Saturday, 6 April 2019

परमात्मा का शासन ही श्रेष्ठ है

जो ज्ञान महंगी महंगी पुस्तकें खरीदकर  ,  तरह तरह के   गुरुओंके पास जाकर  नहीं मिल पाता ,  परमात्मा की कृपा  होने पर  वो  ही  सरलता से  मुखपत्रिकापटल (फेसबुक) , चलचित्र प्रसार स्थलों (  यू ट्यूब )  जैसे अप्रत्याशित    माध्यमों से   भी  घर बैठे बैठे  ही मिल  सकता है ।

लोग तो परमात्मा के ज्ञान को  भी   व्यापार बना के  बैठ गये हैं । पर   परमात्मा  अपने  ज्ञान को   बिना स्वार्थ के  स्वयं  विविध माध्यमों से  निमित्त बनाकर   बरसा देते हैं ।  

सरकारी शासन में तो   उनके राज्य में पानी  भरने  का भी शुल्क ( बिल ) भरना पड़ता है ,   पर  परमात्मा का  शासन  सरकारी शासन से  बिल्कुल अलग है ,  वे जब वर्षा करते हैं    तो घरों  में  शुल्क (बिल) नहीं आता । 

इन सब  घटनाओं को गहराईपूर्वक देखने पर ये स्पष्ट हो जाता है कि परमात्मा ही वस्तुतः  अपने शुद्ध ज्ञान के,   अपने धर्म के संरक्षक व संवर्धक हैं ,   वरना  मनुष्य तो,   उनके पास जो धरोहर  बची  होती   है  , उसे भी  बिगाड़  के   नाश करते देर नहीं करते ।

नवसंवत्सर की शुभकामनाएं ।।

।। जय श्री राम ।।

Friday, 5 April 2019

पापयोनि पर भ्रान्ति निवारण

पापयोनित्व,  पूज्यत्व   और   पाण्डित्य  -

  पापयोनयः स्त्रियः ,  यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, वाचक्नवी गार्गी     ये तीन    शास्त्रीय विषय ऐसे हैं, जिनके ठीक -ठीक  अभिप्रायों व पारस्परिक  अन्तर्सम्बन्धों को न जानने  वाले स्वार्थी तत्त्वों द्वारा समाज में पर्याप्त भ्रम फैला दिये गये हैं ।   पापयोनि  है तो  पूज्या  कैसे ?  पण्डिता कैसे ?   ये सब   भ्रामक   स्थिति  आजकल  यत्र तत्र  सर्वत्र  देखने को मिल रही है ।

पापयोनिः  ये संस्कृत का शब्द है , इसका मतलब होता है  जिसके जन्म में   पूर्वजन्मकृत  पाप  की प्रधानता हो ।   ये जानना    आवश्यक है कि   इस संसार में  जन्म लेना कर्माधारित  प्रक्रिया होती है ।  जन्म अकारण या अकस्मात् नहीं होता , कर्म का परिणामविशेष ही जन्म होता है । इसे ही दूसरे शब्दों में कहें तो     प्राणियों का जन्म उनके पूर्वकृत पुण्य पापों के फलस्वरूप ही  होता है ।

इसलिये पापयोनि शब्द  पर     स्वयं को  अनावश्यक भ्रान्तियों में डालने के स्थान पर,  विषय की  वस्तुस्थिति को समझने का प्रयास करना चाहिये ।

सम्मान और  जन्म -------

यत्र नार्यस्तु ०   ये  विवाहिता स्त्री के प्रसंग में मनु ने लिखा है ,  यहॉ पर केवल इतना भाव है कि  नववधू का    ससुराल में सम्मान करना चाहिये , तभी  उन  कुलों की   सम्यक् उन्नति होती है ।  स्त्रियॉ पापयोनि   नहीं होती,  ऐसा नहीं बोला गया  है वहॉ  ।   ये  वही मनु हैं,  जो  प्राणियों के जन्मादि विषयक   सृष्टिप्रक्रिया के  गुणविभाग और कर्मविभाग को  ही जानकर   निरिन्द्रिया ह्यमन्त्राश्च स्त्रीभ्योऽनृतं इति स्थितिः  के रहस्य  भी  बताये हैं ।       आर्ष-शास्त्रोक्त कोई भी  कथन  निरर्थक , निष्प्रयोजन  या अकर्तव्य नहीं हुआ करता ।  इसीलिये      अपरिपक्व  मति वाले  लोकसामान्य    की  व्यर्थ  भावनाऐं भड़का कर शास्त्रीय सिद्धान्त  को  विकृत करने की   विनाशकारी और उत्पातकारी   दुष्प्रवृत्ति से बचना चाहिये ।  पापयोनित्व तो  जीव के  प्रारब्ध को लेकर  होता  है ,   और  पूजन -सम्मान ये  आचार का विषय है  ।

   अतः  किसी प्राणी का पापयोनि  होना और सम्मानित होना दो पृथक् पृथक् विषय हैं ।    हमारी आपकी  माताऐं , बहनें  ये सभी    हमारी आपकी माताबहनें बाद में हैं,   कर्मचक्र  में पड़े हुए जीव  पहले हैं ।  इसे समझना होगा ।  हम आप भी  पहले  कर्मचक्र में पड़े हुए जीव हैं , तब किसी के  पुत्र या भाई आदि  हैं ।  अतः पापयोनि होने को  लोहे की  हथकड़ी समझिये और पुण्ययोनि  होने को सोने की हथकड़ी । आखिर  हथकड़ी तो दोनों ही   हथकड़ी  ही  हैं ,  हथकड़ी  पहनने  से सम्मान नहीं होता , वरन्  कभी हमें   हथकड़ी   ना पहननी  पड़े, ये है सम्मान की बात ।  इसलिये किसी  के अधिकार हनन की बात यहॉ नहीं है , वरन्   सृष्टि नियमों को समझने की आवश्यकता है ।

जब पापयोनि कौवों को तक  हम लोग    सम्मान करके  श्रद्धापूर्वक  भोजन   प्रदान करते हैं ,   उनके खाने पर पितरों की  संन्तुष्टि   समझते हैं ,   तो     पापयोनि स्त्री को  सम्मान कर दिये तो क्या  समस्या हो गयी ? 

कागभुशुण्डी जी कौए की योनि में  लोमश  ऋषि के शाप से पैदा हुए ,  पर पंडित थे , ऐसे ही गार्गी आदि के ब्रह्मवादिनी होने के सन्दर्भ  में भी समझना चाहिए , कि वे पापयोनि प्रधान जाति में पैदा होकर भी पण्डिता हुईं , उसी  बृहदारण्यकोपनिषद् में तो   गर्भाधान संस्कार की  पूरी एक विधि ही बताई गयी  है कि  आपकी पुत्री पण्डिता कैसे बन सकती है । इसलिये  किसी स्त्री का विदुषी होना  तो  उसके पूर्व संस्कारविशेष    का परिणामभर है ,   इससे प्रकृति का  वह कर्मचक्र का  नियम नहीं बदलता, जिसके फलस्वरूप   ब्राह्मणादि  पुण्ययोनियॉ अथवा स्त्री आदि  पापयोनियॉ   जीवों को प्राप्त होती हैं ।

।। जय श्री राम ।।

पापयोनि पर भ्रान्ति निवारण

पापयोनित्व,  पूज्यत्व   और   पाण्डित्य  -

  पापयोनयः स्त्रियः ,  यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, वाचक्नवी गार्गी     ये तीन    शास्त्रीय विषय ऐसे हैं, जिनके ठीक -ठीक  अभिप्रायों व पारस्परिक  अन्तर्सम्बन्धों को न जानने  वाले स्वार्थी तत्त्वों द्वारा समाज में पर्याप्त भ्रम फैला दिये गये हैं ।   पापयोनि  है तो  पूज्या  कैसे ?  पण्डिता कैसे ?   ये सब   भ्रामक   स्थिति  आजकल  यत्र तत्र  सर्वत्र  देखने को मिल रही है ।

पापयोनिः  ये संस्कृत का शब्द है , इसका मतलब होता है  जिसके जन्म में   पूर्वजन्मकृत  पाप  की प्रधानता हो ।   ये जानना    आवश्यक है कि   इस संसार में  जन्म लेना कर्माधारित  प्रक्रिया होती है ।  जन्म अकारण या अकस्मात् नहीं होता , कर्म का परिणामविशेष ही जन्म होता है । इसे ही दूसरे शब्दों में कहें तो     प्राणियों का जन्म उनके पूर्वकृत पुण्य पापों के फलस्वरूप ही  होता है ।

इसलिये पापयोनि शब्द  पर     स्वयं को  अनावश्यक भ्रान्तियों में डालने के स्थान पर,  विषय की  वस्तुस्थिति को समझने का प्रयास करना चाहिये ।

सम्मान और  जन्म -------

यत्र नार्यस्तु ०   ये  विवाहिता स्त्री के प्रसंग में मनु ने लिखा है ,  यहॉ पर केवल इतना भाव है कि  नववधू का    ससुराल में सम्मान करना चाहिये , तभी  उन  कुलों की   सम्यक् उन्नति होती है ।  स्त्रियॉ पापयोनि   नहीं होती,  ऐसा नहीं बोला गया  है वहॉ  ।   ये  वही मनु हैं,  जो  प्राणियों के जन्मादि विषयक   सृष्टिप्रक्रिया के  गुणविभाग और कर्मविभाग को  ही जानकर   निरिन्द्रिया ह्यमन्त्राश्च स्त्रीभ्योऽनृतं इति स्थितिः  के रहस्य  भी  बताये हैं ।       आर्ष-शास्त्रोक्त कोई भी  कथन  निरर्थक , निष्प्रयोजन  या अकर्तव्य नहीं हुआ करता ।  इसीलिये      अपरिपक्व  मति वाले  लोकसामान्य    की  व्यर्थ  भावनाऐं भड़का कर शास्त्रीय सिद्धान्त  को  विकृत करने की   विनाशकारी और उत्पातकारी   दुष्प्रवृत्ति से बचना चाहिये ।  पापयोनित्व तो  जीव के  प्रारब्ध को लेकर  होता  है ,   और  पूजन -सम्मान ये  आचार का विषय है  ।

   अतः  किसी प्राणी का पापयोनि  होना और सम्मानित होना दो पृथक् पृथक् विषय हैं ।    हमारी आपकी  माताऐं , बहनें  ये सभी    हमारी आपकी माताबहनें बाद में हैं,   कर्मचक्र  में पड़े हुए जीव  पहले हैं ।  इसे समझना होगा ।  हम आप भी  पहले  कर्मचक्र में पड़े हुए जीव हैं , तब किसी के  पुत्र या भाई आदि  हैं ।  अतः पापयोनि होने को  लोहे की  हथकड़ी समझिये और पुण्ययोनि  होने को सोने की हथकड़ी । आखिर  हथकड़ी तो दोनों ही   हथकड़ी  ही  हैं ,  हथकड़ी  पहनने  से सम्मान नहीं होता , वरन्  कभी हमें   हथकड़ी   ना पहननी  पड़े, ये है सम्मान की बात ।  इसलिये किसी  के अधिकार हनन की बात यहॉ नहीं है , वरन्   सृष्टि नियमों को समझने की आवश्यकता है ।

जब पापयोनि कौवों को तक  हम लोग    सम्मान करके  श्रद्धापूर्वक  भोजन   प्रदान करते हैं ,   उनके खाने पर पितरों की  संन्तुष्टि   समझते हैं ,   तो     पापयोनि स्त्री को  सम्मान कर दिये तो क्या  समस्या हो गयी ? 

कागभुशुण्डी जी कौए की योनि में  लोमश  ऋषि के शाप से पैदा हुए ,  पर पंडित थे , ऐसे ही गार्गी आदि के ब्रह्मवादिनी होने के सन्दर्भ  में भी समझना चाहिए , कि वे पापयोनि प्रधान जाति में पैदा होकर भी पण्डिता हुईं , उसी  बृहदारण्यकोपनिषद् में तो   गर्भाधान संस्कार की  पूरी एक विधि ही बताई गयी  है कि  आपकी पुत्री पण्डिता कैसे बन सकती है । इसलिये  किसी स्त्री का विदुषी होना  तो  उसके पूर्व संस्कारविशेष    का परिणामभर है ,   इससे प्रकृति का  वह कर्मचक्र का  नियम नहीं बदलता, जिसके फलस्वरूप   ब्राह्मणादि  पुण्ययोनियॉ अथवा स्त्री आदि  पापयोनियॉ   जीवों को प्राप्त होती हैं ।

।। जय श्री राम ।।

Thursday, 4 April 2019

स्त्री को पापयोनि कहना उचित है?

उड़िया बाबा के नाम पर   निजी   दुराग्रह फैलाने वालों का भ्रमोच्छेदन -

कुछ लोगों द्वारा उड़िया बाबा के श्रोत्रिय होने पर  हमारा   प्रश्नचिन्ह उठाना    बहुत खटक रहा है , पर श्री आद्य शंकराचार्य भगवान् पर जो आक्षेप लगाया गया है, उस पर  उनके मुख में द ही जम गयी है।  ये वे लोग हैं,  जिनको  अपने  दुराग्रह  से इतनी   चाहत है कि स्वयं वेदवेद्य  भगवान् शंकर पर आक्षेप से  भी  कोई लेना देना नहीं ,   

उनके लिये  दर्पण -

  जब उड़िया बाबा ने बता डाला  श्री आद्य शंकराचार्य को ही पक्षपाती -

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श्री आद्य शंकराचार्य का मत  पक्षपातपूर्ण जान पड़ता है ।
- उड़िया बाबा । गीता तत्त्वालोक , पृष्ठ ३०५
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श्री आद्य शंकराचार्य के मत का खंडन करने के लिये  उक्त बाबा महाशय ने  इतना खोखला तर्क दिया  कि   पढ़कर ही हंसी आती है ,  

#कुतर्क -  स्त्री पापयोनि है तो उसके हाथ का भोजन क्यों करते हैं सभी ? जबकि स्त्री के बिना कोई यज्ञ सम्पन्न नहीं होता ।

#भंजन -    महिषादि पशुओं का दुग्धपान करने से क्या  उनका निम्नयोनित्व समाप्त हो जाता है ?   किन्तु उनके दुग्धादि  को ग्रहण करने की भी एक व्यवस्था है  कि कब ग्राह्य है,  कब नहीं ।     यज्ञ की ही बात करें तो  द्रव्य यज्ञ  तो स्थावर योनियों को प्राप्त   वृक्षादि के सहयोग के बिना भी  नहीं  पूर्ण हो पाता , तो क्या उनको  ब्राह्मणादि  के तुल्य पुण्ययोनि मान लेना चाहिये ?  तब तो   सांख्यादि शास्त्रों का प्रसिद्ध तमः प्रधान , सत्त्वप्रधान , रजःप्रधान प्राणियों का शास्त्रोक्त गुण-कर्मविभाग ही  विध्वस्त हो जायेगा । अनृत में स्त्री की स्थिति बताने वाले मन्वादि स्मृतियों का क्या कोई महत्त्व नहीं ?  विचार करना चाहिये ।

श्री गोस्वामी तुलसीदासजी , श्री राम चरितमानस के अरण्यकाण्ड में  महान् भगवद्भक्त श्री शबरी जी के मुख से    अधम ते अधम अधम अति नारी की जब अनुश्रुति कहलवाते  हैं , तो क्या  वहॉ पर वे शबरी जी  झूठ बोलती हैं , जिनके दर्शन के लिये स्वयं   वेदवेद्य  भगवान् श्री राम पधारते हैं ?

श्री भगवान् आद्य शंकराचार्य ने स्पष्ट रूप से कहा है कि  पापा योनिः येषां ते  पापयोनयः    पापजन्मानः  , अर्थात्  जिन प्राणियों के जन्म का कारण पाप हैं , वे पापयोनयः कहलाते हैं । 

जब अपने जन्म में  पाप की प्रधानता  थी ,  तभी तो   पुरुषजन्मराहित्यता आयी ,   अन्यथा क्यों आती ?  निवृत्तिमूलक  ज्ञानमार्ग और  प्रवृत्तिमूलक  कर्ममार्ग - ये दो ही सनातन मार्ग हैं ,  जिनका गीताशास्त्र में उपदेश हुआ है , और  इन दोनों मार्गों में  क्रमशः ब्राह्मण और क्षत्रिय - ये दो पुण्ययोनियॉ ही अधिकृत हैं ।

देवराज इन्द्र ने ब्रह्महत्या का एक भाग जो स्त्रियों में बांटा था , उसी के फलस्वरूप  रजस्वला होती हैं, ( शश्वत्कामवरेणांहस्तुरीयं जगृहुः स्त्रियः । रजोरूपेण तास्वंहो मासि मासि प्रदृश्यते ।।)

और उड़िया बाबा महाशय !  कोई भी शिष्ट व्यक्ति   रजस्वला स्त्री के हाथ का  भोजन तो करता नहीं ,  ना ही यज्ञ  सम्पन्न करते हैं । 

ये सब विषय तैत्तिरीय संहिता  से लेकर बृहदारण्यरोपनिषद् पर्यन्त न केवल  वेदों में प्रसिद्ध है,   वरन् आपस्तम्ब, हिरण्यकेशी , भारद्वाज, बौधायन , हारीत, यम, पाराशर , अंगिरा , याज्ञवल्क्यादि समस्त ऋषि-मुनियों ने नाना प्रकार से प्रतिपादित किया है ।  इतना ही क्यों, आप इतिहास पुराणों में ही यह प्रसंग देख लीजिये , वह चाहे महाभारत हो, या फिर  श्रीमद्भागवत , देवी, स्कन्द,  आदि पुराण हों,   सर्वत्र एक ही स्वर आपको सुनाई देगा ।

समुद्रेषु पृथिव्यां च वनस्पतिषु स्त्रीषु च ।
विभज्य ब्रह्महत्यां च तान् वरैरप्ययोजयत् ।।
(महा० उद्यो०, सेनो० ९।४४))

विभज्य ब्रह्महत्यां तु वृक्षेषु च नदीषु च ।
पर्वतेषु पृथिव्यां च स्त्रीषु चैव युधिष्ठिर ।।
(महा० उद्यो०, सेनो०१३।१९)

स्त्रीभूजलद्रुमैरेनो विश्वरूपवधोद्भवम् ।
विभक्तमनुगृह्णद्भिर्वृत्रहत्यां क्व मार्ज्यहम् ।।
(श्रीमद्भा०६।१३।०५)

  उड़िया बाबा तो प्रणव संकीर्तन भी करवा लेते थे , जिस कारण करपात्री जी महाराज ने तक आपके पास आना बन्द कर दिया था ( प्रमाण - श्री अखण्डानन्द सरस्वती रचित पावन प्रसंग ,  सत्साहित्य प्रकाशन ट्रस्ट से प्रकाशित, पृष्ठ ४१), अतः यदि कदाचित् वे  रजस्वला स्त्री के हाथ का भोजन भी उचित ठहरा दें , तो इस पर भी  यहॉ फेसबुक के   कुछ तथाकथित  भक्तों को उनसे वैमत्य न हो तो भी आश्चर्य नही ।  

समदर्शी महायोगी भगवान् श्री आद्य शंकराचार्य को पक्षपाती बताने वाले  उड़िया बाबा  कितने उद्भट श्रोत्रिय रहे, उनके नाम पर दुराग्रह फैलाने वालों को   पता चल ही रहा होगा ।

।। जय श्री राम ।।

Wednesday, 27 March 2019

वैदिकपशुबलि

वैदिक पशुबलि समर्थन -

वैदिक पशुबलि का सबसे मूल सिद्धान्त ये है कि पशु को तिलमात्र भी किसी भी प्रकार के किसी  कष्ट का कोई अनुभव ही ना हो ,  वह स्वयं ये कहे कि मुझे  यह पशु  शरीर नहीं चाहिये , मुझे इस  अधम देह से विमुक्त कीजिये ! ,    जिस पशु का पशु शरीर बलि हो , उसे दिव्य देव शरीर प्राप्त हो !

ये सब  असम्भव घटनाऐं   मन्त्रों  व यज्ञविज्ञान की अचिन्त्य सामर्थ्य से  घटित होती हैं , जिसका कि वेदादि  ने  विधान किया है ।   जैसे अलौकिकवेदमन्त्रों के बल से     विषबाधाहरण होता है  तद्वत् । शिखाहीन ब्राह्मणों के यजमानों के सिर के उपर से हमारे ये वचन जायें तो कोई आश्चर्य नहीं ।

इस्लाम पन्थ में कुरबानी जो होती है, उसकी वैदिक बलि से तुलना की कल्पना भी नहीं हो सकती ।  दोनों में धरती आकाश का अन्तर है ।   हम वैदिक  लोग  अपने  परोपकारमय उपर्युक्त मूल सिद्धान्तों  का जहॉ पर व्यवहार में  हनन होता  देखते हैं , वहॉ पर स्वयं  उसका विरोध कर  पुनः अहिंसात्मक  वैकल्पिक विधान करते हैं ( श्रीफल आदि के रूप में)  ,  परन्तु इस्लामिक पन्थ में ना तो ऐसा कोई परोपकारमय विधान है, ना ही वैकल्पिक व्यवस्था , वहॉ केवल  पाप है ।

यही कारण है कि हमारी वैदिक  पशुबलि की वैदिक परम्परा में  विकृति आने पर सभी विद्वान्,  अधिकृत,  वैदिक धर्माचार्य  एक स्वर से  स्वयं वहॉ पर  उसका विरोध करते हैं , क्योंकि  वैदिक धर्म  किसी को कष्ट देने, या किसी प्राणी की  हिंसा करने का  समर्थक नहीं ,  अपितु मा हिंस्यात् सर्वभूतानि , किसी भी प्राणी की हिंसा मत करो-इस अहिंसा-सिद्धान्त पर आधारित है,  किन्तु कथित मौलानाओं आदि ने  कभी  समाजशोधक  फतवे नहीं निकाले क्योंकि वहॉ पर ऐसी  कोई  अन्तर्निहित अवधारणा ही नहीं !

सनातन परम्परा के शुद्ध संवाहक  सुदुर पश्चिमांचल   नेपाल में आज भी ऐसे  परम्पराचूड़ामणि  दैवीय स्थल हैं , जहॉ पर यज्ञीय पशु स्वयं स्वबलि का अनुमोदन करता हुआ  यज्ञस्थल पर आता है , और बिना किसी भी  कष्टादि के बलि के माध्यम से  अपना निकृष्ट  देह त्याग करता है ।

उत्तराखण्ड  की नन्दा देवी राजजात यात्रा , जो कि  विश्व की सबसे लम्बी पैदलयात्रा है, उसमें चौसिंग्या खाड़ू के रूप में भी इस सिद्धान्त का कुछ अंशों में दर्शन कर सकते हैं ।

http://devbhoomi.xyz/?p=430

आजकल बलि नहीं अपितु उसके नाम पर   समाज में पशुहत्या ही अधिक होती है ।  और मूर्ख लोग धूर्तों की इस  लौकिक पशुहत्या को देखकर वेद और  तत्प्रतिपादित    वैदिक पशुबलि के सिद्धान्त  को ही  स्वाक्षेपों से  दूषित  करने लगते हैं ! 

बलि परोपकार है , हत्या पाप । वेद परोपकार का उपदेशक है , पाप का नहीं ।   अष्टादशपुराणेषु व्यासस्य वचनद्वयम् । परोपकाराय पुण्याय पापाय परपीड़नम् ।।  हमने लोकमंगल की भावना से इतने सरल रूप में  वैदिक  धर्म का मौलिक स्वरूप  समझा दिया है पर  कतिपय   श्वानपुच्छ  कलिचेलों को  अब भी  यह  सन्देश  समझ नहीं आयेगा ।

।। जय श्री राम  ।।

Tuesday, 26 March 2019

विवाह संस्कार का महत्व

विवाह संस्कार का महत्त्व -
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हमारे सनातन वैदिक धर्म की विहित  विवाह संस्कार. की प्राचीन     परम्परा  में जो   आज विकृति आयी है, उस कारण प्रायः-  प्रायः  सारे युवा   आजकल के  परस्त्री -लम्पट हो गये हैं ।

वैदिक परम्परा में बहुत शीघ्र   ही यह संस्कार  सम्पन्न कर लिया जाता था ।  क्यों?    परिणाम स्वयं चीख चीख कर कारण बता रहे हैं !

सही समय पर  शास्त्रीय संस्कारों  का कितना गम्भीर महत्त्व है, ये स्पष्ट है ।

ऋषि-मुनियों से ज्यादा समझदार समझने का   कुछ कलिग्रसित   अज्ञानियों का अभिमान सारे  मानव -समाज को ले डूबा ।

कहते हैं , // अपना जीवनसाथी चुनने का  अधिकार हमको स्वयं होना चाहिये, जिन्दगी हमने बितानी है , मॉ बाप को नहीं ///

अरे   अज्ञानी बालक !    जीवनसाथी  जिन्दगी बिताने के लिये नहीं चुनते , अपितु जीवन और मृत्यु के चक्रव्यूह  से पार उतर कर  आत्मकल्याण पाने के लिये  चुनते हैं !

और तेरे शरीर पर तो तुझसे पहले तेरे माता पिता का अधिकार है !  क्योंकि तू उनका ऋणी है !  तुझे ऐसा क्यों लगता है कि तेरे माता पिता का निर्णय तेरा निर्णय नहीं ?  यही तो है  तेरे सिर पर चढा हुआ  कलियुग !   तू तो  उनका ही अधिकार   कुचल गया!

।। जय श्री राम ।।

Monday, 25 March 2019

जन्म से ही ब्राह्मण क्यों होता है ?

#समझो और #समझाओ -

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जन्म से ही क्यों होते हैं ब्राह्मण,  कर्म से क्यों नहीं हो  सकते ?

#उत्तर - जो जन्म से ब्राह्मण होते हैं , वे कर्म से ही ब्राह्मण हुए होते हैं । किन्तु कर्म का सिद्धान्त  न जानने से तथाकथित बुद्धिजीवी    लोग भ्रमित हो गये हैं ।

देखो ऐसे समझो -

हम जो भी पाप या पुण्य कर्म करते हैं , वे कर्म एक बीज की भॉति होता है ।

वो बीज  समय के गर्भ में संचित हो जाता है और फिर   हमें ही फल बनकर मिलता है।

ये है प्रकृति का नियम ।
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जो कर्म हम अभी वर्तमान् काल में  कर रहे हैं , उसे कहते हैं क्रियमाण कर्म ।   

और कर्म के फल को ही कहते हैं प्रारब्ध या भाग्य ।

क्रियमाण ---->( संचित )----->प्रारब्ध(फल) /भाग्य ।

बीज ------------------------------------> फल

जो कर्म आज हम कर रहे हैं, उसका फल आने वाले  कल में हमें मिलेगा ।  और वो फल  ईश्वर ही हमें देता है ।

कर्म का फल तीन रूप में मिलता है -

जाति , आयु और भोग ।।

इसीलिये   ब्राह्मण  जन्म से ही होते हैं ।

चार वर्ण भगवान् ने बनाये हैं - अर्थात्  जीव को  जाति रूपी  कर्मफल भगवान् ने ही दिये हैं ।

।। जय श्री राम  ।।

ज़ह्ळ को जालंधर कहने वालों का खंडन

देअ श्री श्री श्री खुडीज़ह्ळ जी को जालन्धर कहने वालों का भ्रमभंग -  भ्रम - प्रभु श्री ज़ह्ळ जी के मुख के सिर में चंद्रमा है तो इन्हें शिव अं...