शिखां छिन्दन्ति यो मोहात् द्वेषादज्ञानतोऽपि वा। तप्तकृच्छ्रेण शुद्ध्यन्ति त्रयोवर्णाद्विजातयः।।हारितः।।
खल्वाटादिकदोषेण विशिखश्चेन्नरो भवेत्। कौशीं तदा धारयेत ब्रह्मग्रन्थियुतैर्शिखाम्।। दक्षिणकर्णोपर्याशिखाबन्धनवत्तिष्ठेत्।। तत्रैव।।
देअ श्री श्री श्री खुडीज़ह्ळ जी को जालन्धर कहने वालों का भ्रमभंग - भ्रम - प्रभु श्री ज़ह्ळ जी के मुख के सिर में चंद्रमा है तो इन्हें शिव अं...
No comments:
Post a Comment