Saturday, 2 September 2017

खुडीजह्ळ को जमदग्नि कहने वालों का भ्रमभंग

#जनश्रुति_समीक्षा

देव श्री खुडीज़ह्ळ के विषय में  1892 की जनश्रुति का लेखक कोई अंग्रेज था (देखें निम्न चित्र)| कहा जा रहा है कि इस लेखक ने भी देहुरी गांव वासी से ये जानकारी प्राप्त की | भवतु |  जनश्रुति कोई भी हो पर उसकी सत्यता कितनी है यह परिशीलनीय है |

#समीक्षा -

आपके (#यतिन_पंडित) द्वारा प्रस्तुत 1892 की जनश्रुति में व तदुक्त स्थान आदि में ही विसंगतियां है |

यथा - चित्र में आदि में लिखा है कि मन्दिर खुडीजल देहुरी, पर जनश्रुति में बात करता है खुडीगांव की | लगता है लेखक को स्वयं ही पता नहीं है कि यह देहुरी मन्दिर की बात है या खुडीगांव कि ? और ये भी बता दें कि खुडी नाम का कोई भी गांव नहीं है | हां खुडीगाड स्थान अवश्य है |

जिन स्थानों का वर्णन इस जनश्रुति में किया है वहां इस देव के तीन (खुडीगाड + देहुरी) मन्दिर है | तो प्रश्न ये उठता है कि किस मन्दिर की बात लेखक कर रहा है ?

हमें तो यही लग रहा है कि इस लेखक को स्वयं कुछ भी ज्ञात नहीं है जो सुना सो लिखा | अत: इसे प्रमाणिक नहीं मान सकते |

अपि च जिस दो फीट की पिण्डी की बात की जा रही है  उस पर भी बता दें कि तीनों मन्दिर में इस प्रमाण की कोई पिण्डी सम्प्रति विराजमान नहीं है |

इस देव का जमदग्नि से भी दूर दूर तक कोई सम्बन्ध ज्ञात नहीं होता | होता तो अवश्य हमारे व्यवहार में भी होता | या इस देव की गणाई आदि में गाया जाता |

अत: इस जनश्रुति के कुछ तथ्यों का मेल कथित स्थान पर न होने से इस जनश्रुति को लेकर खुडीज़ह्ळ जी को जमदग्नि कहना आपका अज्ञान मात्र है |

हमारे पास अन्य परम्परा व जनश्रुति भी है जिससे हम निर्भ्रम है और इस देव को भी जानते है कि यह कौन है| व्यर्थ में लोगों को भ्रम में न डालें ! नहीं तो हमें विवश होकर आपके मत का खण्डन करना पडेगा |

👉 जिस देव व क्षेत्र की बात हो रही है उसकी न परम्परा का आपको पता न ही मन्दिर का और चले हो एक विसंगति युक्त जनश्रुति से देव खुडीज़ह्ळ को जमदग्नि सिद्ध करने |

इसकी परम्परा व वैभव को हमसे जानों ! जबसे यहां मन्दिर प्रतिष्ठित है तभी से इसकी सेवा हमारे पूर्वज अविच्छिन्नतया करतें आए हैं |

शिवं भूयात्

हर हर महादेव

जय श्री राम

क्षत्रियवर्ण किस विधि से विवाह करें ?

लोक में जो #वेदिविवाह (कन्यादान विधि युक्त) प्रसिद्ध है वह केवल ब्राह्मण वर्ण को ही करना उचित हैं | क्षत्रिय आदि को नहीं | परिग्रह (दान लेने) के अनधिकारी होने से | 👍

#प्रश्न : - यदि ऐसा है तो क्षत्रिय वर्ण किस विधि विवाह करे ?

#उत्तर :- गांधर्व व राक्षस ये दो प्रकार के विवाह क्षत्रिय वर्ण के लिए प्रशस्त है | ब्राह्म, दैवादि विवाह नहीं |

#गांधर्वो_राक्षसश्चैव_क्षत्रियस्य_तु_शस्यते ||
           __________शंखस्मृ. 4/3

👉 अत: कर्मकाण्ड कुशल विद्वान् ब्राह्मणों को इसका प्रवर्तन लोक में करना चाहिए |

हर हर महादेव
जय श्री राम|

पूज दिवस निर्णय

#देव_श्री_खुडीज़ह्ळ_पूज़_निर्णय -

#प्रश्न : - यह पूज़ 21 दिनों में अथवा तीन मास में करनी है ?

#उत्तर : - देव व परम्परावित् ब्राह्मणों द्वारा सर्वमान्य मत -

इस देव की #पूज़ परम्परा अनुसार #तीन_महीने होगी |

☝ इस निर्णय में प्रमाण प्रथम तो यह कि स्वयं देव ने तीन मास के अनुष्ठान का आदेश किया है | और हमारे पूज्य प्रात: स्मरणीय पितामह द्वारा लिखित टांकरी भाषा के ग्रन्थ में इसका आद्योपान्त सर्वविध वर्णन उपलब्ध होता है | उसमें तीन मास में अनुष्ठान का विधान कहा है | अपि च आज से लगभग 50 बर्ष पूर्व ठीक यही पूज़ हुई थी | उसके द्रष्टा व कर्ता पूज्य ब्राह्मणों ने एक मत से इसका अनुमोदन किया है |

#दम्भ_पूर्ण_कथन - देवता व ब्राह्मणों को हमारी बात माननी पडेगी | जो हम चाहेंगें वो होगा |

#दम्भ_दमन -  पूज़ कौन सी करनी है ? कैसे करनी है ? कब करनी है? यह देव व ब्राह्मणों से ज्ञेय है |

न तुम्हें इस यज्ञ के अंग का ही सटीक ज्ञान है और न परम्परा का, और न ही देवता के सार का ही पता है |

इन सब में देव व देव के सारज्ञ वेदज्ञ परम्परावित् ब्राह्मणों का निर्णय व  आज्ञा मुख्य व प्रबल है , न कि शास्त्रानभिज्ञ परम्परा ज्ञान हीन देवसार से अपरिचित "अहं करोमीति" वृथाभिमान वाली प्रजा की मनमानी |👍

धार्मिक प्रजा को सश्रद्ध देव ब्राह्मणों के अनुगुण चलना चाहिए, न कि देव ब्राह्मणों को मूर्ख प्रजा के |

फिर इसके मुख्य भागग्राही यहां का देव, कुलपुरोहित, पाण्डा, खूनधारी आदि से देवालय संघ के पदाधिकारियों को चर्चा करनी चाहिए |

यदि फिर भी तुम अपने दम्भ को त्यागना न चाहो तो इसके अशुभ परिणाम जो सकल प्रजा पर होंगें उसके उत्तरदाई तुम स्वयं होगें |

#मनमाने_आचरण_से_न_ही_सिद्धि_न_सुख_न_परागति_ही_प्राप्त_होगी

#य: #शास्त्रविधिमुत्सृज्य_वर्तते_कामकारत:|
#न_च_सिद्धिमवाप्नोति_न_सुखं_न_परां_गति: ||

हर हर महादेव

जय श्री राम

पूज किसे कहतें हैं ?

#जिज्ञासा - पूज क्यों करनी चाहिए ? और कैसे करनी चाहिए ?

#समाधान - पहले तो यह समझो! कि #पूज है क्या ? पूज़ का अर्थ है जीर्णोद्धार किए गए मन्दिर की अथवा अन्य विग्रहखण्डनादि दोषों में, अथवा नियतकाल में शास्त्रानुसार , देवाज्ञा अनुसार, परम्परानुगुण व शिष्टाचारानुसार यथाविधि  पुन: प्रतिष्ठा करना |

यह मुख्यत: दो प्रकार की है - 1. बडी पूज़, 2. छोटी पूज़ |

यह जगत् की सुख, शान्ति व समृद्धि के लिए की जाती है |

👉 किसी भी कार्य को करने के लिए वेदाचार, परम्परा, शिष्टाचार आदि प्रमाण होतें है | 👍

साथ ही साथ इस पूज को करने में #देव व #परम्परा का मुख्य स्थान होता है | पूज का जो विधान देव व परम्परा करती है उसी विधान से करना चाहिए | मनमुखी विधि से नहीं करना चाहिए |

बडी अथवा छोटी जो भी पूज करनी है तो देव तथा परम्परा क्या कहती पहले यह देखना चाहिए फिर कुलपुरोहित से सविनय प्रार्थना करके उसका विधान व मुहूर्त का ज्ञान करना चाहिए |

जैसा देव ब्राह्मण आदेश करे शेष प्रजा को ठीक वैसा ही आचरण करना चाहिए | इनके निरादर से पूज ही निष्फल हो जाऐगी |

अत: बडी पूज यदि 3 महीने होनी है तो होनी है इसमें देव व ब्राह्मणों का एकमत है | इसे तुम्हारी ईच्छा वा हठ से संकुचित नहीं किया जा सकता | इससे सर्वनाश सिद्ध है |

तुममें योग्यता नहीं तो न करो ! यज्ञ शौक के लिए नहीं होता |

दूसरे मार्ग में चलो जो कि सुगम व अल्प दिवस साध्य है |

देव, ब्राह्मण व परम्परा के विरुद्ध चलोगे तो तुम्हारा सर्वनाश निश्चित है |

भगवान् चन्द्रमौलीश्वर सबको सद्बुद्धि प्रदान करें ! 🙏

हर हर महादेव
जय श्री राम

Friday, 1 September 2017

देवखुडीजह्ळ के पौरोहित्य का अधिकार किसे है?

देव श्री #खुडीजह्ळ देवालय का #पुरोहित निर्णय :-
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यह देखने व सुनने में आता है कि अनेक लोग इसके देवालयों के पुरोहित होने का दावा करतें हैं |
मुख्य रुप से #कमान्दु_ब्राह्मण व #ध्रूक_ब्राह्मण अपना अपना पौरोहित्य होना कहतें हैं |

कमान्दु_ब्राह्मण यह मानते हैं कि इस देव के मूलस्थान #खुडीगाड के पुरोहित वही है | पर यह मानना उचित नहीं है | वस्तुत: यहां का पौरोहित्य भी ध्रुक_ब्राह्मण का ही है | क्योंकि आज भी इस देव की #बुढीदिवाली पर्व आचरण पर ध्रूक मूल का ब्राह्मण ही यज्ञार्थ जाता है |

वहां पूजा करने मात्र का दायित्व कमान्दु ब्राह्मण का है | हां ध्रूक ब्राह्मण के आचार्यत्व में कमान्दु ब्राह्मण यज्ञादि में भाग ले सकता है |

ध्यातव्य है कि इस देव का अर्चक (पुजारी) व पुरोहित पृथक् -पृथक् कुल के होतें हैं | अर्चक को पौरोहित्य का नहीं पर पूजा करने मात्र का अधिकार है | जबकि पुरोहित अर्चक कुल के सूतकादि में पूजा कर सकता है |

अत: इस देव के देवालय का पुरोहित मुख्य रुप से ध्रूक ब्राह्मण ही होता है | ध्रूकों में भी मुख्यरुप से अधोलिखित योग्यता होनी चाहिए :-
👉 जिसका शास्त्र विहित काल में जनेऊ हुआ हो |
👉  देव परम्परा को जानता हो |
👉 अभक्ष्य भक्षण न करता हो |
👉 इसके मुख्य पर्वों में व्रताचरण करता हो |
👉 कुल परम्परा से पिता पितामह आदियों ने यहां पौरोहित्य कर्म किया हो |
👉 शुक्लतन्त्रविद्या को जानता हो | कृष्णी को हेय मानता हो |
👉 इस देव की हर रेखा का पालन व अनुवर्तन करता हो |
...............आदि आदि |

अब तुम अपनी योग्यता स्वयं देख लो ! निर्णय भी स्वयं लो ! तुम इस योग्य हो या नहीं ? कि इसके देवालय में पौरोहित्य कर सकते हो वा नहीं |

बडे बडे फट्टों पर अपना नाम लिखने या लिखवाने से, तरह तरह के दांव पेंच खेलने से, या षड्यन्त्र से, व्यर्थ आरोप से, इधर उधर प्रचारादि जैसे निकृष्ट कार्य से कोई इसका पुरोहित नहीं वन जाता | इसके लिए उपरोक्त योग्यता प्राप्त करनी पडती है| और इसके लिए देव कृपा व पुण्य का बल भी नितान्त अपेक्षित है | अन्यथा यह तुम्हारा स्वप्न स्वप्न में ही पूर्ण होगा |

हर हर महादेव
जय श्री राम

ज्यौति:शास्त्र अधिकारी निरूपण

श्री भास्कराय नम:

ज्योति:शास्त्र के अध्ययन अध्यापन का अधिकारी निरूपण, स्त्रीशूद्र को अध्ययन निषेध :--
______________________________________
इस शास्त्र का अधिकारी जिज्ञासु द्विज ही है अन्य कोई नहीं। 👍

#एतज्जिज्ञासुरधिकारी_स_च_द्विज_एव_नान्य:।

तदुक्तं नारदेनैव :--

#सिद्धान्त_संहिताहोरारूपस्कन्धत्रयात्मकम्।
#वेदस्य_निर्मलं_चक्षुर्ज्योति:#शास्त्रमकल्मषम्।
#विनैतदखिलं_श्रौतं_स्मार्तं_कर्म_न_सिध्यति।
#तस्माज्जगद्धितायेदं_ब्रह्मणा_निर्मितं_पुरा।।
#अत_एव_द्विजैरेतदध्येतव्यं_प्रयत्नत:।। इति।

अत्रैवकारस्य पाठक्रमेण योजने प्रयोजनं विनैव ज्योति:शास्त्राध्ययनस्यावश्यकत्वं प्रतीयते। द्विजैरेवेति व्याख्याने द्विजव्यतिरिक्तै: शूद्रैर्नाध्येयमिति च प्रतीयते। व्याख्याद्वयमपि युक्तमेव।

अत एव महाभारते :--
#यजनं_याजनं_चैव_तथा_दानप्रतिग्रहौ।#अध्यापनं_चाध्ययनं_षट्कर्मा_ब्राह्मण:#स्मृत:।।
अध्यापन अधिकारी = ब्राह्मण ही है।

#क्षत्रियविशोस्त्वध्ययने_एवाधिकारो_नाध्यापने।

क्षत्रिय वैश्य को अध्ययन मात्र का अधिकार है।

यह स्पष्ट है कि स्त्रीशूद्रों को अध्ययन का निषेध है, अध्ययन निषेध से अध्यापन का स्वत: निषेध हो गया। अत: अध्ययन व अध्यापन दोनों का ही निषेध है। 👍

जय श्री राम।

जानने योग्य बातें


1. घर में सेवा पूजा करने वाले जन भगवान के एक से अधिक स्वरूप की सेवा पूजा कर सकते हैं ।

2. घर में दो शिवलिंग की पूजा ना करें तथा पूजा स्थान पर तीन गणेश जी नहीं रखें।

3. शालिग्राम जी की बटिया जितनी छोटी हो उतनी ज्यादा फलदायक है।

4. कुशा पवित्री के अभाव में स्वर्ण की अंगूठी धारण करके भी देव कार्य सम्पन्न किया जा सकता है।

5. मंगल कार्यो में कुमकुम का तिलक प्रशस्त माना जाता हैं।

6.  पूजा में टूटे हुए अक्षत के टूकड़े नहीं चढ़ाना चाहिए।

7. पानी, दूध, दही, घी आदि में अंगुली नही डालना चाहिए। इन्हें लोटा, चम्मच आदि से लेना चाहिए क्योंकि नख स्पर्श से वस्तु अपवित्र हो जाती है अतः यह वस्तुएँ देव पूजा के योग्य नहीं रहती हैं।

8. तांबे के बरतन में दूध, दही या पंचामृत आदि नहीं डालना चाहिए क्योंकि वह मदिरा समान हो जाते हैं।

9. आचमन तीन बार करने का विधान हैं। इससे त्रिदेव ब्रह्मा-विष्णु-महेश प्रसन्न होते हैं।

10.  दाहिने कान का स्पर्श करने पर भी आचमन के तुल्य माना जाता है।

11. कुशा के अग्रभाग से दवताओं पर जल नहीं छिड़के।

12. देवताओं को अंगूठे से नहीं मले।

13. चकले पर से चंदन कभी नहीं लगावें। उसे छोटी कटोरी या बांयी हथेली पर रखकर लगावें।

15. पुष्पों को बाल्टी, लोटा, जल में डालकर फिर निकालकर नहीं चढ़ाना चाहिए।

16. श्री भगवान के चरणों की चार बार, नाभि की दो बार, मुख की एक बार या तीन बार आरती उतारकर समस्त अंगों की सात बार आरती उतारें।

17. श्री भगवान की आरती समयानुसार जो घंटा, नगारा, झांझर, थाली, घड़ावल, शंख इत्यादि बजते हैं उनकी ध्वनि से आसपास के वायुमण्डल के कीटाणु नष्ट हो जाते हैं। नाद ब्रह्मा होता हैं। नाद के समय एक स्वर से जो प्रतिध्वनि होती हैं उसमे असीम शक्ति होती हैं।

18. लोहे के पात्र से श्री भगवान को नैवेद्य अपर्ण नहीं करें।

19. हवन में अग्नि प्रज्वलित होने पर ही आहुति दें।

20. समिधा अंगुठे से अधिक मोटी नहीं होनी चाहिए तथा दस अंगुल लम्बी होनी चाहिए।

21. छाल रहित या कीड़े लगी हुई समिधा यज्ञ-कार्य में वर्जित हैं।

22.  पंखे आदि से कभी हवन की अग्नि प्रज्वलित नहीं करें।

23. मेरूहीन माला या मेरू का लंघन करके माला नहीं जपनी चाहिए।

24.  माला, रूद्राक्ष, तुलसी एवं चंदन की उत्तम मानी गई हैं।

25. माला को अनामिका (तीसरी अंगुली) पर रखकर मध्यमा (दूसरी अंगुली) से चलाना चाहिए।

26.जप करते समय सिर पर हाथ या वस्त्र नहीं रखें।

27. तिलक कराते समय सिर पर हाथ या वस्त्र रखना चाहिए।

28. माला का पूजन करके ही जप करना चाहिए।

29. ब्राह्मण को या द्विजाती को स्नान करके तिलक अवश्य लगाना चाहिए।

30. जप करते हुए जल में स्थित व्यक्ति, दौड़ते हुए, शमशान से लौटते हुए व्यक्ति को नमस्कार करना वर्जित हैं।

31.  बिना नमस्कार किए आशीर्वाद देना वर्जित हैं।

32.  एक हाथ से प्रणाम नही करना चाहिए।

33.  सोए हुए व्यक्ति का चरण स्पर्श नहीं करना चाहिए।

34. बड़ों को प्रणाम करते समय उनके दाहिने पैर पर दाहिने हाथ से और उनके बांये पैर को बांये हाथ से छूकर प्रणाम करें।

35. जप करते समय जीभ या होंठ को नहीं हिलाना चाहिए। इसे उपांशु जप कहते हैं। इसका फल सौगुणा फलदायक होता हैं।

36. जप करते समय दाहिने हाथ को कपड़े या गौमुखी से ढककर रखना चाहिए।

37. जप के बाद आसन के नीचे की भूमि को स्पर्श कर नेत्रों से लगाना चाहिए।

38. संक्रान्ति, द्वादशी, अमावस्या, पूर्णिमा, रविवार और सन्ध्या के समय तुलसी तोड़ना निषिद्ध हैं।

39. दीपक से दीपक को नही जलाना चाहिए।

40. यज्ञ, श्राद्ध आदि में काले तिल का प्रयोग करना चाहिए, सफेद तिल का नहीं।

41. शनिवार को पीपल पर जल चढ़ाना चाहिए। पीपल की सात परिक्रमा करनी चाहिए। परिक्रमा करना श्रेष्ठ है, किन्तु रविवार को परिक्रमा नहीं करनी चाहिए।

42. कूमड़ा-मतीरा-नारियल आदि को स्त्रियां नहीं तोड़े या चाकू आदि से नहीं काटें। यह उत्तम नही माना गया हैं।

43. भोजन प्रसाद को लाघंना नहीं चाहिए।

44.  देव प्रतिमा देखकर अवश्य प्रणाम करें।

45. किसी को भी कोई वस्तु या दान-दक्षिणा दाहिने हाथ से देना चाहिए।

46. एकादशी, अमावस्या, कृृष्ण चतुर्दशी, पूर्णिमा व्रत तथा श्राद्ध के दिन क्षौर-कर्म (दाढ़ी) नहीं बनाना चाहिए ।

47. बिना यज्ञोपवित या शिखा बंधन के जो भी कार्य, कर्म किया जाता है, वह निष्फल हो जाता हैं।

48. यदि शिखा नहीं हो तो स्थान को स्पर्श कर लेना चाहिए।

49. शिवजी की जलहारी उत्तराभिमुख रखें ।

50. शंकर जी को बिल्वपत्र, विष्णु जी को तुलसी, गणेश जी को दूर्वा, लक्ष्मी जी को कमल प्रिय हैं।

51. शंकर जी को शिवरात्रि के सिवाय कुंुकुम नहीं चढ़ती।

52. शिवजी को कुंद, विष्णु जी को धतूरा, देवी जी  को आक तथा मदार और सूर्य भगवानको तगर के फूल नहीं चढ़ावे।

53 .अक्षत देवताओं को तीन बार तथा पितरों को एक बार धोकर चढ़ावंे।

54. नये बिल्व पत्र नहीं मिले तो चढ़ाये हुए बिल्व पत्र धोकर फिर चढ़ाए जा सकते हैं।

55. विष्णु भगवान को चांवल, गणेश जी  को तुलसी, दुर्गा जी और सूर्य नारायण  को बिल्व पत्र नहीं चढ़ावें।

56. पत्र-पुष्प-फल का मुख नीचे करके नहीं चढ़ावें, जैसे उत्पन्न होते हों वैसे ही चढ़ावें।

57.  किंतु बिल्वपत्र उलटा करके डंडी तोड़कर शंकर पर चढ़ावें।

58. पान की डंडी का अग्रभाग तोड़कर चढ़ावें।

59. सड़ा हुआ पान या पुष्प नहीं चढ़ावे।

60. गणेश को तुलसी भाद्र शुक्ल चतुर्थी को चढ़ती हैं।

61. पांच रात्रि तक कमल का फूल बासी नहीं होता है।

62. दस रात्रि तक तुलसी पत्र बासी नहीं होते हैं।

63. सभी धार्मिक कार्यो में पत्नी को दाहिने भाग में बिठाकर धार्मिक क्रियाएं सम्पन्न करनी चाहिए।

64. पूजन करनेवाला ललाट पर तिलक लगाकर ही पूजा करें।

65. पूर्वाभिमुख बैठकर अपने बांयी ओर घंटा, धूप तथा दाहिनी ओर शंख, जलपात्र एवं पूजन सामग्री रखें।

66.  घी का दीपक अपने बांयी ओर तथा देवता को दाहिने ओर रखें एवं चांवल पर दीपक रखकर प्रज्वलित करें।

आप सभी के श्री चरणों में प्रार्थना है अगर हो सके तो और लोगों को भी  आप इन महत्वपूर्ण बातों से अवगत करा सकते हैं |

🌸🌿 ।। जय श्री राम ।।  👏🌸🌿

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