Thursday, 27 September 2018

केमद्रुम योग शान्तिविधान

केमद्रूम योग शांतिः विधानम्* मम वा ( अमुकस्य" अमुकाया:) जन्म कुण्डल्यां  निर्बलचन्द्रेण जनित केमद्रूम दोषो$पनोदनार्थं समस्तारिष्ट दौर्भाग्य विनाशाय सर्वत्र शुभ फलावाप्तये सर्वसौभाग्य प्राप्त्यर्थं केमद्रूम शांत्याख्यं कर्म करिष्ये.
तदंगत्वेन गणपति पूजनम्  पुण्याहवाचनम् मातृकापूजनम्(कर्त्री यजमाना स्त्री विषये नैव मातृकापूजनं न च नान्दी श्राद्धम्)नान्दीश्राद्धम् ब्रह्माचार्यादिवरणम्  करिष्ये.
वरणान्त कर्म समाप्य... दिग्रक्षणम् पञ्चगव्यकरणम् प्रोक्षणं च देवा$यान्त्वितिना भूम्यादि पूजनान्तं कृत्वा...  वरदनामाग्निं संस्थाप्य. प्रधान पीठे सर्वतोभद्र देवानावाह्य संपूज्य तत्र पूर्णपात्रान्त विधिना कलशं संस्थाप्य कलशे कर्चूर( कपूरकाचली षोडशदर्भमयं कूर्चं यत्ते केशेषु दौर्भाग्यं० इति मंत्रेण निक्षिप्य. पूर्णपात्रोपरि राजती चतुर्दिक्षु षोडश बिंबाकृति सोममूर्तिं अग्न्युत्तारण प्राणप्रतिष्ठा विधिना संस्थाप्य. मध्ये इमन्देवा$ ० इति सोमं आवाह्य पूर्वादि क्रमेण ( पात्रासादनोक्ताः अमृतादि षोडश सोमकलाः नाम मंत्रेण आवाह्य. मूर्ते: परितः षोडश पूंगीफलेषु पूर्वादि क्रमेण तिथ्यधिष्ठित अग्न्यादि षोडश देवानावाह्य. पुनः पूंगीफल त्रयेषु सोमाधिदेवता उमा प्रत्याधिदेवता अपः जन्मनक्षत्राधिपतिंचावाह्य. षोडशो$पचारैः संपूज्य.
(सोम षोडश कलाः~ १अमृतायैनमः २ मानदायै नमः ३ पूष्ण्यैनमः ४ पुष्ट्यैनमः५ तुष्ट्यै नमः६ रत्यैनमः७ धृत्यै नमः ८ शशिन्यैनमः ९ चंद्रिकायै नमः १० कान्त्यैनमः ११ ज्योत्सनायै नमः १२ श्रियैनमः १३ प्रीत्यैनमः १४ अंगदायैनमः १५ पूर्णायैनमः १६ पूर्णामृतायै नमः) { तिथ्यधिष्ठित देवता:- अग्निन्दूतं०इति अग्निं, प्रजापते नत्व० इति धातृं, आयं गौः० इति गौरीं. गणानांन्त्वा० इति गणपतिं, नमो$स्तु सर्प्पेब्भ्यो०इति सर्पान्, जद्क्रन्दः० इति स्कन्दं, उदुत्यं जातवेदसं० इति रविं, नमः शम्भवाय च मयो० इति शिवं, जातवेदसे सुनवाम० इति दुर्गां, जमायत्वा मखायत्वा० इति यमं, विश्वेदेवास$आगत० इति विश्वान्देवान्, इदं विष्णु० इति विष्णुं, कोदात्कस्मा० इति कामदेवं, तमीशानञ्जगतस्तस्थुखस्पतिं० इति ईश्वरं, आप्यायस्व० इति सोमं, उदिरता मवर$उत्परास० इति पितॄन्,}  प्रधान पीठाद्दुत्तरतः श्वेतवस्त्रं प्रसार्य तदुपरि अक्षतैरष्टदलं विरच्य पूर्णपात्रविधानेन शान्तिसंज्ञककलशं संस्थाप्य..त्रिलौहिमुद्रां अग्न्युत्तारण कृत्वा मातृकाक्षराणि अं आं इं.... क्षं इत्यन्तानि विन्यस्य,कलशान्तराले मुद्रिकां निक्षिप्य,(सोमसूर्याग्नि रूपाः स्युर्वर्णा लोह त्रयं तथा| रौप्यमिन्दु: स्मृतो हेमसूर्य स्ताम्रहुताशनः||लोहभागा समुद्दिष्टाः स्वराद्याक्षर संख्यया|तै र्लौहैः कारयेन्मुद्राम् सङ्कलित सङ्ताम्||शा०ति०) सोम सूर्य तथा अग्निस्वरूप अकारादि ये वर्ण  त्रिलौह स्वरूप हैं. चांदी- सोम, सुवर्ण- सूर्य, ताँबा- अग्नि, के स्वरूप हैं. इन लौह भागोंमें चाँदी १६ भाग, सोना १२ भाग, ताँबा १० भाग लेकर उन्की पृथक पृथक उतने ही परिमाण की अंगूठीयां बनवाकर अलग अलग बनी हुई उन मुद्रीकाओं रज्जुवत् मीलाकर एक करके अंगूठी बनवावें. यह दरिद्रता नाशक अंगुठी हुई.* तस्मिन कलशे वरुणं आवाह्य संपूज्य ब्राह्मण द्वारा ईन्दूसूक्तजप,और सोममंत्र- सों सोमाय नमः" इति १००८जप:,
ग्रहमंडलपीठे आदित्यादिग्रहमंडलदेवानावाह्य च संपूज्य. ऐशाने पूर्णपात्रान्त कलशे वरुणं आवाह्य च संपूज्य." असंख्याता सहस्रेण० इति कलशाम्भसि  रुद्रं आवाह्य संपूज्य.... षडङ्गरुद्रपाठ: ब्रह्मासनादि पर्युक्षणान्त कृत्वा, आधारावाज्यभागौ हुत्वा, वरदनामाग्निं सम्पूज्य. वराहुतिं दत्वा ग्रहहोमः प्रधान सोमं पायसेन १००८ ऊँ सों सोमाय नमः स्वाहा"इमन्देवा० १०८ सोमाधिप्रत्याधिदेवताः उमा अपः २८/२८ वारं तिलाज्येन, षोडशकला:नाममंत्रेण तिलाज्येन ८/८ वारं, षोडश तिथ्यधिष्ठिताः देवता: तिलाज्येन८/८ वारं.इति प्रधान होमं कृत्वा उत्तर होमं समाप्य त्रिलौहीमुद्रिकायां सोमं आवाह्य यथाशक्त्या संपूज्य १०८ वारं मूलमंत्रं सों सोमाय नमः इति पठन्, पवित्रस्थाने निधाय, पूर्णाहुतिं वसोर्द्धाराश्च संपाद्य पवमानमंत्रैः शांतिकलशोदकेन मुद्रिकासहित यजमानमभिषिंच्य अनामिकायां मुद्रिकां धारयेदिति, ॐस्वस्ति||
पु ह शास्त्री.उमरेठ.

Tuesday, 25 September 2018

माता पिता के श्राप से पुत्रहानि

[9/25, 3:46 PM] ‪+91 85113 29848‬: पितृशापात् पुत्रहिनता

(१) पाँचवे स्थान में तुला का सूर्य - शनि के नवांश में और पापकर्तरी में हो
(२) पञ्चमेश सूर्य पापयुक्त होकर त्रिकोण में रहकर पापकर्तरीयोग में हो पापदृष्ट हो
(३) सिंहस्थ गुरु, पञ्चमेश सूर्ययुक्त, पञ्चम तथा लग्नभाव सपाप हो (केवल वृषभ लग्न में)..
(४) दुर्बल लग्नेश पञ्चमभाव में , पञ्चमेश मंगलयुक्त तथा पञ्चमभाव और लग्न ये दोनों सपाप हो
(५)दशमेश पञ्चमस्थान में अथवा पञ्चमेश दशवें स्थान में हो और लग्न एवं पञ्चमभाव सपाप हो
(६)दशमेश मंगल पञ्चमेश के साथ हो ,लग्न और पञ्चम तथा दशमस्थान में पापग्रह हो (केवल कुम्भ और कर्क लग्न में)
(७) दशमेश ६-८-१२ स्थ हो पुत्रकारक गुरु या पञ्चमेश पापराशिस्थ हो और लग्नेश एवं पञ्चमेश सपाप हो
(८) लग्न और पञ्चम भाव में सूर्य, मंगल तथा शनि हो और लग्नेश एवं पञ्चमेश सपाप हो ( सूर्यादि उक्त ग्रहों की अंशादि से दूरी या समिपता दैखनी चाहिये)
(९) अष्टमस्थ सूर्य, पञ्चमस्थ शनि, पञ्चमेश राहुयुक्त तथा लग्न सपाप हो
(१०) व्ययेश लग्न में, अष्टमेश पञ्चम में और दशमेश अष्टम स्थान में हो
(११)षष्ठेश पञ्चम में , दशमेश षष्ठ में और पुत्रकारक गुरु या पञ्चमेश सराहु हो
============बृह०परा०हो०७४/२१-३१======

उपाय ---- (१)गयाश्राद्ध, (२)हजार या दशहजार ब्राह्मण भोजन (कलियुग में पात्रता दैखतें हुएँ सम्भव नहीं),(३) कन्यादान (कलियुग में जो शास्त्र की मर्यादा रखकर कन्याकालोचित समय में दान करें तो)सवत्साधेनु दान -- तीनों में से जो सम्भव हो
पुराणमाहात्य के अनुसार प्रायश्चित्तपूर्वक सयमनियम का पालन करतें हुएँ श्रीमद्भागवत सप्ताह पारायण मूलमात्र किसी स्वशाखीयवेद से संस्कृत हुएँ पाठक से करवायें।
=======तत्रैव ३२-३४====
[9/25, 4:14 PM] ‪+91 85113 29848‬: मातृशापात् सुतक्षय

(१) पञ्चमेश चन्द्र वृश्चिक का हो या पापकर्तरी में हो और चतुर्थ पञ्चम भावों सपाप हो(केवल मेष लग्न में)
(२) एकादश में शनि, चतुर्थ सपाप और नीच का चन्द्र पञ्चमस्थ हो (केवल सिंह लग्न में)
(३) पञ्चमेश त्रिकस्थ (६-८-१२), लग्नेश नीचराशि में, चन्द्र सपाप हो
(४) पञ्चमेश त्रिकस्थ, चन्द्र पापग्रह के नवाँश में और लग्न तथा पञ्चम सपाप हो
(५) पञ्चमेश चन्द्र यदि शनि राहु मंगल के साथ नवम या पञ्चम में हो (केवल मेष लग्न में )
(६) सुखेश मंगल शनि-राहु युक्त हो और लग्न तथा पञ्चम में रवि-चन्द्र हो (केवल सिंह और मकर लग्नों में)
(७)लग्नेश तथा पञ्चमेश षष्ठस्थ हो चतुर्थे अष्टमस्थ हो और अष्टमेश तथा दशमेश लग्न में हो
(८) षष्ठेश और अष्टमेश लग्न में, चतुर्थे व्ययस्थ, सपाप गुरु-चन्द्र पञ्चम में हो
(९) लग्न पापकर्तरी में हो, (क्षीणचन्द्र कृष्णपक्ष षष्ठी से शुक्लपक्ष पञ्चमीतक) का सप्तम में और राहु ,शनि क्रमशः चतुर्थ पञ्चम स्थान में हो
(१०) अष्टमेश पञ्चम में, पञ्चमेश अष्टम में हो और चन्द्र तथा सुखेश ६-८-१२ में कहीं भी हो
(११)कर्क लग्न में मंगल राहु रहे और चन्द्र तथा शनि पञ्चमस्थ हो (मंगल राहु के अंशादि से सामिप्यता और दूरी दैखे)
(१२)लग्न, पञ्चम,अष्टम तथा द्वादश में मंगल, राहु,सूर्य और शनि हो, चतुर्थे एवं लग्नेश ६-८-१२ में से किसी भी स्थान में हो ( बारहवें स्थानस्थ ग्रहों की अंशादि से सामीप्यता और दूरी देखनी चाहिये)
(१३) गुरु अष्टम में मंगल राहु से युक्त (अंशादि से दैखे), पञ्चम में शनि चन्द्र (अंशादि दैखे) हो
=========बृह०पारा०हो०७४/३५-४८====
उपाय - विधिपूर्वक समुद्रस्नान , यथाधिकार रक्ष गायत्री जप, ग्रहदान-ब्राह्मणभोजन, पिप्पल की १००८ प्रदक्षिणा इन्हों में से  यथासम्भव उपाय
---- मातृगयाश्राद्ध के माहात्म्य के कारण मातृगया श्राद्ध करें ---  श्रीमद्भागवत मूल पारायण मोक्षसूचक मुर्हूतों में।

मनुष्य पहले पशु था यह घोर भ्रान्त धारणा है

मनुष्य के स्वाभाविक ज्ञान में नैमित्तिक ज्ञान के सहयोग के बिना कोई उन्नति नहीं होती है ।

चिरकाल से समुन्नत जातियों के संसर्ग से दूर रहने के कारण, आज भी पशु-जीवन  बिताने वाली जङ्गली जातियॉ इस बात का प्रत्यक्ष साक्ष्य दे रही हैं ।

अतः मनुष्य आरम्भ में पशु समान था, शनैः शनैः उसके ज्ञान का विकास हुआ - यह  घोर भ्रान्त धारणा मात्र है ।

।। जय श्री राम ।।

वेद समस्त विश्व के आदिज्ञान स्रोत हैं

वेद समस्त विश्व के आदिज्ञान स्रोत हैं , एक उदाहरण,-

√स्तृ ---> स्तारः (प्रथमा, बहुवचन)  ----> स्टार 
                  |
                  |
             सितारा ---->स्टेयर्नो

(स्तृभिः (तारार्थक) = ऋग्वेद १।६८।५, १।८७।१,१।१६६।११)

।। जय श्री राम ।।

Monday, 24 September 2018

हमारा कहा न सुनने वाले ज्ञानचोर ध्यान दें

हमारा  कहा न सुनने वाले ज्ञानचोर ध्यान दें -
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यह पृष्ठ  अधिकारियों के ही   सापेक्ष प्रदत्त सन्देश है , अनधिकारियों के लिये नहीं ।

जो यहॉ पृष्ठ से ज्ञान चोर के ले जा रहे हैं, कि आज इतना ले लिया , आगे इतना ले लूंगा (इदमद्य मया लब्धमिमं प्राप्स्ये मनोरथम्),

वे   ध्यान दें कि वे यहॉ से अपनी पीठ पर  पाप ही  ढो कर  ले जा रहे हैं  क्योंकि हमारा हरेक कार्य एक  विशेष  आराधना है (यद्यत्कर्म करोमि तत्तदखिलं शम्भो तवाराधनम् ) ।।

  ये जो ज्ञान हमारे माध्यम से  ले गये हो , वो तुम्हें विनाश की ओर ही ले जायेगा ।  तर्क-प्रमाणात्मक ज्ञान शुद्ध होता हुआ  भी  अन्ततः   भ्रमवर्धन व  आत्मपतन का ही हेतु सिद्ध  हो जायेगा ।

एकाक्षरं प्रदातारं यो गुरुं नाभिवन्दते ।
श्वानयोनिशतं भुक्त्वा चाण्डालेष्वभिजायते ।।

इसलिये   हमारे साथ धर्म प्रचार में आगे आओ!   कट्टर स्मार्त्त परम्परा के प्रचार प्रसार में अपनी भूमिका निभाओ !

।। जय श्री राम ।।

Thursday, 20 September 2018

जाति का निर्धारण रक्त से नहीं होता

क्रान्तिवीर चलचित्र ( फिल्म)  से प्रसारित तर्क के दुष्प्रचार का खण्डन -
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काटो तो खून सबका लाल है , फिर  हिन्दू धर्म में  जातिभेद कैसे ?

#उत्तर -    शास्त्रोक्त  जातिभेद  रक्त के वर्ण पर नहीं वरन्  प्राणी के प्रारब्धकर्म  पर आधारित होता  है ।

अन्यथा रक्त तो  मनुष्य ही नहीं, वरन्   पशु-पक्षियों का भी लाल ही होता है  ।

प्रारब्ध कर्म क्या होता है ?

किसी प्राणी का  सृष्टिसंचालक ईश्वर द्वारा  फलोन्मुख किया गया  वह संचित कर्म विशेष , जो अपनी क्रिमाणावस्था को भूतकाल में पूर्ण कर चुका हो,  उसे  प्रारब्ध  कर्म कहते हैं ।

प्रश्न - जो जन्म से वर्ण व्यवस्था को नहीं मानते उनके कौन से कर्म या प्रारब्ध होते हैं???

उत्तर - मानना न मानना  तो व्यक्ति के निज विवेक पर आश्रित होता है  किन्तु  वर्णव्यवस्था -    यह एक सृष्टि प्रक्रिया  है, एक विज्ञान है  ।

व्यक्ति की निजी  मान्यता का सृष्टि के  नैसर्गिक विज्ञान पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता ।

वर्णव्यवस्था सात्विक, राजसिक और तामसिक -इन तीन  नैसर्गिक गुणों के सम्मिश्रण पर आधारित होती है । इसे सविस्तार से समझने के लिये आपको  विस्तृत समय निकालकर अधिकृत गुरु के सान्निध्य में  सत्संग(अध्ययनादि)  करना चाहिये ।

प्रश्न- आचार्य शिवव्रत जी,

इसमें अवैदिक जन्मना वर्णाश्रम धर्म की चर्चा तो है लेकिन "शास्त्रोक्त जातिभेद" क्या है ??

यह नहीं है।

मैं जिज्ञासु यह जानना चाहता हूँ की किस शास्त्र में वर्तमान जातिव्यवस्था ( ठाकुर तेली कुम्हार बामन अग्रवाल) आदि का उल्लेख है???

उत्तर - शास्त्र के अनुसार वर्ण अर्थात् जातियॉ  चार हैं ,  ब्राह्मण , क्षत्रिय , वैश्य , शूद्र ।

इन चार वर्णों में पारस्परिक जाति सांकर्य से  अवान्तर जातियों की सृष्टि होती है ।

इसे मौलिक रूप से समझने हेतु, मनु, याज्ञवल्क्यादि ऋषि-मुनियों की स्मृतियॉ प्रमाण हैं , समस्त पुराणों , महाभारत आदि में भी यत्र तत्र सर्वत्र विकीर्ण रूप से वर्णन है तथा   गहनता से समझने के लिये आपको शिष्ट परम्पराचार्यों का सान्निध्य लेना चाहिये ।

।। जय श्री राम ।।

Thursday, 13 September 2018

अद्वयज्ञाननिष्ठ कट्टर स्मार्त्त की महिमा

स्मृतियों में वर्णित   तथाकथित गाणपत्य/ शैव /वैष्णव/शाक्त/सौर परम्पराओं का औचित्य और कट्टर स्मार्त्त परम्परा से उसका अन्तः सम्बन्ध ~

हमारे भगवान्  शिव / विष्णु/गणेश/सूर्य/शक्ति ही  एकमात्र  हमारे देवता हैं  , शेष अन्य देवता भगवान्   शिव / विष्णु/गणेश/सूर्य/शक्ति की ही महिमा का विस्तार  हैं ,   भक्तिराज्य  में यह भाव      निःसन्देह  सम्भव है ।

और कोई भक्ति को ही अपना  सिद्धान्त स्वीकार बैठा है, तो ऐसे भावुक से हम   अखण्डाद्वयज्ञाननिष्ठ कट्टर स्मार्त्तों को  कोई समस्या भी नहीं ।   अपनी नासमझी के कारण  कदाचित् वह हमें  (  अखण्ड , अद्वय ज्ञान को )   पचा न सके , परन्तु हम   उसे  सरलतापूर्वक  पचा लेते हैं ।

न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसङ्गिनाम्।
जोषयेत्सर्वकर्माणि विद्वान्युक्तः समाचारन्।

हम जिस पञ्चायतनोपासना  का उपदेश करते हैं, वह वस्तुतः  शास्त्रोपदिष्ट  समस्त सम्प्रदायों को उक्त मातृ  -आश्रय  ही   प्रदान करती  है ।

लोक में जैसे एक अबोध नवजात  बालक अपनी माता के स्तन को ही   विश्व का एकमात्र परम दुग्ध भण्डार ,  गोद को ही  अपनी शैय्या , उसके स्कन्ध भुजा, वक्षादि को  ही  आवास  आदि समझता  है, कदाचित् पिता के बुलाये जाने पर भी  वह माता की गोद नहीं छोड़ता ,

उसका कोई पिता   विरोध नहीं करता , ना ही उसे कुछ समझाने/ सिखाने  ही बैठता है , किन्तु  माता की ही गोद में उस बालक को पिता  पलने देता है ।

आयु बढने पर उसे स्वतः बोध होता है कि माता के स्तन क्षीर सागर नहीं होते ,  उसकी गोद  शैय्या नहीं होती, उसके भुजदण्ड, वक्ष, स्कन्धादि     आवास  नहीं हुआ करते ।

त्रयी साङ्ख्यं योगः  पशुपतिमतं वैष्णवमिति प्रभिन्ने प्रस्थाने परमिदमदः पथ्यमिति च ।
रुचीनां वैचित्र्यादृजुकुटिलनानापथजुषां नृणामेको गम्यस्त्वमसि पयसामर्णव इव ।।

।। जय श्री राम ।।

ज़ह्ळ को जालंधर कहने वालों का खंडन

देअ श्री श्री श्री खुडीज़ह्ळ जी को जालन्धर कहने वालों का भ्रमभंग -  भ्रम - प्रभु श्री ज़ह्ळ जी के मुख के सिर में चंद्रमा है तो इन्हें शिव अं...