Sunday, 11 March 2018

मूर्तिपूजा का सिद्धान्त

वेदान्त का सिद्धान्तानुसार ईश्वरचैतन्य जगत् का अभिन्न निमित्तोपादानकारण हैं, अतः सर्वव्यापी हैं । विचार करनेपर घटादि प्रत्येक जड़ वस्तु स्वयंप्रकाश निर्विशेष चैतन्यस्वरुप सिद्ध होता हैं । स्वयंज्योतिस्वभाव आनन्दघन असंग उदासीन आत्मचैतन्य ही अज्ञान के सम्बन्ध से द्वैताकार प्रतीत हो रहा हैं - यह  #वेदान्तसिद्धान्तमुक्तावलीकार श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्य प्रकाशानन्द स्वामी ने तर्क द्वारा सिद्ध करते हैं ।

' अचेतन मूर्ति की पूजा ' - कहनेवाले लोग क्या करते हैं ? सर्वव्यापी ईश्वरचैतन्य में अज्ञान से मृन्मयत्वादि धर्मों का आरोप ! वास्तव में तो ' मूर्तिपूजा ' कभी होती ही नहीं, केवल चिन्मय भगवान् की पूजा होती हैं सर्वत्र । अग्नि सूक्ष्मतत्त्व के रूप में सर्वत्र वर्तमान होते हुए भी काष्ठादि में उनकी दाह्यशक्ति का विशेष प्राकट्य हैं, वैसे ही ईश्वर सर्वत्र समान रूप से व्याप्त होकर भी मूर्ति आदि में उनकी शक्ति की विशेष अभिव्यक्ति होती हैं ।

कौन बनता है भूत प्रेत?

जिसका कोई वर्तमान न हो, केवल अतीत ही हो वही भूत कहलाता है। अतीत में अटका आत्मा भूत बन जाता है। जीवन न अतीत है और न भविष्य वह सदा वर्तमान है। जो वर्तमान में रहता है वह मुक्ति की ओर कदम बढ़ाता है।

आत्मा के तीन स्वरुप माने गए हैं। जीवात्मा, प्रेतात्मा और सूक्ष्मात्मा। जो भौतिक शरीर में वास करती है उसे जीवात्मा कहते हैं। जब इस जीवात्मा का वासना और कामनामय शरीर में निवास होता है तब उसे प्रेतात्मा कहते हैं। यह आत्मा जब सूक्ष्मतम शरीर में प्रवेश करता है, उस उसे सूक्ष्मात्मा कहते हैं।

भूत-प्रेतों की गति एवं शक्ति अपार होती है। इनकी विभिन्न जातियां होती हैं और उन्हें भूत, प्रेत, राक्षस, पिशाच, यम, शाकिनी, डाकिनी, चुड़ैल, गंधर्व आदि कहा जाता है।

भूतों के प्रकार
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हिन्दू धर्म में गति और कर्म अनुसार मरने वाले लोगों का विभाजन किया है- भूत, प्रेत, पिशाच, कूष्मांडा, ब्रह्मराक्षस, वेताल और क्षेत्रपाल। उक्त सभी के उप भाग भी होते हैं। आयुर्वेद के अनुसार 18 प्रकार के प्रेत होते हैं। भूत सबसे शुरुआती पद है या कहें कि जब कोई आम व्यक्ति मरता है तो सर्वप्रथम भूत ही बनता है।

इसी तरह जब कोई स्त्री मरती है तो उसे अलग नामों से जाना जाता है। माना गया है कि प्रसुता, स्त्री या नवयुवती मरती है तो चुड़ैल बन जाती है और जब कोई कुंवारी कन्या मरती है तो उसे देवी कहते हैं। जो स्त्री बुरे कर्मों वाली है उसे डायन या डाकिनी करते हैं। इन सभी की उत्पति अपने पापों, व्याभिचार से, अकाल मृत्यु से या श्राद्ध न होने से होती है।

84 लाख योनियां
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पशुयोनि, पक्षीयोनि, मनुष्य योनि में जीवन यापन करने वाली आत्माएं मरने के बाद अदृश्य भूत-प्रेत योनि में चले जाते हैं। आत्मा के प्रत्येक जन्म द्वारा प्राप्त जीव रूप को योनि कहते हैं। ऐसी 84 लाख योनियां है, जिसमें कीट-पतंगे, पशु-पक्षी, वृक्ष और मानव आदि सभी शामिल हैं।

प्रेतयोनि में जाने वाले लोग अदृश्य और बलवान हो जाते हैं। लेकिन सभी मरने वाले इसी योनि में नहीं जाते और सभी मरने वाले अदृश्य तो होते हैं लेकिन बलवान नहीं होते। यह आत्मा के कर्म और गति पर निर्भर करता है। बहुत से भूत या प्रेत योनि में न जाकर पुन: गर्भधारण कर मानव बन जाते हैं।

पितृ पक्ष में हिन्दू अपने पितरों का तर्पण करते हैं। इससे सिद्ध होता है कि पितरों का अस्तित्व आत्मा अथवा भूत-प्रेत के रूप में होता है। गरुड़ पुराण में भूत-प्रेतों के विषय में विस्तृत वर्णन मिलता है। श्रीमद्‍भागवत पुराण में भी धुंधकारी के प्रेत बन जाने का वर्णन आता है।

अतृप्त आत्माएं बनती है भूत
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जो व्यक्ति भूखा, प्यासा, संभोगसुख से विरक्त, राग, क्रोध, द्वेष, लोभ, वासना आदि इच्छाएं और भावनाएं लेकर मरा है अवश्य ही वह भूत बनकर भटकता है। और जो व्यक्ति दुर्घटना, हत्या, आत्महत्या आदि से मरा है वह भी भू‍त बनकर भटकता है। ऐसे व्यक्तियों की आत्मा को तृप्त करने के लिए श्राद्ध और तर्पण किया जाता है। जो लोग अपने स्वजनों और पितरों का श्राद्ध और तर्पण नहीं करते वे उन अतृप्त आत्माओं द्वारा परेशान होते हैं।

यम नाम की वायु
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वेद अनुसार मृत्युकाल में 'यम' नामक वायु में कुछ काल तक आत्मा स्थिर रहने के बाद पुन: गर्भधारण करती है। जब आत्मा गर्भ में प्रवेश करती है तब वह गहरी सुषुप्ति अवस्था में होती है। जन्म से पूर्व भी वह इसी अवस्था में ही रहती है। जो आत्मा ज्यादा स्मृतिवान या ध्यानी है उसे ही अपने मरने का ज्ञान होता है और वही भूत बनती है।

जन्म मरण का चक्र
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जिस तरह सुषुप्ति से स्वप्न और स्वप्न से आत्मा जाग्रति में जाती हैं उसी तरह मृत्युकाल में वह जाग्रति से स्वप्न और स्वप्न से सु‍षुप्ति में चली जाती हैं फिर सुषुप्ति से गहन सुषुप्ति में। यह चक्र चलता रहता है।

भूत की भावना
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भूतों को खाने की इच्छा अधिक रहती है। इन्हें प्यास भी अधिक लगती है, लेकिन तृप्ति नहीं मिल पाती है। ये बहुत दुखी और चिड़चिड़ा होते हैं। यह हर समय इस बात की खोज करते रहते हैं कि कोई मुक्ति देने वाला मिले। ये कभी घर में तो कभी जंगल में भटकते रहते हैं।

भूत की स्थिति
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ज्यादा शोर, उजाला और मंत्र उच्चारण से यह दूर रहते हैं। इसीलिए इन्हें कृष्ण पक्ष ज्यादा पसंद है और तेरस, चौदस तथा अमावस्या को यह मजबूत स्थिति में रहकर सक्रिय रहते हैं। भूत-प्रेत प्रायः उन स्थानों में दृष्टिगत होते हैं जिन स्थानों से मृतक का अपने जीवनकाल में संबंध रहा है या जो एकांत में स्थित है। बहुत दिनों से खाली पड़े घर या बंगले में भी भूतों का वास हो जाता है।

भूत की ताकत
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भूत अदृश्य होते हैं। भूत-प्रेतों के शरीर धुंधलके तथा वायु से बने होते हैं अर्थात् वे शरीर-विहीन होते हैं। इसे सूक्ष्म शरीर कहते हैं। आयुर्वेद अनुसार यह 17 तत्वों से बना होता है। कुछ भूत अपने इस शरीर की ताकत को समझ कर उसका इस्तेमाल करना जानते हैं तो कुछ नहीं।

कुछ भूतों में स्पर्श करने की ताकत होती है तो कुछ में नहीं। जो भूत स्पर्श करने की ताकत रखता है वह बड़े से बड़े पेड़ों को भी उखाड़ कर फेंक सकता है। ऐसे भूत यदि बुरे हैं तो खतरनाक होते हैं। यह किसी भी देहधारी (व्यक्ति) को अपने होने का अहसास करा देते हैं।

इस तरह के भूतों की मानसिक शक्ति इतनी बलशाली होती है कि यह किसी भी व्यक्ति का दिमाग पलट कर उससे अच्छा या बुरा कार्य करा सकते हैं। यह भी कि यह किसी भी व्यक्ति के शरीर का इस्तेमाल करना भी जानते हैं।

ठोसपन न होने के कारण ही भूत को यदि गोली, तलवार, लाठी आदि मारी जाए तो उस पर उनका कोई प्रभाव नहीं होता। भूत में सुख-दुःख अनुभव करने की क्षमता अवश्य होती है। क्योंकि उनके वाह्यकरण में वायु तथा आकाश और अंतःकरण में मन, बुद्धि और चित्त संज्ञाशून्य होती है इसलिए वह केवल सुख-दुःख का ही अनुभव कर सकते हैं।

अच्‍छी और बुरी आत्मा
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वासना के अच्छे और बुरे भाव के कारण मृतात्माओं को भी अच्छा और बुरा माना गया है। जहां अच्छी मृतात्माओं का वास होता है उसे पितृलोक तथा बुरी आत्मा का वास होता है उसे प्रेतलोक आदि कहते हैं।

अच्छे और बुरे स्वभाव की आत्माएं ऐसे लोगों को तलाश करती है जो उनकी वासनाओं की पूर्ति कर सकता है। बुरी आत्माएं उन लोगों को तलाश करती हैं जो कुकर्मी, अधर्मी, वासनामय जीवन जीने वाले लोग हैं। फिर वह आत्माएं उन लोगों के गुण-कर्म, स्वभाव के अनुसार अपनी इच्छाओं की पूर्ति करती है।

जिस मानसिकता, प्रवृत्ति, कुकर्म, सत्कर्मों आदि के लोग होते हैं उसी के अनुरूप आत्मा उनमें प्रवेश करती है। अधिकांशतः लोगों को इसका पता नहीं चल पाता। अच्छी आत्माएं अच्छे कर्म करने वालों के माध्यम से तृप्त होकर उसे भी तृप्त करती है और बुरी आत्माएं बुरे कर्म वालों के माध्यम से तृप्त होकर उसे बुराई के लिए और प्रेरित करती है। इसीलिए धर्म अनुसार अच्छे कर्म के अलावा धार्मिकता और ईश्वर भक्ति होना जरूरी है तभी आप दोनों ही प्रकार की आत्मा से बचे रहेंगे।

कौन बनता है भूत का शिकार
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धर्म के नियम अनुसार जो लोग तिथि और पवित्रता को नहीं मानते हैं, जो ईश्वर, देवता और गुरु का अपमान करते हैं और जो पाप कर्म में ही सदा रत रहते हैं ऐसे लोग आसानी से भूतों के चंगुल में आ सकते हैं।

इनमें से कुछ लोगों को पता ही नहीं चल पाता है कि हम पर शासन करने वाला कोई भूत है। जिन लोगों की मानसिक शक्ति बहुत कमजोर होती है उन पर ये भूत सीधे-सीधे शासन करते हैं।

जो लोग रात्रि के कर्म और अनुष्ठान करते हैं और जो निशाचारी हैं वह आसानी से भूतों के शिकार बन जाते हैं। हिन्दू धर्म अनुसार किसी भी प्रकार का धार्मिक और मांगलिक कार्य रात्रि में नहीं किया जाता। रात्रि के कर्म करने वाले भूत, पिशाच, राक्षस और प्रेतयोनि के होते हैं।
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Saturday, 10 March 2018

विविध विषयों पर संस्कृत श्लोक

*विविध विषयों पर संस्कृत श्लोकों का हिंदी अर्थ सहित यह विशाल संग्रह बड़े श्रम से संकलित किया गया है | इसका एक मात्र उद्देश्य है भारतीय संस्कृति की महान धरोहर संस्कृत भाषा का प्रसार करना |*

⚜दान पर संस्कृत श्लोक

https://goo.gl/nDSsp8

⚜दुर्जन पर संस्कृत श्लोक

भाग 1: https://goo.gl/rFjktQ

भाग 2: https://goo.gl/mFsngr

⚜जीवन पर संस्कृत श्लोक

भाग 1: https://goo.gl/VnthWV

भाग 2: https://goo.gl/ZTkarG

भाग 3: https://goo.gl/YprJ3c

भाग 4: https://goo.gl/ZFSLm6

भाग 5: https://goo.gl/GyexJz

⚜अभय पर संस्कृत श्लोक

https://goo.gl/iH4coe

⚜मित्रता पर संस्कृत श्लोक

https://goo.gl/HoyLJ6

⚜धर्म पर संस्कृत श्लोक

https://goo.gl/2zBH3X

⚜बुद्धिमान पर संस्कृत श्लोक

https://goo.gl/FY7nGC

⚜गृहस्थी पर संस्कृत श्लोक

https://goo.gl/cxwkXa

⚜नारी पर संस्कृत श्लोक

https://goo.gl/sQgTQm

⚜ज्ञान पर संस्कृत श्लोक

https://goo.gl/t7sWPx

⚜समय पर संस्कृत श्लोक

https://goo.gl/b2REr6

⚜कर्म पर संस्कृत श्लोक

https://goo.gl/38C3dA

⚜राष्ट्र पर संस्कृत श्लोक

https://goo.gl/u1WBzu

⚜सत्य पर संस्कृत श्लोक

https://goo.gl/YBqB61

⚜संतोष पर संस्कृत श्लोक

https://goo.gl/bx2zk8

⚜तप पर संस्कृत श्लोक

https://goo.gl/RJxDXn

⚜सुख दुःख पर संस्कृत श्लोक

https://goo.gl/ukPhvr

⚜उद्यम पर संस्कृत श्लोक

https://goo.gl/wTBPRu

⚜चरित्र पर संस्कृत श्लोक

https://goo.gl/JmdRH8

⚜एकता पर संस्कृत श्लोक

https://goo.gl/knoC3N

⚜ईश्वर पर संस्कृत श्लोक

https://goo.gl/kkLfkx

⚜विवाह शुभकामना पर संस्कृत श्लोक

https://goo.gl/bzaYFX

⚜भक्ति पर संस्कृत श्लोक

https://goo.gl/TncP8p

⚜सत्संगति पर संस्कृत श्लोक

https://goo.gl/pEf3qo

⚜राजधर्म पर संस्कृत श्लोक

https://goo.gl/XdMpDV

⚜मन/बुद्धि पर संस्कृत श्लोक

https://goo.gl/zwGjU6

⚜स्वाभाव पर संस्कृत श्लोक

https://goo.gl/YqwfhN

⚜बुद्धिमत्ता पर संस्कृत श्लोक

https://goo.gl/Jy9prs

⚜परोपकार पर संस्कृत श्लोक

https://goo.gl/JKBav6

⚜दया पर संस्कृत श्लोक

https://goo.gl/3v3NZB

।। शुभमस्तु ।।

श्राद्ध कर्म पर तथाकथित “ऋषि” स्वामी दयानंद का पाखंड

श्राद्ध कर्म पर तथाकथित “ऋषि” स्वामी दयानंद का पाखंड

चतुर्थ सम्मुलाश में स्वामी जी लिखते है

पितृयज्ञ के दो भेद हैं एक श्राद्ध और दूसरा तर्पण। श्राद्ध अर्थात् ‘श्रत्’ सत्य का नाम है ‘श्रत्सत्यं दधाति यया क्रियया सा श्रद्धा श्रद्धया यत्क्रियते तच्छ्राद्धम्’ जिस क्रिया से सत्य का ग्रहण किया जाय उस को श्रद्धा और जो श्रद्धा से कर्म किया जाय उसका नाम श्राद्ध है।

इसका अर्थ है उन्हें पता है की श्राद्ध का क्या महत्व है पर अपनी मुर्खता या श्राद्ध के महत्व को कम करने के लिए वे आगे लिखते है

तृप्यन्ति तर्पयन्ति येन पितृन् तत्तर्पणम्’ जिस-जिस कर्म से तृप्त अर्थात् विद्यमान माता पितादि पितर प्रसन्न हों और प्रसन्न किये जायें उस का नाम तर्पण है। परन्तु यह जीवितों के लिये है मृतकों के लिये नहीं।

अब कोई इन तथाकथित ऋषि से पूछे की पितर किसे कहते है, केवल जीवित माता पिता या मृत माता पिता, दादा दादी और सगे सम्बन्धी,

चूँकि स्वामी जी को पता था की वेदों में कई स्थानों पर श्राद्ध का वर्णन है पर उसे वे अनदेखा करके श्राद्ध को केवल जीवित पितरों के लिए बता देते है 
तर्पण के लिए वे शतपथ ब्राह्मण का उदाहरण भी देते है पर कदाचित वे सत्य को छुपाना चाहते थे इसलिए उन्होंने वहां पर पितर शब्द का अर्थ परमात्मा बता दिया

जबकि येन पितृन् तत्तर्पणम् में वे पितर शब्द का अर्थ माता पिता आदि बताते है, अब इसे मुर्खता कहा जाए या अनभिज्ञता या अज्ञान ये तो तथाकथित ऋषि स्वामी जी ही जाने,

चूँकि स्वामी जी ने ऋग्वेद के दसवे मंडल के एक मन्त्र इदं पितृभ्यो नमो अस्त्वद्य ये पूर्वासो य उपरास ईयुः ये पार्थिवे रजस्या निषत्ता ये वा नूनं सुवृजनासु विक्षु पर कभी अपने विचार नहीं रखे जिसमे अलग अलग लोकों में निवास कर रहे पितरो को प्रणाम किया गया है

यहाँ तक की एक अन्य मन्त्र
आहं पितृन् त्सुविदत्राँ अवित्सि नपातं च विक्रमणं च विष्णोः
बर्हिषदो ये स्वधया सुतस्य भजन्त पित्वस्त इहागमिष्ठाः 
इस पर भी स्वामी जी की कुदृष्टि नहीं पड़ी, या उन्होंने इसे विक्षिप्त बता कर साइड कर दिया

उसी प्रकार 
बर्हिषदः पितर ऊत्य१र्वागिमा वो हव्या चकृमा जुषध्वम् ।
त आ गतावसा शंतमेनाऽथा नः शं योररपो दधात।।
आदि मंत्रो से पितरो को स्थान देने की बात कही गयी है और उनसे प्रार्थना की गयी है की वे हमारा कल्याण करे

स्वामी जी भूल गए की महाभारत में पितामह भीष्म ने पिण्डदान कुश पर रख कर अपने पिता का श्राद्ध किया था, शांति पर्व और अनुशासन पर्व में कई बार श्राद्ध के महत्व को बताया गया है

स्वामी जी ने मनुस्मृति के अध्याय 3 के श्लोक 254 पर भी अपनी दृष्टिपात नहीं की, ऋग्वेद के तीसरे मंडल 3 के सूक्त 55 में श्राद्ध कर्म का महत्व बताया गया है

पुराणों में तो इसका वर्णन है पर चूँकि आर्य समाजी केवल हिन्दू देवताओं के विरुद्ध विष वामन के लिए ही इसका प्रयोग करते है तो इसलिए पुराणो के प्रमाण को विक्षिप्त ही समझा जाए

इसके अतिरिक्त तैत्तिरीय ब्राह्मण और शतपथ ब्राह्मण में भी पितृपक्ष और श्राद्ध का महत्व बताया गया है

गीता के अध्याय एक में ही अर्जुन ने कृष्ण जी से संवाद में श्राद्ध न करने होने वाले दुष्प्रभाव का वर्णन किया है

यदि किसी को और प्रमाण चाहिए तो श्राद्ध पक्ष पर और प्रमाण भी दे द्जिये जायेंगे, याद रहे, आपने अपने पितरों का तर्पण नहीं किया तो ये आपकी मुर्खता ही नहीं, पापकर्म है

अब तथाकथित ऋषि के भक्त कृपया अपने अज्ञान और गालिगलोच के द्वारा इस पोस्ट की शोभा बढाए और बताये की वे असली आर्य समाजी है जो गाली देने में किसी से पीछे नहीं है ।

।। जय श्री राम ।।

Friday, 9 March 2018

आपत्कालीन वैश्यकर्म  (वाणिज्य) में ब्राह्मण के लिए विशेष वैदिक शास्त्रीय निषेध

आपत्काल में ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा शूद्र वर्ण के व्यक्ति को वाणिज्य (व्यापार) कर्म से वृत्ति करने की अनुमति वैदिक शास्त्र ने दी है । उस अवस्था में ब्राह्मण को दूध, दूध के विकार, तेल, घी आदि कतिपय वस्तु विक्री करने का निषेध किया गया है । उन में भी कतिपय वस्तु के विक्री को अत्यन्त निषेध किया गया है । उनका विवरण प्राचीनतम गौतमधर्मसूत्र में इस प्रकार पाया जाता है——
प्रथम प्रश्न सप्तम अध्याय-
तस्याऽपण्यम् ।।८।।

हरदत्तकृत मिताक्षरा वृत्ति— तस्य वैश्यवृत्तेर् ब्राह्मणस्याऽपण्यमविक्रेयं वक्ष्यते । तस्येति वचनात् क्षत्त्रि¬यस्य वैश्यवृत्त्युपजीविनो वक्ष्यमाणमपण्यं न भवति ।।८।।

हिन्दी— आपत्काल में वैश्यकर्म से जीवननिर्वाह करनेवाले ब्राह्मण को आगे निर्दिष्ट वस्तु को नहीं बेचना चाहिए ।

विशेष— वृत्तिकार के अनुसार तस्य कहने के कारण क्षत्त्रिय के लिए यह निषेध लागू नहीं होगा ।।८।।

गन्ध–रस–कृतान्न–तिल–शाण–क्षौमाऽऽजिनानि ।।९।।

हरदत्तकृत मिताक्षरा वृत्ति— गन्धश्चन्दनादिः । रसस् तैल–घृत–लवण–गुडादिः । कृतान्नं मोदकापूपादि । तिलाः प्रसिद्धाः । शाणं शणविकारो गोण्यादिः । क्षौमं क्षुमोद्भूतम्, पट्ट¬वस्त्र¬विशेषः । अजिनं चर्म कटादि । एतान्यविक्रेयाणि । शाण–क्षौमयोर् विकार¬निषेधात् प्रकृते¬रप्रतिषेधः ।।९।।

हिन्दी— गन्ध  (चन्दन आदि), रस   तेल, घी, नमक, गुड इत्यादि), बना हुआ भोजन  लड्डू, रोटी इत्यादि), तिल, सन से बने हुए पदार्थ, क्षुमा से बने वस्त्र, मृगादिचर्म, ये सब  आपत्काल में वैश्यकर्म से जीविका करनेवाले ब्राह्मण के लिए अविक्रेय होते हैं ।

विशेष— वृत्तिकार ने सन और क्षुमा से निर्मित वस्तु का निषेध होने से प्रकृति का   अविकार का (सन का और क्षुमा का) विक्रेय अनिषिद्ध होने की बात बताई है ।।९।।

रक्तनिर्णिक्ते वाससी ।।१०।।

रक्तं लाक्षादिना विकृतम् । निर्णिक्तं रजकादिना धौतम् । एवंभूते अपि वाससी अपण्ये ।।१०।।

हिन्दी— लाक्षा आदि रङ्गों से रङ्गे हुए और धोबी द्वारा धोए गए वस्त्र भी  (आपत्काल में वैश्यकर्म से जीवननिर्वाह करनेवाले ब्राह्मण के लिए) अविक्रेय होते हैं ।।१०।।

क्षीरं सविकारम् ।।११।।

दध्यादिभिर् विकारैः सह क्षीरमपण्यम् ।।११।।

हिन्दी— दूध और दूध से बने दही, खुआ, मलाई इत्यादि भी  आपत्काल में वैश्यकर्म से जीवननिर्वाह करनेवाले ब्राह्मण के लिए अविक्रेय होता है ।।११।।

मूल–फल–पुष्पौषध–मधु–मांस–तृणोदका–ऽपथ्यानि ।।१२।।

मूलमाद्र्घकहरिद्घादि । फलं पूगादि । पुष्पं चम्पकादि । औषधं पिप्पल्यादि । मधु माक्षिकम् । मांसतृणोदकानि प्रसिद्धानि । अपथ्यं विषादि । एतान्यपण्यानि । रसशब्देन पूर्वमेव निषिद्धेऽपि पुनर् मधुग्रहणं “सर्वथा वृत्तिरशक्तौ”   (गौतम. १।७।२२) इत्यादिपक्षे निषेधार्थम् ।।१२।।

हिन्दी— मूल   हल्दी इत्यादि), फल   क्रेमुकादि), पूmल   दमनकादि), औषध, मधु, मांस, तृण, जल और अपथ्य पदार्थ  (विषादि) भी  आपत्काल में वैश्यकर्म से जीविका करनेवाले ब्राह्मण के लिए अविक्रेय हैं ।

विशेष— वृत्तिकार ने रस कहने से ही गतार्थ मधु का फिर ग्रहण अशक्ति में सर्वथा वृत्ति हो सकने की अवस्था में भी निषेध के लिए माना है ।।१२।।

पशवश्च हिंसासंयोगे ।।१३।।

पशवोऽजादयः । हिंसासंयोगे सौनिकादिभ्यो हिंसार्थे न विक्रेयाः ।।१३।।

हिन्दी— पशुओं का भी हिंसा से जुडी हुई अवस्था में बिक्री न करे ।।१३।।

पुरुष–वशा–कुमारी–वेहतश्च नित्यम् ।।१४।।

पुरुषा दासादयः । वशा वन्ध्या गौः । कमासरी वत्सतरी । वेहद् गर्भो¬प¬घा¬ति¬नी । एते नित्यमपण्याः । नित्यमित्युक्तत्वाद् धिंसासंयोगादन्यत्राऽपि निषेधः । अपर आह— इह नित्य¬¬ग्रहणात् पूर्वेषु तिलादिष्वनित्यः प्रतिषेध इति । तत्र वसिष्ठः— “कामं वा स्वयमुत्पाद्य तिलान् विक्रीणीरन्” इति  ¬¬ (वा.ध.सू. २।३१) ।।१४।।

हिन्दी— पुरुष  दासादि), वन्ध्या गाय, बछिया तथा वेहत्  सदा गर्भ गिरा देनेवाली गाय) का विक्रेय भी  आपत्काल में वैश्यकर्म से जीविका करनेवाले ब्राह्मण के लिए नित्य ही वर्जित है ।।१४।।

भूमि–व्रीहि–यवा–ऽजा–ऽव्यश्व–ऋषभ–धेन्वनडुहश्चैके ।।१५।।

भूमिर् गृहम् । व्रीहियवाऽजाऽव्यश्वाः प्रसिद्धाः । ऋषभः सेचनसमर्थः पुङ्गवः । धेनुः सकृत्प्रसूता । अनड्वाननोवहनयोग्यो बलीवर्दः । एते चाऽपण्या इत्येके मन्यन्ते । एक¬शब्दाद् वयं त्वनुजानीमः । अत्राऽप्यजाविग्रहणं हिंसा¬संयोग¬विषयपरम् ।।१५।।

हिन्दी—भूमि, धान, जौ, बकरी, भेड, घोडा, ऋषभ  (सेचनसमर्थ साँड), धेनु  (दोग्ध्री गाय) और बैल का विक्रेय भी  आपत्काल में वैश्यकर्म से जीविका करनेवाले ब्राह्मण को नहीं करना चाहिए ऐसा कतिपय स्मृतिकारों का मत है ।

विशेष— मस्करिभाष्य में निघण्टु का प्रमाण देकर भूमि से घर का ग्रहण होने की बात कही गई है ।।१५।।

निमयस् तु ।।१६।।

निमयो विनिमयः परिवर्तनं तुशब्देन निमयोऽनुज्ञायत इति ।।१६।।

हिन्दी— किन्तु उपर्युक्त विक्रेय के लिए निषिद्ध पदार्थों का भी विनिमय  अदल बदल) करना तो  आपत्काल में वैश्यकर्म से जीविका करनेवाले ब्राह्मण के लिए अनुमत है ।

विशेष— आनन्दाश्रम  (पुणे) से प्रकाशित गणेशशास्त्री गोखलेद्वारा सम्पादित मिताक्षरा व्याख्या से युक्त गौतमधर्मसूत्र की पुस्तक में और चौखम्बा संस्कृत संस्थान  वाराणसी) से प्रकाशित उमेशचन्द्र पाण्डेयद्वारा सम्पादित मिताक्षरा व्याख्या और हिन्दी अनुवाद से युक्त पुस्तक में इस सूत्र का पाठ “नियमस्तु” है । मिताक्षरा व्याख्या में “नियमो विनिमयः परिवर्तनम्” मुद्रित है । मोतीलाल बनारसी¬दास¬द्वारा प्रकाशित अमेरिकन लेखक प्याट्रिक ओलिविलद्वारा सम्पादित अङ्ग्रेजी अनुवाद युक्त संस्करण में भी “नियमस्तु” पाठ ही छपा है । किन्तु काष्ठमण्डपस्थ हस्तलिखितग्रन्थागार राष्ट्रिय अभिलेखालय में स्थित तीन हस्तलेखों में से तीसरे हस्तलेख में “विनिमयस्तु” पाठ पाया जाता है । अन्य दो हस्तलेखों में यद्यपि मूल सूत्र में भ्रमवश “नियमस्तु” लिखा गया मिलता है, तथापि इसी प्रकरण
के अन्य सूत्रों की मिताक्षरा वृत्ति में बहूत स्थलों पर “निमय” और “विनिमय” लिखा गया मिलता है । एक वस्तु के बदले दूसरी वस्तु देने के अर्थ में संस्कृत भाषा में वि उपसर्ग से युक्त और वि उपसर्ग से रहित भी “निमय” शब्द प्रयुक्त होता है । अतः “निमयस्तु” अथवा “विनिमयस्तु” पाठ ही वास्तविक पाठ है ऐसा अवतग होता है । मस्करिभाष्य युक्त मैसुरु से प्रकाशित संस्करण में सूत्र और व्याख्या दोनों में “निमय” पाठ पाया जाता है ।।१६।।

तत्र निमयमाह—

रसानां रसैः ।।१७।।

तैलघृतगुडादीनां रसैरेव निमयः कार्यः ।  तद् यथा— “तैलं दत्त्वा घृतं ग्राह्यमिति रसैः समतो हीनतो वा” इति वसिष्ठः ।।१७।।

हिन्दी— विनिमय करते समय रसों  तेल, घी इत्यादि पदार्थों) का विनिमय रस  गुड इत्यादि पदार्थ) से ही करना चाहिए ।।१७।।

पशूनां च ।।१८।।

पशूनां चतुष्पदां पशुभिर् निमयः कार्यः ।।१८।।

हिन्दी— पशुओं का  (चौपायों का) विनिमय भी इसी प्रकार (पशुओं से ही) करना चाहिए ।

विशेष— मस्करिभाष्य में यह नियम जिन पशुओं का विक्रय निषिद्ध है, उन्हीं पशुओं के विषय में लागू होने की बात व्याख्यात है ।।१८।।

न लवण–कृतान्नयोः ।।१९।।

लवणस्य कृतान्नस्य च निमयेऽपि प्रतिषेधः ।।१९।।

हिन्दी— नमक और पके हुए अन्न का विनिमय  (अदलाबदली) नहीं करना चाहिए ।

विशेष— “रसानां रसैः”  (गौतम. १।७।१७) से नमक का भी विनिमय प्राप्त होता है, उसी का यहाँ निषेध किया गया है ।।१९।।

तिलानां च ।।२०।।

तिलानां च विनिमयो न कार्यः । लवण–कृतान्न–तिलानां द्रव्यान्तरस्वीकारेण प्रदानं निषिद्धम् । समानद्घव्यविषये प्रवत्त्यसंभवात् ।।२०।।

हिन्दी— तिल का भी विनिमय  (अदलाबदली) नहीं करना चाहिए ।।।२०।।

समेनाऽऽमेन तु पक्वस्य सम्प्रत्यर्थे ।।२१।।

समेन समपरिमाणेनाऽऽमेन तण्डुलेन सम्प्रत्यर्थे तादात्विकोपयोगार्थे पक्वान्न¬स्य निमयः कार्यः । मनुस् तु “तिला धान्येन तत्समाः” इति  (१०।९४) समेन धान्येन तिलानां निमयमनुजानीते । अपण्यमिति विक्रेयनिषेधात् सर्वत्र यावदुपयोगक्रेये निषेधो न स्यात् । रसादीनामपि निमयशब्देन प्रदानमेव विवक्षितम् । अन्यथा त्वविद्यमानरसान्तरादिद्रव्यस्य प्रवृत्त्यसम्भवात् ।।२१।।

हिन्दी— समान परिमाण के विना पकाये हुए अन्न  चावल) से पके हुए अन्न का तात्कालिक उपयोग के लिए विनिमय किया जा सकता है ।।२१।।

इस प्रकार ब्राह्मण के लिए कतिपय वस्तुओं की बिक्री का निषेध वैदिक शास्त्रों में की गई है । इस पर ब्राह्मण समुदाय का ध्यान जाना आवश्यक है ।

ज़ह्ळ को जालंधर कहने वालों का खंडन

देअ श्री श्री श्री खुडीज़ह्ळ जी को जालन्धर कहने वालों का भ्रमभंग -  भ्रम - प्रभु श्री ज़ह्ळ जी के मुख के सिर में चंद्रमा है तो इन्हें शिव अं...