Sunday, 3 September 2017

भारत में ही सभी देवता अवतरित क्यों होते है ?

आक्षेप -  सभी देवी देवताओ ने भारत मे हि जन्म क्यो लिया?
क्यो किसी भी देवी -देवता को भारत के बाहर कोइ नही जानता ?

धज्जियां - लोक में ही देखा जाता है , यदि को सरकारी उच्चाधिकारी (मन्त्री आदि ) किसी शहर में दौरे आदि के लिए आता है तो वहां स्थित अथवा उसके समीपस्थ निर्मित सीधे प्रामाणिक सरकारी आवास पर ठहरता है , वहां से श्रेष्ठ वाहन में बैठकर तब दौरा या अन्य कार्य करता है | होता तो पूरे राष्ट्र का मन्त्री है फिर भी पूर्वनियत व्यवस्था का ही अनुपालन करता है , इसी प्रकार ईश्वरीय अथवा दैवीय शक्तियां हैं , वे जब इस वैश्विक धरातल पर अवतरित होती हैं तो , इस सीधे इस विश्व पटल की प्रामाणिक आध्यात्मिक पृष्ठभूमि (भारत ) में आविर्भूत होती हैं तथा यहाँ पदार्पण करने के उपरान्त अपने आध्यात्मिक वर्चस्व से समस्त विश्व को प्रभावित करती हैं | समस्त विश्व में भारत अध्यात्म का सबसे आदर्श धरा भाग है | अफसरीपना पाकर बड़े - बड़े अफसरी भवनों में कौन नहीं आयेगा ? सांसद बनकर भी संसद में कौन नहीं बैठना चाहेगा ? और नहीं बैठेगा संसद में तो फिर कैसा सांसद ? अध्यापक होकर अपनी कक्षा में उपस्थिति न करे तो कैसा अध्यापक ? नरेन्द्र मोदी जब संसद में अपना पहला कदम रखते हैं तो इसकी धूल अपने माथे से लगाकर इसे चूमते हैं , क्योंकि उनको ज्ञात है उसका क्या महत्त्व है ; ऐसे ही भारत भूमि है, देवता इसका महत्त्व जानते हैं , इसके प्रति तो प्रत्येक देवता यही गीत गाता है -
हम देवताओं में भी वे लोग धन्य हैं जो स्वर्ग और मोक्ष के लिए साधनभूत भारतभूमि में उत्पन्न हुए हैं-
'#गायन्ति_देवाः_किल_गीतकानि_धन्यास्तु_ये_भारतभूमिभागे | #स्वर्गापवर्गास्पदहेतुभूते_भवन्ति_भूयः_पुरुषाः_सुरत्वात् ||
देव होकर ही देवताओं की संगति की जाती है #देवो_भूत्वा_यजेत्_देवान् , (यज् देवपूजा-दान-संगतिकरणे ) भारत से बाहर कितने देवत्व धारण करने वाले मनुष्य हैं , ये सुस्पष्ट ही है | संगति का लाभ देवत्व से प्राप्त होता है , जब संगति का ही सम्यक् लाभ नहीं मिला तो उनका विवेक कहाँ से मिलेगा ? ये सब बिना परमात्मा की कृपा कर भला कहाँ सुलभ हो पाता है -
#बिनु_सतसंग_बिबेक_न_होई | #रामकृपा_बिनु_सुलभ_न_सोई
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-----> #आक्षेप - जितने भी देवी देवता देवताओ की सवारीया है उनमे सिर्फ वही जानवर क्यो है जो कि भारत मे ही पाये जाते है?
एसे जानवर क्यो नही जो कि सिर्फ कुछ हि देशो मे पाये जाते है, जैसे कि कंगारु, जिराफ आदी !!
   #धज्जियां - देखो ! इसे ऐसे समझो - जैसे वाहन तो बहुत प्रकार के हैं , जैसे बस, ट्रेन, ट्रैक्टर , साइकिल, बाइक, ऑटो आदि आदि दुनिया भर के ! पर प्रधानमंत्री यदि किसी शहर में आयेगा तो ऑटो या रेल या फिर ट्रैक्टर में थोड़े न आयेगा ? वो आयेगा तो ख़ास सरकारी गाड़ी में आयेगा, कोई नेता आयेगा तो एम्बेसडर जैसी ख़ास नीली या लाल बत्ती गाड़ी में आयेगा , ऐसे ही देवी - देवता हैं, वे जब आते हैं तो भारतीय वाहन में आते हैं , क्योंकि भारत अध्यात्म की सर्वश्रेष्ठ प्रामाणिक धरा है , ये सभी देवी-देवताओं के लिए अध्यात्म का सर्वोत्तम आदर्श है |
.................देवताओं के वाहन लौकिक तिर्यक् पशु नहीं होते, वे सब द्युलोकादि के अमर्त्य देवता ही हैं , यही कारण है कि कोई अज वाहन प्रज्ज्वलित अग्नि देवता को धारण किये है , तो कोई मृग वाहन वायु देवता को , ये सभी वाहन उस -उस देवता के ही अनुरूप विशेष -विशेष दिव्य शक्तियों से युक्त होते हैं |
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-----> #आक्षेप - सभी देवी देवता हमेशा राज घरानो मे हि जन्म क्यो लेते थे ?
क्यो किसी भी देवी देवता ने किसी गरीब या शुद्र के यहा जन्म नही लिया?
#धज्जियां - देखो ! लोक में गाँव के विकास का काम करने के लिए ग्राम प्रधान का पद , जिले के लिए डी एम या विधायक का , प्रदेश के लिए मुख्यमंत्री का तथा देश का काम करने के लिए प्रधानमंत्री का पद सबसे प्रामाणिक व्यवस्था है, ऐसे ही यदि विश्व में अध्यात्म का कोई बड़ा काम करना है तो अध्यात्म की सर्वश्रेष्ठ उपाधि (ब्राह्मण ) चाहिए , प्रशासन को लेकर आपको बड़ी भूमिका निभानी है तो राजघराने से सम्बद्ध होना सबसे प्रामाणिक तरीका है | ब्राह्मण और क्षत्रिय ये दोनों शास्त्र और शस्त्र दोनों से लोक में सुव्यवस्था बनाए रखने के सर्वोत्तम साधन हैं , इसीलिये इनका प्रयोग देवी –देवताओं द्वारा होता है |
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-----> #आक्षेप - पोराणीक कथाओ मे सभी देवी देवताओ की दिनचर्या का वर्णन है जैसे कि कब पार्वती ने चंदन से स्नान किया, कब गणेश के लिये लड्डु बनाये, गणेश ने कैसे लड्डु खाये.. आदी लेकीन जैसे हि ग्रंथो कि स्क्रीप्ट खत्म हो गयी भगवानो कि दिनचर्या भी खत्म.. तो क्या बाद में सभी देवीदेवताऔ का देहांत हो गया ?? अब वो कहाँ है? उनकी औलादे कहाँ है?
#धज्जियां - स्क्रिप्ट ख़त्म तो दिनचर्या ख़त्म - ये तो कोई पागल ही बोल सकता है |यदि मैं किसी को तुम्हारे बारे में बताऊँ कि ///कल तुमने मुझसे एक अमुक प्रश्न पूछा था उसका मैंने ये उत्तर दिया /// तो तुम्हारी ये जानकारी किसी को बताने से तुम मर जाओगे क्या ? चलचित्र (फिल्म) के अंत में हीरो और हीरोइन का मिलन हो जाता है और तीन घंटे की फिल्म समाप्त हो जाती है तो क्या हीरो हीरोइन मर जाते हैं ? वे तो यथास्थान ही होते हैं | कितनी घोर मूर्खता है ! चलचित्र ( फिल्म ) के उस द इंड से तो स्क्रिप्टराइटर की ये शिक्षा होती है कि इस प्रकार उक्त नायक -नायिका के सुखमय जीवन की शुरुआत हुई | एक बच्चा भी आसानी से इतनी सी सामान्य बात समझता है |

................देखो ! लोक में विद्वान क्या करता है , विद्वान जब किसी को बताता है तो सारभूत बोलता है , सटीक बोलता है , और उतना ही बोलता है जितना अगले व्यक्ति को समझाने के लिए यथायोग्य एवं पर्याप्त हो ! इसे #सारं_सुष्ठु_मितं_मधुवाणी (वाग्व्यवहार ) कहते हैं | सार का अभिप्राय है सारभूत , सुष्ठु का अभिप्राय है सर्वथोचित , मितम् का अभिप्राय है यथावश्यक , मधु का अभिप्राय है - माधुर्य अथवा आह्लादकत्व को प्रकट करने वाला |

....................पौराणिक कथाएँ आपको ईश्वर के चरित्र अथवा लीलाओं की सूचना इसी सारं सुष्ठु मितं मधु वाणी से प्रदान करती है , ताकि आप उसे ग्रहण कर उसका बांकी तात्पर्य स्वतः समझ सकें | आपको उतना ही बताते हैं जितने से आपकी प्रज्ञा को समुचित मार्गदर्शन हो जाए , आप स्थालीपुलाकन्याय से उस सम्बन्ध में अन्य गुण –कर्म - स्वभाव भी समझ जाएँ कि इनका गुण कर्म स्वभाव लीला विनोद इस तरह से अभिहित है | आपकी अभिधारणा को ईश्वरीय चेतना के आलोक में सुनियोजित कर उसका उत्तम निर्माण करना मात्र पौराणिक कथाओं का प्रयोजन है | गणेश जी ने लड्डू खाया या कुंकुम-चंदनादि किसी ईश्वरीय शक्ति द्वारा स्वीकृत होने आदि की बातें अगर पुराण कहता है तो इसका अभिप्राय है कि ईश्वर का गणेश रूप अपने प्रेमी भक्तों के द्वारा भाव से प्रदत्त मोदक को ही भक्षण कर रहे हैं , जब आप उपासना करें तो उसमें उनकी प्रसन्नता की कामना लेते हुए मोदक (लड्डू ) के भोग की प्रधानता रखें |

.......................मोदक प्रतीक है मोद का आनंद का (मोदयति आनन्दयतीति मोदकः ) | श्री गणेश जी को मोदक देने का अर्थ है इस प्रतीक के रूप में ईश्वर के प्रति अपने अध्यात्मिक प्रेमानंद की अभिव्यक्ति करना | जब भक्त मुदित होता है तो उसका उपास्य ईश्वर भी मुदित होता है , ये उपास्य -उपासक का परस्पर आतंरिक प्रेम है | जब आप एक मोदक बनाकर ईश्वर के गणेश रूप को श्रद्धा और प्रेम से अर्पित करते हैं तो ईश्वर के प्रति इस प्रेमपूर्ण आध्यात्मिक व्यवहार से आपकी चेतना में क्रमशः सात्त्विकता आती है और आपका आध्यात्मिक विकास होता है | आपको साधना के उद्देश्य से ये श्री गणेश जी के मोदक आदि भक्षण की चर्चा पुराणादि का उद्देश्य है |
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----> #आक्षेप - ग्रंथो के अनुसार पुराने समय मे सभी देवी देवताओ का पृथ्वी पर आना-जाना लगा रहता था। जैसे कि किसी को वरदान देने या किसी पापी का सर्वनाश करने.. लेकीन अब एसा क्या हुआ जो देवी देवताओ ने पृथ्वी पर आना बंद हि कर दिया??
#धज्जियां - पुराने समय में देवी -देवता पृथ्वी पर आते थे तो तब भी उनके देवी या देवता होने का रहस्य केवल उनके अधिकारी भक्त ही जान पाते थे , सब नहीं , जैसे भगवान् कृष्ण द्वापरयुग में अवतरित हुए तो केवल उनके अधिकारी भक्तों जैसे - असित , देवल , व्यास, कुंती, विदुर आदि गिने -चुने लोग ही उनकी भगवत्ता को पहचान पाते थे अथवा केवल स्वयं श्री कृष्ण ही अपनी भगवत्ता के ज्ञाता थे , सभी नहीं |
#आहुस्त्वामृषयः_सर्वे_देवर्षिर्नारदस्तथा |
#असितो_देवलो_व्यासः_स्वयं_चैव_ब्रवीषि_मे || (-श्रीमद्भगवद्गीता १०/१३)
सौ कौरव, कर्ण , जरासंध , अश्वत्थामा , शिशुपाल आदि सहित सारा संसार उनको एक साधारण ग्वाला ही समझता था | इसीलिये तो दुर्योधन भरी राजसभा में उनको बन्दी बनाने का आदेश देता है , शिशुपाल सौ गालियाँ देता है, अश्वत्थामा उनकी आज्ञा न मानकर पांडवों के सर्वनाश का कुकृत्य करता है , आदि | ऐसे ही राम के विषय में था ऐसे ही अन्य अवतारों के विषय में है | हनुमान जी को उस समय का अज्ञानी समाज एक साधारण बन्दर समझता था, इतने देवी देवता वानर रीछ आदि रूपों में अवतरित हुए किसने पहचाना ? केवल महातपा ऋषि मुनियों आदि ने ही क्योंकि महान् आध्यात्मिक शक्तियों को जानने के लिए ज्ञाता को स्वयं भी अध्यात्म के सर्वोच्च शिखर पर होना आवश्यक है | तपः पूत , क्रान्तदर्शी ऋषिगण समाधि की अवस्था में समस्त अवतारों के मूल स्वरूप का साक्षात्कार कर फिर उनका उपदेश करते हैं | इतनी हजारों गोपियाँ पूर्वजन्म में महान् ऋषि थीं, अनेक तो देवलोक की अप्सराएं थीं , अनेक वेदमंत्रों की ऋचाएं अवतरित हुईं थी , किसने पहचाना ?
.................. यहाँ तक कि श्री भगवान् तो यहाँ तक स्पष्ट करते हैं कि लोक में जो-जो भी विभूति युक्त अर्थात् ऐश्वर्य युक्त, कान्ति युक्त और शक्ति युक्त वस्तु है, उस- उसको तू (हे अर्जुन !) मेरे तेज़ के अंश की ही अभिव्यक्ति जान -
#यद्यद्विभूतिमत्सत्वं_श्रीमदूर्जितमेव_वा ।
#तत्तदेवावगच्छ_त्वं_मम_तेजोंऽशसंभवम् || (- श्रीमद्भगवद्गीता १० /४१)
इसी प्रकार आज भी अनेक देवी -देवताओं की स्वांश आध्यात्मिक विभूतियाँ आदि प्रायः विविध प्रकार से अवतरित होकर सनातन धर्म की रक्षा , लोकालीला का सम्पादन करते हैं , पर केवल अधिकारी भक्त ही उनका गूढ़ रहस्य समझ पाते हैं , उनकी विभूतियों का दर्शन कर पाते हैं , मूढ़ नहीं | या फिर वही व्यक्ति उनका संज्ञान प्राप्त कर सकता है , जो इन ऋषियों , हम जैसे धर्मज्ञ ब्राह्मणों से ज्ञान का श्रवण करे | अज्ञानी मूढों के लिए तो श्री भगवान् स्वयं कहते हैं -
मूर्खलोग मेरे सम्पूर्ण प्राणियों के महान् ईश्वररूप श्रेष्ठभाव को न जानते हुए मुझे मनुष्य-शरीर के आश्रित मानकर अर्थात् साधारण मनुष्य मानकर मेरी अवज्ञा करते हैं -
#अवजानन्ति_मां_मूढा_मानुषीं_तनुमाश्रितम् |
#परं_भावमजानन्तो_मम_भूतमहेश्वरम् || (-श्रीमद्भगवद्गीता ९/११)
तुम्हारी भाषा में कहा जाए तो - #शौके_दीदार_गर_है_तो_नजर_पैदा_कर ! (यथा दृष्टि तथा सृष्टि #दृष्टिसृष्टिवाद)
...............श्रीभगवान् स्वयं कहते हैं - (हे अर्जुन !) अपनी योगमायासे छिपा हुआ मैं सबके प्रत्यक्ष नहीं होता, इसलिए यह अज्ञानी जनसमुदाय मुझ जन्मरहित अविनाशी परमेश्वरको नहीं जानता -
#नाहं_प्रकाशः_सर्वस्य_योगमायासमावृतः |
#मूढोऽयं_नाभिजानाति_लोको_मामजमव्ययम् || (-श्रीमद्भगवद्गीता ७/ २५ )
तो कौन जानता है ? तो कहा - जो उनके भक्त हैं, वे अपनी पराभक्ति के द्वारा परमात्मा को वो जो हैं , जैसे हैं ठीक वैसा तत्व से जानते हैं -
#भक्त्या_मामभिजानाति_यावान्यश्चास्मि_तत्त्वतः | (-श्रीमद्भगवद्गीता १८/५५ )
इत्यलम् ||
|| जय

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