Saturday, 29 August 2026

कालसर्प योग पर विचार

कालसर्प योग और एक आख्यान : 

एक वर्ष पूर्व की बात है, कोई हमारे परिचित अपने परिचित सरकारी विभाग में कार्यरत दम्पत्ति से बात करवाये और वे दम्पत्ति हमारे पास स्वपुत्र की समस्या पर कुंडली भिजवाये , किन्हीं महानुभाव पंडित जी ने कालसर्पदोष बताया था तो कुछ चिन्तित थे । बेटा पढाई में मन नही लगाता , कुसंगति आदि समस्या ; जन्मांगचक्र देखकर हमने प्रामाणिक ज्योतिष ग्रन्थानुरूप शास्त्रीय उपाय जो हमें समझ आया , बता दिया तथा कालसर्प दोष की बात पर हमने इतना ही कहा कि हमें तो ऐसा कोई दोष इसमें नहीं दिखता , फिर भी जिनको लगता है , उस पर हम कुछ भी कहना उचित नहीं समझते। उस कुण्डली में वह बारह प्रकार के मुख्य कालसर्प में से कुछ था भी नहीं , जिसमें कि सारे ग्रह आरोह क्रम से राहू केतु की पकड़ में आ जायें, आंशिक कह सकते द्विवेदी जी के कथनानुसार क्योंकि श्री भोजराज द्विवेदी जी ने तो आंशिक कालसर्प दोष को भी पर्याप्त समर्थन करते हुए संख्या बहुत अधिक बता दी है, ऐसे में अधिकांश कुंडलियां सब चपेट में आती हैं, शास्त्र में विधान नहीं तो निषेध भी कहॉ है, ज्योतिष जैसे अपार विद्या में नवीन अनुसन्धानों को महत्त्व क्यों नहीं देना चाहिये इत्यादि तर्क इस कालसर्प समर्थक पक्ष से प्रस्तुत किये गये हैं । गीताप्रेस के ज्योतिषतत्त्वांक में भी इस प्रकरण पर श्री हरिनारायण शास्त्री जी व श्रीमनोहर वर्मा जी नामक विद्वानों के वक्तव्य हैं । चौखम्भा आदि संस्थानों से कालसर्पदोष शान्ति के ग्रन्थ छपे हैं, जो जिज्ञासावश हमने भी अध्ययनार्थ मंगाये । अब तो हमारी देवभूमि के प्रसिद्ध पंचांग में भी विशेष लेख और इस पर व्यापक विवरण प्राप्त कराया जा रहा है, जिसमें श्रीमद्देवी भागवत , नवम स्कन्ध से नागमाता मनसा देवी के स्तोत्र व मन्त्र की भी बात की गयी है । तो उन्होंने कालसर्प योग के प्रति ही अपना आकर्षण चरितार्थ किया , अब संयोग की बात ये भी थी कि जिन पंडित जी से उन्होंने कार्यक्रम करवाया , उनसे एक बार हमारी भेंट हो चुकी थी, हमारे घर पर आये थे कहीं किसी अनुष्ठान में जाते समय, थोड़े कुतर्की टाइप थे, सिगरट उनके मुख पर रहती थी । पूरा डिब्बा जेब रखे रखते । काफी जगहों पर शिवपुराण आदि कथाऐं भी करते रहते । जब उन दम्पत्ति ने फोन पर हमें बताया कि फलाने स्थान के अमुक पंडित जी हैं तो हम सारी कहानी समझ गये कि क्या ज्ञान कहा होगा उन्होंने , परन्तु यदि किसी की निष्ठा कहीं है तो हम क्यों बीच में बोलें । 
इस प्रकार ,बाद में जब उन परिचित महानुभाव ने बताया कि वे कालसर्प निवारण करवा आये चांदी के नाग बनवा के उनको नदी प्रवाहित करके और पंडित जी ने पर्याप्त दान दक्षिणा भी प्राप्त की , तो हमने कहा कि पंडित जी को दान दक्षिणा की है , श्रद्धा से ग्रह देवताओं का ध्यान किया है, ये तो उत्तम ही है, जेन केन बिधि दीन्हें दान करइ कल्यान । जैसे भी हो परिणाम आना चाहिये । तो हुआ क्या कि अभी कुछ दिनों पूर्व हमें पता चला कि वे दम्पत्ति ज्योतिषियों से रुष्ट थे, बोल रहे थे ज्योतिषियों का सब मूर्ख बनाने का धन्धा है पाखंड है , ज्योतिष भी परख लिया हमने इसमें भी कुछ नहीं सार, बेटा वैसे का वैसा ही है कुछ भी नही हुआ परिवर्तन आदि । इसे सुनने के उपरान्त हमने प्रथम तो ये ही विचार किया कि जब आपके पूर्वकर्मों के अनुरूप ग्रह गोचर कुछ विशेष ही विपरीत हों तो उपाय न तो आपको मिलता है, और कहीं मिल भी गया तो आप कर नही नहीं सकते । दूसरा ये कि इस कालसर्प मामले में हम किसे दोषी कहें , इस विधा को ? उस अनुष्ठान को ? उन ब्राह्मण को या यजमान को ? या काल को ही कारण समझ लिया जाये ! फलित ज्योतिष एक ऐसी विद्या है , कि उसमें भी कुछ ऐसे योग भी कहे जाते हैं , वे जिनके जन्मांगचक्र में हैं, वे जो कहते हैं , उनका कहा होता है और फिर ब्राह्मण का वाक्य भी तो स्वयं में एक महान् बल है, वो जो यजमान के कल्याणार्थ कह दें , वह ग्रह देवता न मानें , ऐसे भी कहना कितना सही है , परन्तु क्या तथाकथित गुटखा /सिगरट खाने पीने वाले , धर्म को न जानकर कुतर्क करने वाले, अन्धेरे में तीर मारकर लम्बा बिल फाड़ने वाले लोग ऐसी योग्यता रख सकते हैं ? किन्तु हम उनको भी दोष क्यों दें, श्री भगवान् ने जैसों के लिये तैसे ही भूदेव बनाये हैं ,यह भी तो एक तथ्य है । जिन्होंने कर्मों से अपने बृहस्पति को खराब किया है, उनको गुरुओं से कहॉ लाभ मिलेगा। जो श्राद्ध नहीं करते , नित्य नैमित्तिक कर्म विधिवत् नहीं करते , ऐसे लोग कितने समय तक देवताओं आदि को अपने अनुकूल रख सकते हैं , क्या कुछ धन खर्च करके स्मार्त्त धर्म की कर्त्तव्यविमुखता के दोष का सदा के लिये शमन हो सकता है ? अतः ब्राह्मणों का दायित्व तो यही है कि प्रयास यही करें कि जिन विषयों में संशय हो , वहॉ प्रामाणिक शास्त्रों में जो प्रामाणिक विधियॉ बताई गयी हैं , ग्रहदोष निवारणार्थ उन्हीं विधियों का अनुपालन करने का प्रयास करें , अपना आहार विहार शुद्ध रखें, निष्काम भाव से परोपकार का ही भाव रखें और लोगों को उनके लिये विहित गृहस्थ के स्मार्त्त आचार के महत्त्व को समझाने का प्रयास करें ।

#सन्मार्ग 
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