदेह नहीं रह जाएगा -
यथा यदि रुद्र एक (१)कोटि है तो ग्यारह (११) रुद्रों की एक (१)ही कोटि या प्रकार होनी चाहिए ग्यारह कोटि नहीं क्योंकि कुल ग्यारह रुद्र ही प्रसिद्ध हैं किन्तु यहां ३२कोटि देवताओं में ११ रुद्रों की ११कोटि के रुप में गणना करके ३२की संख्या पूरी कर ली गई है जबकि ३२कोटि में ३२ प्रकार के रुद्र आदि देवता दिखाने चाहिए थे किन्तु भ्रम वादियों द्वारा ऐसा न करके रुद्र, वसु,आदित्य,आदि चार पांच कोटियों में ही ३२की संख्या पूरी की गई है।और आप शास्त्रीय प्रमाण की बात कर रहे हैं तो शास्त्र एक ही रुद्र (एको हि रुद्रो न द्वितीयाय तस्थु...)के ग्यारह ही नहीं बल्कि असंख्यों रुपों का निर्विवाद निर्वचन करता है यथा -"असंख्याता सहस्राणि ये रुद्राsअधिभूम्याम्।तेषा ग्वंग् सहस्रयोजनेsव धन्वानि तन्मसि।।शुक्ल यजुर्वेद,रुद्रसूक्त,५४
इसके अतिरिक्त -"असंख्याता ह वै रुद्रा"
पूजनीयो ह वै देवा: (जो चतुर्विध पुरुषार्थों की सिद्धि के लिए मानवादिकों के लिए पूजनीय हैं वही देवता हैं) इस प्रमाण से माता, पिता, आचार्य से लेकर,देव,पितृ,आदि से ग्रहण करते हुए विष्णु शिव आदि पंचायतन देवताओं के समस्त अवतारों की गणना करते हुए ३२ करोड़ देवता भी कम ही ठहरेंगे।यद्यपि इससे शास्त्रीय अद्वैत वाद को कोई क्षति भी नहीं पहुंचती क्योंकि भारत में एक ही देवता (एकं सद् विप्रा:बहुधा वदन्ति)की महिमा में १८ पुराण लिखे गए हैं यह तथ्य अविस्मरणीय है।
मातृ देवो भव।पितृ देवो भव।। आचार्य देवो भव।।।(तैत्तिरीय उपनिषद्,शिक्षा वल्ली)
देवी-देवता 33 कोटि नहीं 33 करोड़ ही हैं, जानिए इस सत्य को!
देवता वास्तव में 33 करोड़ ही हैं, 33 प्रकार के नहीं। आमतौर पर जो लोग यह समझते हैं कि 33 कोटि शब्द में कोटि का अर्थ 'प्रकार' है, वे अपनी बात के समर्थन में निम्न बातें करते हैं।
भ्रमपूर्ण तर्क : - उनका कहना है कि हिन्दू धर्म को भ्रमित करने के लिए अक्सर देवी और देवताओं की संख्‍या 33 करोड़ बताई जाती रही है। धर्मग्रंथों में देवताओं की 33 कोटि बताई गई है, करोड़ नहीं। जिस प्रकार एक ही शब्द को अलग-अलग स्थान पर प्रयोग करने पर अर्थ भिन्न हो जाता है, उसी प्रकार देवभाषा संस्कृत में कोटि शब्द के दो अर्थ होते हैं।
कोटि का मतलब प्रकार होता है और एक अर्थ करोड़ भी होता है लेकिन यहां कोटि का अर्थ प्रकार है, करोड़ नहीं। इस बात के समर्थन में वे यह भी कहते हैं कि ग्रंथों को खंगालने के बाद कुल 33 प्रकार के देवी-देवताओं का वर्णन मिलता है। ये निम्न प्रकार से हैं-
12 आदित्य, 8 वसु, 11 रुद्र और इन्द्र व प्रजापति को मिलाकर कुल 33 देवता होते हैं। कुछ विद्वान इन्द्र और प्रजापति की जगह 2 अश्विनी कुमारों को रखते हैं। प्रजापति ही ब्रह्मा हैं।👌
12 आदित्य : 1. अंशुमान, 2. अर्यमा, 3. इन्द्र, 4. त्वष्टा, 5. धाता, 6. पर्जन्य, 7. पूषा, 8. भग, 9. मित्र, 10. वरुण, 11. विवस्वान और 12. विष्णु। 
8 वसु : 1. अप, 2. ध्रुव, 3. सोम, 4. धर, 5. अनिल, 6. अनल, 7. प्रत्यूष और 8. प्रभाष। 
11 रुद्र : 1. शम्भू, 2. पिनाकी, 3. गिरीश, 4. स्थाणु, 5. भर्ग, 6. भव, 7. सदाशिव, 8. शिव, 9. हर, 10. शर्व और 11. कपाली।
2 अश्विनी कुमार : 1. नासत्य और 2. दस्त्र।
कुल : 12+8+11+2=33
33 देवी और देवताओं के कुल के अन्य बहुत से देवी-देवता हैं तथा सभी की संख्या मिलाकर भी 33 करोड़ नहीं होती, लाख भी नहीं होती और हजार भी नहीं। वर्तमान में इनकी पूजा होती है।
उपरोक्त तर्क का खंडन!
प्रथम तो कोटि शब्द का अर्थ करोड़ भी है और प्रकार भी है, इसे हम अवश्य स्वीकार करते हैं, परंतु यह नहीं स्वीकार करते कि यहां कोटि का अर्थ करोड़ न होकर प्रकार होगा। पहले तो कोटि शब्द को समझें। कोटि का अर्थ प्रकार लेने से कोई भी व्यक्ति 33 देवता नहीं गिना पाएगा। कारण, स्पष्ट है कि कोटि यानी प्रकार यानी श्रेणी। अब यदि हम कहें कि आदित्य एक श्रेणी यानी प्रकार यानी कोटि है, तो यह कह सकते हैं कि आदित्य की कोटि में 12 देवता आते हैं जिनके नाम अमुक-अमुक हैं। लेकिन आप ये कहें कि सभी 12 अलग-अलग कोटि हैं, तो जरा हमें बताएं कि पर्जन्य, इन्द्र और त्वष्टा की कोटि में कितने सदस्य हैं?
ऐसी गणना ही व्यर्थ है, क्योंकि यदि कोटि कोई हो सकता है तो वह आदित्य है। आदित्य की कोटि में 12 सदस्य, वसु की कोटि या प्रकार में 8 सदस्य आदि-आदि। लेकिन यहां तो एक-एक देवता को एक-एक श्रेणी अर्थात प्रकार कह दिया है।
द्वितीय, उन्हें कैसे ज्ञात कि यहां कोटि का अर्थ प्रकार ही होगा, करोड़ नहीं? प्रत्यक्ष है कि देवता एक स्थिति है, योनि हैं जैसे मनुष्य आदि एक स्थिति है, योनि है। मनुष्य की योनि में भारतीय, अमेरिकी, अफ्रीकी, रूसी, जापानी आदि कई कोटि यानी श्रेणियां हैं जिसमें इतने-इतने कोटि यानी करोड़ सदस्य हैं। देव योनि में मात्र यही 33 देव नहीं आते। इनके अलावा मणिभद्र आदि अनेक यक्ष, चित्ररथ, तुम्बुरु, आदि गंधर्व, उर्वशी, रम्भा आदि अप्सराएं, अर्यमा आदि पितृगण, वशिष्ठ आदि सप्तर्षि, दक्ष, कश्यप आदि प्रजापति, वासुकि आदि नाग, इस प्रकार और भी कई जातियां देवों में होती हैं जिनमें से 2-3 हजार के नाम तो प्रत्यक्ष अंगुली पर गिनाए जा सकते हैं।
शुक्ल यजुर्वेद ने कहा : - अग्निर्देवता वातो देवता सूर्यो देवता चन्द्रमा देवता वसवो देवता रुद्रा देवतादित्या देवता मरुतो देवता विश्वेदेवा देवता बृहस्पतिर्देवतेन्द्रो देवता वरुणो देवता।
अथर्ववेद में आया है : अहमादित्यरुत विश्वेदेवै।
इसमें अग्नि और वायु का नाम भी देवता के रूप में आया है। अब क्या ऊपर की 33 देव नामावली में ये न होने से देव नहीं गिने जाएंगे? मैं ये नहीं कह रहा कि ये ऊपर के गिनाए गए 33 देवता नहीं होते बिलकुल होते हैं लेकिन इनके अलावा भी करोड़ों देव हैं।
भगवती दुर्गा की 5 प्रधान श्रेणियों में 64 योगिनियां हैं। हर श्रेणी में 64 योगिनी। इनके साथ 52 भैरव भी होते हैं। सैकड़ों योगिनी, अप्सरा, यक्षिणी के नाम मैं बता सकता हूं। 49 प्रकार के मरुद्गण और 56 प्रकार के विश्वेदेव होते हैं। ये सब कहां गए? इनकी गणना क्यों न की गई? 
33 कोटि बताने वालों का दूसरा खंडन!
शिव-सती : - सती ही पार्वती है और वही दुर्गा है। उसी के 9 रूप हैं। वही 10 महाविद्या है। शिव ही रुद्र हैं और हनुमानजी जैसे उनके कई अंशावतार भी हैं।
विष्णु-लक्ष्मी : - विष्णु के 24 अवतार हैं, वही राम हैं और वही कृष्ण भी। बुद्ध भी वही है और नर-नारायण भी वही है। विष्णु जिस शेषनाग पर सोते हैं वही नागदेवता भिन्न-भिन्न रूपों में अवतार लेते हैं। लक्ष्मण और बलराम उन्हीं के अवतार हैं।
ब्रह्मा-सरस्वती : - ब्रह्मा को प्रजापति कहा जाता है। उनके मानस पुत्रों के पुत्रों में कश्यप ऋषि हुए जिनकी कई पत्नियां थीं। उन्हीं से इस धरती पर पशु-पक्षी और नर-वानर आदि प्रजातियों का जन्म हुआ। चूंकि वे हमारे जन्मदाता हैं इसलिए ब्रह्मा को प्रजापिता भी कहा जाता है।
इनके तर्क का पुन: खंडन!
यदि कश्यप आदि को आप इसीलिए देव नहीं मानते, क्योंकि ब्रह्मा के द्वारा इनका प्राकट्य हुआ है, सो ये सब ब्रह्मरूप हुए सो इनकी गिनती नहीं होगी तो कश्यप के द्वारा प्रकट किए गए 12 आदित्य और 8 वसु तथा 11 रुद्रों को आप कश्यप रूप मानकर छोड़ क्यों नहीं देते? इनकी गिनती के समय आपकी प्रज्ञा कहां गई?
यदि सारे रूद्र शिव के अवतार हैं, स्वयं हनुमानजी भी हैं, तो क्या आप पार्वती को हनुमानजी की पत्नी कह सकते हैं? क्यों नहीं? इसीलिए क्योंकि हनुमान रुद्रावतार हैं उस समय अवतार यानी वही ऊर्जा होने पर भी स्वरूपत: और उद्देश्यत: भिन्न हैं। ऐसे ही समग्र संसार नारायण रूप होने पर भी स्वरूपत: और उद्देश्यत: भिन्न हैं। इसी कारण आप सीता को कृष्ण पत्नी और रुक्मिणी को राम पत्नी नहीं कह सकते, क्योंकि अभेद में भी भेद है। और जो सभी के एक होने की बात करते हैं वे यदि इतने ही बड़े ब्रह्मज्ञानी हैं तो क्या उन्हें शिव और विष्णु की एकाकारता नहीं दिखती?
शिव और विष्णु में इन्हें भेद दिखता है इसलिए इन्हें अलग-अलग गिनेंगे और राम और विष्णु में अभेद दिखता है, सो इन्हें नहीं गिनेंगे। समग्र संसार ही विष्णुरूप है, रुद्ररूप है, देवीरूप है। भेद भी है और अभेद भी है। लेकिन यदि अभेद मानते हो फिर ये जो 33 देव गिना रहे हो ये भी न गिना पाओगे, क्योंकि जब विष्णु के अवतार राम और कृष्ण को अभेद मानकर नहीं गिन रहे, सती के 10 महाविद्या अवतार को नहीं गिन रहे तो फिर शिवजी के 11 रुद्र अवतार को किस सिद्धांत से गिन रहे हो? सभी ग्रामदेव, कुलदेव, अजर आदि क्षेत्रपाल, ये सबको कौन गिनेगा? ये छोड़ो, इस 33 वाली गणना में तो गणेश, कार्तिकेय, वीरभद्र, अग्नि, वायु, कुबेर, यमराज जैसे प्रमुख देवों को भी नहीं गिना गया।
वेदों में कही-कहीं 13 देवता की भी बात आई है और कहीं-कहीं 36 देवता की भी चर्चा है। 3,339 और 6,000 की भी चर्चा है। अकेले वालखिल्यों की संख्या 60,000 है। तो वहां इन 33 में से कुछ को लिया भी गया है और कुछ को नहीं भी। तो क्या वह असत्य है? बिलकुल नहीं। जैसे जहां मनुष्य की चर्चा हो वहां आप केवल उनका ही नाम लेते हैं जिसका उस चर्चा से संबंध हो, सभी का नहीं। वैसे ही जहां जैसे प्रसंग हैं वहां वैसे ही देवों का नाम लिया गया है। इसका अर्थ ये नहीं कि जिनकी चर्चा नहीं की गई, या अन्यत्र की गई, उसका अस्तित्व ही नहीं। इस 33 की श्रेणी में गरूड़, नंदी आदि का नाम नहीं जबकि वेदों में तो है। विनायक की श्रेणी में, वक्रतुण्ड की श्रेणी में गणेशजी के सैकड़ों अवतार के नाम तंत्र में आए हैं।
हां, 33 कोटि देव की बात है जरूर और कोटि का अर्थ करोड़ ही है, क्योंकि देवता केवल स्वर्ग में नहीं रहते। उनके सैकड़ों अन्य दिव्यलोक भी हैं। और ऐसा कहा जाए तो फिर सभी एकरूप होने से सीधे ब्रह्म के ही अंश हैं तो ये 33 भी गिनती में नहीं आएंगे। फिर वैसे तो हम सब भी गिनती में नहीं आएंगे। सभी भारतीय ही हैं तो अलग-अलग क्यों गिनते हैं?
हर हर महादेव।।।
साभार 
डॉ. कमलेश पाठक आचार्य जी

Tuesday, 15 July 2025

ज्ञ वर्ण का उच्चारण

'ज्ञ' वर्ण के उच्चारण पर शास्त्रीय दृष्टि-

संस्कृत भाषा मेँ उच्चारण की शुद्धता का अत्यधिक महत्त्व है। शिक्षा व व्याकरण के ग्रंथोँ मेँ प्रत्येक वर्ण के उच्चारण स्थान और ध्वनि परिवर्तन के आगमलोपादि नियमोँ की विस्तार से चर्चा है। फिर भी "ज्ञ" के उच्चारण पर समाज मेँ बडी भ्रांति है। 

ज्+ञ्=ज्ञ

कारणः-'ज्' चवर्ग का तृतीय वर्ण है और 'ञ्' चवर्ग का ही पंचम वर्ण है।
जब भी 'ज्' वर्ण के तुरन्त बाद 'ञ्' वर्ण आता है तो 'अज्झीनं व्यञ्जनं परेण संयोज्यम्' इस महाभाष्यवचन के अनुसार 'ज् +ञ'[ज्ञ] इस रुप मेँ संयुक्त होकर 'ज्य्ञ्' ऐसी ध्वनि उच्चारित होनी चाहिये।।

किँतु ये भी कुछ का एक भ्रामक मत है।।

प्रिय मित्रोँ!

"ज्ञ"वर्ण का यथार्थ तथा शिक्षाव्याकरणसम्मत शास्त्रोक्त उच्चारण 'ग्ञ्' ही है। जिसे हम सभी परंपरावादी लोग सदा से ही "लोक" व्यवहार करते आये हैँ।

कारणः- तैत्तिरीय प्रातिशाख्य 2/21/12 का नियम क्या कहता है-
स्पर्शादनुत्तमादुत्तमपराद् आनुपूर्व्यान्नासिक्याः।।
इसका अर्थ है- अनुत्तम, स्पर्श वर्ण के तुरन्त बाद यदि उत्तम स्पर्श वर्ण आता है तो दोनोँ के मध्य मेँ एक नासिक्यवर्ण का आगम होता है। यही नासिक्यवर्ण शिक्षा तथा व्याकरण के ग्रंथोँ मेँ यम के नाम से प्रसिद्ध है। 'तान्यमानेके' (तै॰प्रा॰2/21/13) इस नासिक्य वर्ण को ही कुछ आचार्य 'यम' कहते हैँ। प्रसिद्ध शिक्षाग्रन्थ 'नारदीयशिक्षा' मेँ भी यम का उल्लेख है।अनन्त्यश्च भवेत्पूर्वो ह्यन्तश्च परतो यदि। तत्र मध्ये यमस्तिष्ठेत्सवर्णः पूर्ववर्णयोः।। औदव्रजि के 'ऋक्तंत्रव्याकरण' नामक ग्रंथ मेँ भी 'यम' का स्पष्ट उल्लेख है।'अनन्त्यासंयोगे मध्ये यमः पूर्वस्य गुणः' अर्थात् वर्ग के शुरुआती चार वर्णो के बाद यदि वर्ग का पाँचवाँ वर्ण आता है तो दोनो के बीच 'यम' का आगम होता है,जो उस पहले अनन्तिम-वर्ण के समान होता है।
प्रातिशाख्य के आधार पर यम को परिभाषित करते हुए सरल शब्दों मेँ यही बात भट्टोजी दीक्षित भी लिखते हैँ-
"वर्गेष्वाद्यानां चतुर्णां पंचमे परे मध्य यमो नाम पूर्व सदृशो वर्णः प्रातिशाख्ये प्रसिद्धः" -सि॰कौ॰12/ (8/2/1सूत्र पर)
भट्टोजी दीक्षित यम का उदाहरण देते हैँ। पलिक्क्नी 'चख्खनतुः' अग्ग्निः 'घ्घ्नन्ति'।
यहाँ प्रथम उदाहरण मेँ क् वर्ण के बाद न् वर्ण आने पर बीच मेँ क् का सदृश यम कँ(अर्द्ध) का आगम हुआ है। दूसरे उदाहरण मेँ खँ कार तथैव गँ कार यम, घँ कार यम का आगम हुआ है।

अतः स्पष्ट है कि यदि अनुनासिक स्पर्श वर्ण के तुरंत बाद अनुनासिक स्पर्श वर्ण आता है तो उनके मध्य मेँ अनुनासिक स्पर्श वर्ण के सदृश यम का आगम होता है।
प्रकृत स्थल मेँ-
ज् + ञ्
इस अवस्था मेँ भी उक्त नियम के अनुसार यम का आगम होगा।
किस अनुनासिक वर्ण के साथ कौन से यम का आगम होगा।विस्तारभय से सार रुप दर्शा रहे हैँ। तालिक देखेँ-

स्पर्श अनुनासिक वर्ण यम
क् च् ट् त् प् कँ्‌
ख् छ् ठ् थ् फ् खँ्‌
ग् ज् ड् द् ब् गँ्‌
घ् झ् ढ् ध् भ् घँ्‌

यहाँ यह बात ध्यातव्य है कि यम के आगम मेँ जो'पूर्वसदृश' पद प्रयुक्त हुआ है , उसका आशय वर्ग के अन्तर्गत संख्याक्रमत्वरुप सादृश्य से है सवर्णरुप सादृश्य से नहीँ। ये बात उव्वट और माहिषेय के भाष्यवचनोँ से भी पूर्णतया स्पष्ट है ।जिसे भी हम विस्तारभय से छोड रहे हैँ।

अस्तु हम पुनः प्रक्रिया पर आते हैँ-

ज् ञ् इस अवस्था मेँ तालिका के अनुसार 'ग्'यम का आगम होगा-
ज् ग् ञ्

ऐसी स्थिति प्राप्त होने पर चोःकु [अष्टाध्यायी सूत्र 8/2/30]
सूत्र प्रवृत्त होता है।
'ज्' चवर्ग का वर्ण है और 'ग' झल् प्रत्याहार मेँ सम्मिलित है, अतः इस सूत्र से 'ज्' को कवर्ग का यथासंख्य 'ग्' आदेश हो जायेगा। तब वर्णोँ की स्थिति होगी-
ग् ग् ञ्
इस प्रकार हम देखते हैँ कि ज् का संयुक्त रुप से 'ज्ञ' उच्चारण की प्रक्रिया मेँ उपर्युक्त विधि से 'ग् ग् ञ्' इस रुप से उच्चारण होता है। यहाँ जब ज् रुप ही शेष नहीँ रहा तो 'ज् ञ्' इस ध्वनिरुप मेँ इसका उच्चारण कैसे हो सकता है? अतः 'ज्ञ' का सही एवं शिक्षाव्याकरणशास्त्रसम्मत उच्चारण 'ग्ञ्' ही है।।

जय श्री राम !!!

Thursday, 1 May 2025

पूजा आदि में सिर नहीं ढंका चाहिए

शास्त्र प्रमाण:-
उष्णीषो कञ्चुकी चात्र मुक्तकेशी गलावृतः ।
 प्रलपन् कम्पनश्चैव तत्कृतो निष्फलो जपः ॥
अर्थात् -
पगड़ी पहनकर, कुर्ता पहनकर, नग्न होकर, शिखा खोलकर, कण्ठको वस्त्रसे लपेटकर, बोलते हुए, और काँपते हुए जो जप किया जाता है, वह निष्फल होता है ।'

शिर: प्रावृत्य कण्ठं वा मुक्तकच्छशिखोऽपि वा |
अकृत्वा पादयोः शौचमाचांतोऽप्यशुचिर्भवेत् ||
                   ( -कुर्म पुराण,अ.13,श्लोक 9)
अर्थात्-- सिर या कण्ठ को ढककर ,शिखा तथा कच्छ(लांग/पिछोटा) खुलने पर,बिना पैर धोये आचमन करने पर भी अशुद्ध रहता हैं(अर्थात् पहले सिर व कण्ठ पर से वस्त्र हटाये,शिखा व कच्छ बांधे, फिर पाँवों को धोना चाहिए, फिर आचमन करने के बाद व्यक्ति शुद्ध(देवयजन योग्य) होता है

Tuesday, 19 May 2020

वैदिक प्रश्नोत्तर

#प्रश्नोत्तर

"सादर प्रणाम"

कुछ प्रश्नों के उत्तर देने की कृपा करें।

१-पिता के जीवित होते बेटा किन्हें किन्हें तर्पण कर सकता है?

२-मामा की पुत्री से विवाह अगर सम्मत है तो किन बातों का ध्यान रखना उचित है।

३-ऋतु स्नान के बाद स्त्री जिसे प्रथम बार देखती है वैसी छाप आने वाली सन्तान पर पड़ती है तो प्रश्न यह कि कौन सा ऋतु स्नान सर्व प्रथम वाला या गर्भाधान के पहले वाला स्नान?

४-श्रीगणपति जी पर अगर भूल वश तुलसी चढ़ जाती है तो इसके लिये क्या प्रायश्चित है?

५-पूजन में देवताओ को चंदन आदि लगाते समय किस प्रकार की मर्यादा है? ...यथा चरणों मे या पादुका में चंदन लगा कर मस्तक में लगाने में किसी प्रकार का निषेध आदि?

जयश्रीराम

#उत्तर -

1 जिसके पिता जीवित हों वे भी नित्य तर्पण कर सकते हैं, परंतु दिव्य पितरों तक ही, आगे अपने पितरोंका /मनुष्य  पितरों का तर्पणादि न करें ।

और जिसके पिता जीवित हो वह पूर्ण अपसभ्य भी ना हो
#प्राचीनावीतीत्वाप्रकोष्ठठात्।
प्रकोष्ठ तक ही अपसव्य अवस्था में जनेऊधारण करें।

2 हमारे यहां वेदकी 1131 शाखाएं हैं उनके अनुसार पद्धतियां और विधान भी पृथक पृथक उपलब्ध होते हैं।

जिन विधानोंमें आपस में विरोध नहीं है और किसी शाखा में उसका उल्लेखभी नहीं है ,तो उस कार्य को  दूसरी शाखा वाले के अनुसार भी दूसरी शाखा वाला कर सकता है।

परंतु किसी शाखा में किसी भी विधान पद्धति को अलग प्रकार से कहा गया है और दूसरी में अलग प्रकार से कहा गया है, तो उन दोनों का आपस में मेल नहीं हो सकता अर्थात दोनों को अपनी अपनी शाखा अनुसार ही बर्ताव करना चाहिए यही सभी शास्त्रों का निर्णय है ।
#पारक्यमविरोधीचेत्।

इसी नियमानुसार कुछ ऋग्वेद की और कुछ  कृष्ण यजुर्वेदादिकी शाखा वालों  ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्यों के लिए मामा की बेटी से विवाह करना शास्त्र ने वैध बताया है अर्थात विधान किया है, जिनके लिए विधान किया है अर्थात जिनके यहां वंश परंपरा से यह कार्य चलता आ रहा है उनके लिए यह धर्म एवं शास्त्र सम्मत है ऐसा दक्षिण के कई पवित्र ब्राह्मणों के यहां भी देखा सुना जाता है।

परंतु जिन शाखा वालों के यहां, जिस देश में अथवा जिन कुलों में परंपरा से यह प्राप्त नहीं है जिनके यहां यह काम नहीं होता बल्कि निंदित माना जाता है उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए ।

ऐसा निर्णय निर्णयसिंधुमें लिखा हुआ है विस्तार से आप वहां देख सकते हैं।

3 हमारे धर्म ग्रंथों के अनुसार तो प्रथम रजोदर्शन भी पति के घर पर ही होना चाहिए (आज की परिस्थिति अलग है) हर एक रजोदर्शन के बाद शुद्धि के उपरांत सर्वप्रथम  अपने पति का ही मुख देखा जाए ऐसा माताओं के लिए शास्त्र में स्पष्ट उल्लेख है ।

इस बात को यूं समझ सकते हैं  कि दिन में या संध्याकालमें  गर्भाधान करने से संतान क्रूर होती है ,ऐसा कहा गया है। 

तो क्या  गर्भाधान न करने की दृष्टि से दिन में मैथन किया जा सकता है?

इसका उत्तर देते हुए टीका कारों ने लिखा है कि नहीं । तब भी निषिद्ध है , अगर उससे पुत्र नहीं हुआ तब भी अगले पुत्र में वह दोष आएगा, अगले जन्म में जाएगा , उसका तो वह दोषी होगा ही।

ठीक इसी प्रकार  सभी रजोदर्शन ओं में नियम पालन करना जरूरी है ।

परंतु गर्भाधान से पूर्व में विशेष ध्यान रखा जाए ऐसा तात्पर्य शास्त्र कारों ने दर्शाया है ।

4 कई ऐसे अपराध हैं जिनका प्रायश्चित स्पष्ट रूप से शास्त्रों में नहीं लिखा है।

उनके लिए शास्त्रों ने एक नियम बनाया है ,एक निर्देश किया है कि जिन का प्रायश्चित नहीं लिखा है

उनका प्रायश्चित प्राणायाम है
देवता का स्मरण है
क्षमा याचना है
और भगवन्नाम है।

इसलिए अपनी शक्ति अनुसार प्राणायाम करें

गणेश जी  से क्षमा याचना करें ।

और अपने इष्टदेव का नाम संकीर्तन करें।

तो कई प्रकार के दोषों का प्रायश्चित हो जाता है यहां भी यही कार्य करना चाहिए।

5 मुख्य रूप से साधारण पूजन में देवताओं के इष्ट देवों के मस्तक पर ही तिलक लगाने का विधान है, तो वहां कोई आपत्ति ही नहीं है।

परंतु विशेष पूजनमें चरणों का भी पूजन होता है, चरण पादुका ओं का भी होता है और देवता का तो होता ही है ।

तो ऐसी जगहों पर अलग-अलग पात्रों में चंदन रखना चाहिए

यह तंत्र शास्त्रों में विशेष पूजन की विधि में आप देखेंगे तो वहां पाद्यके लिए पात्र अलग रखा जाता है, अर्घ्य के लिए अलग रखा जाता है।

पूरी पात्रासाधन की प्रक्रिया बड़ी जटिल और कठिन है सादा रूप से किसी पंडित के भी बस की बात नहीं है बिना योग्य गुरु से पढ़े और उसका अभ्यास किए बिना ।

तो कहने का तात्पर्य यही है कि जहां चरणों का और देवता का पूजन दोनों का करना हो तो अलग-अलग पात्रों में चंदन रखें और अलग-अलग रूप से निवेदन करें ।

बीच-बीच में हाथ धुलने की परंपरा भी पूजन क्रम में ध्यान रखने योग्य है।

पूजन की पद्धति तो विशेष है बहुत विधि निषेध हैं तंत्र शास्त्रों में आगम शास्त्रों में अवश्य देखनी चाहिए।

वर्तमान में जो भी पूजन क्रम चल रहा है इसका मूल तंत्र ही हैं।

राजेश राजौरिया वैदिक वृन्दावन।
नमः पार्वतीपतये हर हर महादेव।

यजुर्वेद में जन्म से जाति

जन्मना वर्ण व्यवस्था सिद्धि यजुर्वेद से >>>>>>>

आ ब्रह्मन् ब्राह्मणो ब्रह्मवर्चसी जायताम् आ राष्ट्रे राजन्यः शूर ऽ इषव्यो ऽतिव्याधी महारथो जायतां दोग्ध्री धेनुर् वोढानड्वान् आशुः सप्तिः पुरंधिर् योषा जिष्णू रथेष्ठाः सभेयो युवास्य यजमानस्य वीरो जायतां निकामे-निकामे नः पर्जन्यो वर्षतु फलवत्यो न ऽ ओषधयः पच्यन्तां योगक्षेमो नः कल्पताम् ॥ ( यजुर्वेद २२/२२)

अर्थ :~~ हमारे राष्ट्र में ब्रह्मवर्चसी ब्राह्मण उत्पन्न हों । हमारे राष्ट्र में शूर, बाणवेधन में कुशल, महारथी क्षत्रिय उत्पन्न हों । यजमान की गायें दूध देने वाली हों, बैल भार ढोने में सक्षम हों, घोड़े शीघ्रगामी हों । स्त्रियाँ सुशील और सर्वगुण सम्पन्न हों । रथवाले, जयशील, पराक्रमी और यजमान पुत्र हों । हमारे राष्ट्र में आवश्यकतानुसार समय-समय पर मेघ वर्षा करें । फ़सलें और औषधियाँ फल-फूल से लदी होकर परिपक्वता प्राप्त करें । और हमारा योगक्षेम उत्तम रीति से होता रहे ।

व्याख्या :==  यहाँ ब्राह्मण के लिए ब्रह्मवर्चसी एवं राजाओं के लिए शुरत्व आदि की प्रार्थना आयी है । यदि वेदों में वर्णव्यवस्था कथित गुण कर्मानुरूप होती तो ब्राह्मण के लिए ब्रह्मवर्चसी की प्राथना उसमें नहीं होती तब वेद में ब्रह्मवर्चस युक्त को ही नाम ब्राह्मण होता एव ब्राह्मण के लिए ब्रह्मवर्चसी  प्रार्थना एवं आशिर्वाद ही व्यर्थ होता। 

यह प्रार्थना ही यहाँ जन्मना वर्ण व्यवस्था कि सिद्धि करता है,
ब्राह्मोऽजातौ( अष्टा० ६।४।१७१) इस पाणिनि सूत्र से अपत्य एवं जाती में ब्राह्मण शब्द होता है अब अर्थ हुआ कि हे ! ब्रह्मन्  ब्राह्मण ब्रह्मवर्चसी होवें अथवा ब्रह्मन्–ब्राह्मण में (सप्तम्या लुक्) ब्रह्मवर्चसी ब्राह्मण उत्तपन्न होवें। 

इसी प्रकार शूरतादि गुण बाले  जिस किसीके ( गुणकर्मानुरूप वर्णव्यवस्था मानने बालों के मतानुरूप ) क्षत्रिय होने पर वेद में ( राजन्यः शूरो जायताम ) यह श्रुती व्यर्थ होगी , क्योंकि जो कोई भी शूरता आदि गुणों से युक्त होगा वही क्षत्रिय हुआ कर्मणा वर्ण मानने बालों में फ़िर उसके लिए  #शुर हो यह प्रार्थना कैसी ? इससे सिद्ध है कि वेद ब्राह्मण, क्षत्रिय जन से मानता है ना की तथाकथित कर्म से ।

इसलिए महाभाष्य में राज्ञोऽपत्ये जातिग्रहणं कर्तव्यम्। राजन्यो नाम जातिः। ( ४/१/१३७) यहाँ पर राजा शब्द का पर्याय है एव मीमांसाशबर भाष्य ( २/३/३) क्षत्रियस्य
राजसूयविधानात्। राजा राजसूयेन येजेतेति। ननूक्तं- यौगिको राजशब्द इति। एतदप्ययुक्तम्। यतो जातिवचन इति क्षत्रिये तु प्रत्यक्षं प्रयुञ्जानात् उपलभामहे .....तस्माज्जातिनिमित्तो राजशब्दः। अतः उक्त मन्त्र में राजन्य शब्द  होने से जन्म से वर्ण इष्ट अन्यथा शुर के शुर होने की प्रार्थना व्यर्थ है। 

उक्त मन्त्र संहिता पर ही ब्राह्मण कहता है ~~
१) आ ब्रह्मन् ब्राह्मणो ब्रह्मवर्चसी जायतामिति ब्राह्मण एव ब्रह्मवर्चसं दधाति तस्मात्पुरा ब्राह्मणो ब्रह्मवर्चसी जज्ञे - १३.१.९.[१] , तद्ध्येव ब्राह्मणेनैष्टव्यं यद् ब्रह्मवर्चसी स्यादिति॥
१।९॥३॥१६
२)आ राष्ट्रे राजन्यः शूर इषव्योऽतिव्याधी महारथो जायतामिति राजन्य एव शौर्यम्
महिमानं दधाति तस्मात्पुरा राजन्यः शूर इषव्योऽतिव्याधी महारथो जज्ञे - १३.१.९.[२] तस्मात्पुरा धेनुर्दोग्ध्री जज्ञे - १३.१.९. ३ तस्मात्पुरानड्वान्वोढा जज्ञे - १३.१.९.[४] इत्यादि ।

यहाँ पर ब्राह्मण का  ब्रह्मवर्चवाला होना क्षत्रिय के शुर आदि   होना है , ब्रह्मवर्चवाले का ब्राह्मण होना शुर का क्षत्रिय होना नहीं कहा अतः यह सूक्ष्म विचार कर लेना चाहिए ।

उक्त मन्त्र में #ब्राह्मण का #ब्रह्मवर्चसी और #क्षत्रिय का #शूर होना आदि विधेय विशेषण है ... इसलिये उन्हें विशेष्य से पिछे ढाला गया  है ; नहीं तो #अविमृष्टविधेयांशदोष हो जाता । इस से स्प्ष्ट है ही वेद में वर्णव्यवस्था जन्म से है ना की स्वकल्पित कर्मानुरूप । यदि उक्त मन्त्र में 'हे परमात्मन्  हमारे राष्ट्र में  ब्रह्मवर्चस वाला ब्राह्मण  हो और शूर क्षत्रिय हो' यह प्रार्थना मानी जावे , तथापि यदि जन्मना वर्णव्यवस्था न मानी जावे तो उनके ये विशेषण व्यर्थ हो जाएंगे। 

यदि उक्त मन्त्र में ब्रह्मवर्चस बॉला  ब्राह्मण  होता है ; और शूर ही क्षत्रिय होता है यह विपरित अर्थ किया जावे तो यह ठिक नहीं है । पहले तो यह अर्थ यहां हो ही नहीं सकता क्योंकि ऐसा शब्द ही नहीं है , यदि विलष्ट कल्पना से यहाँ वो अर्थ मान भी लिया जाए तो #दोग्ध्री_धेनु , #वोढानड्वान्_आशुः #सप्तिः ..... यहाँ पर भी वही दोष प्राप्त होगा । तब तो दोग्ध्री  दूध देने बॉला धेनु कहा जायेगा एवं बकरी , भैंस , कुतिया आदि भी #धेनु कहलाने लगेगी। #वोढा ( भार ढोने बॉला) कुली , मजदूर आदि #अनड्वान् #बैल हो जाएंगे । शीघ्र चलने बाले रथ , गाड़ी आदि #सप्तिः( घोड़ा ) हो जायेंगे
जो कदापि युक्ति युक्त नहीं है ।

अतः उपरोक्त इस लेख  से हमें यह ही कहना है की उक्त मन्त्र से वेद स्वयं ही जन्मना वर्णव्यवस्था की सिद्धि एवं तथा कथित कर्मणा का रट लगाने बालों का खण्ड़न कर रहें हैं ।

इसलिए समाजिकों जादा वेद के नाम पर बंद कूद न मचाया करो नहीं औंधे मुँह ऐसा गिरोगे की बत्तीसी सीधे पेट में चल जायेग की समझे 😁😁😁😁😁
 

                        ।। जय श्री राम ।।

Friday, 15 May 2020

मरणाशौच कब से होता है?

*#प्रश्नावली_16_का_उत्तर*

मरणाशौच मुख्य रूपसे मृत्यु के तुरन्त बाद ही शुरू हो जाता है।

*#प्रमाण* -

*#मरणादेव_कर्तव्यं संयोगो यस्य नाग्निना ।*
*दाहादूर्ध्वमशौचं स्याद् यस्य वैतानिको विधि।।* (शातातप)

समस्त हिंदू समाजमें आशौचकी प्रवृत्ति मृत्युके बाद ही होनी चाहिए ।

परंतु जो द्विज #अग्निहोत्री हैं उनके आशौचकी प्रवृत्ति दाह के बादसे करनी चाहिए।

विद्वद्वरवरिष्ठ परम पूज्य गुरुदेव श्रीनर्मदेश्वर द्विवेदीजी के  कथनानुसार -
धर्मसम्राट स्वामी श्रीकरपात्रीजी महाराजने उस समय अग्निहोत्रियों की गणना पूरे भारतवर्ष में करवाई थी।

तो उस समय केवल 130 के लगभग अग्निहोत्री पूरे भारतवर्ष में थे, जिसमें से ज्यादातर दक्षिण के ही थे ।

तव स्वामीजी ने कुछ विद्वानोंको अग्निहोत्रकी दीक्षा दिलवाई थी और उनकी व्यवस्था भी की थी ।

तब से अब तक और ह्रास हो गया , दुर्भाग्यवश बहुत ही अल्प मात्रा में अग्निहोत्री भारतवर्ष में बचे हुए हैं ।

*#सारांश* -
तो केवल उन अग्निहोत्रिओं को छोड़करके , बाकी के हम सभी जो निरग्निक हैं अर्थात् अग्निहोत्री नहीं हैं,उन सभी को मरणाशौच मृत्युके तुरंत बाद शुरू हो जाता है ।

बहुत से पांडित्य करने वाले पंडितोंको भी यह भ्रम है कि मरणाशौच शवदाह के बाद लगता है।

*#हमारा_उद्देश्य* -
सभीसे करबद्ध प्रार्थना है कि - भ्रमनिवारण पूर्वक शास्त्रीय मार्गका ही सहर्षावलंबन करें।

नमः पार्वतीपतये हर हर महादेव।
राजेश राजौरिया वैदिक वृन्दावन।

Saturday, 9 May 2020

शास्त्रीय सार सिद्धान्त

शास्त्रीय सार सिद्धान्त --------->

(१) कर्म जाति का अधिष्ठान है तथा जाति जन्म का अधिष्ठान है ।
            जन्म
               ^
               |
            जाति
               ^
               |
             कर्म
अतः जाति कर्ममूलक होती है तथा जन्म जातिमूलक होता है । क्रियमाण कर्म से जाति का निर्माण इसलिये नहीं हो सकता क्योंकि क्रियमाण कर्म जब तक संचित होकर प्रारब्धोन्मुख नहीं हो जाते , वे निष्फल ही रहते हैं ।

(२) समस्त वैदिक शास्त्रों का प्रतिपाद्य  सारमत पंचायतनसिद्धान्त है, जिसके अनुयायी स्मार्त कहलाते हैं  । पञ्चायतन सिद्धान्त का अर्थ है कि एक ही निर्गुण परमात्मा गणेश, दुर्गा, सूर्य , शिव तथा विष्णु के रूप में सगुण साकार हैं ।

(३) समस्त शास्त्रों का परम  प्रतिपाद्य सिद्धान्त केवलाद्वैत(अद्वैत) सिद्धान्त है ।  श्री आद्य शंकराचार्य भी इसी सिद्धान्त  के एक मुख्य प्रचारक रहे । इस कलियुग में अद्वैत संन्यास परम्परा के परम संरक्षक एवं स्वयं भगवान् शिव के अवतार होने से वे  कलियुग के जगद्गुरु हैं ।

(४)  रामानन्द सम्प्रदाय को अग्रिम चार वैष्णव सम्प्रदायों (क)  रामानुज सम्प्रदाय (ख)  माध्व सम्प्रदाय  (ग) वल्लभ सम्प्रदाय (घ)  निम्बार्क सम्प्रदाय   --  इनमें से  रामानुज सम्प्रदाय के स्थान पर  गिनकर स्वीकार करना न्यायसंगत नहीं है ।

(५) समुद्रपार विदेश यात्रा सर्वथा अशास्त्रीय है । ऐसा  यात्री प्रायश्चित्त के उपरान्त भी  इस लोक में ' पतित ' ही बना रहता है ।

(६) गुरुवंश पुराण को महर्षि वेदव्याससम्पादित  अष्टादश पुराणों के तुल्य कदापि नहीं समझा जा सकता , ना ही उसकी फलश्रुति को ही प्रामाणिक समझा जा सकता है ।

(७) पुराणों से स्मृतियों के प्रमाण प्रबल होते हैं । स्मृतियों में श्री मनुस्मृति के प्रमाण सबसे प्रबल हैं ।

(८) कर्म और ज्ञान - ये दो ही  सनातन मार्ग हैं । कर्म मार्ग के अन्तर्गत उपासना होती है तथा ज्ञान मार्ग के अन्तर्गत भक्ति होती है । भक्ति उपासना का ही परिपक्व स्वरूप है । कर्म मार्ग ही  प्रवृत्ति मार्ग है । ज्ञान मार्ग ही निवृत्ति मार्ग है ।

(९) अंगहीन को न कर्म के अनुष्ठान  में अधिकार है , न दण्ड संन्यास में ।
वह मृत्युभय उपस्थित होने पर  केवल आतुर संन्यास मात्र ले सकता है , कदाचित् भय टल गया तो एक बार संन्यास का संकल्प कर चुकने के कारण  वह फिर आगे अलिंग संन्यासी के रूप में जीवन यापन करता है । दण्डसंन्यास का फिर भी वह अधिकारी नहीं होता ।

(१०) सोलह वर्ष से पूर्व की अवस्था वाले ब्राह्मण  को बालक  कहा जा सकता है , उसका सलिंगसंन्यास में अधिकार न होना केवल अनातुर (मृत्युसंकट न आना)  दशा में ही समझना चाहिये । एक बार  आतुर संन्यास (प्राण निकलने की दशा विशेष में लिया जाने वाला संन्यासविशेष)  लेने के उपरान्त वह बालक  यदि जीवित बच जाये  तो  यदि अंगहीन नहीं  है तो सलिंग अन्यथा अलिंग संन्यास का ही  वह अधिकारी होता है ।

33 करोड़ देवता निर्णय

#तैंतीस_करोड़_देवता_कोटि_नहीं_हैं_  वास्तव में वैदिक दर्शन में "अनन्ता वै वेदा:" प्रमाण से "मंत्र ब्राह्मणयोर्वेद नामधेयम्...