Friday, 22 December 2017

मासिकधर्म की महानता

मासिकधर्म  के  विधि- विधान   : हिन्दू  गौरव -

मासिक धर्म (माहवारी/पीरियड) के काल में जीर्ण-शीर्ण ( फटे- पुराने)  वस्त्र पहन कर  गोशाला में एकान्तवास करना - ये हिन्दू धर्म की महिलाओं का #पिछड़ापन नहीं वरन् #गौरव है , क्योंकि ऐसा करके वह #त्रिरात्रव्रत का पालन करती हैं और फिर  चौथे दिन आप्लवन  स्नान करके   बिना फटे हुए शोभित नूतन वस्त्र  पहनती हैं ।

इस विशेष व्रत के पालनकाल में स्त्री ना ही अलंकरण करती है , ना ही स्नान करती है , ना ही दिन में सोती है , ना ही दन्तधावन करती है , ना ही ग्रहादि का निरीक्षण करती है , ना हंसती है , ना ही कुछ आचरण करती है , ना ही अंजलि से जल पीती है  ना ही लोहे या कॉसे  के पात्र में भोजन करती है । वह सनातनधर्मिणी नारी   गोशाला में  भूमि पर शयन कर इस महान् व्रत को सम्यक्  परिपालन कर आत्मसंयम का अनूठा उदाहरण प्रस्तुत कर  आत्मशोधन  करती हुई  देवताओं को आनन्दित करती है ।

पाश्चात्यमुखी,  धर्ममूढ़,  अज्ञानी असुरों व विधर्मियों ने   हिन्दू महिलाओं के इस महान् व्रत को  हिन्दुओं का पिछड़ापन बताकर   हिन्दू मर्यादाओं  को तहस नहस करने का भारी प्रयास किया और कर रहे हैं ।

वस्तुतः स्त्रियों के  रजस्वला होने से पूर्वकाल में देवराज इन्द्र की विभाजित ब्रह्महत्या का इतिहास जुड़ा है ,  हिन्दू धर्म के विद्वान् मनीषी जानते हैं कि  उस दैवीय  विभाजन का ही एक भाग  स्त्रीजाति को भी प्राप्त हुआ था  , इस व्रत से उसी  ब्रह्महत्या-दोष का उपशमन होता है ।

#प्राणी_स्वकृत_कर्म_का_ही_भोग_करता_है - इस दार्शनिक  सिद्धान्त  से स्पष्ट है कि  वस्तुतः रजोधर्मप्रधान स्त्री देह के माध्यम से जीव वस्तुतः अपने ही पूर्वकृत  ब्रह्महनन दोष का ही  उपशमन करता है । इसीलिये गीतोक्त  #पापयोनयः विशेषण  का भाष्य  पापजन्मानः भगवान् भाष्यकार ने किया है ।

मात्र ब्राह्मण की हत्या ही  ब्रह्महत्या नहीं होती वरन् ब्राह्मण का अपमान भी ब्रह्महत्या ही होती है,  क्योंकि श्रेष्ठ पुरुषों का अपमान उन पर मृत्युदण्ड प्रहार ही होता है ।   इसीप्रकार,  शास्त्र का विकृतिकरण भी ब्रह्महत्या ही है । अतः सदैव  शास्त्रवचनों का अनर्थ , उनमें मनमानी व  कुतर्कों  के महान् पाप करने से बचना चाहिये ।

जो स्त्री रजस्वलावस्था में त्रिरात्रव्रत रूप धर्म का परिपालन नहीं करती , वह मृत्यु के अनन्तर नरकगामिनी होती है क्योंकि अनुपशमित पाप अंकुरित बीज की भॉति बढता हुआ दुख रूप महान् फलों को पैदा करता है । हमारे महान्  क्रान्तदर्शी तपोनिष्ठ ऋषि-मुनिजन   ये सनातन  रहस्य जानते थे , इसीलिये उन्होंने  इसका आचार -प्रचार किया था ।

वेदों के ये विधि- निषेध  मानव के  ही कल्याण के साधन होते हैं , किन्तु घोर  अज्ञान में डूबे होने व  घोर कुसंगति  के कारण उन  दुर्भागी  मानवों  को  ये  वैदिक विधान बोझ लगते हैं, जिनको धर्मपालन, ईश्वरभक्ति   व आत्मकल्याण से कोई लेना -देना नहीं ,केवल पशुओं  की तरह अन्धभोगमय जीवन यापन कर चौरासीलाख योनियों के चक्रव्यूह  में ही भटकते जाना है ।

।। जय श्री राम  ।।

Tuesday, 19 December 2017

अवतार अनेक है

भगवान के अवतार असंख्य है , उनके
अवतारो की गिनती न
हो सकती है और न होगी ,अग्नि पुराण
कहता है कि ,
" अवतारा असंख्याता अतीतानागदादयः "
(अ.पु.16/12)

शूद्रों को शिखा नहीं रखनी चाहिए

*#न_शिखिनोपवीती_स्यान्नोच्चरेत्संस्कृतां_गिरम् ||श्री आद्य शंकाराचार्यकृत विष्णु सहस्र भाष्ये ||*

शूद्र को न तो शिखा न उपवीती-जनेऊ - न संस्कृत वाणी का उच्चारण करना चाहिए |

Sunday, 17 December 2017

कर्मकाण्ड का महत्व

#श्री_आद्य_शंकराचार्य के  अनुसार  #कर्मकाण्ड का महत्त्व -

श्री आद्य शंकराचार्य  के सिद्धान्त में  कर्मकाण्ड  का अत्यन्त महत्त्व है । 

आचार्य के मत में कर्मकाण्ड से ज्ञानकाण्ड की एकवाक्यता है ।   इस सम्बन्ध में यजुर्वेदीय की काण्वी शाखा के वाजसनेयब्राह्मण की श्रुतियों के भाष्यामृत सिन्धु में  श्रीभगवान् आद्य शंकराचार्य  का कथनरस इस प्रकार  उद्भावित   है कि -

वेदानुवचन , यज्ञ , दान और तप - इन शब्दों  से सारा ही नित्यकर्म उपलक्षित होता है , इस प्रकार काम्यकर्मरहित सम्पूर्ण नित्यकर्म आत्मज्ञान की उत्पत्ति के द्वारा मोक्ष के साधन होते हैं ।

इस प्रकार कर्मकाण्ड से ज्ञानकाण्ड की एकवाक्यता  ज्ञात होती है ।

श्रीमद्भगवत्पादाचार्य शंकर  का कथन  है कि कर्म चित्तशुद्धि के कारण हैं । कर्मों से संस्कारयुक्त हुए विशुद्धचित्त पुरुष ही उपनिषत्प्रकाशित  आत्मा को बिना किसी रुकावट के जान सकते हैं ।

ऐसा ही #विशुद्धसत्त्वस्ततस्तु ०  इस आथर्वण श्रुति से भी सिद्ध होता है तथा #ज्ञानमुत्पद्यते_पुंसां० ऐसी स्मृति भी है ।

फलतः आत्मकल्याण के इच्छुक प्रत्येक ब्राह्मण को काम्य तथा निषिद्ध कर्मों  से दूर रहकर  नित्य , नैमित्तिक, प्रायश्चित्त तथा उपासनाप्रधान कर्मों का पूर्ण मनोयोग से   अनुपालन करना चाहिये ।

।। जय श्री राम  ।।

Friday, 8 December 2017

याज्ञवल्क्य परिचय

#महर्षियाज्ञवल्क्यजी_का_प्राकट्यदिवस_मंगलमय
महर्षि याज्ञवल्क्य जी के प्राकट्य दिवस के परम पावन अवसर पर हार्दिक अभिनंदन ।शुभकामनाएँ  ।बधाई हो।
शुल्क यजुर्वेद प्रवर्तक, याज्ञिक सम्राट, महान दार्शनिक एवं विधिवेत्ता महर्षि याज्ञवल्क्य की जयन्ती कार्तिक शुक्ल द्वादशी को मनाई जाती है।
जो हिन्दू परम्परा में ‘‘योगेश्वर द्वादशी’’ के नाम से जानी जाती है।
महर्षि याज्ञवल्क्य के पिता का नाम ब्रह्मरथ (वाजसनी और देवरथ नाम से भी जाने जाते हैं) और माता का नाम देवी सुनन्दा था।
पिता ब्रह्मरथ वेद-शास्त्रों के परम ज्ञाता थे।
माता ऋषि सकल की पुत्री थी।
महर्षि याज्ञवल्क्य यज्ञ सम्पन्न कराने में इतने निष्णात थे कि उनको याज्ञिक-सम्राट कहा जाता है। यज्ञ सम्पादन में उनकी इस सिद्ध- हस्तता के कारण ही उनका नाम ‘‘याज्ञवल्क्य’’ पड़ा।
याज्ञवल्क्य शब्द स्वयं दो शब्दों का योग है-
याज्ञ और वल्क्य अर्थात् यज्ञ सम्पादन कराना जिनके लिए वस्त्र बदलने के समान सहज और सरल था।
महर्षि याज्ञवल्क्य की दो पत्नियां थीं,मैत्रेयी और कात्यानी। मैत्रेयी ब्रह्मवादिनी थी। महर्षि याज्ञवल्क्य और मैत्रेयी के मध्य अनश्वरता पर हुए प्रसिद्ध संवाद का बृहदारण्य कोपनिषद् में उल्लेख मिलता है। महर्षि याज्ञवल्क्य की दूसरी पत्नि कात्यायनी, जो ऋषि भारद्वाज की पुत्री थीं, इनसे इनके तीन पुत्र थे - चन्द्रकान्त, महामेघ और विजय ।
एक बार राजा जनक को ब्रह्मविद्या जानने की इच्छा हुई।
इसके लिए उन्होने एक शास्त्रार्थ का आयोजन किया जिसमें यह शर्त रखी गयी कि जो भी ब्रह्मविद्या का परम ज्ञाता होगा उसे स्वर्ण मण्डित सींगों वाली एक हजार गायें दी जायेंगी।
इस शास्त्रार्थ में महर्षि याज्ञवल्क्य के अलावा कोई भी भाग लेने का साहस नहीं जुटा पाया।
उनसे ब्रह्मविद्या विषयक बहुत से प्रश्न पूछे गये। जिनका उन्होंने बड़ी सहजता व सटीकता से उत्तर दिया और अन्त में शास्त्रार्थ में विजयी हुए और राजा जनक के गुरूपद्भाक् रहे।
इन्होने ही प्रयाग में ऋषि भारद्वाज को श्रीराम के पावन चरित्र का श्रवण कराया था।
जिसका उल्लेख गोस्वामी तुलसीदासजी ने अपने श्रीरामचरितमानस में किया है
महर्षि याज्ञवल्क्य, उनके आध्यात्मिक गुरू एवं उनकी पत्नियों - कात्यायनी व मैत्रेयी की मूर्तियां स्थापित हैं।
इसी प्रकार दक्षिण अरकोट जिले में कुड्डालोर के पास सोर्नावूर में बंगलूर शहर में एवं वाराणसी में महर्षि याज्ञवल्क्य के मन्दिर है।
महर्षि याज्ञवल्क्य का हिन्दू धर्म एवं संस्कृति में अतुल्य एवं महत्वपूर्ण योगदान
महर्षि याज्ञवल्क्य शुक्ल यजुर्वेदकार रहे हैं।
शतपथ ब्राह्मण, बृहदारण्यकोपनिषद् ईशोपनिषद, याज्ञवल्क्य स्मृति, प्रतिज्ञासूत्र, योग याज्ञवल्क्य आदि ग्रन्थ महर्षि याज्ञवल्क्य के हिन्दू धर्म एवं संस्कृति को अमूल्य योगदान है।
शत् शत् नमन। वंदनम्। सुमिरनम्।
सादर श्रीकृष्ण रात्रि वन्दनम्।
राकेश शर्मा
गौत्र- भारद्वाज
शुक्ल यजुर्वेदी माध्यंदिन ब्राह्मण.

Thursday, 7 December 2017

श्रुति स्मृति मेरी ही आज्ञा है

श्रुतिस्मृति ममेवाज्ञा यस्तु उल्लंध्य वर्तते ।
आज्ञाच्छेदी ममद्रोही मद्भक्तोपि न मे प्रियः ।।

Wednesday, 6 December 2017

मन्त्रब्राह्मणयोर्वेदनामधेयम्

वेदार्थपारिजात में वेदसंज्ञाविचार विषयक प्रकरण  में युधिष्ठिर मीमांसक के खण्डन पर  युधिष्ठिर मीमांसक की आक्षेपात्मक  प्रतिक्रिया -

#मन्त्रब्राह्मणयोर्वेदनामधेयम् यह सूत्र केवल कृष्णयजुर्वेद के ही श्रौतसूत्रों में क्यों उपलब्ध होता है , ऋग्वेद, शुक्लयजुर्वेद , सामवेद और अथर्ववेद के श्रौतसूत्रों में क्यों नहीं मिलता?  इस प्रश्न का सप्रमाण उत्तर आज तक  किसी विद्वान् ने न दिया  ।श्री करपात्री जी ने वेदार्थपारिजात में मेरे उक्त निबन्ध के खण्डन में पचासों पृष्ठ लिखे , परन्तु उक्त प्रश्न का सीधा उत्तर न दिया ।   वस्तुतः इस श्रौतवचन के आधार पर ब्राह्मण ग्रन्थों की वेद-संज्ञा  मानने वालों के पास उक्त प्रश्न का उत्तर है ही नहीं ।

यदि कोई किसी पाणिनीय वैयाकरण से पूछे कि पाणिनि ने वृद्धिरादैच् (१।१।१)  से आ , ऐ , औ की वृद्धि संज्ञा और अदेङ् गुणः (१।१।२)  से अ, ए , ओ की गुण संज्ञा क्यों की ? तो वहस्पष्ट उत्तर देगा  कि पाणिनि ने अपनी शब्दान्वाख्यान-प्रक्रिया की सुगमता और संक्षेप के लिये वृद्धि और गुण कृत्रिम संज्ञाऐं कीहैं । इन संज्ञाओं का सम्बन्ध केवल पाणिनीय शास्त्र तक ही सीमित है । इसी प्रकार कृष्ण यजुर्वेदीय श्रौतसूत्रकारों ने ही मन्त्र और ब्राह्मण की वेद संज्ञा क्यों कही ? इसका भी यही उत्तरहोगाकि उन्होंने अपने शास्त्र की प्रवृत्ति-विशेष  के लिये मन्त्र और ब्राह्मण की वेदसंज्ञा कही है । ...

( युधिष्ठिर मीमांसक, वेद-श्रुति-आम्नाय-संज्ञा-मीमांसा , पृ० ९४)

यद्यपि वेदार्थपारिजात के समनुशीलन से उक्त समस्त आक्षेपों का  ध्वंसाधारत्व  ही  सिद्ध होता है  तथापि  इस  प्रतिक्रिया के प्रत्युत्तर में पारिजात वार्तिक में क्या कहा गया है , वह जिज्ञास्य है ।

इसी तरह कल्पद्रुम  के माध्यम से भी जो  प्रत्याक्षेप सामाजिकों द्वारा किये गये हैं, जिनके  उत्तर स्वामी निरञ्जन देव तीर्थ जी महाराज द्वारा  दिये गये हैं,  वह  सभी सनातन वैदिक धर्मावलम्बियों को  पारिजात वार्तिक  जैसे प्रत्युत्तरात्मक ग्रन्थों के पुनर्मुद्रण व   प्रकाशन एवं प्रचार   के माध्यम से  सुलभ करने  चाहिये ।

।। जय श्री  राम ।।

ज़ह्ळ को जालंधर कहने वालों का खंडन

देअ श्री श्री श्री खुडीज़ह्ळ जी को जालन्धर कहने वालों का भ्रमभंग -  भ्रम - प्रभु श्री ज़ह्ळ जी के मुख के सिर में चंद्रमा है तो इन्हें शिव अं...