Saturday, 13 April 2019

वैदिक जाति व्यवस्था और आक्षेप व समाधान

वैदिक जाति व्यवस्था :  आक्षेप और समाधान -

#आक्षेप- एक पण्डित  व्यक्ति  शूद्र का दिया पानी तो नहीं पी रहा पर उसका बनाया घड़ा प्रयोग कर रहा है । कितनी नकारात्मक बात है !  इससे सिद्ध है कि   पण्डित द्वेषी , लोभी  और अभिमानी होते हैं ।

#उत्तर -

एक पंडित  व्यक्ति  शूद्र का दिया पानी तो नहीं पी रहा पर उसका बनाया घड़ा प्रयोग कर रहा है ।

इसी बात को सकारात्मक भी लिया जा सकता है नकारात्मक भी ।

ये  सामने वाले व्यक्ति की निजी मानसिकता पर निर्भर करता है कि वो इसे कैसे  व्यवहार में लाता है ।

हिन्दू धर्म में जाति की व्यवस्था गलत नहीं है , वरन् वे लोग गलत हैं जो इस व्यवस्था को  नकारात्मक बना  देते हैं ।

तर्क दिया जाता है  कि पंडित शोषक है जो बस अपना काम निकालता है दूसरे की मेहनत पर और फिर उन्हें नीच कह कर औकात दिखाता है,

इस पर आक्षेपकर्ता विधर्मियों  से हमारा कहना  यह है कि  पानी लाना तो सबसे बडी मेहनत है, पूरा कुंआ खोदना पड़ता है  पानी को पाने  के लिये, आरम्भ से ही श्रम है  । और उस कुंए का संरक्षण भी तो करना है अनवरत  , क्योंकि प्यास तो पूरे दिन में  कईं बार लगती है !  पानी  पिलाना इतना सरल काम नहीं है । और दूसरी बात ये है कि  यदि  मेहनत शूद्र करता है तो उसका  फल भी तो वही ले जाता है !   फ्री में थोडे न पंडित घड़ा लेता है उससे!  

यहॉ पर  पण्डित उससे घड़ा लेकर उसे उसकी  कला का पारितोषिक व  एक आधिकारिक रोजगार ही तो प्रदान कर रहा है !   सामाजिक सहयोग सद्भाव का कितना सुन्दर उदाहरण है यह !

विचार कीजिये -

१. अगर जातिगत द्वेष कारण होता तो पंडित घड़ा भी क्यों प्रयोग करता ?

२.यदि पण्डित  लोभी होता तो पानी भी क्यों छोड़ता ?

३. और यदि पण्डित अभिमानी होता तो  पानी और घड़ा दोनों ही एक साथ क्यों  न छोड़ता  !

इससे सिद्ध है कि ना तो पण्डित द्वेषी है , ना  लोभी और ना ही अभिमानी !

वरन् वो अवश्य किसी  मर्यादा में ,  व्यवस्था में अनुशासित और व्यवस्थित  है ।

~~~~~~~~~~~

शास्त्र व्यवस्था का ही नाम है, अनुशासन का ही नाम है ।  ईश्वर का  दिया  हुआ अनुशासन , ईश्वर की दी हुई व्यवस्था पर चलना - यही एक धार्मिक की पहचान होती है ।

जो लोग धार्मिक होते हैं, वे तो कभी आपस में झगड़ने की कल्पना भी नहीं कर सकते!  ना ही वे निजी स्वार्थ नें बह सकते हैं !   ये परस्पर  झगड़े और  वैमनस्यता  को खड़ा  करना तो अधार्मिकों के काम हैं ।

।। जय श्री राम ।।

Sunday, 7 April 2019

मनुवाद शूद्रों के पक्ष में ही है

जो  कहते  हैं  मनुवाद  देश को  तोड़ता  है ,  वे  आजकल  की   जड़  भाषा   में समझो   मनुवाद  क्या  कहता है  -

मनुवाद  कहता  है  कि    देश के  सारे  इंजिनियर्स के पद  , आई टी सेक्टर  , कॉटेज  इंडस्ट्रीज  आदि  केवल   शूद्रों  के  लिए  आरक्षित  हो  जाएँ  , साथ ही   यूनिवर्सिटीज , एडमिनिस्ट्रेशन  और  एग्रीकल्चरल , बिजनेस  रिलेटेड  फील्ड्स  में  भी  शूद्रों   को  देश  की    सेवा  करने  का  आमन्त्रण दिया जाए  ।   मनुवाद कहता है कि शूद्र  ही देश के बड़े बड़े  बिल्डर  बनें ।    ब्राह्मणों को  केवल एजुकेशन ही का फील्ड थमाया जाये ,  उसे गुजारा ना हो रहा हो, तो  विशेष आपत्ति होने पर  एडमिनिस्ट्रेशन या  एग्रीकल्चर के फील्ड में ट्राय कर सकते हैं,  लेकिन  शूद्रों के लिये जो  प्रोफेशनल  फील्ड रिजर्व हैं , उनमें इंटर नहीं कर सकते ।

मनुवाद  कहता  है  कि   ब्राह्मणों और  क्षत्रियों   को  बिलकुल  भी   उन  सेवाओं  में   घुसने  ना  दिया  जाए  , जो  शूद्रों  के  लिए  आरक्षित  हैं  ! इतना ही  नही,    ब्राह्मण  जो  भी  कमाते  हैं  ,  उस कमाई  पर  भी  मनुवाद  अंकुश  लगाता  है  , उनके  पास   इतनी ही  प्रौपर्टी और  बैंक  बैलेंस  रहे  ,  जितने  से  केवल   वन  इयर   का गुजारा  हो  !   और   जॉब  भी  केवल   पच्चीस  वर्ष  तक  ही   कर  सकता  है  , उसके  बाद  उसे  रिटायर  होना  पडेगा !  और ये रिटायरमेंट ऐसा होगा कि  ना किसी सोसाइटी में रहो , ना सिटी में,  बल्कि  जाके  फॉरेस्ट में रहो और वहीं   अपने शोल को गेन  करने  के लिये  योगा करो ।  

मनुवाद  केवल  हिन्दुओं  को   ही  देश  में  रहने  की  बात  करता है , बांकी  लोग   या तो  मनुवाद  को मानें   वरना   गेट  आउट  ।

मनुवाद से  उनको  समस्या  है , जो हिन्दू नहीं हैं,  और मनुवाद के विरोध का सीधा सीधा मतलब है,   शूद्रों के अधिकारों का हनन , क्योंकि इसमें  सबसे ज्यादा सुख उन्हीं को है ।

वे भारत से बाहर व भारत में रहने वाले   विदेशी लोग इसीलिये  षड्यन्त्र करके मनुवाद का विरोध करवाते हैं , ताकि  वे शूद्रों  के रिजर्व   सुख छीन सकें और   अपने आप को भी देश में   प्रविष्ट (इंटर)  कर सकें ।

।। जय श्री राम ।।

ब्राह्मण मन्दिर में क्या करता है

एक  शोधार्थी की खोज -

ये ब्राह्मण लोग आखिर मन्दिरों में करते क्या हैं ?

   ब्राह्मणों की विरोधी पुस्तकें   जैसी आजकल बाजारों में मिलती हैं,   उनको पढ़कर मुझे तो लगा था वे लोग वहॉ  उन भवनों के  अन्दर बैठकर शूद्रों को खूब गालियॉ देते होंगे,  उनको कत्ल करने के हथियार बनाते होंगे,  

पर अन्दर जाकर  उनको   देखा तो वे लोग    तो किसी एक  मूर्ति को प्रणाम कर रहे थे    और    एक संस्कृत का वाक्य बोल रहे थे - सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः सर्वे भद्राणि पश्यन्तु  मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत्  ।  

उनके इस वाक्य का मतलब क्या है , ये पता किया तो मेरे होश उड़ गये । इसका तो सीधा सीधा मतलब यही आ रहा था कि  शूद्र सुखी हों , निरोगी हों,  उनका कल्याण करना ,  उनको कभी भी  दुःख का भागी  ना  बनना  पड़े  !   मुझे आश्चर्य हुआ कि  जिनको  शूद्रों के शत्रु  बताया जाता है , वे लोग आखिर  उनके लिये ऐसी प्रार्थना कैसे कर सकते हैं ! उनको तो शूद्रों को दुखी करने की प्रार्थना करनी चाहिये थी ।

फिर मुझे लगा कि शायद हवन में जो मन्त्र बोलते हैं, उसमें वे शूद्रों के दुखी होने  की बात कहते होंगे या फिर अग्नि से कहते होंगे कि तुम शूद्रों का घर जला दो , पर वहॉ भी ऐसा नहीं था ,  वे लोग  वहॉ भी  ईश्वर की स्तुति कर रहे थे  और कह रहे थे कि  विश्व में  चारों ओर सुख शान्ति हो,  हमारे पास जो कुछ भी है, वो आपका है  ।  आपकी सम्पत्ति   से सबको सुख मिले ।

फिर मुझे लगा कि मन्दिरों में न सही पर जीवन में कभी तो शूद्रों के उपर कोई  घातक आक्रमण कर  उनके घर लूटने की बातें कहते होंगे , पर उनके जीवन  को  संचालित करने वाले जो इनके धर्मशास्त्र हैं , उनकी नियमावली को  पढ़ा  तो पता चला कि वे तो   जीवन का ७५% घर के सुख त्याग कर  जंगलों में   व्यक्तिगत  तपस्या में बिताने को बोला है  , शेष २५%  में समाजसेवा  ।

।। जय श्री राम ।।

Saturday, 6 April 2019

परमात्मा का शासन ही श्रेष्ठ है

जो ज्ञान महंगी महंगी पुस्तकें खरीदकर  ,  तरह तरह के   गुरुओंके पास जाकर  नहीं मिल पाता ,  परमात्मा की कृपा  होने पर  वो  ही  सरलता से  मुखपत्रिकापटल (फेसबुक) , चलचित्र प्रसार स्थलों (  यू ट्यूब )  जैसे अप्रत्याशित    माध्यमों से   भी  घर बैठे बैठे  ही मिल  सकता है ।

लोग तो परमात्मा के ज्ञान को  भी   व्यापार बना के  बैठ गये हैं । पर   परमात्मा  अपने  ज्ञान को   बिना स्वार्थ के  स्वयं  विविध माध्यमों से  निमित्त बनाकर   बरसा देते हैं ।  

सरकारी शासन में तो   उनके राज्य में पानी  भरने  का भी शुल्क ( बिल ) भरना पड़ता है ,   पर  परमात्मा का  शासन  सरकारी शासन से  बिल्कुल अलग है ,  वे जब वर्षा करते हैं    तो घरों  में  शुल्क (बिल) नहीं आता । 

इन सब  घटनाओं को गहराईपूर्वक देखने पर ये स्पष्ट हो जाता है कि परमात्मा ही वस्तुतः  अपने शुद्ध ज्ञान के,   अपने धर्म के संरक्षक व संवर्धक हैं ,   वरना  मनुष्य तो,   उनके पास जो धरोहर  बची  होती   है  , उसे भी  बिगाड़  के   नाश करते देर नहीं करते ।

नवसंवत्सर की शुभकामनाएं ।।

।। जय श्री राम ।।

Friday, 5 April 2019

पापयोनि पर भ्रान्ति निवारण

पापयोनित्व,  पूज्यत्व   और   पाण्डित्य  -

  पापयोनयः स्त्रियः ,  यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, वाचक्नवी गार्गी     ये तीन    शास्त्रीय विषय ऐसे हैं, जिनके ठीक -ठीक  अभिप्रायों व पारस्परिक  अन्तर्सम्बन्धों को न जानने  वाले स्वार्थी तत्त्वों द्वारा समाज में पर्याप्त भ्रम फैला दिये गये हैं ।   पापयोनि  है तो  पूज्या  कैसे ?  पण्डिता कैसे ?   ये सब   भ्रामक   स्थिति  आजकल  यत्र तत्र  सर्वत्र  देखने को मिल रही है ।

पापयोनिः  ये संस्कृत का शब्द है , इसका मतलब होता है  जिसके जन्म में   पूर्वजन्मकृत  पाप  की प्रधानता हो ।   ये जानना    आवश्यक है कि   इस संसार में  जन्म लेना कर्माधारित  प्रक्रिया होती है ।  जन्म अकारण या अकस्मात् नहीं होता , कर्म का परिणामविशेष ही जन्म होता है । इसे ही दूसरे शब्दों में कहें तो     प्राणियों का जन्म उनके पूर्वकृत पुण्य पापों के फलस्वरूप ही  होता है ।

इसलिये पापयोनि शब्द  पर     स्वयं को  अनावश्यक भ्रान्तियों में डालने के स्थान पर,  विषय की  वस्तुस्थिति को समझने का प्रयास करना चाहिये ।

सम्मान और  जन्म -------

यत्र नार्यस्तु ०   ये  विवाहिता स्त्री के प्रसंग में मनु ने लिखा है ,  यहॉ पर केवल इतना भाव है कि  नववधू का    ससुराल में सम्मान करना चाहिये , तभी  उन  कुलों की   सम्यक् उन्नति होती है ।  स्त्रियॉ पापयोनि   नहीं होती,  ऐसा नहीं बोला गया  है वहॉ  ।   ये  वही मनु हैं,  जो  प्राणियों के जन्मादि विषयक   सृष्टिप्रक्रिया के  गुणविभाग और कर्मविभाग को  ही जानकर   निरिन्द्रिया ह्यमन्त्राश्च स्त्रीभ्योऽनृतं इति स्थितिः  के रहस्य  भी  बताये हैं ।       आर्ष-शास्त्रोक्त कोई भी  कथन  निरर्थक , निष्प्रयोजन  या अकर्तव्य नहीं हुआ करता ।  इसीलिये      अपरिपक्व  मति वाले  लोकसामान्य    की  व्यर्थ  भावनाऐं भड़का कर शास्त्रीय सिद्धान्त  को  विकृत करने की   विनाशकारी और उत्पातकारी   दुष्प्रवृत्ति से बचना चाहिये ।  पापयोनित्व तो  जीव के  प्रारब्ध को लेकर  होता  है ,   और  पूजन -सम्मान ये  आचार का विषय है  ।

   अतः  किसी प्राणी का पापयोनि  होना और सम्मानित होना दो पृथक् पृथक् विषय हैं ।    हमारी आपकी  माताऐं , बहनें  ये सभी    हमारी आपकी माताबहनें बाद में हैं,   कर्मचक्र  में पड़े हुए जीव  पहले हैं ।  इसे समझना होगा ।  हम आप भी  पहले  कर्मचक्र में पड़े हुए जीव हैं , तब किसी के  पुत्र या भाई आदि  हैं ।  अतः पापयोनि होने को  लोहे की  हथकड़ी समझिये और पुण्ययोनि  होने को सोने की हथकड़ी । आखिर  हथकड़ी तो दोनों ही   हथकड़ी  ही  हैं ,  हथकड़ी  पहनने  से सम्मान नहीं होता , वरन्  कभी हमें   हथकड़ी   ना पहननी  पड़े, ये है सम्मान की बात ।  इसलिये किसी  के अधिकार हनन की बात यहॉ नहीं है , वरन्   सृष्टि नियमों को समझने की आवश्यकता है ।

जब पापयोनि कौवों को तक  हम लोग    सम्मान करके  श्रद्धापूर्वक  भोजन   प्रदान करते हैं ,   उनके खाने पर पितरों की  संन्तुष्टि   समझते हैं ,   तो     पापयोनि स्त्री को  सम्मान कर दिये तो क्या  समस्या हो गयी ? 

कागभुशुण्डी जी कौए की योनि में  लोमश  ऋषि के शाप से पैदा हुए ,  पर पंडित थे , ऐसे ही गार्गी आदि के ब्रह्मवादिनी होने के सन्दर्भ  में भी समझना चाहिए , कि वे पापयोनि प्रधान जाति में पैदा होकर भी पण्डिता हुईं , उसी  बृहदारण्यकोपनिषद् में तो   गर्भाधान संस्कार की  पूरी एक विधि ही बताई गयी  है कि  आपकी पुत्री पण्डिता कैसे बन सकती है । इसलिये  किसी स्त्री का विदुषी होना  तो  उसके पूर्व संस्कारविशेष    का परिणामभर है ,   इससे प्रकृति का  वह कर्मचक्र का  नियम नहीं बदलता, जिसके फलस्वरूप   ब्राह्मणादि  पुण्ययोनियॉ अथवा स्त्री आदि  पापयोनियॉ   जीवों को प्राप्त होती हैं ।

।। जय श्री राम ।।

पापयोनि पर भ्रान्ति निवारण

पापयोनित्व,  पूज्यत्व   और   पाण्डित्य  -

  पापयोनयः स्त्रियः ,  यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, वाचक्नवी गार्गी     ये तीन    शास्त्रीय विषय ऐसे हैं, जिनके ठीक -ठीक  अभिप्रायों व पारस्परिक  अन्तर्सम्बन्धों को न जानने  वाले स्वार्थी तत्त्वों द्वारा समाज में पर्याप्त भ्रम फैला दिये गये हैं ।   पापयोनि  है तो  पूज्या  कैसे ?  पण्डिता कैसे ?   ये सब   भ्रामक   स्थिति  आजकल  यत्र तत्र  सर्वत्र  देखने को मिल रही है ।

पापयोनिः  ये संस्कृत का शब्द है , इसका मतलब होता है  जिसके जन्म में   पूर्वजन्मकृत  पाप  की प्रधानता हो ।   ये जानना    आवश्यक है कि   इस संसार में  जन्म लेना कर्माधारित  प्रक्रिया होती है ।  जन्म अकारण या अकस्मात् नहीं होता , कर्म का परिणामविशेष ही जन्म होता है । इसे ही दूसरे शब्दों में कहें तो     प्राणियों का जन्म उनके पूर्वकृत पुण्य पापों के फलस्वरूप ही  होता है ।

इसलिये पापयोनि शब्द  पर     स्वयं को  अनावश्यक भ्रान्तियों में डालने के स्थान पर,  विषय की  वस्तुस्थिति को समझने का प्रयास करना चाहिये ।

सम्मान और  जन्म -------

यत्र नार्यस्तु ०   ये  विवाहिता स्त्री के प्रसंग में मनु ने लिखा है ,  यहॉ पर केवल इतना भाव है कि  नववधू का    ससुराल में सम्मान करना चाहिये , तभी  उन  कुलों की   सम्यक् उन्नति होती है ।  स्त्रियॉ पापयोनि   नहीं होती,  ऐसा नहीं बोला गया  है वहॉ  ।   ये  वही मनु हैं,  जो  प्राणियों के जन्मादि विषयक   सृष्टिप्रक्रिया के  गुणविभाग और कर्मविभाग को  ही जानकर   निरिन्द्रिया ह्यमन्त्राश्च स्त्रीभ्योऽनृतं इति स्थितिः  के रहस्य  भी  बताये हैं ।       आर्ष-शास्त्रोक्त कोई भी  कथन  निरर्थक , निष्प्रयोजन  या अकर्तव्य नहीं हुआ करता ।  इसीलिये      अपरिपक्व  मति वाले  लोकसामान्य    की  व्यर्थ  भावनाऐं भड़का कर शास्त्रीय सिद्धान्त  को  विकृत करने की   विनाशकारी और उत्पातकारी   दुष्प्रवृत्ति से बचना चाहिये ।  पापयोनित्व तो  जीव के  प्रारब्ध को लेकर  होता  है ,   और  पूजन -सम्मान ये  आचार का विषय है  ।

   अतः  किसी प्राणी का पापयोनि  होना और सम्मानित होना दो पृथक् पृथक् विषय हैं ।    हमारी आपकी  माताऐं , बहनें  ये सभी    हमारी आपकी माताबहनें बाद में हैं,   कर्मचक्र  में पड़े हुए जीव  पहले हैं ।  इसे समझना होगा ।  हम आप भी  पहले  कर्मचक्र में पड़े हुए जीव हैं , तब किसी के  पुत्र या भाई आदि  हैं ।  अतः पापयोनि होने को  लोहे की  हथकड़ी समझिये और पुण्ययोनि  होने को सोने की हथकड़ी । आखिर  हथकड़ी तो दोनों ही   हथकड़ी  ही  हैं ,  हथकड़ी  पहनने  से सम्मान नहीं होता , वरन्  कभी हमें   हथकड़ी   ना पहननी  पड़े, ये है सम्मान की बात ।  इसलिये किसी  के अधिकार हनन की बात यहॉ नहीं है , वरन्   सृष्टि नियमों को समझने की आवश्यकता है ।

जब पापयोनि कौवों को तक  हम लोग    सम्मान करके  श्रद्धापूर्वक  भोजन   प्रदान करते हैं ,   उनके खाने पर पितरों की  संन्तुष्टि   समझते हैं ,   तो     पापयोनि स्त्री को  सम्मान कर दिये तो क्या  समस्या हो गयी ? 

कागभुशुण्डी जी कौए की योनि में  लोमश  ऋषि के शाप से पैदा हुए ,  पर पंडित थे , ऐसे ही गार्गी आदि के ब्रह्मवादिनी होने के सन्दर्भ  में भी समझना चाहिए , कि वे पापयोनि प्रधान जाति में पैदा होकर भी पण्डिता हुईं , उसी  बृहदारण्यकोपनिषद् में तो   गर्भाधान संस्कार की  पूरी एक विधि ही बताई गयी  है कि  आपकी पुत्री पण्डिता कैसे बन सकती है । इसलिये  किसी स्त्री का विदुषी होना  तो  उसके पूर्व संस्कारविशेष    का परिणामभर है ,   इससे प्रकृति का  वह कर्मचक्र का  नियम नहीं बदलता, जिसके फलस्वरूप   ब्राह्मणादि  पुण्ययोनियॉ अथवा स्त्री आदि  पापयोनियॉ   जीवों को प्राप्त होती हैं ।

।। जय श्री राम ।।

Thursday, 4 April 2019

स्त्री को पापयोनि कहना उचित है?

उड़िया बाबा के नाम पर   निजी   दुराग्रह फैलाने वालों का भ्रमोच्छेदन -

कुछ लोगों द्वारा उड़िया बाबा के श्रोत्रिय होने पर  हमारा   प्रश्नचिन्ह उठाना    बहुत खटक रहा है , पर श्री आद्य शंकराचार्य भगवान् पर जो आक्षेप लगाया गया है, उस पर  उनके मुख में द ही जम गयी है।  ये वे लोग हैं,  जिनको  अपने  दुराग्रह  से इतनी   चाहत है कि स्वयं वेदवेद्य  भगवान् शंकर पर आक्षेप से  भी  कोई लेना देना नहीं ,   

उनके लिये  दर्पण -

  जब उड़िया बाबा ने बता डाला  श्री आद्य शंकराचार्य को ही पक्षपाती -

~~~~~~~~~~
श्री आद्य शंकराचार्य का मत  पक्षपातपूर्ण जान पड़ता है ।
- उड़िया बाबा । गीता तत्त्वालोक , पृष्ठ ३०५
~~~~~~~~~~~~

श्री आद्य शंकराचार्य के मत का खंडन करने के लिये  उक्त बाबा महाशय ने  इतना खोखला तर्क दिया  कि   पढ़कर ही हंसी आती है ,  

#कुतर्क -  स्त्री पापयोनि है तो उसके हाथ का भोजन क्यों करते हैं सभी ? जबकि स्त्री के बिना कोई यज्ञ सम्पन्न नहीं होता ।

#भंजन -    महिषादि पशुओं का दुग्धपान करने से क्या  उनका निम्नयोनित्व समाप्त हो जाता है ?   किन्तु उनके दुग्धादि  को ग्रहण करने की भी एक व्यवस्था है  कि कब ग्राह्य है,  कब नहीं ।     यज्ञ की ही बात करें तो  द्रव्य यज्ञ  तो स्थावर योनियों को प्राप्त   वृक्षादि के सहयोग के बिना भी  नहीं  पूर्ण हो पाता , तो क्या उनको  ब्राह्मणादि  के तुल्य पुण्ययोनि मान लेना चाहिये ?  तब तो   सांख्यादि शास्त्रों का प्रसिद्ध तमः प्रधान , सत्त्वप्रधान , रजःप्रधान प्राणियों का शास्त्रोक्त गुण-कर्मविभाग ही  विध्वस्त हो जायेगा । अनृत में स्त्री की स्थिति बताने वाले मन्वादि स्मृतियों का क्या कोई महत्त्व नहीं ?  विचार करना चाहिये ।

श्री गोस्वामी तुलसीदासजी , श्री राम चरितमानस के अरण्यकाण्ड में  महान् भगवद्भक्त श्री शबरी जी के मुख से    अधम ते अधम अधम अति नारी की जब अनुश्रुति कहलवाते  हैं , तो क्या  वहॉ पर वे शबरी जी  झूठ बोलती हैं , जिनके दर्शन के लिये स्वयं   वेदवेद्य  भगवान् श्री राम पधारते हैं ?

श्री भगवान् आद्य शंकराचार्य ने स्पष्ट रूप से कहा है कि  पापा योनिः येषां ते  पापयोनयः    पापजन्मानः  , अर्थात्  जिन प्राणियों के जन्म का कारण पाप हैं , वे पापयोनयः कहलाते हैं । 

जब अपने जन्म में  पाप की प्रधानता  थी ,  तभी तो   पुरुषजन्मराहित्यता आयी ,   अन्यथा क्यों आती ?  निवृत्तिमूलक  ज्ञानमार्ग और  प्रवृत्तिमूलक  कर्ममार्ग - ये दो ही सनातन मार्ग हैं ,  जिनका गीताशास्त्र में उपदेश हुआ है , और  इन दोनों मार्गों में  क्रमशः ब्राह्मण और क्षत्रिय - ये दो पुण्ययोनियॉ ही अधिकृत हैं ।

देवराज इन्द्र ने ब्रह्महत्या का एक भाग जो स्त्रियों में बांटा था , उसी के फलस्वरूप  रजस्वला होती हैं, ( शश्वत्कामवरेणांहस्तुरीयं जगृहुः स्त्रियः । रजोरूपेण तास्वंहो मासि मासि प्रदृश्यते ।।)

और उड़िया बाबा महाशय !  कोई भी शिष्ट व्यक्ति   रजस्वला स्त्री के हाथ का  भोजन तो करता नहीं ,  ना ही यज्ञ  सम्पन्न करते हैं । 

ये सब विषय तैत्तिरीय संहिता  से लेकर बृहदारण्यरोपनिषद् पर्यन्त न केवल  वेदों में प्रसिद्ध है,   वरन् आपस्तम्ब, हिरण्यकेशी , भारद्वाज, बौधायन , हारीत, यम, पाराशर , अंगिरा , याज्ञवल्क्यादि समस्त ऋषि-मुनियों ने नाना प्रकार से प्रतिपादित किया है ।  इतना ही क्यों, आप इतिहास पुराणों में ही यह प्रसंग देख लीजिये , वह चाहे महाभारत हो, या फिर  श्रीमद्भागवत , देवी, स्कन्द,  आदि पुराण हों,   सर्वत्र एक ही स्वर आपको सुनाई देगा ।

समुद्रेषु पृथिव्यां च वनस्पतिषु स्त्रीषु च ।
विभज्य ब्रह्महत्यां च तान् वरैरप्ययोजयत् ।।
(महा० उद्यो०, सेनो० ९।४४))

विभज्य ब्रह्महत्यां तु वृक्षेषु च नदीषु च ।
पर्वतेषु पृथिव्यां च स्त्रीषु चैव युधिष्ठिर ।।
(महा० उद्यो०, सेनो०१३।१९)

स्त्रीभूजलद्रुमैरेनो विश्वरूपवधोद्भवम् ।
विभक्तमनुगृह्णद्भिर्वृत्रहत्यां क्व मार्ज्यहम् ।।
(श्रीमद्भा०६।१३।०५)

  उड़िया बाबा तो प्रणव संकीर्तन भी करवा लेते थे , जिस कारण करपात्री जी महाराज ने तक आपके पास आना बन्द कर दिया था ( प्रमाण - श्री अखण्डानन्द सरस्वती रचित पावन प्रसंग ,  सत्साहित्य प्रकाशन ट्रस्ट से प्रकाशित, पृष्ठ ४१), अतः यदि कदाचित् वे  रजस्वला स्त्री के हाथ का भोजन भी उचित ठहरा दें , तो इस पर भी  यहॉ फेसबुक के   कुछ तथाकथित  भक्तों को उनसे वैमत्य न हो तो भी आश्चर्य नही ।  

समदर्शी महायोगी भगवान् श्री आद्य शंकराचार्य को पक्षपाती बताने वाले  उड़िया बाबा  कितने उद्भट श्रोत्रिय रहे, उनके नाम पर दुराग्रह फैलाने वालों को   पता चल ही रहा होगा ।

।। जय श्री राम ।।

ज़ह्ळ को जालंधर कहने वालों का खंडन

देअ श्री श्री श्री खुडीज़ह्ळ जी को जालन्धर कहने वालों का भ्रमभंग -  भ्रम - प्रभु श्री ज़ह्ळ जी के मुख के सिर में चंद्रमा है तो इन्हें शिव अं...