Friday, 2 March 2018

विवाह परिक्रमा पर शास्त्रीय लेख

>>>>>>विवाह में ७ फेरे ( भांवर )केवल भ्रममात्र है <<<<<<<
धर्म ,अर्थ ,काम, और मोक्ष ,चार ही फेरे प्रमाणित है।
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आज कल विवाह में कहीं तो 7 फेरों का प्रचलन है तो कहीं 4 का ,

इस विषय पर बहुत विवाद सुनने में आ रहा है । राजस्थान, गुजरात और मिथिला आदि प्रान्तों में

कई स्थानों में 4 फेरों की परम्परा है और उत्तर प्रदेश आदि कुछ प्रान्तों के कतिपय स्थलों में 7 फेरों

की परम्परा ।

हम यहां सप्रमाण यह तथ्य प्रस्तुत करेंगे कि “फेरे कितने होने चाहिए ।

यहां एक बात ध्यान में अवश्य रखनी है कि सभी बातें शास्त्रों में ही उपलब्ध नहीं होती हैं ।

जैसे — वर वधू का मंगलसूत्र पहनाना,गले में माला धारण करवाना, वर वधू के वस्त्रों में ग्रन्थि

लगाना ( गांठ बांधना ),वर के हृदय पर दही आदि का लेपन, ऐसे बहुत से कार्य हैं जो गृह्यसूत्रों में

उपलब्ध नही हैं ।

इन सब कार्यों में कौन प्रमाण है ?

इसका उत्तर है –”अपने अपने कुल की वृद्ध महिलायें ;क्योंकि वे अपने पूर्वजों से किये गये सदाचारों

का स्मरण रखती हैं । इसलिए विवाहादि कार्यों में इनकी बात मानने का विधान शास्त्रों ने किया है ।

देखें —शुक्ल यजुर्वेद की माध्यन्दिन और काण्व शाखा इन दोनों का प्रतिनिधित्व करता है -

महर्षि पारस्कर प्रणीत ” पारस्करगृह्यसूत्र”

महर्षि कहते हैं –

”ग्रामवचनं च कुर्युः”-।। 11।।

“विवाहश्मशानयोर्ग्रामं प्राविशतादिति वचनात् ‘।।12।।

“तस्मात्तयोर्ग्रामः प्रमाणमिति श्रुतेः ।।13।।

-----प्रथमकाण्ड, अष्टमी कण्डिका ।

यहां 11वें सूत्र का अर्थ “हरिहरभाष्य” में किया गया है कि

“विवाह और श्मशान सम्बन्धी कार्यों में ( ग्रामवचनं = स्वकुलवृद्धानां स्त्रीणां वाक्यं कुर्युः ) अपने

कुल की वृद्ध महिलाओं की बात मानकर कार्य करना चाहिए ।

“गदाधरभाष्यकार”भी यही अर्थ किये हैं । इनमें कुछ बातें जैसे “मंगलसूत्र आदि” इनका उल्लेख

इसी भाष्य के आधार पर मैने किया है ।

सूत्र11 में ” च ” शब्द आया है । उससे “देशाचार, कुलाचार और जात्याचार ” का ग्रहण है ।

“चकारोऽनुक्तसमुच्चयार्थकः –च शब्द जो बातें नहीं कहीं गयी हैं -उनका संकेतक माना जाता है ।

अत एव ” च शब्दाद्देशाचारोऽपि ” –ऐसा भाष्य श्रीगदाधर जी ने लिखा ।

यहां ” अपि ” शब्द कैमुत्यन्याय से कुलाचार और जात्याचार का बोधक है ;क्योंकि विवाहादि कार्यों में

जाति और कुल के अनुसार भी आचार में भिन्नता कहीं कहीं देखने को मिलती है ।

ग्रामवचन का अर्थ “भर्तृयज्ञ ” जो कात्यायन श्रौतसूत्र के व्याख्याता हैं उन्होने लोकवचन किया है –

ऐसा गदाधर जी ने अपने भाष्य में संकेत किया है ।

इसे लोकमत या शिष्टाचार — सदाचार कहते हैं । यह भी हमारे यहां प्रमाणरूप से अंगीकृत है ।

पूर्वमीमांसा में सर्वप्रथम प्रमाणों की ही विशद चर्चा हुई है । इसलिए उस अध्याय का नाम ही

” प्रमाणाध्याय “रख दिया गया है । इसमें शिष्टाचार को प्रमाण माना गया है । शिष्ट का लक्षण वहां

निरूपित है ।

” वेदः स्मृतिः सदाचारः ” –मनुस्मृति,2/12,

तथा “श्रुतिःस्मृतिः सदाचारः “–याज्ञवल्क्य स्मृति-आचाराध्याय,7,

इन दोनों में सदाचार को धर्म में प्रमाण माना है ।

किन्तु धर्म में परम प्रमाण भगवान् वेद ही हैं । उनसे विरुद्ध समृति या सदाचार प्रमाण नही हैं ।

पूर्वमीमांसा में वेदैकप्रमाणगम्य धर्म को बतलाया गया –जैमिनिसूत्र-1/1/2/2,

पुनः ” स्मृत्यधिकरण “-1/3/1/2, से वेदमूलक स्मृतियों को धर्म में प्रमाण माना गया ।

यदि कोई स्मृति वेद से विरुद्ध है तो वह धर्म में प्रमाण नही हो सकती –यह सिद्धान्त

” विरोधाधिकरण “-1/3//2/3-4, से स्थापित किया गया ।

इसी अधिकरण में सदाचार की प्रामाणिकता को लेकर यह निश्चित किया गया कि सदाचार स्मृति से

विरुद्ध होने पर प्रमाण नही है ।

जैसे दक्षिण भारत में मामा की लड़की के साथ भांजे का विवाह आदि ;क्योंकि यह सदाचार

” मातुलस्य सुतामूढ्वा मातृगोत्रां तथैव च ।

समानप्रवरां चैव त्यक्त्वा चान्द्रायणं चरेत् । ।

इस शातातप स्मृति से विरुद्ध है ।

भागवत के 10/61/23-25 श्लोकों द्वारा इस विवाहरूपी कार्य को अधर्म बतलाया गया है ।। अस्तु।।

तात्पर्य यह कि सदाचार से उसकी ज्ञापक स्मृति का अनुमान किया जाता है और उस स्मृति से

तद्बोधक श्रुति का अनुमान । जब आचार की विरोधिनी स्मृति बैठी है तो उससे वह बाधित हो

जायेगा ।

इसी प्रकार स्मृति भी स्वतः धर्म में प्रमाण नही है अपितु वेदमूलकत्वेन ही प्रमाण है ।

स्मृति से श्रुति का अनुमान किया जाता है । जब स्मृति विरोधिनी श्रुति प्रत्यक्ष उपलब्ध है तो उससे

स्मृति बाधित हो जायेगी –

” विरोधे त्वनुपेक्षं स्यादसति ह्यनुमानम् “–पूर्वमीमांसा,1/3/2/3,

सदाचार से स्मृति और स्मृति से श्रुति का अनुमान होता है । इन तीनों में श्रुति से स्मृति और स्मृति से

सदाचार रूपी प्रमाण दुर्बल है ।

निष्कर्ष यह कि स्मृति या वेदविरुद्ध आचार प्रमाण नही है ।

अब हम यह देखेंगे कि विवाह में जो फेरे पड़ते हैं –4 या 7,

इनमें किसको स्मृति या वेद का समर्थन प्राप्त है और कौन इनसे विरुद्ध है ?

यहां यह बात ध्यान में रखनी है कि स्मृति का अर्थ केवल मनु या याज्ञवल्क्य आदि महर्षियों

से प्रणीत स्मृतियां ही नहीं अपितु सम्पूर्ण धर्मशास्त्र है —

” श्रुतिस्तु वेदो विज्ञेयो धर्मशास्त्रं तु वै स्मृतिः “–2/10,

धर्मशास्त्र के अन्तर्गत स्मृतियां ,पुराण,इतिहास,कल्पसूत्र आदि आते हैं –

यह मीमांसकों का सिद्धान्त है
–-- ----- स्मृत्यधिकरण,1/3/1/1-2,

इसी से 4 या 7 फेरों का निश्चय हो जायेगा ।

विवाह में 4 कर्म ऐसे हैं जिनसे फेरों का सम्बन्ध है । अर्थात् उन चारों का क्रमशः सम्पादन करने के

बाद फेरे( परिक्रमा या भांवर ) का क्रम आता है । वे निम्नलिखित हैं —

1-लाजा होम—

इसमें कन्या को उसका भाई शमी के पल्लवों से मिश्रित धान के लावों को अपनी अञ्जलि से

कन्या के अञ्जलि में डालता है । कन्या उस समय खड़ी रहती है ।

यदि कन्या के भाई न हो तो यह कार्य उसके चाचा ,मामा का लड़का ,मौसी का पुत्र या फुआ

( बुआ -फूफू अर्थात् पिता की बहन ) का पुत्र आदि भी कर सकते हैं–

यह तथ्य श्रीगदाधर जी ने बहवृचकारिका को उद्धृत करके अपने भाष्य में दर्शाया है ।

पारस्करगृह्यसूत्र के प्रथम काण्ड की छठी कण्डिका में “कुमार्या भ्राता –”–1 में इसका कथन है ।

कन्या के अञ्जलि में लावा है । वर भी खड़ा होकर उसके दोनों हाथों से अपने हाथ लगाये रहता है

और कन्या खड़ी होकर ही उन लावों को मिली हुइ अञ्जलि से होम करती है –अर्यमणं देवं –

इत्यादि मन्त्रों से ।

ये तीनों मन्त्र बहुत महत्त्वपूर्ण हैं । अतः इनका अर्थ प्रस्तुत किया जा रहा है –

1-अर्यमणं देवं– सूर्य देव, जो ,अग्निं –अग्निस्वरूप हैं ,उनकी वरप्राप्ति के लिए, अयक्षत –पूजा की

है,स–वे,अर्यमा देवः–भगवान् सूर्य, नो–हमें,इतः–इस पितृकुल से , प्रमुञ्चतु –छुड़ायें, किन्तु ,

पत्युः –पति से ,मा –न छुड़ायें , स्वाहा — इतना बोलकर कन्या होम करती है ।

आज इस पद्धति का विधिवत् आचरण न करने का परिणाम इतना भयंकर दिख रहा है कि

पति या तो पत्नी को छोड़ देता है अथवा पत्नी पति को ।

2-मन्त्र –” आयुष्मानस्तु मे पतिरेधन्तां ज्ञातयो मम स्वाहा।

अर्थ– मे पतिः –मेरे पति, आयुष्मानस्तु –दीर्घायु हों,और मम– मेरे ,ज्ञातयो– बन्धु बान्धव,

एधन्तां –बढ़ें ,स्वाहा बोलकर पुनः होम ।

विवाह में इस मन्त्र के छूट जाने का पहला परिणाम “पति असमय ही किसी भी कारण से

अकालमृत्यु को प्राप्त होता है । या मृत्यु जैसे कष्टकारी रोगों से आक्रान्त हो जाता है ।

और पत्नी के पतिगृह पहुंचने के कुछ समय बाद ही बंटवारे की नौबत भी आ जाती है ।

जो आजकल का तथाकथित सभ्य समाज भुगत रहा है ।

3 मन्त्र –” इमाँल्लाजानावपाम्यग्नौ समृद्धिकरणं तव । मम तुभ्य च संवननं

तदग्निरनुमन्यतामियं स्वाहा ।

हे स्वामिन् ! , तव –तुम्हारी , समृद्धिकरणं –समृद्धि करने के लिए, इमाँल्लाजान् –इन लावों को ,

अग्नौ –अग्नि में , आवपामि –मैं डाल रही हूं । मम तुभ्य च — हमारा और तुम्हारा , जो, संवननं –

पारस्परिक प्रेम है , तत् –उसका , ये, अग्निः–अग्नि देव, अनुमन्यन्ताम्—अनुमोदन करें अर्थात्

सदृढ करें , और, इयं –अग्नि की पत्नी स्वाहा भी , स्वाहा –बोलकर पुनः होम ।

इस मन्त्र से होम किया जाता है कि दाम्पत्य जीवन सदा प्रेम से संसिक्त रहे ।

पर आज जो पण्डित आधे घण्टे में विवाह करा दे उसे कई शहरों में बहुत अच्छा मानते हैं ।

इस मन्त्र से होम न करने का परिणाम है –दाम्पत्य जीवन का कलहमय होना ।

अतः विवाहोपरान्त भविष्य में आने वाले इन सभी संकटों को रोकने के लिए हमारे ऋषियों ने हमें

जो कुछ दिया । उसकी अवहेलना का परिणाम आज घर घर में किसी न किसी रूप में दिख रहा है ।

अतः वेदों के इन पद्धतियों की वैज्ञानिकता और आदर्श समाज की रचना के इन अद्भुत प्रयोगों

हमें पुनः अपनाना होगा ।

2-सांगुष्ठग्रहण–यह कर्म लाजा होम के बाद वर द्वारा किया जाता है । वह वधू का दांया हाथ

अंगूठे सहित पकड़ता है ।

और ” गृभ्णामि से शरदः शतम् ” तक मन्त्र पढ़ता है ।

इस मन्त्र से वर वधू में देवत्व का आधान होता है । तथा बहुत से पुत्रों के प्राप्ति की प्रार्थना

की गयी है ।

पुत्र वही है जो पुत् नामक नरक से तार दे -पुत् नामकात् नरकात् त्रायते इति पुत्रः ।

इस मन्त्र के छूटने का परिणाम यह है कि आज कल लड़के अपने माता पिता का जीवन

नरकमय बना रहे है । तारना तो दूर की बात है ।

3-अश्मारोहण– अग्निकुण्ड के उत्तर की ओर रखे हुए ” पत्थर ” ( लोढ़ा आदि) के समीप जाकर

वर वधू के दायें पैर को पकड़कर उस पर रखता है ।

श्रीगदाधर ने अपने भाष्य मे सप्रमाण इसका उल्लेख किया है । और मिथिला मे यह आज भी वर

द्वारा किया जाता है |

इस समय वर स्वयं मन्त्र पढ़ता है–”आरोहे से लेकर पृतनायत ” तक ।

इस मन्त्रका अर्थ है कि कन्ये !तुम इस पत्थर पर आरूढ होकर इस प्रस्तर की भांति दृढ़ हो जाओ ।

और कलह चाहने वालों को दबाकर स्थिर रहो । और उन शत्रुओं को दूर हटा दो ।

यह कर्म कन्या द्वारा आज भी U.P आदि में देखा जाता है । कन्या उस लोढ़े को पैर के अंगूठे से

प्रहार करके फेंक देती है ।

यह कर्म अद्भुत भाव से ओतप्रोत है । यह कन्या को हर विषम परिस्थितियों में अविचल भाव देने के

साथ ही शत्रुदमन की अदम्य ऊर्जा भी प्रदान करता है ।

4-गाथागान — इसमें एक मन्त्र का गान वर करता है जिसमें नारी के उदात्त व्यक्तित्व की सुन्दर

झलक है ।

5- परिक्रमा या फेरे — अब वर वधू अग्नि की परिक्रमा करते हैं । इस समय वर –

” तुभ्यमग्रे से लेकर प्रजया सह ” तक 1 मन्त्र बोलता है ।

1 परिक्रमा (फेरा ) अब पूर्ण हुई |

इसी प्रकार पुनः पूर्ववत् लाजाहोम, सांगुष्ठग्रहण, अश्मारोहण, गाथागान और 1 परिक्रमा करनी है ।

तत्पश्चात् पुनः वही लाजाहोम से लेकर 1 परिक्रमा तक पूर्वकी भांति सभी कर्म करना है ।

इसका संकेत प्रथम काण्ड की सप्तमी कण्डिका में शुक्लयजुर्वेद के सूत्रकार महर्षि पारस्कर अपने

गृह्यसूत्रमें करते हैं —

” एवं द्विरपरं लाजादि ” इसका अर्थ ” हरिहरभाष्य और गदा धरभाष्य ” दोनो में यही किया गया कि

“कुमार्या भ्राता —-” –जहां से लाजाहोम आरम्भ है वहां से परिक्रमा पर्यन्त कर्म होता है ।

अब यहां हमारे समक्ष लाजा होम से लेकर परिक्रमा पर्यन्त सभी कर्मों का ३ बार अनुष्ठान

सम्पन्न हुआ ।

जिनमें 9 बार लावों की आहुति पड़ी ;क्योंकि १ -१ लाजाहोम में ३ –३ बार कन्या ने पूर्वोक्त मन्त्रों

से आहुति दिया है ।

3 बार सांगुष्ठग्रहण, 3 बार अश्मारोहण, 3 बार गाथागान और 3परिक्रमा (फेरे ) सम्पन्न हो चुकी है ।

अब चौथी बार केवल लाजा होम और परिक्रमा ही करनी है। पर इस चौथे क्रम में पहले से कुछ

भिन्नता है ।

क्या भिन्नता ?

इसे महर्षि पारस्कर स्वयं सूत्र द्वारा दिखाते हैं —

” चतुर्थं शूर्पकुष्ठया सर्वाँल्लाजानावपति–भगाय स्वाहेति। “

—-पारस्करगृह्यसूत्र,प्रथमकाण्ड,सप्तमीकण्डिका,5,

कन्या का भाई शूर्प में जो भी लावा बचा है वह सब सूप के कोने वाले भाग से कन्या के

अञ्जलि में दे दे और कन्या सम्पूर्ण लावों को ” भगाय स्वाहा “बोलकर अग्नि में होम कर दे ।

इसके बाद मौन होकर वर और वधु अग्नि की परिक्रमा करते हैं –इसमें “सदाचार “ही प्रमाण है |

देखें हरिहरभाष्यकार लिखते है –

” ततः समाचारात्तूष्णीं चतुर्थं परिक्रमणं वधूवरौ कुरुतः “|

इसे सर्वसम्मत पक्ष बतलाते हुए गदाधर भाष्य में “वासुदेव ,गंगाधर ,हरिहर और रेणु दीक्षित जैसे

भाष्यकारों के नाम का उल्लेख श्रद्धापूर्वक किया गया है |–प्रथम काण्ड ,सप्तमी कण्डिका,६

इस प्रकार शुक्लयजुर्वेद के महर्षि पारस्कररचित ” पारस्करगृह्यसूत्र” के अनुसार विवाह में 4 फेरे

(परिक्रमा )ही प्रमाणसिद्ध है । 7 फेरे केवल भ्रममात्र हैं ।

वाराणसी से छपी पण्डितप्रवर श्रीवायुनन्दन मिश्र जी की विवाहपद्धति तथा राजस्थान के

महापण्डित चतुर्थीलाल जी की पुस्तक में भी 4 फेरों का ही उल्लेख है ।

और 4 फेरे कई प्रान्तों मे पहले बताये भी जा चुके हैं । अतः यही मान्य और शास्त्रसम्मत है ।

यदि कोई कहे कि 7 फेरों का सदाचार हमारी परम्परा में चला आ रहा है और सदाचार का प्रामाण्य

सभी ने स्वीकार किया है । अतः यह ठीक है ।

तो मैं उस व्यक्ति से यही कहूंगा कि सदाचार तभी तक प्रमाण है जब तक उसके विरुद्ध कोई

स्मृति या श्रुति न हो ।

पर यहां तो साक्षात् 4 फेरों की सिद्धि शुक्ल यजुर्वेद के ” पारस्करगृह्यसूत्र “से ही हो रही है ।

अतः इसके विपरीत 7 फेरों वाला सदाचार प्रमाण नही है

बलि रहस्य

प्राचीन सनातन हिन्दू राष्ट्र नेपाल में  विविध शक्ति -  उपासनाऐं - 

गीता में देवव्रताः , पितृव्रताः , भूतेज्या : इस प्रकार सृष्टि के  कारणभूत  त्रिगुणों की विलक्षणता से  प्रकट    लौकिक उपासनाओं के तीन भेद और उनके फलों की चर्चा भगवान् ने संकेत की है ।  इसके साथ ही प्राचीन  आचार्यों ने यह सिद्धान्त गीता का स्थिर किया है  कि  देवोपासना अनिवार्य  कर्तव्य ही है  एवं  एक ही देवोपासना सकाम व निष्कामभाव से भोग व मोक्ष की हेतु सिद्ध होजाती है ।

नेपाल के  पश्चिमांचल की यदि हम चर्चा करें  तो , यह वह भाग है , जहॉ  पर  वैदिक , मिश्रित व तान्त्रिक : तीनों ही प्रकार की  आत्मोपासना विद्यमान् है ।

पश्चिमॉचल भाग में स्वयं भगवान् शिव के   असंख्य रुद्रावतारों की श्मशानी शक्तियों,    राजंशी देवताओं के  कार्यसाधक  श्मशानी शक्तियों का पूजन अपने शीर्ष पर है ।

महाभगवती दुर्गा , भगवती महाकालिका की   प्रेतवाहिनी,  आसुरी रक्त शोषण करने वालीं  दिव्य शक्तियॉ विविधरूपों में पूजित हैं ।

इसके अतिरिक्त  कुछ   स्थल/  परम्पराऐं  ऐसी भी हैं जहॉ पर   विविध प्रेतयोनि की शक्तियॉ , असुरलोक की विविध  शक्तियॉ पूजित होती हैं ।

यही कारण है कि   विविध प्रकार की  तान्त्रिक  पूजाविधियॉ, उन -उन  शक्ति के स्वभाव विभेद से  अनेक प्रकार की  पशुबलियॉ   (छाग(बकरा),  महिष(भैंसा) , सूकर (सुंवर) , कुक्कुट (मुर्गा) आदि )  बहुत ही सामान्य सी बात है । अनेक स्थलों पर  नरबलि की भी परम्परा रही है ।

श्री आद्य शंकराचार्य  ने निज  भाष्य में स्पष्ट  किया है कि अद्वय आत्मभाव की  अपेक्षा से प्राणिमात्र  असुर ही है । इस दार्शनिक दृष्टि से  पश्वादि विविध योनियों के     विविध  प्राणियों का रक्तपान/ बलिस्वीकरण  यदि ईश्वरीय शक्तियॉ करतीं हैं,  तो कोई आश्चर्य नहीं ।  #त्यागाच्छान्तिरनन्तरम् ।।

#ध्यातव्य (नोट ) :  कृपया   कुछ झोलाछाप ज्ञानी ध्यान दें कि वे समाज सुधार ,  अहिंसा  धर्म  का  व्यर्थ का  #अप्रासंगिक,  रटा रटाया  अपना    चुल्लू भर ज्ञान से प्रकट उपदेश इस वक्तव्य (पोस्ट) पर   न दिखायें ।    सीधे  अवरुद्ध (ब्लॉक) कर दिया जायेगा ।।

।। जय श्री  राम ।।।

Tuesday, 27 February 2018

वर्ण व शरीर का निर्माण कैसे

भ्रम : - वर्ण का आधार जन्म नहीं गुण(सत, रज, तम)  होता है। अपने गुणों के अनुसार ही व्यक्ति कर्म करता है और कर्म को भोगने के लिए ही वह भिन्न भिन्न योनियों में पृथ्वी पर आता है। अतः वर्ण का आधार जन्म को मानना शास्त्र विरुद्ध है।

उत्तर : - गुणों के अनुसार व्यक्ति कर्म करता है , ये अधूरा सत्य है , पूरा सत्य तो ये है कि उन्हीं सत्त्व, रज,  तम  संज्ञक गुणों की साम्यावस्था प्रकृति कहलाती है, उस त्रिगुणात्मिका  प्रकृति  से ही ब्राह्मण , क्षत्रिय , वैश्य और शूद्र के स्थूल, सूक्ष्म और कारण देह का निर्माण  होता है, और ये निर्माण ईश्वर की अध्यक्षतामें ही होता है - मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम् ० सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसम्भवाः ० इत्यादि ।।
आप कभी सांख्यशास्त्रवेत्ता  प्रामाणिक  गुरुजनों के  चरणचञ्चरीक होकर  बैठा कीजिये ।  जय श्री राम  ।।

अन्तःकरण के जिस विशेष मलादि दोष अथवा दोषों का संशोधन होना चाहिए, केवल तत्-तत् संशोधन के अनुसार ही ये व्यवस्था निर्धारित होगा । अन्य व्यवस्था उसके लिए न केवल निष्फल हैं, अपितु उससे प्रतिकूल प्रभाव भी होना संभव हैं, जैसे मानो बिना रोग निर्णय किये औषध सेवन करना । अतः आर्यशास्त्र के अनुसार ईश्वर के अनुग्रह से व्यक्तिविशेष की आध्यात्मिक विकास के लिए उपयुक्त धार्मिक प्रशिक्षण_का_निर्णय_करने_का_गुरुदायित्व से मुक्त कर दिया गया हैं । बस उन ईश्वर-निर्धारित नियमों का पालन करना चाहिए ।

इसी लिए जन्मना वर्णव्यवस्था ही एकमात्र उपाय हैं क्योंकि अगणित पूर्वजन्मों के संस्कार हैं चित्त में , अतः कौनसी व्यवस्था चित्तशुद्धि में सहायक होगी और कौनसी नहीं - यह एकमात्र सर्वज्ञ ईश्वर ही निर्धारण कर सकते हैं , वही तदनुरूप ब्राह्मणादि योनि में प्रेरण करते हैं ताकि उस योनि में पालनीय स्वधर्म उनका चित्तशुद्धि द्वारा अध्यात्मिक विकाश में सहायक होगा |

भोगभूमि व कर्मभूमि भेद क्यों किया भगवान ने

प्रश्न : - आचार्य जी , हमने ऐसा सुना है कि भारतभूमि पर ही कर्मकाण्ड फलित होते हैं अन्यत्र नहीं ,अतः वर्णाश्रम यहीं मिलता है ,  भारत भूमि ऐसी क्या विशेषता है ?

उत्तर :- कर्मभूमि होने से , कर्मभूमि और भोगभूमि - इस प्रकार भूमि विभेद होता है ।

प्रश्न : -  तो भगवान पर पक्षपात सिद्ध नहीं होता , कि दुर्लभ मानव देह देकर भी सारी भूमि को कर्मभूमि न बनाकर बस एक स्थान को बनाया , तब बाकी लोग तो पशुवत आहार, निद्रादि में ही रहेंगे , भगवत्परायण बुद्धि नहीं होगी उनकी |

उत्तर : - तत् तत् प्राणियों के तदुपार्जितपाप- पुण्यफल रूप  भोगों के  पूर्त्यर्थ जिस भू-  भागविशेष को विधाताने सृष्टकियाहै , वह भोग भूमि है । वैषम्यनैर्घृण्ये न सापेक्षत्वात् तथा हि दर्शयति  ब्रह्मसूत्र २।१।३३
यह आक्षेप तो वहॉ भी प्रसक्त हो सकता है, जहॉ पर दुर्लभ मनुष्य देह प्रदान करने  के उपरान्त भी  ईश्वर  सभी मनुष्यों को स्वस्थ पूर्णांग देह ,   यथोचित अन्न , वस्त्रादि प्रदान नहीं करता । यह आक्षेप वहॉ भी प्रसक्त हो सकता है कि दुर्लभ मनुष्य देह प्रदान करकेभी ईश्वर सभी को विशुद्ध  ब्राह्मण  देह नहीं प्रदान करता |  असूर्या नामते लोका०,     आसुरीं योनिमापन्ना ० इस गीताश्लोक पर मन्थन करें , आप पायेंगे कि ईश्वर   प्राणी के कर्मानुसार उसे  आसुरी योनि और लोक में फेंकता है |  जैसे एक वैद्य सभीरोगियों को मीठी औषधि नहीं देता, वरन् किसी को कड़वी , किसी कोमीठी देता है, किसी की तोशल्य क्रिया ही कर देता है , इस कृत्य में उसका कोई भी रागद्वेषादिन होकर सर्वहितभाव ही होता है , इसी प्रकार ईश्वरीय कृत्यको भी समझना चाहिये । भगवान् ने इस धरा को भोग और योग दोनों से विशिष्ट करके रचा है । जिससे कि भोगी और योगी -दोनों अपने मनोरथ पूर्ण कर सकें । जड़ चेतन गुन दोषमय बिस्व कीन्ह करतार।
संत हंस गुन गहहिं पय परिहरि बारि बिकार ।।

विधाता ने इस जड़-चेतन विश्व को गुण-दोषमय रचा है, किन्तु सन्त रूपी हंस दोष रूपी जल को छोड़कर गुण रूपी दूध को ही ग्रहण करते हैं ।.

ब्राह्मण शूद्र को तंग क्यों करतें है

प्रश्न: - प्रज्ञान शर्मा  to Brahman shudra ko apmanit kyun karte hai, Maine kabhi kisi shudra ko kisi brahman ko apmanit karte na dekha na suna.. uski jati ke naam p

उत्तर :- ये सब का मूल कारण   देश की डिवाइड एण्ड रूल वाली  कुटिल  राजनीति है ।

ऐसानहींहै कि केवल कुछेक ब्राह्मण ही शूद्र का अपमान करते हैं , अपितु कुछेक शूद्र भी हैं जो ब्राह्मण का अपमान करते हैं , ये सब  का कारण कईं बार तो   धर्म को न जानना होता है , कईं बार  सामने वाले के किये अपमान का बदला होता है ।

जिस प्रकार  देश के संविधान में अपराध करने की मनाही है ,   और अपराध करने वाले के लिये  सजा का भी प्रावधान है ।     फिर भी समाज में अपराध तो होता ही है । 

इसी प्रकार शास्त्र में ब्राह्मण व शूद्र का  प्रेमभाव  का विधानहै , फिर भी कोई नास्तिक मानसिकता का व्यक्ति  शास्त्र के विधान को तोड़ता है तो ये दोष तो उसका व्यक्तिगत है !

संख्याबल मुख्य नहीं है

प्रश्न: - वर्णाश्रम-धर्म यदि ईश्वरद्वारा संस्थापित है,संगोपित हैं , संरक्षित हैं फिर वर्तमान समय में समग्र सृष्टी छोडिए..केवल भरतखंड में ही वर्णाश्रम-धर्म का पालन क्यों नही हो रहा हैं? जन्मजात ब्राह्मण पशुवत् व्यवहार कर रहे हैं, क्षत्रिय पलायन कर रहे हैं एवं क्षुद्र वेद बांच रहे हैं.. अगर जाति-विहीतकर्म   कर्म-फल ही हैं तो जिव उसे भोगने कैसे बच जा रहा हैं? आज काफी सारे नियोग जैसे प्रबंधक, निषेधन अधिकारी, वैज्ञानिक आदि निर्माण हो चुके हैं जिससे समाज-कार्यव्यवस्था और-अधिक क्लिष्ट हो चुकी हैं... जो मोटे-तोर पर ४-वर्ण में बाटना असंभवसा जान पडता हैं... फिर इन संक्रमित कार्यो को ४-वर्ण में कैसे बाटेंगे?

आप मेधावी हैं.. आपसे उपरोक्त प्रश्नों के उत्तरों की सविनय प्रतिक्षा रहेगी...

उत्तर : -
यह बात सत्य है कि अधिकांशतः देखने में यह आ रहा है कि   कथित वर्णाश्रमावलम्बियों के  हीयमानविवेकविज्ञानहेतुवशात्  वर्तमान् में वर्णाश्रम व्यवस्था अपने आदर्श रूप से   अत्यन्त क्षीण हो गयी दीखती  है , किन्तु इस  यथार्थता  को आप अनदेखा नहीं कर सकते कि वर्णाश्रम व्यवस्था कहीं  है ही नहीं । 
विपरीत परिस्थितियों से धर्म का बाह्य स्वरूप भले ही  परिवर्तित दीखता है , किन्तु आत्मा फिर भी अपने अपरिवर्तनीय स्वरूप में विद्यमान् रहती है ।
आज भी ऐसे ब्राह्मण  आदि है , जो   काल की उद्भासित  इस विषम परिस्थिति में भी  यथोचित्  स्वधर्म का पालन कर रहे हैं ।  
यह सनातन सिद्धान्त ही है कि
धर्म की ग्लानि  ही होती है नाश नहीं होता है ।  अतः धर्म की ग्लानि होना -ये  कोई भी अप्राकृतिक घटना नहीं है ।

संख्या की जहॉ तक बात है , ईश्वर के लिये  शुद्ध वर्णों के संख्या बल का औचित्य नहीं, वरन् अस्तित्व का औचित्य है ।  सृष्टि के आरम्भ में  सृष्टि रचना के लिये  मात्र   मरीच्यादि सात ऋषि ही तो विधाता द्वारा प्रकट किये गये  थे  और प्रलय रूप  सृष्ट्यन्त में भी गिने चुने ऋषि ही तो  रह जाते हैं ।

इसी प्रकार ध्यातव्य है कि   पाण्डव पॉच ही थे , कौरव सौ थे, परन्तु ईश्वर (कृष्ण)  के लिये   पाण्डव पक्ष को चिरस्थाई रखते हुए कौरव पक्ष को समाप्त कर देना कोई समस्या  नहीं थी ।

एक ओर श्री भगवान् की नारायणी सेना थी , दूसरी ओर वे स्वयं खड़े थे, वो भी शस्त्रास्त्रादिविहीन ।

अल्पज्ञ, एकदेशीय और अल्पसामर्थ्य वाले होने से
क्लिष्टता हम और आप   देहधारियों  ही  दृष्टि में जान पड़ती  है , ईश्वर की दृष्टि में  यह क्लिष्टता  नहीं होती , अन्यथा यह  उसके सर्वनियन्तृत्व, सर्वेश्वरत्वादि गुणों वाले  कर्तुमकर्तुमन्यथाकर्तुं सर्वथासमर्थ ईश्वरकी परम  सामर्थ्यशक्ति  पर ही प्रश्नचिन्ह खड़ा करना होगा  !

धर्म का पालन करने वाला ,  ब्रह्मवेत्ता ,
एक भी कुलीन शुद्ध   ब्राह्मण  जब तक इस धरा धाम पर विराजमान् है, तब तक सनातनधर्म स्वयं साक्षात् इस धरा पर विराजित है,जब तक ईश्वर. स्वयं  है, तब तक धर्म भी  पूर्णतः  सनाथ और  अस्तित्ववान्  है ।    इस सत्य को भलीभॉति  जानने वाले ईश्वर के लिये  म्लेच्छों अथवा अनाचारियों का  संख्याधिक्य कोई महत्व नहीं रखता । जैसे  प्रदीप्त दावानल में असंख्य पतंगे स्वयं ही  आहूत होते हैं ,उसी प्रकार महाकाल परमेश्वर पृथ्वी में उत्पन्न  समस्त असुरों को इसी  पृथ्वी पर ही   तिरछा कर देते हैं ।

वेदादिक शास्त्र ग्रन्थों की प्रबलता का क्रम

वेदादिशास्त्रग्रन्थों की प्रबलता का क्रम ------------- माध्यन्दिनीय-वाजसनेयि-शुक्लयजुर्वेद के अनुयायियों के लिए शास्त्र-ग्रन्थों की मान्यता ...