Wednesday, 26 August 2026

उपाकर्म निर्णय

उपाकर्म २८ को करना ज्यादा प्रशस्त नही है क्योंकि भगवान् पारस्कर ने उपाकर्म के चार मुख्य काल माने हैं श्रवण नक्षत्र,
श्रावणपूर्णिमा, पंचमी, तथा हस्त चूंकि प्रायः श्रावणपञ्चमी मे हस्त होता ही है तथा पूर्णिमा में श्रवण होता है अतः प्रायः दो काल ही मुख्यतया प्राप्त होता है परन्तु इस वर्ष चार काल प्राप्त थे जिसमें तीन बीत गये चौथा काल है पूर्णिमा ।
२७ को पूर्णिमा ९ बजकर कुछ मिनट में लग रहा है अतः पूर्णिमा मध्याह्नकाल में प्राप्त हो रही है और परम्परातः उपाकर्म मध्याह्न स्नान मध्याह्न सन्ध्या और तर्पण के पश्चात् ही किया जाता है जो २८ को कथमपि सम्भव नही है ।
क्योंकि २८ को पूर्णमा ९ बजकर कुछ मिनट में समाप्त हो जारही है ।
यदि २८ को कोई उपाकर्म करता है तो मध्याह्न स्नान मध्याह्न सन्ध्या तर्पण करते ही करते पूर्णिमा व्यतीत हो जायेगी
उपाकर्म के समय भाद्रपद् कृष्ण प्रतिपद् तिथि होगी जो गृह्योक्त न होने से स्वीकार्य नही है ।
पौर्णमासेष्टि का एवं पक्षादि कर्म का काल विज्ञों ने पूर्णिमा का चतुर्थ चरण तथा प्रतिपद् के प्रारम्भ से तीन पाद बताया है चतुर्थ पाद में इष्टि निषेध है तथा पौर्णमास का प्रारम्भ सूर्योदय के पश्चात् करने को कहा है । (स्मार्तोल्लास )
अतः पौर्णमास व पक्षादि कर्म २८ को ही होगा ।
उपाकर्म में मुख्यतया अध्यापन कर्म में युक्त गृह्याग्नि धारक ही अधिकारी है (हरिहिरभाष्य - उपाकर्म प्रकरण )
२८ को यदि उपाकर्म होगा तब क्योंकि उपाकर्म अत्यन्त विस्तृत कर्म है इसमें शिष्यों को प्रत्येक अध्याय व काण्ड का आदि मन्त्र ब्राह्मण अनुवाचन कराना आवश्यक है।
साथ ही होम लाजादि प्राशन आदि भी है
तथा परम्परया सप्तर्षि पूजन यज्ञोपवीत संस्कार आदि भी होता है जिससे उपाकर्म में पूर्णिमा काल प्राप्त नही ही होगा यह तो निश्चित है ।
अतः अनुक्त काल में उपाकर्म उचित नही है जो काशी के पंचांगो में लिखा है
उपाकर्म के नित्य कर्म होने से उसमें भद्रा का विचार नही है
भद्रा का विचार श्रावणी (रक्षा बन्धन ) में है यह स्पष्ट भाष्य में लिखा है अतः
भद्रा के कारण अथवा किसी भी कारण से स्वगृह्योक्त काल का विद्वज्जन परित्याग न करें ।

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