Friday, 6 October 2017

गोपी गीत (अर्थ सहित)


जयति तेsधिकं जन्मना ब्रज:श्रयत इन्द्रिरा शश्व दत्र हि
द्यति द्दश्यतां दिक्षु तावका स्त्वयि धृतासवस्त्वां विचिन्वते !!

भवार्थ - हे प्रियतम प्यारे! तुम्हारे जन्म के कारण वैकुण्ठ आदि लोको से भी अधिक ब्रज की महिमा बढ़ गयी है तभी तो सौंदर्य और माधुर्य की देवी लक्ष्मी जी स्वर्ग छोडकर यहाँ की सेवा के लिए नित्य निरंतर निवास करने लगी है हे प्रियतम देखो तुम्हारी गोपियाँ जिन्होंने तुम्हारे चरणों में ही अपने प्राण समर्पित कर रखे है वन वन में भटक ढूँढ रही है.

!! शरदुदाशये साधु जातसत सरसिजोदरश्रीमुषा द्द्शा
सुरतनाथ तेsशुल्दासिका वरद निघ्न्तो नेह किं वधः !!

भवार्थ - हे हमारे प्रेम पूरित ह्रदय के स्वामी ! हम तो आपकी बिना मोल की दासी है तुम शरदऋतु के सुन्दर जलाशय में से चाँदनी की छटा के सौंदर्य को चुराने वाले नेत्रो से हमें घायल कर चुके हो. हे प्रिय !अस्त्रों से हत्या करना ही वध होता है, क्या इन नेत्रो से मरना हमारा वध करना नहीं है.

!! विषजलाप्ययाद व्यालराक्षसादवर्षमारुताद वैद्युतानलात
वृषमयात्मजाद विश्वतोभया द्दषभ ते वयं रक्षिता मुहु: !!

भवार्थ - हे पुरुष शिरोमणि ! यमुना जी के विषैले जल से होने वाली मृत्यु, अजगर के रूप में खाने वाला अधासुर, इंद्र की वर्षा आकाशीय बिजली, आँधी रूप त्रिणावर्त, दावानल अग्नि, वृषभासुर और व्योमासुर आदि से अलग-अलग समय पर सब प्रकार के भयो से तुमने बार-बार हमारी रक्षा की है.

!! न खलु गोपिकानन्दनो भवानखिलदेहिनामन्तरादृक
विखनसार्थितो, विश्वगुप्तये सख उदेयिवान सात्वतां कुले !!

भवार्थ - हे हमारे परम सखा ! आप केवल में यशोदा के ही पुत्र नहीं हो अपितु समस्त देहधारियों के हृदयों में अन्तस्थ साक्षी हैं.चूँकि भगवान ब्रह्मा ने आपसे अवतरित होने एवं ब्रह्माण्ड की रक्षा करने के लिए प्रार्धना की थी इसलिए अब आप यदुकुल में प्रकट हुए हैं.

!! विरचिताभयं वृष्णिधुर्य ते चरणमीयुषां संस्रृतेयात
करसरोरुहं कान्त कामदं शिरसि धेहि नः श्रीकरग्रहम !!

भवार्थ - हे वृषिणधूर्य ! तुम अपने प्रेमियों की अभिलाषा को पूर्ण करने में सबसे आगे हो जो लोग जन्म मृत्यु रूप संसार के चक्कर से डरकर तुम्हारे चरणों की शरण ग्रहण करते है उन्हें तुम्हारे कर कमल अपनी छत्र छाया में लेकर अभय कर देते हो सबकी लालसा अभिलाषा को पूर्ण करने वाला वही करकमल जिससे तुमने लक्ष्मी जी के हाथ को पकडा है प्रिये, उसी कामना को पूर्ण करने वाले कर कमल को हमारे सिरों के ऊपर रखें.

!! ब्रजजनार्तिहन्वीर योषितां निजजनस्मयध्वंसनस्मितः
भज सखे भवत्किंकरी: स्मनो जलरुहाननं चारू दर्शय !!

भवार्थ - हे वीर शिरोमणि श्यामसुन्दर! तुम सभी व्रजवासियो के दुखो को दूर करने वाले हो तुम्हारी मंद-मंद मुस्कान की एक झलक ही तुम्हारे भक्तो के सारे मान मद को चूर चूर करती है. हे मित्र ! हम से रूठो मत, प्रेम करो, हम तो तुम्हारी दासी है तुम्हारे चरणों में निछावर है, हम अबलाओ को अपना वह परम सुन्दर सांवला मुखकमल दिखलाओ.

!! प्रणतदेहिनां पापकर्षनं तृणचरानुगं श्रीनिकेतनम
फणिफणार्पितं तेपदाम्बुजं कृणु ‌कुचेषु नः, कृन्धि हृच्छयम् !!

भवार्थ - आपके चरणकमल आपके शरणागत समस्त देहधारियों के विगत पापों को नष्ट करने वाले है. लक्ष्मी जी सौंदर्य और माधुर्य की खान है वह जिन चरणों को अपनी गोद में रखकर निहारा करती है वह कोमल चरण बछडो के पीछे-पीछे चल रहे है उन्ही चरणों को तुमने कालियानाग के शीश पर धारण किया था तुम्हारी विरह की वेदना से ह्रदय संतृप्त हो रहा है तुमसे मिलन की कामना हमें सता रही है, हे प्रियतम ! तुम उन शीतलता प्रदान करने वाले चरणों को हमारे जलते हुए वक्ष स्थल पर रखकर हमारे ह्रदय की अग्नि को शान्त कर दो.

!! मधुरया गिरा वळ्गुवाक्यया बुधमनोज्ञया पुष्करेक्षण
विधिकरीरिमा वीर मुह्यतीरधरसीधुनाssप्यायस्व न : !!

भवार्थ - हे कमल नयन ! तुम्हारी वाणी कितनी मधुर है तुम्हारा एक-एक शब्द हमारे लिए अमृत से बढकर मधुर है बड़े-बड़े विद्वान तुम्हारी वाणी से मोहित होकर अपना सर्वस्व निछावर कर देते है उसी वाणी का रसास्वादन करके तुम्हारी आज्ञाकारिणी हम दासी मोहित हो रही है, हे दानवीर ! अब तुम अपना दिव्य अमृत से भी मधुर अधररस पिलाकर हमें जीवन दान दो.

!! तव कथामृतं तप्तजीवनं कविभिरीडीतं कल्मषापहम्
श्रवणमंडगलं श्रीमदाततं भुवि गृणन्ति ये, भूरिदा जनाः !!

भवार्थ - आपके शब्दों का अमृत तथा आपकी लीलाओं का वर्णन इस भौतिक जगत मेंकष्ट भोगने वालों के जीवन और प्राण हैं. ज्ञानियों महात्माओ भक्तो कवियों ने
तुम्हारी लीलाओ का गुणगान किया है जो सारे पाप ताप को मिटाने वाली है जिसके सुनने मात्र से परम मंगल एवम परम कल्याण का दान देने वाली है तुम्हारी लीला कथा परम सुन्दर मधुर और कभी न समाप्त होने वाली है जो तुम्हारी लीला का गान करते है वह लोग वास्तव में मृत्यु लोक में सबसे बड़े दानी है.

! ! प्रहसितम् प्रिय प्रेमवीक्षणं विहरणं च ते ध्यानमंङगलम्
रहसि संविदो या हदिस्पृशः कुहक नो मनः क्षोभयन्ति ‍‌हि !!

भवार्थ - आपकी हँसी, आपकी मधुर प्रेम- भरी चितवन, आपके साथ हमारे द्वारा भोगी गई घनिष्ट लीलाएं तथा गुप्त वार्तालाप , इन सबका ध्यान करना मंगलकारी है.और ये हमारे ह्दयों को स्पर्श करती है उसके साथ ही, हे छलिया ! वे हमारे मनों को अतीव क्षुब्ध भी करती है.

!!चलसि यदब्रजाच्चारयन्पशून नलिनसुन्दरं नाथ ते पदम्
शिलतृणाडकुरैः सीदतीति नः कलिलतां मनः, कान्त गच्छति !!

भवार्थ - हे स्वामी, हे प्रियतम ! तुम्हारे चरण कमल से भी कोमल और सुन्दर है जब आप गौवें चराने के लिए गाँव छोडकर जाते है तो हमारे मन इस विचार से विचलित हो उठते है कि कमल से भी अधिक सुन्दर आपके पाँवों में अनाज के नोकदार तिनके तथा घास- फूस एंव पौधे चुभ जाऐंगे. ये सोचकर ही हमारा मन बहुत वेचैन हो जाता है.

!! दिनपरिक्षये नीलकुन्तलैवनरूहाननं विभ्रतवृतम्
धनरजवलं , दर्शयन्मुहुमनसि नः स्मरं वीर यच्छसि !!

भवार्थ - हे हमारे वीर प्रियतम ! दिन ढलने पर जब तुम वन से घर लौटते हो तो हम देखती है कि तुम्हारे मुखकमल पर नीली-नीली अलके लटक रही है, और गौओ के खुर से उड़ उड़कर घनी धूल पड़ी हुई है तुम अपना वह मनोहारी सौंदर्य हमें दिखाकर हमारे ह्रदय को प्रेम पूरित करके मिलन की कामना उत्पन्न करते हो.

!! प्रणतकामदं पद्मजार्चितं धरणिमण्ड़नं ध्येयमापदि
चरणपडकजं , शंतमं च ते रमण नः स्तनेष्वर्पयाधिहन!!

भवार्थ - हे प्रियतम ! तुम ही हमारे दुखो को मिटाने वाले हो, तुम्हारे चरण कमल शरणागत भक्तो की समस्त अभिलाषाओं को पूर्ण करने वाली है, इन चरणों के ध्यान करने मात्र से सभी व्याधि शांत हो जाती है. हे प्यारे ! तुम अपने उन परम कल्याण स्वरुप चरण कमल हमारे वक्ष स्थल पर रखकर हमारे ह्रदय की व्यथा को शांत कर दो.

!! सुरतवर्धनं शोकनाशनं,स्वरितवेणुना सुष्ठुः चुम्वितम्
इतररागविस्मारणं नृणां वितर वीर नस्तेsधराम्रृतम !!

भवार्थ - हे वीर ! आप अपने होंठों के उस अमृत को हममें वितरित कीजिये जो माधुर्य हर्ष को बढाने वाला और शोक को मिटाने वाला है उसी अमृत का आस्वादन, आपकी ध्वनि करती हुई वंशी लेती है और लोगों को अन्य सारी आसक्तियां भुलवा देती है.

!! अटति यद्भवानहिनि काननं त्रुटियुगायते त्वामपश्यताम्
कुटिलकुन्तलं श्रीमुखं च ते जड उदीक्षतां पक्ष्मकृतद्दशाम् !!

भवार्थ - हे हमारे प्यारे ! दिन के समय तुम वन में विहार करने चले जाते हो तब तुम्हारे बिना हमारे लिए एक क्षण भी एक युग के समान हो जाता है और तुम संध्या के समय लौटते हो तथा घुँघराली अलकावली से युक्त तुम्हारे सुन्दर मुखारविन्द को हम देखती है उस समय हमारी पलको का गिरना हमारे लिए अत्यंत कष्टकारी होता है तब ऐसा महसूस होता है कि इन पलको को बनाने वाला विधाता मूर्ख है.

!! पतिसुतान्वयभातृबान्धवानतिविलडघ्य तेsन्त्यच्युतागताः
गतिविदस्तवोदगीत्मोहिताः कितब योषितः कस्त्यजेन्निशि !!

भवार्थ - हे हमारे प्यारे श्यामसुन्दर ! हम अपने पति, पुत्र, सभी भाई, बंधू, और कुल परिवार को त्यागकर उनकी इच्छा और आज्ञा का उल्लघन करके तुम्हारे पास आई है. हम तुम्हारी हर चाल को जानती, हर संकेत को समझती है. और तुम्हारे मधुर गान से मोहित होकर यहाँ आई है हे कपटी इस प्रकार रात्रि को आई हुई युवतियों को तुम्हारे अलावा और कौन छोड सकता है.

!! रहसि संविदं हच्छयोदयं प्रहसिताननं प्रेमवीक्षणम्
बृहदुर श्रियो, वीक्ष्य धाम ते मुहरतिस्पृहा, मुहयते मनः !!

भवार्थ - हे प्यारे ! एकांत में तुम मिलन की इच्छा और प्रेमभाव जगाने वाली बाते किया करते थे हँसी मजाक करके हम छेड़ते थे तुम प्रेम भरी चितवन से हमारी ओर देख्रकर मुस्करा देते थे तुम्हारा वक्षस्थल, जिस पर लक्ष्मी जी नित्य निवास करती है, हे प्रिये! तब से अब तक निरंतर हमारी लालसा बढती ही जा रही है ओर हमारा मन तुम्हारे प्रति अत्यंत आसक्त होता जा रहा है.

!! ब्रजवनौकसां ,व्यक्तिरडग ते वृजिनहन्त्र्यलंविश्वमंडगलम्
त्यज मनाक् च नस्त्वत्स्पृहात्मनां स्वजनहद्रुजां यन्निषूदनम !!

भवार्थ - हे प्यारे ! तुम्हारी यह अभिव्यक्ति ब्रज वनवासियों के सम्पूर्ण दुख ताप को नष्ट करने वाली ओर विश्व का पूर्ण मंगल करने के लिए है हमारा ह्रदय तुम्हारे प्रति लालसा से भर रहा है कुछ ऐसी औषधि प्रदान करो जो तुम्हारे भक्त्जनो के ह्रदय-रोग को सदा-सदा के लिए मिटा दे.

!! यत्ते सुजातचरणाम्बुरूहं स्तनेषु भीताः शनैः प्रिये दधीमहि ककशेषु
तेनाटवीमटसि तद्व्यथते न किंस्वित कूपापदिभिभ्रमतिधीर्भवदायुषां नः !!

भवार्थ - हे कृष्णा ! तुम्हारे चरण कमल से भी कोमल है उन्हें हम अपने कठोर स्तनों पर भी डरते-डरते बहुत धीरे से रखती है जिससे आपके कोमल चरणों में कही चोट न लग जाये उन्ही चरणों से तुम रात्रि के समय घोर जंगल में छिपे हुए भटक रहे हो, क्या कंकण, पत्थर, काँटे, आदि की चोट लगने से आपके चरणों में पीड़ा नहीं होती? हमें तो इसकी कल्पना मात्र से ही अचेत होती जा रही है. हे प्यारे श्यामसुन्दर ! हे हमारे प्राणनाथ ! हमारा जीवन तुम्हारे लिए है हम तुम्हारे लिए ही जी रही है हम सिर्फ तुम्हारी ही है.

श्यामा प्यारी कुञ्ज बिहारी जै जै  श्रीहरिदास दुलारी

Tuesday, 3 October 2017

।। श्री मधुराष्टकम् ।। ससरलार्थ


अधरं मधुरं वदनं मधुरं,
नयनं मधुरं हसितं मधुरम्।
हृदयं मधुरं गमनं मधुरं
मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ॥१॥

*(हे कृष्ण !) आपके होंठ मधुर हैं, आपका मुख मधुर है, आपकी ऑंखें मधुर हैं, आपकी मुस्कान मधुर है, आपका हृदय मधुर है, आपकी चाल मधुर है, मधुरता के ईश हे श्रीकृष्ण! आपका सब कुछ मधुर है ॥१॥*

वचनं मधुरं चरितं मधुरं
वसनं मधुरं वलितं मधुरम्।
चलितं मधुरं भ्रमितं मधुरं
मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ॥२॥

*आपका बोलना मधुर है, आपके चरित्र मधुर हैं, आपके वस्त्र मधुर हैं, आपका तिरछा खड़ा होना मधुर है, आपका चलना मधुर है, आपका घूमना मधुर है, मधुरता के ईश हे श्रीकृष्ण! आपका सब कुछ मधुर है ॥२॥*

वेणुर्मधुरो रेणुर्मधुरः
पाणिर्मधुरः पादौ मधुरौ।
नृत्यं मधुरं सख्यं मधुरं
मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ॥३॥

*आपकी बांसुरी मधुर है, आपके लगाये हुए पुष्प मधुर हैं, आपके हाथ मधुर हैं, आपके चरण मधुर हैं , आपका नृत्य मधुर है, आपकी मित्रता मधुर है, मधुरता के ईश हे श्रीकृष्ण! आपका सब कुछ मधुर है।*

गीतं मधुरं पीतं मधुरं
भुक्तं मधुरं सुप्तं मधुरम् ।
रूपं मधुरं तिलकं मधुरं
मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ॥४॥

*आपके गीत मधुर हैं, आपका पीना मधुर है, आपका खाना मधुर है, आपका सोना मधुर है, आपका रूप मधुर है, आपका टीका मधुर है, मधुरता के ईश हे श्रीकृष्ण! आपका सब कुछ मधुर है ॥४॥*

करणं मधुरं तरणं मधुरं
हरणं मधुरं रमणं मधुरम्।
वमितं मधुरं शमितं मधुरं
मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ॥५॥

*आपके कार्य मधुर हैं, आपका तैरना मधुर है, आपका चोरी करना मधुर है, आपका प्यार करना मधुर है, आपके शब्द मधुर हैं, आपका शांत रहना मधुर है, मधुरता के ईश हे श्रीकृष्ण! आपका सब कुछ मधुर है ॥५॥*

गुंजा मधुरा माला मधुरा
यमुना मधुरा वीची मधुरा।
सलिलं मधुरं कमलं मधुरं
मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ॥६॥

*आपकी घुंघची मधुर है, आपकी माला मधुर है, आपकी यमुना मधुर है, उसकी लहरें मधुर हैं, उसका पानी मधुर है, उसके कमल मधुर हैं, मधुरता के ईश हे श्रीकृष्ण! आपका सब कुछ मधुर है ॥६॥*

गोपी मधुरा लीला मधुरा
युक्तं मधुरं मुक्तं मधुरम् ।
दृष्टं मधुरं शिष्टं मधुरं
मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ॥७॥

*आपकी गोपियाँ मधुर हैं, आपकी लीला मधुर है, आप उनके साथ मधुर हैं, आप उनके बिना मधुर हैं, आपका देखना मधुर है, आपकी शिष्टता मधुर है, मधुरता के ईश हे श्रीकृष्ण! आपका सब कुछ मधुर है ॥७॥*

गोपा मधुरा गावो मधुरा
यष्टिर्मधुरा सृष्टिर्मधुरा।
दलितं मधुरं फलितं मधुरं
मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ॥८॥

*आपके गोप मधुर हैं, आपकी गायें मधुर हैं, आपकी छड़ी मधुर है, आपकी सृष्टि मधुर है, आपका विनाश करना मधुर है, आपका वर देना मधुर है, मधुरता के ईश हे श्रीकृष्ण! आपका सब कुछ मधुर है ॥८॥*

Sunday, 1 October 2017

तुरीय की प्राप्ति का उपाय क्या है ?


नारायण ! तुरीय की प्राप्ति का उपाय है वासनारूपी विषयोच्छिष्ट का नाश । विषयग्रहण के समय उससे प्रभावित न होने से ही यह सम्भव है । इन्द्रियों द्वारा विषय ग्रहण काल में भी उनसे प्रभावित न होना क्यों आवश्यक है ? क्यों कि विषय बहुत शीघ्र मनुष्य को जर्जरित कर देते हैं । यथा पर्वत श्रृङ्गों पर वायु के निरन्तर तेजी से चलते रहने से वृक्ष शीघ्र जीर्ण होते हैं । इसी प्रकार मन दि अपने वेग से चलता रहे तो वह जर्जरित होकर इतना शक्तिहीन हो जाता है कि परमात्म तत्व को प्राप्त करने की शक्ति खो देता है । अतः अन्तर्दृष्टि को शास्त्रों ने साधन बताया । इसे कैसे किया जाय ?
मेरे नारायण ! मन में एक विलक्षण शक्ति है कि एक साथ कई कार्य कर सकता है । उसकी शक्ति को अभ्यास से बढ़ाया जा सकता है । यथा कोई व्यक्ति मोटर चलाते हुए पास में बैठे हुए व्यक्ति से तरह - तरह की बाते भी करता जाता है और मौटर चलाने पर भी ध्यान रखता है । शतावधानि भी सुने जाते हैं । अनुभव के अन्दर जो काल आता है उसमें युगपत् मन की दो जगह प्रतीति हो रही है । प्रत्येक ज्ञान में ही मन के दो तीन रूप बन ही जाते हैं । पीला  घड़ा देखना एक ऐसी क्रिया है कि इसमें रंग का ज्ञान , घड़े का ज्ञान और मैं देख रहा हूँ यह ज्ञान युगपत् हो रहा है । यदि इसके विपरीत करे तो ज्ञान नहीं होगा । एक साथ वाक्य बोलने से जो ज्ञान होता है उसमें यद्यपि शब्द अलग - अलग हैं पर उन्हें एक साथ सुनते है तो अर्थ बोध होता है । मन इकट्ठे ही उस सारे वाक्य का अर्थ ग्रहण करता है । सारे वाक्य के अन्दर भिन्न - भिन्न पदार्थ होने पर भी उनके द्वारा मन युगपत् ज्ञान करता है । ठीक इसी प्रकार यहाँ भी युगपत् अनुभूति अभ्यास के कारण होती है । शिशुकक्षा का बालक एक एक अक्षर को अलग अलग बांच कर अभ्यास करता है , पर बहुत से लोग एक उपच्छेद या एक पृष्ट को युगपत् बांचते हैं । इसी प्रकार से यहाँ भी होता है । प्रत्यगात्मा की तरफ लक्ष्य और बाहर के विषय को अन्दर जाने से रोकना इसका अभ्यास अलग - अलग करना पड़ता है। जिस काल में प्रत्यगात्मा का अन्दर ग्रहण करेगा उस समय बाहर नहीं देख पायेगा । बाहर के विषयों को देखने का अभ्यास तो पहले से ही पक्का है । उसे सीखना नहीं है । केवल प्रत्यगात्मा को देखने का ही अभ्यास करना है । जैसे बात करना तो पहले से आता ही है , केवल मोटर चलाने का  पूर्ण अभ्यास कर लें तो मोटर चलाते हुए बात कर सकेंगे । प्रारम्भ से ही अभ्यास ऐसा हो जाय कि व्यवहार करते हुए वृत्ति एकाग्र रहे यह असम्भव है । अतः अन्तर्लक्ष्य का तात्पर्य अभ्यास या प्रयत्न के द्वारा उसे दृढ़ करना है । अपने अन्दर लक्ष्य में चित्त को एकाग्र करने के लिये शास्त्र ने कई उपाय बतलाये है । नाड़ी में चित्त का निरोध , प्राणायाम द्वारा चित्त का निरोध आदि । ऐसा हम मानते हैं कि सारा शरीर हमारा है । लेकिन क्या कभी आपने विचार किया कि आप कितने थोड़े से हिस्से के मालिक हैं । ये इन्द्रियें अपन काम ठीक - ठीक करें इसमें भी आप स्वतन्त्र नहीं हैं । पेट या यकृत को आप हुक्म नहीं दे सकते । हृदय पर आप शासन नहीं कर सकते । नख से आप कह नहीं सकते कि तुम बढ़ना बन्द कर दो । शरीर के एक छोटे से भाग पर ही हमारा अधिकार है । ठीक यही हालत हमारे मन का भी है । मनोविज्ञान के अन्वेषकों ने पता लगाया है कि मन के बहुत बड़े भाग पर हमारा अधिकार नहीं है । वासनायें न मालूम कहाँ से आती हैं और हमें बहा ले जाती है । जब मन पर हमारा अधिकार ही नहीं तो उसका निरोध कैसे करें ?
मेरे प्रभु ! आज कल लोग कह देते हैं कि मन को लगाना है ।  चाहे जैसे लगावें , बैठ कर या लेटकर । पर शरीर में दो प्रकार का नाड़ी संस्थान है । यदि हम इन पर अधिकार नहीं कर पाते तो हम उन्हें संचालित नहीं कर सकते । इन्हें क्रियास्थान एवं ज्ञप्तिस्थान अंगेजी भाषा में Afferent , Efferent कहा जाता है । प्राण का निरोध हमें ज्ञान - क्रिया में स्वतन्त्र करता है । प्राण वायु समस्त नाड़ी संस्थानों में जाकर अपना प्रभाव डालती है । प्राणायाम को इसी लिये करते है । सभी नियमन का तात्पर्य अपने शरीर और मन का शासक बनने में है । विचार के द्वारा , चिन्तन के द्वारा , मनन के द्वारा हम समझ तो जाते हैं , पर समझी हुई बात व्यवहार में नहीं आ पाती । जैसा अर्जुन ने गीता में कहा कि मानो कोई जबरदस्ती हमको प्रवृत्त कर रहा है । यह प्रत्येक साधक का अनुभव है । जब आप वेदान्त की कथा सुनते हैं तो क्रोध व्यर्थ लगता है । फिर थोड़ी देर बाद क्रोध प्रकट हो जाता है ।
नारायण ! एक शराब पीने वाला शराबी क्यों लड़खड़ता है ? उसका अपने ऊपर नियन्त्रण नहीं है । ऐसे ही हम व्यवहार में लड़खड़ाते हैं । क्यों लड़खड़ाते हैं ? कामादि विकारों के कारण । हम बार बार विचार करते हैं कि शरीर और मन पर नियन्त्रण करेंगे ।  पर नियन्त्रण का मार्ग साधना का मार्ग है । उस पर घीरे धीरे चलना पड़ता है । यथा बारहखड़ी लिखने में बच्चे को बहुत समय लगता है । प्रत्येक अक्षर , उसको अलग अलग समझना पड़ता है । शास्त्रकारों ने तो केवल सामान्य रूप से निर्देश कर दिया कि यदि मन संसार के भोगों की तरफ जाने लगे तो विचार से रोके । पर विचार कैसे हो ? विषयों के विकार ज्ञान से विचार आसान हो जाता है । इसी प्रकार प्राणायाम में वायु का निरोध है जिसे चक्रों में करना पड़ता है । मन की प्रत्येक वासना को एक एक करके सुखाना पड़ता है , जैसे समुद्र बून्द बून्द सुखाया जाय ।
नारायण ! शास्त्रों में अविद्या शब्द कर्म मार्ग के लिये बताया गया है । अन्तःकरण के लिये भाव रूप क्रिया की अपेक्षा है । आत्म तत्त्व की प्राप्ति तो ज्ञान से होगी पर मल को दूर करने का उपाय भी तो करना पड़ेगा । परमेश्वर का वास्तविक प्रेम तब तक उपलब्ध नहीं होगा जब तक मल रूपी दोष न हटेगा । ज्ञान का साधक समझता है कि ज्ञान के उत्पन्न होते ही सारे दोष अपने आप दूर हो जायेंगे। पर ज्ञान उत्पन्न होगा कैसे ? शास्त्रों को सुन कर और पढ़ कर एक वृत्ति का आभास उत्पन्न होता है । उससे ज्ञान की  प्रतीति तो बनी , पर " असतो निवृत्तिः " यदि नहीं हुई ; काम क्रोधादि यदि अपने अन्दर रहे , तो ज्ञान उत्पन्न नहीं हुआ ही ऐसा समझें ।
नारायण ! ज्ञान की अग्नि उत्पन्न हो कैसे ? यदि लकड़ी ने आग पकड़ ली तो लकड़ी के ऊपर रखे बटलोई { भोजन बनाने का एक पात्र } के पानी को भी उड़ा देगी । पर यदि लकड़ी ही स्वयं गीली है तो आग पकड़ेगी ही नहीं । ज्ञानाग्नि सभी कर्मनाश में समर्थ है पर यदि पाप कर्म का मल हृदय में है तो ज्ञान उत्पन्न होगा ही नहीं । यद्यपि अविद्या और कर्म से बन्धन है तथापि " अविद्याप्युपकाराय नृणां जायते विषवत् " जैसे जहर रोग को दूर कर देता है वैसे ही अविद्या रूपी जहर मल को काटने के लिये आवश्यक है । यदि अच्छी चीज को भी गलत तरीके से करें तो वह खराब हो जाती है । ज्ञान भी यदि ठीक समय पर न हो तो बन्धन का हेतु हो जायेगा । यथा संग्रहणी का रोगी यदि घी पीले तो ताकतवर होने के बजाय मौत के घाट उतरेगा । अगर विद्या का गलत प्रकार से अनुष्ठान करेंगे तो बन्धन होगा । यह ध्रुव सत्य है ।
पहले शास्त्र का श्रवण करने से तब रुचि उत्पन्न होगी । परमेश्वर परमशिव की तरफ रुची उत्पन्न होते ही कई लोग कर्मों का त्याग कर देते  हैं । जब तक मल दोष दूर नहीं होगा तब तक " तत्किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि " की ही दशा रहेगी । कर्म में लगे रहना पड़ेगा । ज्ञान और ध्यान श्रेष्ठ है पर उसके लिये अधिकारी बने तभी । मल दोष दूर कर ज्ञान ध्यान के अधिकारी बनेंगे । तब तक कर्म करना है जब तक अन्तःकरण में तीव्र शक्ति नहीं आ जाती । अन्तर्लक्ष्य प्राप्तव्य है सही पर यह शक्ति मन को शोध कर ही मिलती है ।
मेरे नारायण ! जब मन वासनाओं से आवृत रहता है तो अन्तःकरण पाप के मल से उसी तरह आच्छादित रहता है जिस प्रकार दर्पण मल से आच्छादित रहता है । पाप का मूलस्रोत इन्द्रिय है । इन्द्रियों द्वारा जब चित्त विषयों में न लगा रहे तभी उस परमशिव तत्व की प्राप्ति होती है । अतः अर्न्तदृष्टिर्बहिलक्ष्य की क्रिया बतलाई । अन्तःकरण के संस्कारोँ के द्वारा ही अन्तःकरण में शक्ति आती है । संस्कृत अन्तःकरण के लिये ही यज्ञोपवितादि सारे संस्कार हैं । आज इन संस्कारों के न होने के कारण जीवन दुःखमय हो गया है । परमात्मा ने संसार का निर्माण जीव को दुःखी बनाने के लिये किया हो यह सम्भव नहीं । लड़के को पिता पाठशाला इसलिये नहीं भेजता कि वह वहाँ जाकर निष्फल हो जाय । लड़का यह  कह सकता है कि न तुम मुझे पाठशाला भेजते न मैं निष्फल होकर दुःखी होता। पिता कहेगा " बेटा ! भेजा विद्याध्यन के लिये था , पर तूने वहाँ जाकर विपरीत अभ्यास किया " । जीव में आणवदोष आना ही उसका फेल होना है । ईक्षण इस लिये नहीं किया था कि वह संस्कार हीन होकर सृष्टि में फँसे । सृष्टि के द्वारा संस्कार मय होकर वह अपने स्वरूप को पहचाने इस लिये संसार है। जब जीव शास्त्र विरुद्ध क्रियाओं में लग गया तो आणव के ऊपर मल दोष भी छा गया । आज हमने संसार को दुःख का जाल मान लिया है । संसार में हम चिन्तित बने रहते हैं । मकान , दूकान , नौकरी, वेतन बढ़ने आदि की चिन्ता से सभी चिन्ता ग्रस्त हैं । शिव ने संसार को निश्चिन्त रहने का साधन बनाया था । हम यहाँ आकर चिन्ता करने लगे । इससे अधिक निश्चिन्त बनने में प्रमाण क्या कि बच्चा उत्पन्न होने से पहले ही मां के स्तनों में दूध का निर्माण कर दिया । शिव ने प्रारब्ध का नियम ही ऐसा बनाया कि प्रारब्ध के रहते हुए हम कभी मर नहीं सकते । यदि कोई तपस्या करने लगा तो इन्द्र घबरा उठता है । इसका मतलब यह है कि साधक की साधना से मन रूपी इन्द्र को तकलीफ होती है। इन्द्र को पता तो है कि  100 वर्ष तक मैं इन्द्रासन पर आसीन रहूंगा । फिर दूसरे को तपस्या करते देख क्यों चिन्तित होता है ? ठीक जैसे आपको पता है कि जब तक प्रारब्ध है योग क्षेम बने रहेंगे फिर क्यों चिन्ता करते हैं ?
सावशेष ......

श्री नारायण हरिः !

Friday, 29 September 2017

क्या स्त्री किसी को गुरु बना सकती है ?

*क्या स्त्री किसीको गुरु बना सकती है ?*
उत्तरᅳस्त्रीको कोई गुरु नहीं बनाना चहिये । अगर बनाया हो तो छोड़ देना चहिये । स्त्रीको पति ही उसका गुरु है । शास्त्रोंमें आया हैᅳ
*गुरुरग्निर्द्विजातीनां   वर्णानां   ब्राह्मणो  गुरुः ।*
*पतिरेव गुरुः स्त्रीणां  सर्वस्याऽभ्यागतो गुरुः ॥*
                                          *(पद्मपुराण स्वर्ग॰ ५१/५१, ब्रह्मपुराण ८०/४७)*
‘अग्नि द्विजातियोंका गुरु है, ब्राह्मण चारों वर्णोंका गुरु है, एकमात्र पति ही स्त्रियोंका गुरु है और अतिथि सबका गुरु है ।’
*वैवाहिको विधिः स्त्रीणां संस्कारो वैदिकः स्मृतः ।*
*पतिसेवा  गुरौ    वासो    गृहार्थोऽग्निपरिक्रिया ॥*
                                                       *(मनुस्मृति २/६७)*
‘स्त्रियोंके  वैवाहिक विधिका पालन ही वैदिक-संस्कार (यज्ञोपवीत), पतिकी सेवा ही गुरुकुलवास और गृह-कार्य ही अग्निहोत्र कहा गया है ।’
स्त्रीको पतिके सिवाय किसी भी पुरुषसे किसी भी प्रकारका भी सम्बन्ध नहीं जोड़ना चाहिये । स्त्रियोंसे प्रार्थना है कि वे कभी किसी साधुके फेरमें न पड़ें । आजकल बहुत ठगी, दम्भ, पाखण्ड हो रहा है । मेरे पास ऐसे पत्र भी आते हैं और भुक्तभोगी स्त्रियाँ भी आकर अपनी बात सुनाती हैं, जिससे ऐसा लगता है की वर्तमान समयमें स्त्रीके लिये गुरु बनाना अनर्थका मूल है ।
साधुको भी चाहिये कि वह किसी स्त्रीको चेली न बनाये । दीक्षा देते समय गुरुको शिष्यके हृदय आदिका स्पर्श करना पड़ता है, जबकि संन्यासीके लिये स्त्रीके स्पर्शका कड़ा निषेध है । श्रीमद्भागवतमें आया है कि हाड़-मांसमय शरीरवाली स्त्रीका तो कहना ही क्या है, लकड़ीकी बनी हुई स्त्रीका भी स्पर्श न करे और हाथसे स्पर्श करना तो दूर रहा, पैरसे भी स्पर्श न करेᅳ
*पदापि युवतीं भिक्षुर्न स्पृशेद् दारवीमपि ।*
                              *(श्रीमद्भागवत ११/८/१३)*
शास्त्रोंमें यहाँतक कहा गया हैᅳ
*मात्रा स्वस्त्रा दुहित्रा वा न विविक्तासनो भवेत् ।*
*बलवानिद्रियग्रामो  विद्वांसमपि  कर्षति ॥*
                                                *(मनु॰ २/२१५)*
‘मनुष्योंको चाहिये कि अपनी माता, बहन अथवा पुत्रीके साथ भी कभी एकान्तमें न रहें; क्योंकि इन्द्रियाँ बड़ी प्रबल होती हैं, वे विद्वान मनुष्यको भी अपनी तरफ खींच लेती हैं ।’
*संग न कुर्यात्प्रमदासु  जातु   योगस्य  पारं  परमारुरुक्षुः ।*
*मत्सेवया प्रतिलब्धात्मलाभो वदन्ति या निरयद्वारमस्य ॥*
                                                     *(श्रीमद्भागवत ३/३१/३९)*
‘जो पुरुष योगके परम पदपर आरूढ़ होना चाहता हो अथवा जिसे मेरी सेवाके प्रभावसे आत्मा-अनात्माका विवेक हो गया हो, वह स्त्रियोंका संग कभी न करे; क्योंकि उन्हें ऐसे पुरुषके लिये नरकका खुला द्वार बताया गया है ।’
*‒‘क्या गुरु बिना मुक्ति नहीं ?’* पुस्तकसे

ज़ह्ळ को जालंधर कहने वालों का खंडन

देअ श्री श्री श्री खुडीज़ह्ळ जी को जालन्धर कहने वालों का भ्रमभंग -  भ्रम - प्रभु श्री ज़ह्ळ जी के मुख के सिर में चंद्रमा है तो इन्हें शिव अं...