Sunday, 13 January 2019

अग्नि के भेद

यज्ञादि कर्मों में अग्नि के नाम एवं वेदों में अग्नि की महत्ता

अग्नि की उत्पत्ति के सम्बन्ध में पौराणिक गाथा इस प्रकार है-सर्वप्रथम धर्म की वसु नामक पत्नी से अग्नि उत्पन्न हुआ। उसकी पत्नी स्वाहा से उसके तीन पुत्र हुए-

पावक
पवमान
शुचि

छठे मन्वन्तर में वसु की वसुधारा नामक पत्नी से द्रविणक आदि पुत्र हुए, जिनमें 45 अग्नि-संतान उत्पन्न हुए। इस प्रकार सब मिलाकर 49 अग्नि हैं। विभिन्न कर्मों में अग्नि के भिन्न-भिन्न नाम हैं। लौकिक कर्म में अग्नि का प्रथम नाम पावक है। गृहप्रवेश आदि में निम्नांकित अन्य नाम प्रसिद्ध हैं-

अग्नेस्तु मारुतो नाम गर्भाधाने विधीयते।
पुंसवने चन्द्रनामा शुगांकर्मणि शोभन:।।
सीमन्ते मंगलो नाम प्रगल्भो जातकर्मणि।
नाग्नि स्यात्पार्थिवी ह्यग्नि: प्राशने च शुचिस्तथा।।
सत्यनामाथ चूडायां व्रतादेशे समुद्भव:।
गोदाने सूर्यनामा च केशान्ते ह्यग्निरुच्यते।।
वैश्वानरो विसर्गे तु विवाहे योजक: स्मृत:।
चतुर्थ्यान्तु शिखी नाम धृतिरग्निस्तथा परे।।
प्रायश्चित्ते विधुश्चैव पाकयज्ञे तु साहस:।
लक्षहोमे तु वह्नि:स्यात कोटिहोमे हुताश्न:।।
पूर्णाहुत्यां मृडो नाम शान्तिके वरदस्तथा।
पौष्टिके बलदश्चैव क्रोधाग्निश्चाभिचारिके।।
वश्यर्थे शमनी नाम वरदानेऽभिदूषक:।
कोष्ठे तु जठरी नाम क्रव्यादो मृतभक्षणे।।

अर्थात

गर्भाधान में अग्नि को "मारुत" कहते हैं।
पुंसवन में "चन्द्रमा
शुगांकर्म में "शोभन
सीमान्त में "मंगल
जातकर्म में 'प्रगल्भ
नामकरण में "पार्थिव
अन्नप्राशन में 'शुचि
चूड़ाकर्म में "सत्य
व्रतबन्ध (उपनयन) में "समुद्भव
गोदान में "सूर्य
केशान्त (समावर्तन) में "अग्नि
विसर्ग (अर्थात् अग्निहोत्रादिक्रियाकलाप) में "वैश्वानर
विवाह में "योजक
चतुर्थी में "शिखी
धृति में "अग्नि
प्रायश्चित (अर्थात् प्रायश्चित्तात्मक महाव्याहृतिहोम) में "विधु
पाकयज्ञ (अर्थात् पाकांग होम, वृषोत्सर्ग, गृहप्रतिष्ठा आदि में) 'साहस
लक्षहोम में "वह्नि
कोटि होम में "हुताशन
पूर्णाहुति में "मृड
शान्ति में "वरद
पौष्टिक में "बलद
आभिचारिक में "क्रोधाग्नि
वशीकरण में "शमन
वरदान में "अभिदूषक
कोष्ठ में "जठर
और मृत भक्षण में "क्रव्याद" कहा गया है।

ऋग्वेद के अनुसार

हिन्दू देवमण्डल का प्राचीनतम सदस्य, वैदिक संहिताओं और ब्राह्मण ग्रन्थों में इसका महत्त्वपूर्ण स्थान है। अग्नि के तीन स्थान और तीन मुख्य रूप हैं-

व्योम से सूर्य
अन्तरिक्ष (मध्याकाश) में विद्युत
पृथ्वी पर साधारण अग्नि

अग्नि की तुलना बृहस्पति और ब्रह्मणस्पति से भी की गई है। वह मंत्र, धी (बुद्धि) और ब्रह्म का उत्पादक है। इस प्रकार का अभेद सूक्ष्मतम तत्त्व से दर्शाया गया है। वैदिक साहित्य में अग्नि के जिस रूप का वर्णन है, उससे विश्व के वैज्ञानिक और दार्शनिक तत्त्वों पर काफ़ी प्रकाश पड़ता है। जैमिनी ने मीमांसासूत्र के "हवि:प्रक्षेपणाधिकरण" में अग्नि के छ: प्रकार बताये हैं-

गार्हपत्य
आहवनीय
दक्षिणाग्नि
सभ्य
आवसथ्य
औपासन

'अग्नि शब्द का व्युत्पत्त्यर्थ इस प्रकार है : जो ऊपर की ओर जाता है'(अगि गतौ, अंगेनलोपश्च, अंग्+नि और नकार का लोप)।

वैदिक धर्म के अनुसार

अवेस्ता में अग्नि को पाँच प्रकार का माना गया है। परन्तु अग्नि की जितनी उदात्त तथा विशद कल्पना वैदिक धर्म में है, उतनी अन्यंत्र कहीं पर भी नहीं है। वैदिक कर्मकाण्ड का श्रौत भाग और गृह्य का मुख्य केन्द्र अग्निपूजन ही है। वैदिक देवमण्डल में इन्द्र के अनन्तर अग्नि का ही दूसरा स्थान है। जिसकी स्तुति लगभग दो सौ सूक्तों में वर्णित है। अग्नि के वर्णन में उसका पार्थिव रूप ज्वाला, प्रकाश आदि वैदिक ऋषियों के सामने सदा विद्यमान रहता है। अग्नि की तुलना अनेक पशुओं से की गई है। प्रज्वलित अग्नि गर्जनशील वृषभ के समान है। उसकी ज्वाला सौर किरणों के तुल्य, उषा की प्रभा तथा विद्युत की चमक के समान है। उसकी आवाज़ आकाश की गर्जन जैसी गम्भीर है। अग्नि के लिए विशेष गुणों को लक्ष्य कर अनेक अभिधान प्रयुक्त करके किए जाते हैं। अग्नि शब्द का सम्बन्ध लातोनी 'इग्निस्' और लिथुएनियाई 'उग्निस्' के साथ कुछ अनिश्चित सा है, यद्यपि प्रेरणार्थक अज् धातु के साथ भाषा शास्त्रीय दृष्टि से असम्भव नहीं है। प्रज्वलित होने पर धूमशिखा के निकलने के कारण धूमकेतु इस विशिष्टिता का द्योतक एक प्रख्यात अभिधान है। अग्नि का ज्ञान सर्वव्यापी है और वह उत्पन्न होने वाले समस्त प्राणियों को जानता है। इसलिए वह 'जातवेदा:' के नाम से विख्यात है। अग्नि कभी द्यावापृथिवी का पुत्र और कभी द्यौ: का सूनु (पुत्र) कहा गया है। उसके तीन जन्मों का वर्णन वेदों में मिलता है। जिनके स्थान हैं-स्वर्ग, पृथ्वी तथा जल। स्वर्ग, वायु तथा पृथ्वी अग्नि के तीन सिर, तीन जीभ तथा तीन स्थानों का बहुत निर्देश वेद में उपलब्ध होता है। अग्नि के दो जन्मों का भी उल्लेख मिलता है-भूमि तथा स्वर्ग। अग्नि के आनयन की एक प्रख्यात वैदिक कथा ग्रीक कहानी से साम्य रखती है। अग्नि का जन्म स्वर्ग में ही मुख्यत: हुआ, जहाँ से मातरिश्वा ने मनुष्यों के कल्याणार्थ उसका इस भूतल पर आनयन किया। अग्नि प्रसंगत: अन्य समस्त वैदिक देवों में प्रमुख माना गया है। अग्नि का पूजन भारतीय संस्कृति का प्रमुख चिह्न है और वह गृहदेवता के रूप में उपासना और पूजा का एक प्रधान विषय है। इसलिए अग्नि 'गृहा', 'गृहपति' (घर का स्वामी) तथा 'विश्वपति' (जन का रक्षक) कहलाता है।

रूप का वर्णन

अग्नि के रूप का वर्णन इस प्रकार है-

पिंगभ्रूश्मश्रुकेशाक्ष: पीनांगजठरोऽरुण:।
छागस्थ: साक्षसूत्रोऽग्नि: सप्तार्चि: शक्तिधारक:।।

भौहें, दाढ़ी, केश और आँखें पीली हैं। अंग स्थूल हैं और उदर लाल है। बकरे पर आरूढ़ हैं, अक्षमाला लिये है। इसकी सात ज्वालाएँ हैं और शक्ति को धारण करता है।

शुभ लक्षण

होम योग्य अग्नि के शुभ लक्षण निम्नांकित हैं-
अर्चिष्मान् पिण्डितशिख: सर्पि:काञ्चनसन्निभ:।
स्निग्ध: प्रदक्षिणश्चैव वह्नि: स्यात् कार्यसिद्धये।।

ज्वालायुक्त, पिण्डितशिख, घी एवं सुवर्ण के समान, चिकना और दाहिनी ओर गतिशील अग्नि सिद्धिदायक होता है।

शब्द उत्पादन

देहजन्य अग्नि में शब्द उत्पादन की शक्ति होती है, जैसा कि "संगीतदर्पण" में कहा है-

आत्मना प्रेरितं चित्तं वह्निमाहन्ति देहजम्।
ब्रह्मग्रन्थिस्थितं प्राणं स प्रेरयति पावक:।।
पावकप्रेरित: सोऽथ क्रमदूर्ध्वपथे चरन्।
अतिसूक्ष्मध्वनि नाभौ हृदि सूक्ष्मं गले पुन:।।
पुष्टं शीर्षे त्वपुष्टञ्च कृत्रिमं वदने तथा।
आविर्भावयतीत्येवं पञ्चधा कीर्त्यते बुधै:।।
नकारं प्राणनामानं दकारमनलं विंदु:।
जात: प्राणाग्निसंयोगात्तेन नादोऽभिधीयते।।

आत्मा के द्वारा प्रेरित चित्त देह में उत्पन्न अग्नि को आहत करता है। ब्रह्मग्रन्थि में स्थित प्रेरित वह प्राण क्रम से ऊपर चलता हुआ नाभि में अत्यन्त सूक्ष्म ध्वनि करता है तथा गले और हृदय में भी सूक्ष्म ध्वनि करता है। सिर में पुष्ट और अपुष्ट तथा मुख में कृत्रिम प्रकाश करता है। विद्वानों ने पाँच प्रकार का अग्नि बताया है। नकार प्राण का नाम है, दकार अग्नि का नाम है। प्राण और अग्नि के संयोग से नाद की उत्पत्ति होती है। सब देवताओं में इसका प्रथम आराध्यत्व ऋग्वेद के सर्वप्रथम मंत्र "अग्निमीले पुरोहितम्" से प्रकट होता है।

रूप का प्रयोग

योगाग्नि अथवा ज्ञानाग्नि के रूप में भी "अग्नि" का प्रयोग होता है। गीता में यह कथन है-

'ज्ञानाग्नि: सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा।'
'ज्ञानाग्निदग्धकर्माणि तमाहु: पण्डितं बुधा:।।'

अग्नि का सर्वप्रथम स्थान

पृथ्वी-स्थानीय देवों में अग्नि का सर्वप्रथम स्थान है। अग्नि यज्ञीय अग्नि का प्रतिनिधि रूप है। यज्ञ के द्वारा मनुष्य का सम्बन्ध देवों से होता है। अत: यज्ञ की अग्नि मनुष्य और देवता के बीच सम्बन्ध का सूचक है। परन्तु अग्नि का स्वरूप भौतिक भी है। इनका स्वरूप गरजते हुए वृषभ के समान बतलाया गया है। उन्हें सिर और पैर नहीं हैं परन्तु जिह्वा लाल है। वैदिक मंत्रों में बतलाया गया है कि उत्पत्ति के समय अग्नि का स्वरूप बछड़े के समान है, परन्तु प्रज्वलित होने पर उनका स्वरूप अश्व के समान है। उनकी ज्वाला को विद्युत के समान कहा गया है। काष्ठ और घृत को उनका भोजन माना गया है। अग्नि धूम पताके के समान ऊपर की ओर जाता है। इसी कारण से अग्नि को धूमकेतु कहा गया है। यज्ञ के समय इनका आह्वान किया जाता है कि ये कुश के आसन पर विराजमान हों तथा देवों के हविष को ग्रहण करें। अग्नि का जन्म स्थान स्वर्ग माना गया है। स्वर्ग से मातरिश्वा ने धरती पर इन्हें लाया। अग्नि ज्ञान का प्रतीक है। वह सभी प्राणियों के ज्ञाता देव हैं। अत: इन्हें 'जातवेदा:' कहा गया है। अग्नि को द्युस्थानीय देवता सूर्य भी माना गया है। अग्नि को 'त्रिविध' तथा 'द्विजन्मा' भी कहा गया है। उनका प्रथम जन्म स्वर्ग में तथा दूसरा जन्म जल में (पृथ्वी पर) बतलाया गया है। अग्नि दानवों के भक्षक तथा मानवों के रक्षक माने गए हैं। इनका वर्णन दो सौ वैदिक सूक्तों में प्राप्त होता है।
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इन हिंदी कहावतों के स्थान पर संस्कृत की सूक्ति बोलें।
1. अपनी डफली अपना राग - मुण्डे मुण्डे मतिर्भिन्ना ।
2. का बरखा जब कृषि सुखाने - पयो गते किं खलु सेतुबन्धनम्।
3. अंधों में काना राजा - निरस्तपादपे देशे एरण्डोपि द्रुमायते।
4. अधजल गगरी छलकत जाए - अर्धोघटो घोषमुपैति शब्दम् ।
5. एक पंथ दो काज - एका क्रिया द्वयर्थकरी प्रसिद्धा।
6. आंख का अंधा नाम नयनसुख - भिक्षार्थं भ्रमते नित्यं नाम किन्तु धनेश्वरः।
7. काल करे सो आज कर, आज करे सो अब - श्वः कर्तव्यानि कार्याणि कुर्यादद्यैव बुद्धिमान्।
8. जैसी करनी वैसी भरनी - यो यद् वपति बीजं लभते तादृशं फलम्।
9. पर उपदेश कुशल बहुतेरे - परोपदेशे पाण्डित्यं सर्वेषां सुकरं नृणाम् ।
10. मुंह में राम बगल में छुरी - विषकुम्भं पयोमुखम्।
11. भूखा क्या नहीं करता - बुभुक्षितः किं न करोति पापम्।
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#हिन्दू शब्द की उत्पत्ति कैसे हुई ????? पढ़े एक ज्ञानवर्धक प्रस्तुति।*

कुछ अति बुद्धिमान (सेकुलर व मुस्लिम) लोग कहते हैं की #हिन्दू शब्द फारसियों की देन है। क्यूंकि इसका उल्लेख #वेद #पुराणों में नहीं है।

मेरे #सनातनी भाईयों, इन जैसे लोगों का मुंह     बंद करने के लिये  आपके सन्मुख हजारों वर्ष पूर्व लिखे गये #सनातन #शास्त्रों में लिखित चंद श्लोक (अर्थ सहित) प्रमाणिकता सहित बता रहा हूँ । आप सब सेव करके रख लें, और मुझसे यह सवाल करने वाले महामूर्ख सेकुलर को मेरा जवाब भी देख लें.......////

1-#ऋग्वेद के ब्रहस्पति अग्यम में #हिन्दू शब्द का उल्लेख इस प्रकार आया है..

*हिमलयं समारभ्य यावत इन्दुसरोवरं।*
*तं देवनिर्मितं देशं हिन्दुस्थानं प्रचक्षते।।*

अर्थात हिमालय से इंदु सरोवर तक देव निर्मित देश को हिंदुस्तान कहते हैं।

*2- सिर्फ वेद ही नहीं बल्कि मेरूतंत्र (शैव ग्रन्थ) में हिन्दू शब्द का उल्लेख इस प्रकार किया गया है....
*हीनं च दूष्यतेव् हिन्दुरित्युच्च ते प्रिये।*
अर्थात... जो अज्ञानता और हीनता का त्याग करे उसे हिन्दू कहते हैं।

*3- और इससे मिलता जुलता लगभग यही यही श्लोक कल्पद्रुम में भी दोहराया गया है....!

*"हीनं दुष्यति इति हिन्दू"*
अर्थात जो अज्ञानता और हीनता का त्याग करे उसे हिन्दू कहते है।

4- पारिजात हरण में #हिन्दू को कुछ इस प्रकार कहा गया है...
*"हिनस्ति तपसा पापां दैहिकां दुष्टं। हेतिभिः श्त्रुवर्गं च स हिन्दुर्भिधियते।।"*

अर्थात जो अपने तप से शत्रुओं का दुष्टों का और पाप का नाश कर देता है, वही #हिन्दू है।

5- माधव दिग्विजय में भी #हिन्दू शब्द को कुछ इस प्रकार उल्लेखित किया गया है..
*"ओंकारमन्त्रमूलाढ्य पुनर्जन्म द्रढ़ाश्य:।*
*गौभक्तो भारतगरुर्हिन्दुर्हिंसन दूषकः।।*

अर्थात.... वो जो ओमकार को ईश्वरीय धुन माने, कर्मों पर विश्वास करे, सदैव गौपालक रहे तथा बुराईयों को दूर रखे, वो #हिन्दू है।

6- केवल इतना ही नहीं हमारे #ऋगवेद ( ८:२:४१ ) में विवि हिन्दू नाम के बहुत ही पराक्रमी और दानी राजा का वर्णन मिलता है। जिन्होंने 46000 गौमाता दान में दी थी.... और ऋग्वेद मंडल में भी उनका वर्णन मिलता है।

7- ऋग वेद में एक #ऋषि का उल्लेख मिलता है जिनका नाम सैन्धव था । जो मध्यकाल में आगे चलकर "#हैन्दव/#हिन्दव" नाम से प्रचलित हुए, जिसका बाद में अपभ्रंश होकर #हिन्दू बन गया...!!

8- इसके अतिरिक्त भी कई स्थानों में #हिन्दू शब्द उल्लेखित है....।।

*इसलिये गर्व से कहो, हाँ हम #हिंदू थे, #हिन्दू हैं और सदैव #सनातनी_हिन्दू ही रहेंगे.../////

हे गौरि ! शंकरार्धांगि ! यथा त्वं शंकरप्रिया ।
तथा मां कुरु कल्याणि कान्तकान्तां सुदुर्लभाम्।।

तपस्तप्त्वा सृजद् ब्रह्मा ब्राह्मणान् वेदगुपतये | तृप्त्यर्थं पितृदेवानां धर्मसंरक्षणाय च ||
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#ताम्बूलभक्षणविधि

कर्पूरकङ्कोललवङ्गपूगजातिफलैर्नागरखण्डपर्णैः ।
शुद्धाश्मचूर्णं खदिरस्य सारं ताम्बूलमेतन्नवधा प्रसिद्धम् ।

ताम्बूलं कटु तिक्तमुष्णमधुरं क्षारं कषायान्वितम् ।
वातघ्नं पित्तनाशनं कृमिहरं दुर्गन्धिनिर्णाशनम् ।।
वक्त्रस्याभरणं बिशुद्धिकरणं कामाग्निंसन्दीपनम् ।
ताम्बूलस्य सखे त्रयोदशगुणाः स्वर्गेऽपि तु दुर्लभाः ।।

ताम्बूलपत्राणि हरन्ति वातं,
पौगं फलं हन्ति कफं च हृद्यम् ।
चूर्णं निहन्यात् कफवातमुच्चैः
हन्याच्च पित्तं खदिरस्य सारः ।।

अभ्यङ्गे निशि माङ्गल्ये प्रभाते भोजनान्तिके ।
कर्पूरादिकसंमिश्रं ताम्बूलं योजयेत्भिषक् ।।

क्रमुकं पञ्चनिष्कं स्यात् ताम्बुल्याश्च पलद्वयम् ।
गुञ्जाद्वयं चूर्णमानं ताम्बूलक्रममुत्तमम् ।।
द्विपत्रमेकपूगं च सचूर्णखदिरं च तत् ।
गायत्रीगुटिकाचूर्णं पूगं नागलतादलम् ।
नात्युच्चैनातिनीच्चैश्च पर्णानामधिकवरम् ।।
समपत्रः फले रागे विरागस्तु फलेऽधिके ।
चूर्णाधिक्ये तु दूर्गन्धः पत्राधिक्ये सुगन्धता ।।

अन्यच्च
पर्णाधिक्ये दीपनी रङ्गदात्री ।
पूगाधिक्ये रूक्षदा कृच्छ्रदात्री ।
चूर्णाधिक्ये सोष्णदुर्गन्धदात्री ।
साधिक्ये चेत् खादिरे शोषदात्री ।।

प्रभाते पूगमधिकं मध्याह्ऩे खादिरं तथा ।
निशायां तु तथा चूर्णं ताम्बूलं भक्षयेत् सदा ।।
दिवा खदिरसारं तु ताम्बूलं तु सुशोभनम् ।
रात्रॊ खदिरसारं तु शक्रस्यापि हरेत् श्रियम् ।।

अङ्गुष्ठचूर्णसंयुक्तं पर्णपृष्ठे तु लेपनम् ।
तत् पर्णं खादयेत् तेन सोमपानं दिने दिने ।।
कनिष्ठानामिकामध्यातर्जन्यङ्गुष्ठयोगतः ।
शोको हानिस्तथा मृत्युरैश्वर्यं चौर्यमेव च ।।
वामहस्तेन नो खादेत् स्त्रीहस्तेन तथैव च ।
यदि खादयते मूढस्तस्य लक्ष्मीर्विनश्यति ।।
म्लेच्छहस्ताच्छत्रुहस्ताच्छङ्कितस्य जनस्य च ।
अथ वैदग्धहस्तस्थस्ताम्बूलो हि निषिध्यते ।।

स्वायत्तमेकान्तगुणं विधात्रा विनिर्मितं छादानमज्ञतायाः ।
विशेषतः सर्वविदां समाजे विभूषणं मौनमपण्डितानाम् ॥

अपनी मूर्खता छिपाने के लिये भगवान ने मूर्खों को मौन धारण करने का एक अद्भुत सुरक्षा कवच दिया है, जो उनके अधीन भी है। विद्वानो से भरी सभा मे "मौन रहना" मूर्खो के लिये आभूषण से कम नहीं है।
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धन्य हैं भारतीय संस्कृति के पावन संस्कार..!!
मिथिला में एक विद्वान ब्राह्मण #भवनाथ_मिश्र विद्यार्थियों को पढ़ाते थे । उनकी आर्थिक स्थिति अत्यंत दयनीय थी, फिर भी वे किसीसे किसी वस्तु की याचना नहीं करते थे । भवनाथ के घर पुत्र का जन्म हुआ । दाई ने पुरस्कार माँगा । बालक की माता भवानी देवी ने भावपूर्ण ढंग से कहा ‘अभी घर में देने को कुछ भी नहीं है । #इस_बालक_की_पहली_कमाई_की_पूरी_धनराशि_तुम्हें_दे_दूँगी ।’’दाई इस कथन पर संतुष्ट होकर बालक को आशीर्वाद दे के चली गयी । उस बालक का नाम रखा गया ‘शंकर’ ।

शंकर की आयु अभी पाँच वर्ष भी पूरी नहीं हुई थी । वह अन्य बालकों के साथ गाँव के बाहर खेल रहा था । उसी समय मिथिला के महाराज शिवसिंह देव वहाँ से गुजर रहे थे । उनकी दृष्टि शंकर पर पड़ी । चेहरे से उन्हें बालक प्रतिभाशाली मालूम हुआ । महाराज ने शंकर को बुलाकर पूछा : ‘‘बेटा ! तुम कुछ पढ़ते हो ?’’

शंकर : ‘‘जी ।’’

‘‘#कोई_श्लोक_सुनाओ।’’

‘‘#स्वयं_का_बनाया_हुआ_सुनाऊँ_या_दूसरे_का_बनाया_हुआ ?’’

‘‘स्वयं का बनाया हुआ सुनाओ ।’’

‘‘#बालोऽहं_जगदानन्द_न_मे_बाला_सरस्वती ।
#अपूर्णे_पञ्चमे_वर्षे_वर्णयामि_जगत्त्रयम् ।।’’

अर्थात् हे जगत को आनंद देनेवाले (राजन्) ! मैं अभी बालक हूँ परंतु मेरी सरस्वती (विद्या) बालिका नहीं है । पाँचवाँ वर्ष अपूर्ण होने पर भी मैं तीनों लोकों का वर्णन कर सकता हूँ ।

‘‘अब स्वयं का और दूसरे का मिलाकर श्लोक सुनाओ ।’’

*‘‘#चलितश्चकितश्छन्नः_प्रयाणे_तव_भूपते ।
#सहस्रशीर्षा_पुरुषः_सहस्राक्षः_सहस्रपात् ।।’’

अर्थात् हे राजन् ! आपके कूच को देखकर सहस्रों पैर आंदोलित और सहस्रों सिर व सहस्रों नेत्र चकित हैं ।
इतनी कम उम्र में संस्कृत का इतना ज्ञान व कुशाग्र बुद्धि देख राजा बहुत प्रसन्न हुए और अपने खजानची को बुलाकर बोले : ‘‘#इस_बालक_को_खजाने_में_ले_जाओ । यह स्वयं जितना धन ले सके, लेने दो ।’’

खजानची शंकर को ले गये । शंकर ने केवल लँगोटी पहन रखी थी, अतः उसी लँगोटी के एक भाग पर वह जितना धन ले सका, उतना लेकर घर आया । उसने माँ को सारी बात बतायी । माता ने तुरंत उस दाई को बुलाया जिसे बालक की पहली कमाई की धनराशि देने का वचन दिया था ।
दाई से आदरपूर्वक कहा : ‘‘#यह_शंकर_की_पहली_कमाई_है ।
*#यह_सारा_धन_आप_ले_जाओ ।’’

दाई बालक को आशीर्वाद दे प्रसन्नतापूर्वक सुवर्णमुद्राएँ, माणिक, रत्न आदि पुरस्काररूप में लेकर चली गयी । उसने उस धनराशि से गाँव में एक पोखर (तालाब) का निर्माण कराया, जिससे लोगों की सेवा हो सके। उस पोखर को लोग ‘दाई का पोखर’ कहने लगे, जिसके अवशेष आज भी बिहार में मधुबनी जिले के सरिसव गाँव में विद्यमान हैं ।
आगे चलकर शंकर मिश्र बड़े विद्वान हुए । उन्होंने #वैशेषिक_सूत्र_पर_आधारित_उपस्कार_ग्रंथ_खंडनखंडखाद्य_टीका_रसार्णव इत्यादि अनेक ग्रंथों की रचना की ।

धन्य है हमारी भारतीय संस्कृति जिसमें धन से ज्यादा संस्कारों को महत्त्व दिया जाता है ! #गरीबी_में_भी_अपने_वचन_के_प्रति_कितनी_ईमानदारी_और_वचनबद्धता ! धनराशि देखने के बाद भी शंकर की माँ को किंचिन्मात्र लोभ नहीं आया । और धन्य है वह सत्संगी समझवाली पुण्यशीला दाई, जिसने स्वार्थ की जगह सेवा, परोपकार में धन का सदुपयोग किया ! धन्य हैं वे माता-पिता जो अपने बालकों को ऐसे सुसंस्कार,एवं सुंदर समझ देते हैं !!
अरुण शास्त्री सँकलित

वृक्षों की पूजा के फल

वृक्षों का देव स्वरूप एक दृष्टि ----
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भारतीय संस्कृति में वृक्षों को काटना हिंसा है। इनमें देवात्मा होती है।  सनातन संस्कृति में वृक्षों की पूजा होती है ।
अभिषेक , दीपदान , सुत्रबंधन , अक्षत-रोली-चन्दन-पुष्पों आदि से पूजन  किया जाता है और परिक्रमा की जाती है।

१ पीपल
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योगिराज भगवान् श्री कृष्ण श्रीमद भगवत गीता जी में कहते हैं :
" वृक्षेषु अश्वस्था: " अर्थात " वृक्षों में मैं पीपल हूँ" |

पीपल विष्णु वृक्ष है | पीपल के नीचे श्राद्ध क्रिया, गायत्री जप, कथा, स्तोत्र आदि संपन्न किये जाते हैं | पीपल का पेड़ काटने या कटवाने से पितर दोष लगता है...

इसके साथ ही प्रेतात्माओ का शाप भी लगता है जो रात को पीपल पर निवास करती हैं... (इसीलिए रात्री के समय पीपल की पूजा नहीं होती )

सूर्योदय के बाद पीपल पर माता लक्ष्मी का निवास मन गया है... पीपल की पूजा बृहस्पति और शनि दोषों से मुक्ति के लिए भी की जाती है |

२ बरगद
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वट शिव वृक्ष है | प्रलय के समय मुकुंद ने अक्षय वट पर विश्राम किया था | यह अक्षय वट प्रयाग में है | महिलाएं वट सावित्री की पूजा करती हैं सौभाग्य के वरदान के लिए | वट वृक्ष जटाधारी भगवान् शिव का ही रूप है |

३ कमल
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माता लक्ष्मी का निवास होता है | यह एक ऐसा पुष्प है जो अपने गुणों के कारण प्रत्येक देवी देवता को प्रिय है |

४) नारियल
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श्री देवी (माँ लक्ष्मी) ही बस्ती हैं | नारियल एक ऐसा फल है जो प्रत्येक देवी देवता को प्रिय है... इसे पौराणिक ग्रंथो में "कल्प वृक्ष" का नाम दिया गया है... शक्ति पूजा में और किसी अनुष्ठान में यह विशेष रूप से प्रयोग में लाया जाता है |

५ बिल्व
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वृक्ष में लक्ष्मी जी का निवास है... ऋग्वेद के "श्री सूक्तं" के अनुसार माता लक्ष्मी की कठोर तपस्या के परिणाम स्वरुप ही बिल्व वृक्ष उत्पन्न हुआ... "
"वनस्पतिस्तव वृक्शोथ बिल्व: "...

इसीलिए यह वृक्ष, इसके पत्ते और फल भगवान् शिव को अत्यंत प्रिय हैं | बिल्व पत्र महादेव के विग्रह की शोभा हैं | शास्त्रानुसार संध्या के समय बिल्व वृक्ष के नीचे दीप दान करने वाला व्यक्ति मृत्योपरांत शिवलोक को ही जाता है अर्थात उसकी सद्गति निश्चित होती है | देवी कात्यायनी की पूजा भी में भगवान् राम ने बिल्व पत्रों का प्रयोग किया था |

६) रुद्राक्ष
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शिव वृक्ष है | इसके बीजो से बनी माला पूजा में प्रयुक्त होती है | रुद्राक्ष भगवान् शंकर का श्रृंगार हैं |

७) तुलसी
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वृंदा देवी हैं | तुलसी के स्पर्श, दर्शन, सेवन से जन्म-जन्मान्तरों के पाप कर्मों का नाश होता है | यह भगवान् विष्णु को अत्यंत प्रिय है |कोई भी अनुष्ठान या पूजा कार्य संपन्न करने के लिए तुलसी पत्र का होना आवश्यक माना गया है | वर्ष भर तुलसी में जल अर्पित करना एवं सायंकाल तुलसी के नीचे दीप जलाना अत्यंत श्रेष्ठ माना जाता है |
कार्तिक मास में तुलसी के समक्ष दीपक जलाने से मनुष्य अनंत पुण्य का भागी बनता है एवं उसे माँ लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है क्योंकि तुलसी में साक्षात माता लक्ष्मी का निवास माना गया है |

८) धान
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"धान्य देवी" अर्थात "माता अन्नपूर्ण" का ही रूप हैं| प्रत्येक पूजा में अक्षत ( चावलों के साबुत दाने ) का प्रयोग होता है|

९) नीम
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शीतला देवी रहती हैं जो रोगों से रक्षा करती हैं | देश भर में शीतला देवी के मंदिरों में नीम के वृक्ष सहजता से मिल जाते हैं|

१०) आम के वृक्षों पर यक्ष किन्नर विहार करते हैं|

११) आंवला
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विष्णु और लक्ष्मी माँ का प्रिय है | कार्तिक मास में आंवले की परिक्रमा और पूजा होती है|

१२) कैंथ और जामुन
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के वृक्ष गणपति गणेश को प्रिय हैं और इनके फल गणेश पूजा में अर्पित किये जाते हैं|
          
            " कपित्थ जम्बू फल चारु भक्षणं "|

१३) बृहस्पति दोषों से मुक्ति पाने हेतु केले की पूजा की जाती है|

१४) आक और पलाश
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सूर्य वनस्पति है और पलाश चन्द्र वनस्पति ..
. सूर्य और चन्द्र के दोषों से मुक्ति पाने हेतु ज्योतिष में इन वनस्पतिओं का प्रयोग्किया जाता है |

वनस्पतियाँ विधाता का वरदान हैं | इनकी मधुरिमा को बने रखने के लिए वेद मंत्र है
" मधुमान्नोवनस्पते: "|

वृक्षों में देवात्मा होती है | वृक्षारोपण एक धार्मिक अनुष्ठान है | वृक्षों में खिले हुए पुष्पों की गंध और फलो के रसात्मक तत्वों को पाकर देवता तृप्त होते हैं | इसीलिए पूजा स्थलों के परिसर में पुष्प और फलदार वृक्ष लगाये जाते हैं | फूलो, फलो अथवा हरे भरे वृक्षों को काटने पर महापाप लगता है| और इसके विपरीत वृक्षारोपण से व्यक्ति महापुण्य का भागीदार होता है.।।।

Thursday, 10 January 2019

हवन समय पर ही होना चाहिए

गणितात् सिद्धितः कालः काले तिष्ठति देवताः। वरमेकाहुतिः काले अकाले कोटिसंख्यया।। कालातीते च यः कुर्यात् श्राद्धं होमं जपं तथा। व्यर्थं भवति तत् सर्वमपमृत्युं विषं तथा।।
कालातिक्रमदोषे तु राक्षसस्तस्य देवता। अशुचिर्यत्र होमेऽपि पिशाचस्तस्य देवता।तस्मात् काले शुचिर्द्रव्ये होतव्यं नान्यथा क्वचित्।।

Wednesday, 9 January 2019

भोजन पका कर इस विधि से अग्नि में डाले माता

कुमकुम+अक्षत से अग्नि की पूजा करे "ह्रीं पावकाग्नये नमः"

प्रार्थना करें - मुखं यः सर्वदेवानां हव्यभुक् कव्यभुक् तथा। पितृणां च नमस्तस्मै नमस्ते पावकाग्नये।।

घर में शुद्धता से पकी हुई भात में घी मिलाकर - मध्यमा+अनामिका और अंगूठे से थोडी थोड़ी मात्रा में छते हाथ से अग्नि में समर्पित करें (किसी उपवास के दिन भात न भी बनायी हो,तो केवल घी छोटी चम्मची से अग्नि में समर्पित करें / चम्मची को भी जैसे भात लेतें हैं इसी प्रकार पकड़ना चाहिये)--
(१) ह्रीं ब्रह्मणे नमः - इदं ब्रह्मणे न मम।
(२)ह्रीं प्रजापतये नमः - इदं प्रजापतये न मम।
(३) ह्रीं गृह्याभ्यो नमः - इदं गृह्याभ्यो न मम।
(४)ह्रीं कश्यपाय नमः - इदं कश्यपाय न मम।
(५) ह्रीं विश्वेभ्यो देवेभ्यो नमः - इदं विश्वेभ्यो देवेभ्यो न मम।
(६)ह्रीं अग्नये स्विष्टकृते नमः - इदं अग्नये स्विष्टकृते न मम।

धर्म की गम्भीरता

प्रिय मित्रों !

दूसरा जन्म वैसे ही होता है , जैसे ये जन्म हुआ है । दूसरा जन्म कैसा होगा, लोग सोचते हैं । ऐसा ही होगा जैसा अभी लग रहा है आपको कि हम जन्मे हैं ।

इस जन्म का होना ही प्रमाण है कि आपका जन्म होता है ।
आप की मृत्यु होना ही इस बात का प्रमाण है कि आप मरते भी हो !

आप जन्म भी लेते हो , आप मरते भी हो !

कभी खेतों में जा के देखा करो  ध्यान से ;
बीज फलित हो के धान बनता है , धान  पक के बीज - ये ही प्रकृति है ।

इतनी सी बात भी अनुभूत हो जायेगी आपको तो   धर्म की गम्भीरता अनुभव होगी ।

।। जय श्री राम ।।

राम नाम जप आवश्यक या सन्ध्या

////केवल २ से ३ मिनट लगेंगे!
एकबार काशीजी में एक ब्राह्मणदेवता ने पूज्य श्रीकरपात्री स्वामीजी को प्रणाम करके पुछा -
स्वामीजी! मैं सन्ध्या-यज्ञादि कर्म नहीं करता हूँ बस श्रीरामनाम का जप-कीर्तन एवं रामचरितमानस का मासपारायण पाठ कर लेता हूँ। तो क्या इससे मेरा कल्याण हो जायेगा?

इसपर पूज्य श्रीकरपात्री स्वामीजी ने कहा - यदी आप शुद्रकुल में उत्पन्न हुए होते तो निश्चित आपका कल्याण हो गया होता पर दुर्भाग्य से आपका जन्म ब्राह्मणकुल में हुआ है अतः आपके लिए सन्ध्या-यज्ञादि वैदिक कर्म करना अत्यंत आवश्यक है।

अब आप विचार करें, क्या करपात्री स्वामीजी भगवन्नाम विरोधी है ? क्या उनको नहीं ज्ञात था कि "राम नाम अवलम्बन एकु" का सिद्धांत कलिकाल में मुख्य है?
अरे भाई! जितना रामनाम प्रेमी करपात्री स्वामीजी हुए उतना शायद ही कोई और हुआ होगा। स्वामीजी श्वास-प्रश्वास में सतत रामनाम का जप करते थे, इतना की एकबार जब वे अस्वस्थ होकर कुछ समय तक मूर्छित रहें तो जगने पर उन्हें बहुत पश्चाताप हुआ कि उनका रामनाम का जप स्थगित हो गया था। तो विचार कीजिए की स्वामीजी ने उस ब्राह्मण को ऐसा क्यों कहा?

आईये कुछ बातों पर विचार करें।सबसे पहले तो नित्यानुष्ठान ना करने के लिये भगवन्नाम का ओट लेना बहुत बड़ा अपराध है। जिन भगवानका नाम हम रट रहें है क्या उनकी आज्ञा का पालन करना हमारा धर्म नहीं?  भगवान स्वयं कह रहें हैं -

श्रुतिस्स्मृति: ममैवाज्ञा यस्तामुल्लङ्घ्य वर्तते |
आज्ञाच्छेदी ममद्रोही  मद्भक्तोsपि  न वैष्णव: || (विष्णुधर्म)
(श्रुति और स्मृति यह मेरे आदेश है जो इसका पालन नहीं करते हैं वे विश्वासघाती - मेरे द्रोही  हैं। चाहे वें मेरी भक्ति करें तो भी उनको वैष्णव नहीं मानना चाहिये।)

सोइ सेवक प्रियतम मम सोई। मम अनुसासन मानै जोई॥ (रामचरितमानस)

और तो और​ प्रपन्न​-शरणागत के लिये भगवदाज्ञा का पालन करना ही मुख्य हैं - अग्या सम न सुसाहिब सेवा (रामचरितमानस)। भगवदाज्ञा का पालन करना यानि उनके अनुकूल रहना और प्रपन्न के लिये तो सर्वप्रथम निर्दिष्ट यहीं है - आनुकूलस्य संकल्पः (अहिर्बुधन्य संहिता)।

दुसरी बात जो कि गोस्वामीपाद श्रीतुलसीदासजी स्वयं कह रहें हैं  -

नाम राम को अंक है सब साधन हैं सून।
अंक गये कछु हाथ नहिं अंक रहें दस गून॥(दोहावली)

भगवान श्रीरामका नाम अंक है और सब साधन शून्य (०) हैं। अंक न रहने पर तो कुछ भी हाथ नहीं आता, परंतु शून्य के पहले अंक आने पर वे दस गुने हो जाते हैं, अर्थात राम-नाम के जप के साथ जो साधन होते हैं, वे दस गुना अधिक लाभदायक हो जाते हैं, परंतु राम-नाम के बिना जो साधन होता है वह किसी भी तरह का फल प्रदान नहीं करता।
इससे यह स्पष्ट हैं कि श्रीरामनाम के ही परमोपासक गोस्वामीजी अन्य साधन-कर्मों की उपेक्षा  करने के पक्षमें बिल्कुल नहीं हैं। विशेष जानकारी के लिये रामचरितमानसके उत्तरकाण्ड का अध्ययन करें। हाँ गोस्वामीजी निरस कर्मकाण्ड को भगवन्नाम से जोड़कर हमारे सभी कृत्यों को उपासनात्मक बनाने के पक्ष में जो कि गीताचार्य भगवान श्रीकृष्ण स्वयं कह रहें हैं  -
यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत्।यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम्॥
(हे कुन्तीपुत्र! तुम जो कुछ भी स्वतःप्राप्त कर्म करते हो, जो खातें हो, जो कुछ श्रौत या स्मार्त यज्ञरूप हवन करते हो, जो कुछ (स्वर्ण,अन्न, घृतादि वस्तु) सत्पात्रोंको दान देते हो और जो कुछ तपका आचरण करते हो वह सब मुझे समर्पित कर दो।)

अब एक और महत्पुर्ण बात पर ध्यान दीजिये। भगवन्नामजप​-कीर्तन तब ही सफल है जबतक हमनें नामापराधसे बचकर भगवन्नाम का आश्रय किया। इन दश नामापराधमें इन तीन पर विचार कीजिये  -
(१) अश्रद्धा श्रुतिशास्त्रदैशिकगिरां  (वेद-शास्त्र-सन्त आज्ञा का पालन नहीं करना)।
(२) विहितत्यागौ (यह सोचना की नामजप करतें हैं अतः सन्ध्या-पूजन​-तर्पण आदि कार्यों का त्याग कर देना)
(३) धर्मान्तरैः साम्यं (भगवन्नामाश्रय को अन्य पूण्यकर्मों के समान मानना तथा तूलना करना। क्योंकि भगवन्नामाश्रय से श्रेष्ठ कोई भी  यज्ञ- तीर्थ आदि नहीं हो सकते। इसलिये भगवन्नाम को सर्वोपरी जानकर सन्ध्या-यज्ञादि नित्यानुष्ठान की तुलना करनी ही नहीं चाहिये।)

तो मित्रों सौ बात की एक बात भगवन्नाम का आश्रय लेकर अपने वर्णाश्रमोचित कर्मों से ना भागें, नियमपूर्वक श्रद्धासहित नित्य कर्मानुष्ठान (सन्ध्यावन्दन​, अग्निहोत्र​, देवपूजन​, वेदादि शास्त्रों क अध्ययन​, पितृ तर्पण आदि) करें। भगवन्नाम तो साक्षात भगवान हैं! भगवन्नामसें भगवानकी अनुभूति करें। भक्त-प्रपन्न को तो अपने सभी कार्य भगवत्प्रीत्यर्थ करने चाहिये।

श्रीसीतारामनाम महाराज की जय​।

*संभव हो तो श्रीकरपात्री स्वामीजी द्वारा लिखित "संकीर्तन मीमांसा" नामक ग्रन्थ को एकबार अवश्य पढ़ लेंवे।///

Saturday, 5 January 2019

समुद्रोल्लघन करने वाले कथाकारों की समीक्षा

समुद्रोल्लंघन कर #म्लेच्छदेशगमन कर चुके बालशुक गोपेश आदि वृन्दावनिये पाखंडी कथाकारों  की #शास्त्रीय आलोचना -

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सूतसंहिता का वचन है कि विधि का पालन भले ही न करो किन्तु निषिद्ध से तो अवश्य निवृत्त हो - " अकुर्वन्नपि विध्युक्तं निषिद्धं परिवर्जयेत् | निषिद्धपरिहारेण विहिते लभते मतिम् "

यह वचन चन्द्रशेखर भारती जी ने विवेकचूड़ामणि भाष्य में उद्धृत किये और  स्वामी  निश्चलानंद जी ने भी कहा  -

" एक विधि हैं, अगर आपके मन में श्रद्धा हैं तो आप उसे मानिये | पर जहाँ शास्त्र में निषेध हैं, वहाँ मानो ख़तरा ही ख़तरा हैं | "

अतः स्पष्ट है कि निषेध की अवमानना करने पर   तत्कर्मजन्य अदृष्ट  से दूषित होकर प्राणी न केवल  आत्मनाश को प्राप्त होता है, वरन् वह  परम्परानुगमक लोक के लिये  भी  तत्तत्कर्मों में   अनादर्श होता है , जो  उन-उन निषिद्धकर्मसम्बद्ध    शास्त्र की फलश्रुतियों के प्रभाव की परिधि में आते हैं ।

इस दृष्टि से योग्यता का विभाजन दो भागों में किया जा सकता है -

१. विहितयोग्यता  ।

२.प्रतिषिद्धयोग्यता ।

विहितयोग्यता से तात्पर्य है , उन उन योग्यताओं से , जिनका विधान धर्मशास्त्रों द्वारा स्फुटित है तथा उनको  एक कथाकार स्वयं में धारण कर  कथाकारों की श्रेणी में अग्रगण्य बनता है ।

प्रतिषिद्धयोग्यता  से अभिप्राय है, ऐसी योग्यता , जिनका  निषेध धर्मशास्त्रों द्वारा स्फुटित है तथा उनको  एक कथाकार स्वयं में धारण कर  कथाकारों की श्रेणी में अधम  दशा का भागी  बनता है ।

श्रीमद्भागवतम्, श्री ब्रह्मवैवर्तपुराणम्  इत्यादि सनातनधर्म के परम पवित्र परम्परागत  धर्मशास्त्रों  का  कथानुष्ठान करने से पूर्व अथवा  उन उन शास्त्रों के  व्यासपीठ से प्रवाचनार्थ   व्यासपीठाधिरोहण   हेतु  विहित  आधिकारिकताओं का शास्त्रीय विचार   करने की शृंखला में  विहित  योग्यताओं का विचार करने पर  प्रतिषिद्धयोग्यता   का विचार   विशेष रूप से  अवश्यमेव  करना चाहिये ।

क्योंकि विहितयोग्यता का न्यूनातिरेक तत्कर्मजन्य अदृष्ट  -लाभ का ही साधक-बाधक होता है, किन्तु   प्रतिषिद्धयोग्यता  का न्यूनातिरेक  तत्कर्मजन्य अदृष्ट- हानि का साधक-बाधक होकर प्रकट होता है ।

अतः  यह अत्यन्त विचारणीय है कि कथानुष्ठान हेतु   वेदादि आर्ष शास्त्रों की दृष्टि  से  विषेष  प्रतिषिद्ध हो चुके     कथाकारों  को  आर्यावर्त की पवित्र भूमि में  खुलकर  प्रायोजित करना कितना धर्मसम्मत कृत्य है ?

।। जय श्री राम ।।

वेदादिक शास्त्र ग्रन्थों की प्रबलता का क्रम

वेदादिशास्त्रग्रन्थों की प्रबलता का क्रम ------------- माध्यन्दिनीय-वाजसनेयि-शुक्लयजुर्वेद के अनुयायियों के लिए शास्त्र-ग्रन्थों की मान्यता ...