Thursday, 1 May 2025
पूजा आदि में सिर नहीं ढंका चाहिए
Tuesday, 19 May 2020
वैदिक प्रश्नोत्तर
#प्रश्नोत्तर
"सादर प्रणाम"
कुछ प्रश्नों के उत्तर देने की कृपा करें।
१-पिता के जीवित होते बेटा किन्हें किन्हें तर्पण कर सकता है?
२-मामा की पुत्री से विवाह अगर सम्मत है तो किन बातों का ध्यान रखना उचित है।
३-ऋतु स्नान के बाद स्त्री जिसे प्रथम बार देखती है वैसी छाप आने वाली सन्तान पर पड़ती है तो प्रश्न यह कि कौन सा ऋतु स्नान सर्व प्रथम वाला या गर्भाधान के पहले वाला स्नान?
४-श्रीगणपति जी पर अगर भूल वश तुलसी चढ़ जाती है तो इसके लिये क्या प्रायश्चित है?
५-पूजन में देवताओ को चंदन आदि लगाते समय किस प्रकार की मर्यादा है? ...यथा चरणों मे या पादुका में चंदन लगा कर मस्तक में लगाने में किसी प्रकार का निषेध आदि?
जयश्रीराम
#उत्तर -
1 जिसके पिता जीवित हों वे भी नित्य तर्पण कर सकते हैं, परंतु दिव्य पितरों तक ही, आगे अपने पितरोंका /मनुष्य पितरों का तर्पणादि न करें ।
और जिसके पिता जीवित हो वह पूर्ण अपसभ्य भी ना हो
#प्राचीनावीतीत्वाप्रकोष्ठठात्।
प्रकोष्ठ तक ही अपसव्य अवस्था में जनेऊधारण करें।
2 हमारे यहां वेदकी 1131 शाखाएं हैं उनके अनुसार पद्धतियां और विधान भी पृथक पृथक उपलब्ध होते हैं।
जिन विधानोंमें आपस में विरोध नहीं है और किसी शाखा में उसका उल्लेखभी नहीं है ,तो उस कार्य को दूसरी शाखा वाले के अनुसार भी दूसरी शाखा वाला कर सकता है।
परंतु किसी शाखा में किसी भी विधान पद्धति को अलग प्रकार से कहा गया है और दूसरी में अलग प्रकार से कहा गया है, तो उन दोनों का आपस में मेल नहीं हो सकता अर्थात दोनों को अपनी अपनी शाखा अनुसार ही बर्ताव करना चाहिए यही सभी शास्त्रों का निर्णय है ।
#पारक्यमविरोधीचेत्।
इसी नियमानुसार कुछ ऋग्वेद की और कुछ कृष्ण यजुर्वेदादिकी शाखा वालों ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्यों के लिए मामा की बेटी से विवाह करना शास्त्र ने वैध बताया है अर्थात विधान किया है, जिनके लिए विधान किया है अर्थात जिनके यहां वंश परंपरा से यह कार्य चलता आ रहा है उनके लिए यह धर्म एवं शास्त्र सम्मत है ऐसा दक्षिण के कई पवित्र ब्राह्मणों के यहां भी देखा सुना जाता है।
परंतु जिन शाखा वालों के यहां, जिस देश में अथवा जिन कुलों में परंपरा से यह प्राप्त नहीं है जिनके यहां यह काम नहीं होता बल्कि निंदित माना जाता है उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए ।
ऐसा निर्णय निर्णयसिंधुमें लिखा हुआ है विस्तार से आप वहां देख सकते हैं।
3 हमारे धर्म ग्रंथों के अनुसार तो प्रथम रजोदर्शन भी पति के घर पर ही होना चाहिए (आज की परिस्थिति अलग है) हर एक रजोदर्शन के बाद शुद्धि के उपरांत सर्वप्रथम अपने पति का ही मुख देखा जाए ऐसा माताओं के लिए शास्त्र में स्पष्ट उल्लेख है ।
इस बात को यूं समझ सकते हैं कि दिन में या संध्याकालमें गर्भाधान करने से संतान क्रूर होती है ,ऐसा कहा गया है।
तो क्या गर्भाधान न करने की दृष्टि से दिन में मैथन किया जा सकता है?
इसका उत्तर देते हुए टीका कारों ने लिखा है कि नहीं । तब भी निषिद्ध है , अगर उससे पुत्र नहीं हुआ तब भी अगले पुत्र में वह दोष आएगा, अगले जन्म में जाएगा , उसका तो वह दोषी होगा ही।
ठीक इसी प्रकार सभी रजोदर्शन ओं में नियम पालन करना जरूरी है ।
परंतु गर्भाधान से पूर्व में विशेष ध्यान रखा जाए ऐसा तात्पर्य शास्त्र कारों ने दर्शाया है ।
4 कई ऐसे अपराध हैं जिनका प्रायश्चित स्पष्ट रूप से शास्त्रों में नहीं लिखा है।
उनके लिए शास्त्रों ने एक नियम बनाया है ,एक निर्देश किया है कि जिन का प्रायश्चित नहीं लिखा है
उनका प्रायश्चित प्राणायाम है
देवता का स्मरण है
क्षमा याचना है
और भगवन्नाम है।
इसलिए अपनी शक्ति अनुसार प्राणायाम करें
गणेश जी से क्षमा याचना करें ।
और अपने इष्टदेव का नाम संकीर्तन करें।
तो कई प्रकार के दोषों का प्रायश्चित हो जाता है यहां भी यही कार्य करना चाहिए।
5 मुख्य रूप से साधारण पूजन में देवताओं के इष्ट देवों के मस्तक पर ही तिलक लगाने का विधान है, तो वहां कोई आपत्ति ही नहीं है।
परंतु विशेष पूजनमें चरणों का भी पूजन होता है, चरण पादुका ओं का भी होता है और देवता का तो होता ही है ।
तो ऐसी जगहों पर अलग-अलग पात्रों में चंदन रखना चाहिए
यह तंत्र शास्त्रों में विशेष पूजन की विधि में आप देखेंगे तो वहां पाद्यके लिए पात्र अलग रखा जाता है, अर्घ्य के लिए अलग रखा जाता है।
पूरी पात्रासाधन की प्रक्रिया बड़ी जटिल और कठिन है सादा रूप से किसी पंडित के भी बस की बात नहीं है बिना योग्य गुरु से पढ़े और उसका अभ्यास किए बिना ।
तो कहने का तात्पर्य यही है कि जहां चरणों का और देवता का पूजन दोनों का करना हो तो अलग-अलग पात्रों में चंदन रखें और अलग-अलग रूप से निवेदन करें ।
बीच-बीच में हाथ धुलने की परंपरा भी पूजन क्रम में ध्यान रखने योग्य है।
पूजन की पद्धति तो विशेष है बहुत विधि निषेध हैं तंत्र शास्त्रों में आगम शास्त्रों में अवश्य देखनी चाहिए।
वर्तमान में जो भी पूजन क्रम चल रहा है इसका मूल तंत्र ही हैं।
राजेश राजौरिया वैदिक वृन्दावन।
नमः पार्वतीपतये हर हर महादेव।
यजुर्वेद में जन्म से जाति
जन्मना वर्ण व्यवस्था सिद्धि यजुर्वेद से >>>>>>>
आ ब्रह्मन् ब्राह्मणो ब्रह्मवर्चसी जायताम् आ राष्ट्रे राजन्यः शूर ऽ इषव्यो ऽतिव्याधी महारथो जायतां दोग्ध्री धेनुर् वोढानड्वान् आशुः सप्तिः पुरंधिर् योषा जिष्णू रथेष्ठाः सभेयो युवास्य यजमानस्य वीरो जायतां निकामे-निकामे नः पर्जन्यो वर्षतु फलवत्यो न ऽ ओषधयः पच्यन्तां योगक्षेमो नः कल्पताम् ॥ ( यजुर्वेद २२/२२)
अर्थ :~~ हमारे राष्ट्र में ब्रह्मवर्चसी ब्राह्मण उत्पन्न हों । हमारे राष्ट्र में शूर, बाणवेधन में कुशल, महारथी क्षत्रिय उत्पन्न हों । यजमान की गायें दूध देने वाली हों, बैल भार ढोने में सक्षम हों, घोड़े शीघ्रगामी हों । स्त्रियाँ सुशील और सर्वगुण सम्पन्न हों । रथवाले, जयशील, पराक्रमी और यजमान पुत्र हों । हमारे राष्ट्र में आवश्यकतानुसार समय-समय पर मेघ वर्षा करें । फ़सलें और औषधियाँ फल-फूल से लदी होकर परिपक्वता प्राप्त करें । और हमारा योगक्षेम उत्तम रीति से होता रहे ।
व्याख्या :== यहाँ ब्राह्मण के लिए ब्रह्मवर्चसी एवं राजाओं के लिए शुरत्व आदि की प्रार्थना आयी है । यदि वेदों में वर्णव्यवस्था कथित गुण कर्मानुरूप होती तो ब्राह्मण के लिए ब्रह्मवर्चसी की प्राथना उसमें नहीं होती तब वेद में ब्रह्मवर्चस युक्त को ही नाम ब्राह्मण होता एव ब्राह्मण के लिए ब्रह्मवर्चसी प्रार्थना एवं आशिर्वाद ही व्यर्थ होता।
यह प्रार्थना ही यहाँ जन्मना वर्ण व्यवस्था कि सिद्धि करता है,
ब्राह्मोऽजातौ( अष्टा० ६।४।१७१) इस पाणिनि सूत्र से अपत्य एवं जाती में ब्राह्मण शब्द होता है अब अर्थ हुआ कि हे ! ब्रह्मन् ब्राह्मण ब्रह्मवर्चसी होवें अथवा ब्रह्मन्–ब्राह्मण में (सप्तम्या लुक्) ब्रह्मवर्चसी ब्राह्मण उत्तपन्न होवें।
इसी प्रकार शूरतादि गुण बाले जिस किसीके ( गुणकर्मानुरूप वर्णव्यवस्था मानने बालों के मतानुरूप ) क्षत्रिय होने पर वेद में ( राजन्यः शूरो जायताम ) यह श्रुती व्यर्थ होगी , क्योंकि जो कोई भी शूरता आदि गुणों से युक्त होगा वही क्षत्रिय हुआ कर्मणा वर्ण मानने बालों में फ़िर उसके लिए #शुर हो यह प्रार्थना कैसी ? इससे सिद्ध है कि वेद ब्राह्मण, क्षत्रिय जन से मानता है ना की तथाकथित कर्म से ।
इसलिए महाभाष्य में राज्ञोऽपत्ये जातिग्रहणं कर्तव्यम्। राजन्यो नाम जातिः। ( ४/१/१३७) यहाँ पर राजा शब्द का पर्याय है एव मीमांसाशबर भाष्य ( २/३/३) क्षत्रियस्य
राजसूयविधानात्। राजा राजसूयेन येजेतेति। ननूक्तं- यौगिको राजशब्द इति। एतदप्ययुक्तम्। यतो जातिवचन इति क्षत्रिये तु प्रत्यक्षं प्रयुञ्जानात् उपलभामहे .....तस्माज्जातिनिमित्तो राजशब्दः। अतः उक्त मन्त्र में राजन्य शब्द होने से जन्म से वर्ण इष्ट अन्यथा शुर के शुर होने की प्रार्थना व्यर्थ है।
उक्त मन्त्र संहिता पर ही ब्राह्मण कहता है ~~
१) आ ब्रह्मन् ब्राह्मणो ब्रह्मवर्चसी जायतामिति ब्राह्मण एव ब्रह्मवर्चसं दधाति तस्मात्पुरा ब्राह्मणो ब्रह्मवर्चसी जज्ञे - १३.१.९.[१] , तद्ध्येव ब्राह्मणेनैष्टव्यं यद् ब्रह्मवर्चसी स्यादिति॥
१।९॥३॥१६
२)आ राष्ट्रे राजन्यः शूर इषव्योऽतिव्याधी महारथो जायतामिति राजन्य एव शौर्यम्
महिमानं दधाति तस्मात्पुरा राजन्यः शूर इषव्योऽतिव्याधी महारथो जज्ञे - १३.१.९.[२] तस्मात्पुरा धेनुर्दोग्ध्री जज्ञे - १३.१.९. ३ तस्मात्पुरानड्वान्वोढा जज्ञे - १३.१.९.[४] इत्यादि ।
यहाँ पर ब्राह्मण का ब्रह्मवर्चवाला होना क्षत्रिय के शुर आदि होना है , ब्रह्मवर्चवाले का ब्राह्मण होना शुर का क्षत्रिय होना नहीं कहा अतः यह सूक्ष्म विचार कर लेना चाहिए ।
उक्त मन्त्र में #ब्राह्मण का #ब्रह्मवर्चसी और #क्षत्रिय का #शूर होना आदि विधेय विशेषण है ... इसलिये उन्हें विशेष्य से पिछे ढाला गया है ; नहीं तो #अविमृष्टविधेयांशदोष हो जाता । इस से स्प्ष्ट है ही वेद में वर्णव्यवस्था जन्म से है ना की स्वकल्पित कर्मानुरूप । यदि उक्त मन्त्र में 'हे परमात्मन् हमारे राष्ट्र में ब्रह्मवर्चस वाला ब्राह्मण हो और शूर क्षत्रिय हो' यह प्रार्थना मानी जावे , तथापि यदि जन्मना वर्णव्यवस्था न मानी जावे तो उनके ये विशेषण व्यर्थ हो जाएंगे।
यदि उक्त मन्त्र में ब्रह्मवर्चस बॉला ब्राह्मण होता है ; और शूर ही क्षत्रिय होता है यह विपरित अर्थ किया जावे तो यह ठिक नहीं है । पहले तो यह अर्थ यहां हो ही नहीं सकता क्योंकि ऐसा शब्द ही नहीं है , यदि विलष्ट कल्पना से यहाँ वो अर्थ मान भी लिया जाए तो #दोग्ध्री_धेनु , #वोढानड्वान्_आशुः #सप्तिः ..... यहाँ पर भी वही दोष प्राप्त होगा । तब तो दोग्ध्री दूध देने बॉला धेनु कहा जायेगा एवं बकरी , भैंस , कुतिया आदि भी #धेनु कहलाने लगेगी। #वोढा ( भार ढोने बॉला) कुली , मजदूर आदि #अनड्वान् #बैल हो जाएंगे । शीघ्र चलने बाले रथ , गाड़ी आदि #सप्तिः( घोड़ा ) हो जायेंगे
जो कदापि युक्ति युक्त नहीं है ।
अतः उपरोक्त इस लेख से हमें यह ही कहना है की उक्त मन्त्र से वेद स्वयं ही जन्मना वर्णव्यवस्था की सिद्धि एवं तथा कथित कर्मणा का रट लगाने बालों का खण्ड़न कर रहें हैं ।
इसलिए समाजिकों जादा वेद के नाम पर बंद कूद न मचाया करो नहीं औंधे मुँह ऐसा गिरोगे की बत्तीसी सीधे पेट में चल जायेग की समझे 😁😁😁😁😁
।। जय श्री राम ।।
Friday, 15 May 2020
मरणाशौच कब से होता है?
*#प्रश्नावली_16_का_उत्तर*
मरणाशौच मुख्य रूपसे मृत्यु के तुरन्त बाद ही शुरू हो जाता है।
*#प्रमाण* -
*#मरणादेव_कर्तव्यं संयोगो यस्य नाग्निना ।*
*दाहादूर्ध्वमशौचं स्याद् यस्य वैतानिको विधि।।* (शातातप)
समस्त हिंदू समाजमें आशौचकी प्रवृत्ति मृत्युके बाद ही होनी चाहिए ।
परंतु जो द्विज #अग्निहोत्री हैं उनके आशौचकी प्रवृत्ति दाह के बादसे करनी चाहिए।
विद्वद्वरवरिष्ठ परम पूज्य गुरुदेव श्रीनर्मदेश्वर द्विवेदीजी के कथनानुसार -
धर्मसम्राट स्वामी श्रीकरपात्रीजी महाराजने उस समय अग्निहोत्रियों की गणना पूरे भारतवर्ष में करवाई थी।
तो उस समय केवल 130 के लगभग अग्निहोत्री पूरे भारतवर्ष में थे, जिसमें से ज्यादातर दक्षिण के ही थे ।
तव स्वामीजी ने कुछ विद्वानोंको अग्निहोत्रकी दीक्षा दिलवाई थी और उनकी व्यवस्था भी की थी ।
तब से अब तक और ह्रास हो गया , दुर्भाग्यवश बहुत ही अल्प मात्रा में अग्निहोत्री भारतवर्ष में बचे हुए हैं ।
*#सारांश* -
तो केवल उन अग्निहोत्रिओं को छोड़करके , बाकी के हम सभी जो निरग्निक हैं अर्थात् अग्निहोत्री नहीं हैं,उन सभी को मरणाशौच मृत्युके तुरंत बाद शुरू हो जाता है ।
बहुत से पांडित्य करने वाले पंडितोंको भी यह भ्रम है कि मरणाशौच शवदाह के बाद लगता है।
*#हमारा_उद्देश्य* -
सभीसे करबद्ध प्रार्थना है कि - भ्रमनिवारण पूर्वक शास्त्रीय मार्गका ही सहर्षावलंबन करें।
नमः पार्वतीपतये हर हर महादेव।
राजेश राजौरिया वैदिक वृन्दावन।
Saturday, 9 May 2020
शास्त्रीय सार सिद्धान्त
शास्त्रीय सार सिद्धान्त --------->
(१) कर्म जाति का अधिष्ठान है तथा जाति जन्म का अधिष्ठान है ।
जन्म
^
|
जाति
^
|
कर्म
अतः जाति कर्ममूलक होती है तथा जन्म जातिमूलक होता है । क्रियमाण कर्म से जाति का निर्माण इसलिये नहीं हो सकता क्योंकि क्रियमाण कर्म जब तक संचित होकर प्रारब्धोन्मुख नहीं हो जाते , वे निष्फल ही रहते हैं ।
(२) समस्त वैदिक शास्त्रों का प्रतिपाद्य सारमत पंचायतनसिद्धान्त है, जिसके अनुयायी स्मार्त कहलाते हैं । पञ्चायतन सिद्धान्त का अर्थ है कि एक ही निर्गुण परमात्मा गणेश, दुर्गा, सूर्य , शिव तथा विष्णु के रूप में सगुण साकार हैं ।
(३) समस्त शास्त्रों का परम प्रतिपाद्य सिद्धान्त केवलाद्वैत(अद्वैत) सिद्धान्त है । श्री आद्य शंकराचार्य भी इसी सिद्धान्त के एक मुख्य प्रचारक रहे । इस कलियुग में अद्वैत संन्यास परम्परा के परम संरक्षक एवं स्वयं भगवान् शिव के अवतार होने से वे कलियुग के जगद्गुरु हैं ।
(४) रामानन्द सम्प्रदाय को अग्रिम चार वैष्णव सम्प्रदायों (क) रामानुज सम्प्रदाय (ख) माध्व सम्प्रदाय (ग) वल्लभ सम्प्रदाय (घ) निम्बार्क सम्प्रदाय -- इनमें से रामानुज सम्प्रदाय के स्थान पर गिनकर स्वीकार करना न्यायसंगत नहीं है ।
(५) समुद्रपार विदेश यात्रा सर्वथा अशास्त्रीय है । ऐसा यात्री प्रायश्चित्त के उपरान्त भी इस लोक में ' पतित ' ही बना रहता है ।
(६) गुरुवंश पुराण को महर्षि वेदव्याससम्पादित अष्टादश पुराणों के तुल्य कदापि नहीं समझा जा सकता , ना ही उसकी फलश्रुति को ही प्रामाणिक समझा जा सकता है ।
(७) पुराणों से स्मृतियों के प्रमाण प्रबल होते हैं । स्मृतियों में श्री मनुस्मृति के प्रमाण सबसे प्रबल हैं ।
(८) कर्म और ज्ञान - ये दो ही सनातन मार्ग हैं । कर्म मार्ग के अन्तर्गत उपासना होती है तथा ज्ञान मार्ग के अन्तर्गत भक्ति होती है । भक्ति उपासना का ही परिपक्व स्वरूप है । कर्म मार्ग ही प्रवृत्ति मार्ग है । ज्ञान मार्ग ही निवृत्ति मार्ग है ।
(९) अंगहीन को न कर्म के अनुष्ठान में अधिकार है , न दण्ड संन्यास में ।
वह मृत्युभय उपस्थित होने पर केवल आतुर संन्यास मात्र ले सकता है , कदाचित् भय टल गया तो एक बार संन्यास का संकल्प कर चुकने के कारण वह फिर आगे अलिंग संन्यासी के रूप में जीवन यापन करता है । दण्डसंन्यास का फिर भी वह अधिकारी नहीं होता ।
(१०) सोलह वर्ष से पूर्व की अवस्था वाले ब्राह्मण को बालक कहा जा सकता है , उसका सलिंगसंन्यास में अधिकार न होना केवल अनातुर (मृत्युसंकट न आना) दशा में ही समझना चाहिये । एक बार आतुर संन्यास (प्राण निकलने की दशा विशेष में लिया जाने वाला संन्यासविशेष) लेने के उपरान्त वह बालक यदि जीवित बच जाये तो यदि अंगहीन नहीं है तो सलिंग अन्यथा अलिंग संन्यास का ही वह अधिकारी होता है ।
Friday, 24 April 2020
राम जी ने सीता जी की अग्नि परीक्षा क्यों लीं
प्रश्न-
जगज्जननी माँ सीताजी की अग्निपरीक्षा का औचित्य क्या है?
सब कुछ जानते हुए भी श्रीराम ने ऐसा दुर्व्यवहार क्यों किया?
उत्तर-
भगवान् श्रीराम ने खर दूषणादि को मारकर एक दिन एकान्त में श्रीसीताजी को कहा कि अब अविलम्ब रावण भिक्षुक बनकर आपके पास आयेगा।(रावणो भिक्षुरूपेण आगमिष्यति तेन्तिकम्)।
अतः आप एकवर्षपर्यन्त अग्नि में निवास करो।(अग्नौ अदृश्यरूपेण वर्षं तिष्ठ ममाज्ञया)।
तुम्ह पावक महुं करहु निवासा।
जौ लगि करौं निसाचर नासा।।
निज प्रतिबिम्ब राखि तहं सीता।
तैसेइ सील रूप सुविनीता।।
प्रभुपद धरि हिय अनल समानी।
रा.च.मा. अरण्य 23 /2-3-4
और स्वमायारचित अपनी छायाकृति कुटिया में स्थापित करो।(त्वं तु छायां त्वदाकारां स्थापयित्वा उटजे विश)।
रावण वधोपरान्त आप हमको पुनः प्राप्त करोगी।(रावणस्य वधान्ते मां पूर्ववत् प्राप्स्यसे शुभे)
सीताजी ने माया सीता को बाहर रखकर स्वयं पावक में प्रवेश किया।
मायासीतां बहिस्थाप्य स्वयमन्तर्दधेनले।
अध्यात्म रामायण अरण्यकाण्ड 7/2-3-4
युद्धकाण्ड...12 वां सर्ग
रावणान्त्येष्टि संस्कार संपन्न होने पर भक्तप्रवर विभीषणाभिषेकोपरान्त श्रीराम के मन में पावकस्थ सीताजी को प्राप्त करने तथा मायामय सीताजी को त्यागने का भाव आया।
मायासीतां परित्यक्तुं जानकीमनले स्थिताम्।आदातुं मनसा ध्यात्वा रामः प्राह विभीषणम्।।12/67
सीता प्रथम अनल महुं राखी।
प्रगट कीन्ह चह अन्तरसाखी।।
रा.च.मा.लंका का.108/14
अग्निदेव सीतामाता को अपनी गोद में लेकर प्रकट होते हैं तथा श्रीराम को सौंपते हैं।
विभावसुः ..
स्वांके समादाय विदेहपुत्रिकां..13/19
गृहाण देवीं रघुनाथ जानकीं,
पुरा त्वया मय्यवरोपितां वने।।13/20
अंकेनादाय पावकः.....एषा ते राम वैदेही पापमस्यां न विद्यते।।
बाल्मिकीय यु.का.118/5
प्रतिबिम्ब अरु लौकिक कलंक प्रचंड पावक महुं जरे।
धरिरूप पावक पानि गहि श्री सत्य श्रुति जग विदित जो।
जिमि क्षीरसागर इंदिरा रामहि समर्पी आनि सो।।
रा.च.मा.लं.का.108/छंदांश
दशरथ जी स्वयं सीताजी से कहते हैं- हे पुत्रि सीते तुम राम पर संशय मत करना।राम तुम्हारे हितैषी हैं।तीनों लोकों में तुम्हारी पवित्रता सिद्ध करने हेतु ही यह लीला की है।
रामेणेदं विशुद्ध्यर्थं कृतं वै त्वद्धितैषिणा।।
119/35 बा.यु.का.
सांसारिक स्वभाव में लीन संशयग्रस्त प्राणियों के विश्वासार्थ ही यह अग्निपरीक्षा का अभिनय किया गया।अन्यथा आप ही सोचें शिवशिवा ब्रह्मेन्द्राग्निवायु आदि देवगणों के सम्मुख, राक्षसेश विभीषण,वानरेश सुग्रीव जैसे राजाओं की साक्षिता होने पर भी यह संसारी व्यक्ति सीताचरित्र पर प्रश्नचिह्न लगा जाते हैं। कल्पना करो कि यह परीक्षा न होती तो न जाने कितने लोग क्या क्या न कहते सीता जी के विषय में।
और अंत में यदि श्रीराम का यह व्यवहार निंदायोग्य है,अस्वीकार्य है तो फिर प्रत्येक स्वर्णकार भी निंदित हो जो स्वर्ण को पीडा देकर गलाकर जलाकर नवाकार देता है।
चांद्रायण कृच्छ्र तप्तकृच्छ्र आदि व्रतोपदेष्टा गुरु शास्त्र संत सभी गलत होंगे जो कठोर प्रायश्चित्त का उपदेश करते हैं।
प्रत्येक वह माँ जो रुदनरत शिशु को बलात स्नानादि कराकर सजाती है।
श्रीराम चाहते हैं कि मेरी सीता पर कोई उंगली न उठे।इसीलिए सावधानी वरत रहे हैं।
Tuesday, 31 March 2020
शबरी शूद्रा नहीं थी
शबरी जी कदापि शूद्रा न थीं ~
(१) आक्षेप : परिचारिणी थीं, अतः शूद्रा हैं -
समाधान : परिचारिणी शब्द के आधार पर शूद्रा समझे जाने पर राम के अर्घ्य पाद्य गन्धानुलेपन विशेषणरूप आतिथ्य सत्कार तथा मतंगमुनि-आश्रमवास आदि से विरोध होगा ।
छान्दोग्योपनिषद् की जबाला भी परिचारिणी थीं (चरन्ती परिचारिणी यौवने) , किन्तु त्रिकालदर्शी महर्षि गौतम उनके पुत्र की परीक्षा करके ब्राह्मण ही बताते हैं और समिधं सोम्याssहर कहकर उनका उपनयन संस्कार भी करते हैं । जाबाल मुनि के लिये ब्रह्मवैवर्तपुराण में वेदाङ्गवेदज्ञः विशेषण है, ये विशेषण उनको शूद्र समझने वालों का भी भ्रान्तिहरण कर रहा है ।
परिचर्या का अभिप्राय उपासना (सेवा) है । सेवा शूद्र का स्वाभाविक कर्म अवश्य है , किन्तु शूद्र ही सेवाचित्त वाला हो सकता है , ये नियम नहीं है । लोक में ब्राह्मणी भी अपने पति की , अतिथि की , विदुषी ब्राह्मणियों की , सन्तों की , ईश्वर की सेवा करती है ।
(२) आक्षेप : राम के चरण पकड़तीं हैं ,अतः शूद्रा हैं -
समाधान : लोकाचार की दृष्टि से ब्राह्मणी होकर क्षत्रिय अतिथि के चरण पकड़ने का आचार ब्राह्मणी न होने का भले ही पोषण करे , किन्तु ब्राह्मणी नहीं थीं, तो शूद्रा ही थीं , ऐसा भी एकान्त निर्णय नहीं करता , क्योंकि राम शुद्ध क्षत्रिय जाति के थे , ऐसी स्थिति में अनुलोम संकर क्षत्रिय , वैश्य आदि जातियों को भी चरण पकड़ने का अवकाश प्राप्त है । हीनजातिसमुद्भवा, अधमजन्मा विशेषणों का समाधान पूर्व वक्तव्य में हम कर आये हैं ।
अकथित अंश से असम्भव होने की सिद्धि नहीं हुआ करती , फलतः राम द्वारा नमन करने का प्रसंग प्राप्त न होना , उनके द्वारा नमन न करने की भी सिद्धि नहीं करता ।
शबरी जी के ब्राह्मणी पक्ष में - // दृष्ट्वा तु तदा सिद्धा समुत्थाय कृतांजलिः । पादौ जग्राह..// यहॉ चरण पकड़ने वाली शबरी के लिये #सिद्धा विशेषण उनके ब्राह्मणीपक्ष की रक्षा कर रहा है । क्योंकि लोक में सिद्ध प्राणियों में आचारमर्यादा का अतिरेक दीखने पर भी उनमें दोषप्राप्ति नहीं होती । (समरथ को नहिं दोष गोंसाई। रवि पावक सुरसरि की नाई।।) । वे मतंग मुनि की शिष्या रहीं , उनके आश्रम में वास करतीं थीं , वहीं उन्होंने तपस्या साधना की ( जैसा कि राम के तपस्या , आहारादि विषयक प्रश्नों से स्पष्ट है ) अतः शूद्रा नहीं कहा जा सकता ।
।। श्रीरामस्य जयोsस्तु ।।
ज़ह्ळ को जालंधर कहने वालों का खंडन
देअ श्री श्री श्री खुडीज़ह्ळ जी को जालन्धर कहने वालों का भ्रमभंग - भ्रम - प्रभु श्री ज़ह्ळ जी के मुख के सिर में चंद्रमा है तो इन्हें शिव अं...
-
जन्मना जायते शूद्रः संस्काराद् द्विज उच्यते। वेदपाठाद् भवेद् विप्रः ब्रह्म जानाति ब्राह्मणः।। इसके आधार पर यदि आप इसका ये अर्थ करतें हैं क...
-
रामपाल तो सामने आने से रहा , तथापि रामपाल के कथित चेलों के माध्यमेन इसे सामने ( लाइन हाजिर ) लाकर इसकी पोल खोली जा रही है , य...
-
#व्रतधर्माः->#किसीभी_व्रतमें_पालनीय_सामान्य_नीयमों~~> {गृहित्वौदुम्बरं(=ताम्रमयम् - विश्वकोशे) पात्रं वारिपूर्णमनदङ्गमुखः || उपवासं त...