Tuesday, 27 February 2018

क्या जन्म से ही ब्राह्मण होता है ?

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जन्म से ही क्यों होते हैं ब्राह्मण,  कर्म से क्यों नहीं हो  सकते ?

#उत्तर - जो जन्म से ब्राह्मण होते हैं , वे कर्म से ही ब्राह्मण हुए होते हैं । किन्तु कर्म का सिद्धान्त  न जानने से तथाकथित बुद्धिजीवी    लोग भ्रमित हो गये हैं ।

देखो ऐसे समझो -

हम जो भी पाप या पुण्य कर्म करते हैं , वे कर्म एक बीज की भॉति होता है ।

वो बीज  समय के गर्भ में संचित हो जाता है और फिर   हमें ही फल बनकर मिलता है।

ये है प्रकृति का नियम ।
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जो कर्म हम अभी वर्तमान् काल में  कर रहे हैं , उसे कहते हैं क्रियमाण कर्म ।   

और कर्म के फल को ही कहते हैं प्रारब्ध या भाग्य ।

क्रियमाण ---->( संचित )----->प्रारब्ध(फल) /भाग्य ।

बीज ------------------------------------> फल

जो कर्म आज हम कर रहे हैं, उसका फल आने वाले  कल में हमें मिलेगा ।  और वो फल  ईश्वर ही हमें देता है ।

कर्म का फल तीन रूप में मिलता है -

जाति , आयु और भोग ।।

इसीलिये   ब्राह्मण  जन्म से ही होते हैं ।

चार वर्ण भगवान् ने बनाये हैं - अर्थात्  जीव को  जाति रूपी  कर्मफल भगवान् ने ही दिये हैं ।

।। जय श्री राम  ।।

वर्ण का देहाश्रित है

सीधी बात :- नो बकवास।

वर्ण देहाश्रित है। देह जन्माश्रित है।
वर्ण कर्माश्रित नहीं है क्योंकि कर्म देह की अपेक्षा चिरस्थाई नहीं। वर्ण भौतिक अस्तित्व का परिचायक है और कर्म का आधार। इसीलिए कर्म वर्णाश्रित है, न कि वर्ण कर्माश्रित। कर्म बदलने से यदि वर्ण बदलेगा तो पूजा कराने वाला ब्राह्मण यदि धर्मरक्षा के लिए शस्त्र उठाये तो उसकी क्षत्रिय संज्ञा हो जाती, तो उसे अपनी पत्नी से ही ब्राह्मणीगमन का पाप लग जाता। कर्म वर्ण के ऊपर आश्रित है इसीलिए द्रोणाचार्य और युधिष्ठिर का कर्म उनके वर्ण पर प्रभाव न डाल सका।

पहले वर्ण मिलता है, तब उसके अनुरूप कर्म करने का अधिकार।
कोई भी कर्म करके उसके अनुरूप वर्ण चयन करने का अधिकार नहीं है।

उदाहरण :- पहले व्यक्ति आरबीआई का गवर्नर बनेगा फिर नोट छापेगा। पहले पद तब अधिकार। कोई भी व्यक्ति नोट छाप कर ये नहीं कह सकता है कि चूंकि मैं आरबीआई के गवर्नर का काम कर रहा हूँ तो मुझे वही पद दे दो। इसी प्रकार पूर्वजन्म की योग्यता के आधार पर इस जन्म का वर्ण मिलता है, फिर उसके अनुरूप कर्म करने का अधिकार। कर्म चुनने की स्वतंत्रता किसी को भी नहीं है। यदि ऐसा होता तो भिक्षाटन करने (ब्रह्मवृत्ति) के लिए उत्सुक अर्जुन को भगवान नहीं रोकते।

इज्याध्ययनदानानि विहितानि द्विजन्मनाम्।
जन्मकर्मावदातानां क्रियाश्चाश्रमचोदिताः॥
( श्रीमद्भागवत 7-11-13)
कुछ लोग सूत जी का उदाहरण देते हैं। सूत जी अयोनिज हैं। पृथु जी के यज्ञ में बृहस्पति और इंद्र जी का भाग मिल जाने से यज्ञ कुण्ड से सूत जी की उत्पत्ति हुई।
सूत जी ब्राह्मण ही हैं, सूत उनकी संज्ञा है, न कि सूत जाति। पद्मपुराण और वायुपुराण में उनके प्रादुर्भाव की कथा है।अग्निकुण्डसमुद्भूत: सूतो विमलमानसः।   लेकिन उनका पालन पोषण सन्तानहीन सूत परिवार ने किया अतः वे भी उसी से पुकारे गए। जैसे राजा उपरिचर तथा अद्रिका अप्सरा की कन्या सत्यवती तथा ब्राह्मण शक्तिपुत्र पराशर के सहयोग से उत्पन्न व्यास जी ब्राह्मण थे। कैवर्त के द्वारा लालन पालन होने से सत्यवती दाशकन्या नहीं बन गयी। ऋषि कण्व के द्वारा पालन पोषण करने मात्र से शकुंतला ब्राह्मणी नहीं बन गयी।

जैसे सूत रथी के रथ का कुशलता से संचालन करके उसके मार्ग को प्रशस्त करता है, जैसे गुरु शिष्य को मार्गदर्शन देकर उसका मार्ग प्रशस्त करता है, वैसे ही सूत जी ने मार्गदर्शन के माध्यम से ऋषियों का कल्याण किया, इसीलिए उन्हें सूत कहा गया।

वैसे कर्म देखें तो द्रोणाचार्य ने जीवन भर शस्त्र की ही कमाई खाई। लेकिन उन्हें कभी भी कहीं भी क्षत्रिय नहीं कहा गया। विदुर जी ने जीवन भर शास्त्रोपदेश ही किया लेकिन उन्हें किसी ने कभी भी ब्राह्मण नहीं कहा। कृष्ण जी ने अनेकों बार अर्जुन का रथ संचालन किया लेकिन उन्हें कभी किसी ने सूत नहीं कहा।

महर्षि रोमहर्षण जी को ऋषियों ने अपना सूत यानि मार्ग दर्शक स्वीकार किया और बाद मंे इन्हीं को सूत जी महाराज कहा गया, अल्पज्ञानी लोग सूत जी को सूत जाति से सम्बन्धित कर देते हैं, परन्तु सूत जी का जन्म अग्निकुण्ड से ऋषियों द्वारा यज्ञ के दौरान हुआ, जिनके दर्शन से ऋषियों के रोंगटे खड़े हो गये क्योंकि इनके ललाट पर इतना तेज था। इनका प्रथम नाम रोमहर्षण हुआ । महर्षि श्री सूत जी साक्षात् ज्ञान स्वरूप थे तभी तो शौनकादि ऋषियों ने इन्हें अज्ञानान्धकार का नाश करने वाला सूर्य कहा।
अज्ञानध्वान्तविध्वंसकोटिसूर्यसमप्रभ। सूताख्याहि कथासारं मम कर्ण रसायनम् ।।

कबीर दास ने कहा :- गुरु कुम्हार सिस कुम्भ है ...
तो इसका अर्थ यह नहीं कि सभी गुरु कुम्हार हैं, या सभी कुम्हार गुरु हैं।अपितु यह है कि जैसे अपरिपक्व मिट्टी से कुम्हार अपने मार्गदर्शन से, कभी मार कर, कभी सहलाकर परिपक्व घड़ा बनाता है, वैसे ही अपरिपक्व शिष्य को अपने मार्गदर्शन से गुरु परिपक्व बनाता है। इसीलिए गुरु का कुम्हार के समान होना बताया गया है। जैसे रोमहर्षण जी का सूत के समान वर्णन मिलता है।

श्रीभागवतानंद गुरु

ब्राह्मण अग्नि है

अग्निर्वै ब्राह्मणः!

अग्निर्मुखं तु देवानां!
मुखं यः सर्वदेवानां हव्यभुक् कव्यभुक् तथा!!
ब्राह्मणो अस्य मुखमासीत्!
द्विविधः ब्राह्मणत्वं अग्निर्मिव स्वकीयं कृत्रिमं वा! सूर्यादिषु स्वकीयं, अरणिर्मध्ये कृत्रिमं च!
ब्राह्मण हव्य और कव्य क्रिया का प्रतिनिधि विधि निषेध का प्रेरक -प्रयोक्ता अग्नि है! यह अग्नि जन्मना स्वभावतः है जैसे सूर्य में अग्नि जन्म से ही है, तद्वत् ही वशिष्ठादि में स्वभावतः जन्म से ही ब्राह्मणत्व है! पुनः यह अग्नि कृत्रिम भी (द्विज -दो प्रकार या दो बार या संस्कार रूप दूसरा जन्म होने ,जन्म लेने से) है अरणियों में मंथ क्रिया से प्रकट होने के समान विश्वामित्रादि में प्रकट अपवादस्वरुप प्रकट ब्राह्मणत्व के समान!अस्तु इस विषय में विद्वानों में  शंका नहीं होनी चाहिए !
बाल्मीकि रामायण में ब्राह्मणादर्श पूर्ण जितेन्द्रियता को कहा गया है, जो भगवान वशिष्ठ जी में पूर्णतः सिद्ध है!
विश्वामित्र जी का जितेन्द्रियत्व अर्जित होने एवं पुनः ब्रह्मर्षि वशिष्ठ जी द्वारा अनुमोदित होने से परम्परानुसारी हो गया, अतः वह सनातन मर्यादा के अनुकूल ही (परम्परा से प्राप्त होने से) है! जब तक उसका वशिष्ठ जी द्वारा अनुमोदन नहीं हुआ था तबतक वे ब्रह्मर्षि रूप में देवताओं, मुनियों द्वारा भी मान्य नहीं किये गये थे!
भगवान परशुराम जी भी भगवान श्रीराम, श्रीकृष्ण ,एवं भविष्य में भगवान श्रीकल्कि जी को अपने समस्त शस्त्रास्त्रों का त्यागकर कल्पांत में पूर्णतः ब्रह्मर्षिपद पर प्रतिष्ठित हो जाएँगे! इति!

"वेद का स्वरूप एवं प्रामाण्य"
-श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज
एवं
वाल्मीकि रामायण
से स्मृति पूर्वक साभार!
श्रीगुरूचरणकमलेभ्यो नमः!
सनातन धर्मो विजयते!!
हर हर हर महादेव!!!

Monday, 26 February 2018

यज्ञोपवीत संस्कार रहित व्यवहार में वर्ज्य है

यज्ञोपवीत संस्कार  के  नियम  से  विहीन  ब्राह्मण   व्यवहार -बहिष्कृत   हैं  -

जिस ब्राह्मण के पिता  या पितामह  आदि  का विधिवत्   यज्ञोपवीत-संस्कार  नही हुआ  ,  जिन्हें  वेद -शास्त्रों  की  जानकारी  नहीं , जो   आचार संस्कार  की  परम्परा से  विच्छिन्न  हैं  ,    वह उसके पिता , पूर्वज ब्रह्मघाती  हैं  , उनके  साथ  रोटी -बेटी  का  कोइ  सम्बन्ध  नही रखना  चाहिये  , ऐसे  ब्रह्मघाती  कुलों  को  अपने लिये   प्रायश्चित्त  की  कामना  करनी  चाहिये ।

यस्य पिता पितामह इत्यनुपेतौ स्यातां ते ब्रह्महसंस्तुताः,  तेषामभ्यागमनं भोजनं विवाहमिति च वर्जयेत्।  तेषामिच्छतां प्रयश्चितम्। (श्रीआपस्तम्बधर्मसूत्रम् १/१/३२-३४ )

इसी  प्रकार  सन्ध्यादि   से  विहीन ब्राह्मण  भी  अत्यन्त  निन्दनीय  जानने  चाहिये  । शास्त्र  मे  कहा  गया  है  कि  कलियुग  मे  अनगिनत   राक्षस  ब्राह्मण कुलों  मे  जन्म  लेंगे ।  ऐसे  ब्राह्मण नामधारी   राक्षसों  से  कुलीन सभ्य सुसंस्कृत   ब्राह्मणों  को  सदैव  सावधान  रहना  चाहिये  ।  अस्तु ।

नीतिशास्त्र  में  भी  कहा  गया  है  कि  जिनके पास विद्या, तप, ज्ञान, शील, गुण और धर्म में से कुछ नहीं ,  ऐसे  वह मनुष्य   धरती  के  भार   हैं  ,  तथा  वे   ऐसा जीवन व्यतीत करते हैं जैसे एक मृग  (वनचर पशु )  -

येषां न विद्या न तपो न दानं ज्ञानं न शीलं न गुणो न धर्मः ।
ते मर्त्यलोके  भुविभारभूता मनुष्यरूपेण मृगाश्चरन्ति ।। 

।। जय  श्री  राम  ।।

शर्मा नाम रहस्य

साभार- श्री आद्य शंकराचार्य संदेश
        #शर्मा_नाम_रहस्य-

संस्कृत के #शर्म शब्द से  शर्मा शब्द बना है ।  शास्त्र में #शर्मवद्_ब्राह्मणो_ज्ञेयो ( मनुस्मृति) कहा गया है अर्थात् ब्राह्मण को शर्मा नाम से  जानना चाहिये  ।

अतः शर्मा सम्बोधन  ब्राह्मणमात्र का परिचायक होता है , आजकल  के पाश्चात्य प्रभाव से ये  #शर्मा सम्बोधन के व्यक्तिगत होकर रह गया है , जबकि शास्त्रीय दृष्टि से ऐसी नही है ।

शर्मा सम्बोधन ब्राह्मणजातिमात्र का वाचक होता है , जबकि अन्य उपनाम यथा दूबे, तिवारी, जोशी, पन्त, पाठक आदि  उन उन ब्राह्मणों के वैशिष्ट्य की दृष्टि से लोकविख्यात हुए  हैं  किन्तु शर्मा - ये  सम्बोधन ब्राह्मणजातिमात्र का सम्बोधक होता है ।

अतः प्रत्येक  ब्राह्मण को  स्वयं को  आत्मपरिचय में  अमुक शर्मा   हूं - ये कहना चाहिये , ऐसी प्राचीन आचार्यों ने व्यवस्था दी है ।

ये बात और है कि आजकल  शुद्ध,  अनुलोम  ब्राह्मणों से लेकर प्रतिलोम  ब्राह्मणेतर पर्यन्त सभी इस  नाम को अंगीकृत कर लिये हैं , अतः जो कोई भी  'शर्मा जी नमस्ते' ले लेता है,  किन्तु शास्त्रीय दृष्टि से केवल एक उच्च कुलीन विशुद्ध ब्राह्मण में ही यह पद प्रयोग हो  सकता है ।

शास्त्रीय रीति के अनुसार शर्म, वर्म, गुप्त तथा  दास ( शर्मा , वर्मा, गुप्ता, दास) - इन चार सम्बोधक  पदों से ही ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र  जाति का वाचन होता है ।

।। जय श्री राम ।।

Sunday, 25 February 2018

कम्प्यूटर आदि सब वेदमूलक है

आप धार्मिक हो तो फेसबुक  कम्प्यूटर आदि क्यों चलाते हो ?

उत्तर :  मौलिक अधिकारी होने से ।

फेसबुक , कम्प्यूटर , बैटरी आदि जितने भी यान्त्रिक संसाधन आज समाज में हैं, ये सबका मूल  वेद है ।

धर्म और   विद्या दोनों का मूल  वेद है ।

फेसबुक की संस्थापना के पीछे दिव्य नरेन्द्र और नीमकरोली बाबा की भूमिका हो या कम्प्यूटर  के  बीज के पीछे पुरी पीठ के शंकराचार्य  का वैदिक गणितीय ज्ञान  अथवा बैटरी  की अवधारणा के पीछे अगस्त्य संहिता के सूत्र ;  विधिक रुपमें इस मौलिक अधिकार तो हम आस्तिकों का ही हुआ !

यह सत्य किसी से छिपा नहीं है कि वैश्विक स्तर पर भारतीय ज्ञानविज्ञान को  विकसित कर अपने नाम से  अंकित कराने का विदेशी षडयन्त्र  वर्षों से चला आता रहा है ।

गुरुत्वाकर्षण सिद्धान्त, डीएनए विज्ञान , परमाणु अवधारणा, विमान विद्या ,  खगोलीय विज्ञान , चिकित्सा विज्ञान आदि जितनी भी  वैज्ञानिक  विधाऐं आज विश्वपटल पर संस्थापित हैं , उन सबका मूल बीज हमारे वेदों   से, हमारे  आस्तिक आचार्यों से   ही विश्वविख्यात  शोधार्थियों ने प्राप्त किया है ।

भूतकाल  में जो कुछ घटित हुआ है  , वर्तमान् में जो घटित हो रहा है तथा भविष्य में भी जो घटित होगा , वह  सब हमारे     वेद  से    प्रसिद्ध है ।

भूतं भव्यं भविष्यञ्च सर्वं वेदात् प्रसिद्ध्यति ।।

वस्तुतः  यह प्रश्न तो  हमें आपसे  पूछना चाहिये  कि तुम यदि धार्मिक नहीं हो , आस्तिक नहीं हो  तो  तुम ये सब संसाधन क्यों चलाते हो ?

।। जय श्री राम  ।।

शर्मा, वर्मा आदि का प्रमाण

#दास शब्द की मौलिकता -

वैदिक  शास्त्रों   में शर्मा , वर्मा , गुप्ता और दास , ये चार उपनाम क्रमशः ब्राह्मण , क्षत्रिय , वैश्य व शूद्र से सम्बद्ध माने गये हैं !

शास्त्र  कहते  हैं  - 

ब्राह्मण का  शर्मा  शब्द से  युक्त , क्षत्रिय का  रक्षा  शब्द से युक्त , वैश्य का  पुष्टि  शब्द से युक्त और  शूद्र  का  'दास'  शब्द  से  युक्त  उपनाम रखना  चाहिए -

शर्मवद् ब्राह्मणस्य स्याद्राज्ञो रक्षासमन्वितम्।
वैश्यस्य पुष्टिसंयुक्तं शूद्रस्य प्रेष्यसंयुतम् ।। (मनुस्मृतिः २/३२ )

इस श्लोक की टीका  में  मन्वर्थमुक्तावलीकार  आचार्य श्री  कुल्लूक भट्ट स्पष्ट  उदाहरण  देते  हुए  कहते  हैं  -

//////////उदाहरणानि  तु  -  शुभशर्मा , बलवर्मा , वसुभूतिः  दीनदास इति ।  तथा  च  -
शर्म देवश्च विप्रस्य वर्म त्राता च भूभुजः ।
भूतिदत्तश्च वैश्यस्य  #दासः_शूद्रस्य_कारयेत् ।। /////////////

और  फ़िर्  विष्णुपुराण  का  प्रमाण  अवतरित  करते  हुए  आचार्य  श्री  कुल्लूक भट्ट कहते हैं -

////////विष्णुपुराणेsप्युक्तम् -

शर्मवद्  ब्राह्मणस्योक्तं  वर्मेति क्षत्रसंयुतम् ।
#गुप्तदासात्मकं_नाम_प्रशस्तं_वैश्यशूद्रयोः ।। (विष्णुपुराणम् ३।१०।०९ ) //////

ये तो हुई  #दास#  शब्द  पर  पारम्परिक सनातनी वैदिक दृष्टि !

..........................इसी के साथ  भारत के सनातन हिन्दू धर्म की #दास_प्रथा पर आधुनिक कथित सामाजिक विचारकों व इतिहासकारों की दृष्टि इस वक्तव्य (पोस्ट ) में अवतरित किये गए कुछ पृष्ठों के माध्यम से अवलोकन करें ! पुस्तक : प्राचीन भारत का सामाजिक एवं आर्थिक इतिहास  ।। लेखक - डॉ० शिवस्वरूप सहाय ।।

।। जय श्री राम ।।

वेदादिक शास्त्र ग्रन्थों की प्रबलता का क्रम

वेदादिशास्त्रग्रन्थों की प्रबलता का क्रम ------------- माध्यन्दिनीय-वाजसनेयि-शुक्लयजुर्वेद के अनुयायियों के लिए शास्त्र-ग्रन्थों की मान्यता ...