Tuesday, 31 March 2020

शबरी शूद्रा नहीं थी

शबरी जी कदापि शूद्रा न थीं ~

(१) आक्षेप : परिचारिणी थीं, अतः शूद्रा हैं -

समाधान :  परिचारिणी शब्द के आधार पर शूद्रा समझे जाने पर राम के  अर्घ्य पाद्य गन्धानुलेपन विशेषणरूप आतिथ्य सत्कार  तथा मतंगमुनि-आश्रमवास आदि से विरोध होगा ।

छान्दोग्योपनिषद् की जबाला भी परिचारिणी  थीं (चरन्ती परिचारिणी यौवने) ,   किन्तु त्रिकालदर्शी महर्षि गौतम उनके पुत्र की  परीक्षा करके  ब्राह्मण ही बताते हैं  और समिधं सोम्याssहर कहकर उनका उपनयन संस्कार भी करते हैं । जाबाल मुनि के लिये ब्रह्मवैवर्तपुराण में वेदाङ्गवेदज्ञः विशेषण है, ये विशेषण उनको शूद्र समझने वालों का भी भ्रान्तिहरण कर रहा है ।

परिचर्या  का अभिप्राय उपासना (सेवा)  है । सेवा शूद्र का  स्वाभाविक कर्म अवश्य  है , किन्तु शूद्र ही सेवाचित्त वाला  हो सकता है , ये नियम नहीं है । लोक में ब्राह्मणी भी अपने पति की , अतिथि की ,  विदुषी ब्राह्मणियों की , सन्तों की , ईश्वर की सेवा करती है ।  

(२) आक्षेप : राम के चरण पकड़तीं हैं ,अतः शूद्रा हैं -

समाधान :  लोकाचार की दृष्टि से  ब्राह्मणी होकर क्षत्रिय अतिथि के  चरण पकड़ने का आचार ब्राह्मणी न होने का भले ही पोषण करे , किन्तु ब्राह्मणी नहीं थीं, तो शूद्रा ही थीं , ऐसा भी  एकान्त निर्णय नहीं करता , क्योंकि   राम शुद्ध  क्षत्रिय जाति के थे , ऐसी स्थिति में अनुलोम संकर क्षत्रिय , वैश्य आदि जातियों को भी चरण पकड़ने का  अवकाश प्राप्त है । हीनजातिसमुद्भवा, अधमजन्मा विशेषणों का समाधान पूर्व वक्तव्य  में हम कर आये हैं ।
अकथित अंश  से असम्भव होने की सिद्धि नहीं हुआ करती  , फलतः राम द्वारा नमन करने का प्रसंग प्राप्त न होना , उनके द्वारा  नमन न करने की भी सिद्धि नहीं करता ।

  शबरी जी के ब्राह्मणी पक्ष में - // दृष्ट्वा तु तदा सिद्धा समुत्थाय कृतांजलिः । पादौ जग्राह..// यहॉ  चरण पकड़ने वाली शबरी के लिये #सिद्धा विशेषण उनके   ब्राह्मणीपक्ष की रक्षा कर रहा है ।  क्योंकि लोक में सिद्ध प्राणियों में  आचारमर्यादा का अतिरेक दीखने पर भी उनमें  दोषप्राप्ति नहीं होती ।  (समरथ को नहिं दोष गोंसाई। रवि पावक सुरसरि की नाई।।) । वे  मतंग मुनि की शिष्या रहीं , उनके आश्रम में वास करतीं थीं ,  वहीं उन्होंने तपस्या साधना की ( जैसा कि राम के तपस्या , आहारादि विषयक  प्रश्नों से स्पष्ट है ) अतः शूद्रा नहीं कहा जा सकता । 

।। श्रीरामस्य जयोsस्तु ।।

Sunday, 29 March 2020

जाति और वर्ण एक ही अर्थ में प्रयुक्त हुए है

#प्रश्न - वर्ण और जाति - दोनों एक ही (समानार्थक)  शब्द हैं या अलग अलग ?

#उत्तर -   दोनों एक ही  हैं ।  वर्ण कहो  या जाति - एक ही बात है । 

ब्राह्मण , क्षत्रिय , वैश्य और शूद्र - ये चार  वर्ण मानव   की  प्रधान  जातियॉ हैं ।

श्री ब्रह्माजी नामक  ब्रह्मलोक के महान् देवता  के  दिव्य  मुखादि  अंगों से  सृष्टि के आरम्भ में   पैदा हुए - इसलिये इनको #जाति कहते हैं, परमात्मा  ने इन जीवों को इनके पूर्वजन्मों के  गुण -कर्मों से चुना था , इसलिये ये #वर्ण कहलाते हैं । 

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#प्रश्न -इन दोनों शब्दों का एकार्थ किस रीति  सिद्ध है , क्योंकि  वर्णऔर जाति  शब्द  तो अलग अलग हैं ?

#उत्तर - जैसे, -

#कानन  और #अरण्य    -ये परस्पर     पर्यायवाची शब्द है ।  दोनों शब्द जिस  वन  का  बोध कराते हैं, वो  बोध  एक ही है ।

इसी प्रकार, -

वर्ण और जाति - ये पर्यायवाची शब्द हैं । दोनों शब्द जिस  ब्राह्मणादि  का बोध कराते हैं, वो एक ही है ।

जैसे , -

कानन का अर्थ कस्य ब्रह्मणः  आननम्    इस प्रकार  ब्रह्ममुख आदि  भी  किया जा सकता है,  अथवा कं जलम् अननं जीवनम् अस्य इस प्रकार अन्यार्थ भी प्रयोग किये जा सकते हैं,

इसी प्रकार, -

वर्ण शब्द के अन्य भी अनेक अर्थ हो सकते हैं , किन्तु इन सब विविधार्थों के मध्य  अरण्य या वन अर्थ भी कानन का होता है, इसी प्रकार वर्ण शब्द का अर्थ जाति  होता है, इसमें  किसी भी प्रकार की  कोई विप्रतिपत्ति नहीं है ।

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#प्रश्न - तो फिर  हिन्दू धर्म की  जाति व्यवस्था का  तरह तरह  प्रकारों से  लोग विरोध क्यों करते हैं आजकल ?

#उत्तर -  सुनिये, -

जिनके बाप -दादे  अपने पुरखों की शुद्ध जाति परम्परा से गिर कर म्लेच्छ हो  गये हैं, ऐसे कुछ   स्वधर्मभ्रष्ट परिवारों  की सन्तानें  कहती हैं कि जाति व्यवस्था   हिन्दू धर्म का  कोई भी  अंग नहीं है ।

किन्तु जिनके बाप दादे अपने पुरखों की शुद्ध जाति परम्परा को सम्भालते हुए आये , ऐसे तपस्वियों की सन्तानें कहती हैं जाति व्यवस्था हिन्दू धर्म की आधारशिला है ।

धार्मिक जाति व्यवस्था का विरोध करना  वस्तुतः लोगों की  व्यक्तिगत / पारिवारिक समस्या की पहचान है ।

।। जय श्री राम ।।

शबरी का झूठे वेर खिलाने का खण्ड

हमने भी पर्याप्त  जंगली बेर खाये हैं, लेकिन चख के पता कभी नहीं करना पड़ा , रंग देख कर ही पता चल जाता है कि कैसा होगा ।

हो सकता है त्रेतायुग में कईं प्रजातियॉ रही होंगी, लेकिन प्रजाति का स्वाद  पता करने के लिये तो स्थालीपुलाकन्याय से  एक बार का एक ही बेर पर्याप्त है ।  वो भी उस स्त्री के लिये जिसने पूरा जीवन जंगल में ही काटा हो !

ये क्या कि मुंह के जूठे बेर काट काट के अतिथि देवता को खिलाये जायें ? चलो दुर्जनतोषन्याय से  हम तो फिर भी आपका कहा मान लेते हैं वो मतंगशिष्या  जंगली गंवार थी, पर क्या राम भी अनपढ़ थे क्या , जो किसी का जूठा खा लें ? वो राम , जो गुरुगृह गये पढ़न रघुराई । अन्तकाल विद्या सब पाई ।।

नोच्छिष्टं कस्यचिद् दद्यात् ।

उच्छिष्टमपि चामेध्यं भोजनं तामसप्रियम् ।

श्रुति स्मृति का उल्लंघन करने वाला न तो मेरा भक्त है, न  वैष्णव , ऐसा कहने वाले भगवान् ने स्वयं श्रौत- स्मार्ताचार को ताक पर रखकर भक्ति के नाम पर  जूठे बेर खा लिये - कितना झूठ फैला दिया गया ।

।। श्रीरामस्य जयोsस्तु ।।

शवरी ब्राह्मणी थी

शबरी जी :  शंका समाधान ----

अध्यात्म रामायण में शबरी जी के विषय में दो विशेषण हैं - 
(१) हीनजातिसमुद्भवा
(२) अधमजन्मा

और शबरी के  आचारकर्म के भी दो ध्यातव्य विशेषण हैं -

(१) अर्घ्यादिभिरादृता
  (२) सुगन्धैः सानुलेपनैः (सम्पूज्य)

अर्थात् शबरी हीन जाति में पैदा हुईं थीं , वे अधमजन्मा थीं  और उन्होंने अर्घ्य, पाद्य  से पूजन करके भगवान् राम को तिलक भी लगाया ।

अब जो लोग शबरी को शूद्रा समझते हैं , उनका विरोध अर्घ्य, तिलकादि पूजन कर देते हैं , क्योंकि शूद्रा स्त्री को क्षत्रिय को अर्घ्य , पाद्य देने और  स्पर्श करते हुए  गन्ध लेपन करने का कितना शास्त्रीय अधिकार है , ये सर्वविदित है ।

ऐसे में प्रश्न ये है कि फिर शबरी जी के लिये प्रयुक्त दो   जातिपरक  विशेषणों का क्या भाव है ?  इसका समाधान यह है कि शबरी जी के उक्त दो विशेषण  या तो उनकी स्त्री जाति होने के कारण ही प्रयुक्त हुए हैं (ब्राह्मणी पक्ष में) क्योंकि   जाति शब्द केवल वर्णगत ही नहीं प्रयोग  हुआ करता , वरन् योनिगत भी प्रयुक्त होता है , जैसे - मनुष्य जाति , पशु जाति , पक्षी जाति , स्त्री जाति , पुरुष जाति आदि । पुरुष जाति के सापेक्ष स्त्री जाति के  अवर होने के कारण ही उक्त दो विशेषणों का होना संगत है ।  शास्त्रानुसार स्त्री जाति को पापयोनि कहा गया है । ( मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येsपि स्युः पापयोनयः । स्त्रियो वैश्यस्तथा शूद्रास्तेsपि यान्ति परां गतिम् ।। )  अतः शबरी जी का स्वयं के स्त्री जाति होने के कारण ही स्वयं को हीनजातिसमुद्भवा कहा गया । यही संगत है ।
तभी तो गोस्वामी जी ने शबरीमुख से कहलवाया भी है - अधम ते अधम अधम अति नारी । तिन्ह मंह मैं मतिमन्द अघारी ।।
अथवा क्षत्रिय जाति से अवर जाति - अनुलोम संकर क्षत्रिय, वैश्य जाति आदि के कारण प्रयुक्त हुए   ।

श्री धर्मसम्राट् करपात्री जी महाराज ने रामायण मीमांसा ग्रन्थ में शबरी जी को ब्राह्मणी बताया है । 

कृतातिथ्य रघुश्रेष्ठम् - शबरी जी ने रघुकुल के राम चन्द्र का आतिथ्य किया था । कहा जाता है , भरत के अनुमोदन पर गिरि काननरूप  अरण्यभाग का शासन  राम ही कर रहे थे । राजा आतिथ्य का अधिकारी है । ऐसी स्थिति में शबरी जी का आचार शास्त्रोचित ही था ।
मर्यादा पुरुषोत्तम राम भला शास्त्रविरुद्ध आचार को अनुमोदन कर भी कैसे सकते थे !

राम वशिष्ठ ऋषि से शिक्षा पाये थे, वशिष्ठ धर्मसूत्र , वशिष्ठ स्मृति जन्मना वर्णव्यवस्था की ही पोषक है ।  स्वयं राम के पूर्वज महाराज मनु की मनुस्मृति जन्मना वर्णव्यवस्था का ही अनुमोदन करती है । अतः राम अपने गुरु , पिता - पूर्वजों के ही मार्ग पर चले थे, उन्हीं की मान्य आचार परम्परा को पोषित किये थे , ये सिद्ध है ।

।। श्रीरामस्य जयोsस्तु ।।

Tuesday, 11 February 2020

भोजन के वैदिक नियम

सज्जनो !----
यदि आप कौवे का जन्म नहीं लेना चाहते तो ध्यान दें ----
भोजन करने के सामान्य नियम -
१. सदैव शुद्ध होकर, आचमन करके ही भोजनालय ( रसोई) में भोजनार्थ प्रवेश करे ।
२.उत्तरीय ( दुपट्टा) और धोती पहने ।
३. श्रीखंड चंदन आदि का तिलक लगा के भोजनालय में जाये ।
४. भोजनालय गोबर से लीपा हो ।
५. भोजन से पूर्व ब्राह्मण चतुष्कोण , क्षत्रिय त्रिकोण , वैश्य गोल मण्डल व शूद्र केवल जल से अभिषेक करे ।
६. #पितुन्नुस्तोषम्० इत्यादि मन्त्र से पहले अन्न की स्तुति करे ।
७. पुनः मानस्तोके नमो वः० मन्त्र से उस परोसे अन्न को अभिमन्त्रित करे ।
८. फिर बलिवैश्वदेव यज्ञ ( आहार का कुछ अंश मन्त्र के साथ बलि देना ) करे ।
९. फिर अन्तश्चरसि० मन्त्र से भगवान् विष्णु का ध्यान करे, फिर अमृतोपस्त० मन्त्र से आचमन करे ।
१०. फिर अन्न में अमृत का ध्यान करके अपने मुख में पॉच आहुतियॉ दे - प्राणाय स्वाहेति मन्त्रों से ।( वाजसनेयी शाखानुसार )
११. ये प्राणाहुतियॉ दॉत से न काटे , वरन जीभ से चाट कर ही ग्रहण करे ।
१२. पहला कौर अंगुठे + मध्यमा , दूसरा मध्यमा+अनामिका, तीसरा कनिष्ठा+तर्जनी , चौथा अंगूठे के अतिरिक्त शेष चार , पॉचवा पॉचों अंगुलियों से ग्रहण करे ।
१३. बॉये हाथ से, पैर से, पेडू से , सिर से या विपरीत दिशा में रखा अन्न न छुए ।
१४. भोजन के अन्त में अन्न लेकर मद्भुक्तोच्छिष्टशेषं० मन्त्र पढ़कर अंगूठे व तर्जनी के बीच से गिरा दे ।
१५. फिर हाथ में जल लेकर अमृतापिधानम्० मन्त्र से हाथ का आधा जल पीकर शेष आधा जल धरती पर गिराये ।
१६. फिर अर्थिनां सर्वभूतानां ० मन्त्र पढ़कर भोजन स्थान से कुछ हटकर भरकुल्ला जल और सींक ( खरका ) से मुंह साफ करें ।
१७. फिर पुनः अच्छी तरह कुल्ला व आचमन कर दाहिने पैर के अंगूठे में अंगुष्ठमात्र पुरुष की भावना से ईशः सर्वस्य जगतः० मंत्र पढ़ते हुए हाथ से जलधारा गिराए ।
१८ फिर पेट पकड़कर शर्यातिञ्च० मंत्र पढ़े और नमो भगवते वाजसनेयाय याज्ञवल्क्याय दो बार कहते हुए हुए स्मरण करे , और मुंह को अच्छी तरह साफ कर मुख शुद्धि करे ।

                   ।।  जय श्री राम ।।

Thursday, 6 February 2020

शिवरात्री चतुर्थ याम पूजा

#शिवरात्रौ-

चतुर्थ याम पूजनम्=====
ॐभूःऋग्वेदायस्वाहा" ॐभुवः यजुर्वेदाय स्वाहा" ॐस्वः सामवेदाय स्वाहा"त्रिराचम्य"ॐभूर्भुवःस्वः अथर्ववेदाय स्वाहेति हस्तं प्रक्षाल्य " ॐत्र्यम्बकं०  मंत्रेण त्रिः प्राणानायम्य"सुमुखश्चेत्यादि पठित्वा एतत् कर्म प्रधान देवता सांगाय सपरिवाराय मृत्युञ्जय(अमुक महादेवाय)नमः संकल्पः- शिवरात्रौ सूचित चतुर्थ याम शिवपूजां करिष्ये" गणपतिं पञ्चोपचारैः सम्पूज्य" तृतीय प्रहरे गौरी पूजा- ध्यानम्* मालिनीछंदः* अस कलश शिराजन्मौलि राबद्ध पाशां कुरु रुचि कराग्रा बंधु जीवारुणांगी|| अमर निकर वंद्या त्रीक्षणी शोणलेपा शुक कुसुमयुता स्यात्संपदे पार्वती नः|| पाद्यादि दशोपचारै र्वा षोडशोपचारैः सम्पूज्य" प्रार्थना-स्रग्धरा* ऐं लोके कीर्तयंती मम हरतु भयं चंडरूपे नमस्ते घ्रांघ्रांघ्रां घोररूपे घ घ घ घ घटिते घर्घरे घोररावे|| निर्माँसे काकजंघे घसित नख नखा धूम्रनेत्रे त्रिनेत्रे हस्ताब्जे शूलमुंडे कल कुल कुकुले श्री महेशी नमस्ते|| शार्दूल विक्रिडीतम्- गौरि त्र्यम्बक पत्नि पार्वति सति त्रैलोक्य गाने शिवे शर्वाणि त्रिपूरे भवानि वरदे रुद्राणि कात्यायनि|| भीमे भैरवी चण्डि सर्व वरदे कालेऽक्षये शूलिनी त्वत्पाद प्रणतं ह्यनन्य मनसा पर्याकुले पाहि माम्|| पृथ्विछंदः- पुरारि तनु हारिणी दुरित संघ संहारिणी भजन्मति विवर्धिनी प्रबल दानवो न्मादनी || तुषारगिरि नन्दिनी मुनि हृदन्त रालम्बिनी कुमार मुख चुम्बिनी हर नितम्बिनी पातु वः|| शिखरिणी* त्वयांतर्यामिन्या भगवति वशिन्यादि सहिते विधीयन्ते भावा मनसि जगता मित्युपनिषत्|| अहं कर्त्तेत्यन्तर्विशतु मम बुद्धिः कथमुमे सुबुद्धिस्त्वद्भक्तौ न भवति कुबुद्धिः क्वचिदपि|| वसन्त तिलका- आवाहनं यजन वर्णन मग्निहोत्रं कर्मार्पणं तव विसर्जन मत्र देवी|| मोहान्मया कृतमिदं सकलाऽपराधं मातः क्षमस्व गिरिजे बहिरन्तरस्थे|| कालरात्रि र्महारात्रि र्मोहरात्रि श्च दारुणा|| त्वं श्रीस्त्वमीश्वरी त्वं ह्रीस्त्वं बुद्धिर्बोध लक्षणा|| सर्व मंगल० अपराध शतं कृत्वा०

पूजनादौ स्वदेह शुद्ध्यर्थं न्यासान्करिष्ये" त्र्यम्बकमित्यस्य वशिष्ठ ऋषिः अनुष्टुप् छंदः मृत्युंजयो देवता हलो बीजानि स्वराः शक्तयः पूजनादौ न्यासे विनियोगः~ ॐवशिष्ठर्षये नमः शिरसि" ॐअनुष्टुप् छंदसे नमो मुखे" ॐमृत्युंजयदेवतायै नमः हृदये" हल् बीजेभ्यो नमः गुह्ये" (हस्तं प्र०) स्वराः शक्तिभ्यो नमः पादयोः" पूजयां विनियोगाय नमः सर्वांगे" ॐत्र्यम्बकं अंगुष्ठाभ्यां नमः " ॐज्जजामहे तर्जनीभ्यां नमः " ॐसुगन्धिं पुष्टि वर्द्धनं मध्यमाभ्यां नमः " ॐउर्व्वारुक मिव बन्धनात् अनामिकाभ्यां नमः " ॐमृेत्योर्मुक्षीय कनिष्ठिकाभ्यां नमः " ॐमामृेतात् करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः " एवमेवं हृदयादि षडंगानि विन्यस्य"
पञ्चब्रह्ममयो ईशानादि अष्त्रिंशत्कला न्यासः(शा०ति०) ॐईशानः सर्व० अंगुष्ठाभ्यां नमः" ॐतत्पुरुषाय वि० तर्जनीभ्यां नमः" ॐअघोरेभ्योऽथ० मध्यमाभ्यां नमः" ॐवामदेवाय नमो० अनामिकाभ्यां नमः" ॐसद्योजातं प्र० कनिष्ठिकाभ्यां नमः" ईशमन्त्र कला न्यासः(पञ्चवक्त्रपूजायां ऊर्ध्ववक्त्रन्यासः) ॐईशानः सर्वविद्यानाम् शशिन्यै नमः पूर्वमुखे" ॐईश्वरः सर्वभूतानाम् अङ्गदायै नमः दक्षिणमुखे" ॐब्रह्माधिपति र्ब्रह्मणोऽधिपति र्ब्रह्मेष्टदायै नमः पश्चिम मुखे" ॐशिवो मेऽस्तु मरीच्यै नमः उत्तर मुखे" ॐसदाशिवोम् अंशुमालिन्यै नमः मध्यमुखे" तत्पुरुष न्यासः( पञ्चवक्त्र पूजायां पूर्ववक्त्रन्यासः) ॐतत्पुरुषाय विद्महे शान्त्यै नमः पूर्वमुखे" ॐमहादेवाय धीमहि विद्यायै नमः पश्चिम मुखे" ॐतन्नोरुद्रः प्रतिष्ठायै नमः दक्षिणमुखे" ॐप्रचोदयात् निवृत्यै नमः उत्तरमुखे" अघोरकला न्यासः(पञ्चवक्त्र पूजायां दक्षिणवक्त्रन्यासः) ॐअघोरेभ्यः ईरितायै नमः हृदये" ॐअथघोरेभ्यः मोहायै नमः ग्रीवायाम्" ॐघोर क्षमायै नमः दक्षिण स्कन्धे" ॐघोर घोरतरेभ्यः निद्रायै नमः वामस्कन्धे" ॐसर्वतः सर्व व्याध्यै नमः नाभौ" ॐशर्वेभ्यः मृत्यवे नमः कुक्षौ" ॐनमस्तेऽस्तु क्षुधायै नमः पृष्ठे" ॐरुद्ररूपेभ्यः तृषायै नमः वक्षः स्थले" वामदेव मन्त्रकला न्यासः(पञ्चवक्त्र पूजायां उत्तरवक्त्र न्यासः) ॐवामदेवायनमः वज्रायै नमः गुह्ये" ॐज्येष्ठायनमः रक्षायै नमः ॐरुद्रायनमः रत्यै नमः वृषणयो:" ॐकालायनमः पालिन्यै नमः ॐकलाय नमः कामायै नमः ऊर्वो:"ॐविकरणाय नमः संयमन्यै नमः ॐबलाय नमः क्रियायै नमः जान्वोः"ॐबलविकरणायनमः वृद्ध्यैनमः ॐबलायनमः स्थिरायै नमः जङ्घयोः" ॐप्रमथनायनमः रात्र्यैनमः नितम्बे" ॐसर्वभूतदमनाय नमः भ्रामण्यै नमः कट्योः" ॐमनः मोहिन्यै नमः ॐउन्मनाय नमः जरायै नमः पार्श्वयोः" सद्योजातकला न्यासः(पञ्चवक्तपूजायां पश्चिमवक्त्र न्यासः) ॐसद्योजातं प्रपद्यामि सिद्ध्यैनमः ॐसद्योजाताय वै नमः वृद्ध्यै नमः पादतलयोः" ॐभवे द्युत्यैनमः ॐअभवे लक्ष्म्यैनमः करतलयोः" ॐनातिभवे मेधायै नमः ॐभजस्व माम् प्रज्ञायै नमः नासिकयोः" ॐभवः प्रभायै नमः शिरसि" ॐउद्भवाय नमः स्वधायै नमः बाह्वोः" (इति विन्यस्य देहोऽसौ भवेद्गंगाधरः स्वयम्|| ततः समाहितो भूत्वा ध्यायेद्देवं सदाशिवोम्||शा०ति०१८पटले) ततः महान्यासान्तरतः सप्तमो लघुन्यासं कृत्वा " एखत इत्यस्य प्रजापति र्ऋषिः सामपङ्क्ति र्यजुर्गायत्री छन्दसी रुद्रो देवता (यथा कामानुसारेण स्वाङ्गे) योनि मुद्रा प्रदर्शने विनियोगः(एवं न्यास विधिं कृत्वा ततो मुद्रां प्रदर्शयेत्|| शिवपुष्टिः शिवस्योक्ता सैवशान्ति प्रदायिनी|| श्रीकामः शीर्ष्णि कुर्वीत" तेजस्कामस्तु नेत्रयोः"|| मुखे त्वन्नाद्य कामस्तु" ग्रीवायां रोगनाशने"||हृदये सर्वकामस्तु" नाभौ ज्ञानी प्रदर्शयेत(मोक्षज्ञानार्थं)"|| प्रजाकामस्तु(कुलवृद्ध्यर्थं)गुह्ये वै" पशुकामस्तु जङ्घयोः"|| जानुभ्यां ग्रामकामस्तु" राष्ट्रकामस्तु पादयोः"||वशीकरणकामस्तु(चलितमनः) वामहस्ते प्रदर्शयेत्"||पापक्षयेऽभिचारे च (उपद्रवशांति) व्याधेरपगमे (रोगनिवृत्तिः) तथा||- बहिः शरीरात्कुर्वीत" शिवस्याज्ञेति च स्मरन्|| एवं प्रदर्शयित्वा तु ततो ध्यानं समारभेत्||
दक्षिणभागे साधारस्य ताम्रपात्रस्य स्थापनं कृत्वा-अक्षतैः पूजयेत्-  ॐजातवेदसे० दशकलात्मने अग्नये नमः, ॐसूर्ज्जरश्मि० द्वादशकलात्मने सूर्य्याय नमः, त्र्यम्बकमित्यस्य वशिष्ठ ऋषिः अनुष्टुप् छंदः मृत्युञ्जयो देवता अर्घ पूरणे विनियोगः, ॐत्र्यम्बकं० पात्रे तीर्थोदकमापूर्य, अक्षतैः पूजयेत्- ॐत्र्यम्बकं० षोडशकलात्मने चन्द्राय नमः, तस्मिन् गंधाक्षतपुष्पाणि प्रक्षिप्य, ॐत्र्यम्बकं० इति अष्टवारं अभिमन्त्र्य, पूजासम्भारान् अनैनावार्घोदकेन प्रोक्षयेत्- ॐत्र्यम्बकं० शिवार्चन कालेषु यानि यानिह साम्प्रतम्|| वस्तुनि सौरभाढ्यानि पवित्राणि भवन्तु वै|| किंचित् अर्घोदकबिन्दुं पूजार्थं गृहितकलशे निक्षिप्य."  बाणलिंग मूर्तौ अग्न्युत्तारण पूर्वकं प्राणप्रतिष्ठापनम् च आवाहनम् (स्वयंभुवे रसलिंगे बाणलिंगे आत्मलिंगे वायुलिंगे वा ज्योतिर्लिंगे प्राणप्रतिष्ठा  नैवम्)  ध्यानम्*हस्ताभ्यां कलशद्वयामृतरसै राप्लावयन्तं शिरः द्वाभ्यां तौ दधतं मृगाक्षवलये द्वाभ्यांवहन्तं परम्|| अंके न्यस्त करद्वयामृतघटं कैलाशकान्तं शिवं स्वच्छांभोजगतं नवेन्दुमुकुटं देवं त्रिनेत्रं भजे||  ॐभूर्भुवःस्वः (अमुक महादेव)मृत्युञ्जयाय नमः इति  आसन,पाद्य,अर्घ्य. आचमन, स्नान,पञ्चामृतस्नान, गंधोदकस्नान,सुगंधीतैलस्नान, आमलकद्रवस्नान, कुशोदकस्नान,गर्भोदकस्नान, षडंगरुद्रेण वा पुराणोक्ते ब्रह्मशिलादसंवादे नमकचमकानुवाकेन अभिषेकः चतुर्थ प्रहरे ॐसद्योजाताय नमः इति मधुना (प्रहरपूजायां लघुरुद्राभिषेकस्य आवश्यक्ता नैव केवलं प्रहरपूजा विशेषार्थो ज्ञेयः),शुद्धोदकस्नान,वस्त्र, उपवीत, अलंकार,अस्त्र शस्त्र आयुध, चतुर्थप्रहरे  ॐईशानाय नमः इति गंधम् .चतुर्थप्रहरोक्त सप्तधान्य,प्रहरोक्त बकुल चम्पक मालति पुष्पाणि अन्यऋतुकालोद्भव पुष्पाणि, पुष्पहार,बिल्वपत्राद्यैः पूजनं कृत्वा पञ्चवक्त्रपूजनम्(  यथोक्त पूजाद्रव्यैः)  गंधाक्षतैः अङ्गपूजा, देववामभागे शक्तिपूजा,गणपूजा  एकादशरुद्रपूजा, द्वादशलिङ्गपूजा, १०८बिल्वपत्रैः अष्टोत्तरशतनाम मंत्राभिः सम्पूज्य, सौभाग्यद्रव्य, धूपनिवेदन विधिः- धूपपात्रं अर्घोदकेन संप्रोक्ष्य. अंगारान् रं इति संस्थाप्य, गुग्गुलं निक्षिपेत्  ॐत्र्यम्बकं० इति धूपं कृत्वा. गंधपुष्पाभ्यां नमः इति सम्पूज्य,घंटा पूजनम्- ह्रीं जगत् ध्वनि मंत्रमातः स्वाहा" घंटां वादयन् दक्षकरेण किंचिद् अर्घोदकमादाय वामतर्जन्या धधूपपात्रं स्पृष्ट्वा ॐ धूरसि० सांगाय सपरिवाराय(अमुक महादेवाय) मृत्युञ्जयाय नमः  धूपं समर्पयामि, देवस्य नाभौ धूपं दत्वा धूपपात्रं देववामभागे निधाय. तर्जन्यङ्गुष्ठयोगेन धूप मुद्रां प्रदर्श्य,
दीपनिवेदन विधिः- दीपपात्रं अर्घोदकेन अस्त्राय फट् इति प्रोक्ष्य. गोघृतेनापूर्य.पञ्चतंतुभिः वर्तिन्निक्षिप्य, ॐत्र्यम्बकं०  इति प्रज्वाल्य, नमः इति सम्पूज्य. ॐसुजातो० सांगाय सपरिवाराय(अमुक महादेवाय) मृत्युञ्जयाय  नमः इति वदन् मस्तकादि पादान्तं दीपं प्रदर्शयेत्.देव दक्षिणे दीपपात्रं निधाय, अर्घोदकमादाय  (अमुक महादेवाय) मृत्युञ्जयाय नमः दीपं दर्शयामि, मध्यमाङ्गुष्ठ योगेन दीपमुद्रां प्रदर्श्य.

नैवेद्य निवेदन विधिः- देवस्याग्रे जलेन चतुरस्र मंडलं कृत्वा तस्योपरि भोजनपात्रं निधाय.पात्रे तृतीयप्रहरोक्त गोधूमान्न(गेहुंके आँटेका हलुवा- कंसार)नैवेद्यं पूरयित्वा. अस्त्राय फट् इति अर्घोदकेन प्रोक्ष्य. मुकुलमुद्रारित्या सर्वतोदिशी  चक्राकारं भ्रामयित्वा चक्रमुद्रां दर्शयन् नैवेद्यं संरक्ष्य. ॐत्र्यम्बकं० इति मूलेन संवीक्ष्य,अधोमुख दक्षिण हस्तोपरि तादृशं वामहस्तं निधाय नैवेद्यमाच्छाद्य यं इति वायुबीजं षोडशवारं संजप्य वायुना तद्गत सम्भवित दोषान् संशोध्य. ततो दक्षिण करतले तत्पृष्ठ लग्न वामकरतलं कृत्वा नैवेद्यं प्रदर्श्य रं इति वह्निबीजं षोडशवारं जप्त्वा तदुत्पन्नाग्निना तद्दोषं दग्ध्वा, ततो वाम करतले वं इति सुधाबीजं विचिन्त्य तत्पृष्ठ लग्न दक्षिण करतलं कृत्वा नैवेद्यं प्रदर्श्य वं इति षोडशवारं संजप्य.तदुत्थामृत धारयाप्लावितं विभाव्य ॐत्र्यम्बकं० इति अर्घोदकेन प्रोक्ष्य. धेनुमुद्रया अमृतिकृत्य ॐत्र्यम्बकं० इति मूलेनाष्टवारमभिमन्त्र्य. गंधपुष्पाभ्या सम्पूज्य. देवस्योद्गत तेजं स्मृत्वा वामांगुष्ठेन नैवेद्यपात्रं  स्पृष्ट्वा दक्षिण करेण किंचिद् अर्घोदकं गृहित्वा ॐनमोऽस्तु रुद्रेभ्यो जे पृथ्व्यां० सांगाय सपरिवाराय (अमुक महादेवाय)मृत्युञ्जयाय  नमः  नैवेद्यं समर्पयामि. ॐअमृतोपस्तरणमसि स्वाहा-इति भूतले जलं क्षिप्त्वा. वाम हस्तेन नैवेद्य मुद्रां(अनामिकांगुष्ठ योगेन) प्रदर्श्य, सपुष्पकराभ्यां पात्रमुद्धरन् भगवतः(अमुक महादेवः) उमापति र्निवेदितानि हवीषिं जुषाण. सर्वांगुलिभिः ग्रासमुद्रां प्रदर्श्य..

प्राणाद्यैः मुद्राभिः(कनिष्ठिकानामिकांगुष्ठ योगेन- ॐप्राणाय स्वाहा" तर्जन्यङ्गुष्ठमध्यमाभिः-  ॐअपानाय स्वाहा" तर्जन्यंगुष्ठमध्यमानामिकाभिः- ॐव्यानाय स्वाहा" मध्यमानामिकांगुष्ठैः ॐउदानाय स्वाहा" सर्वांगुलिभिः ॐसमानाय स्वाहा") देवता भुंजानं ध्यात्वा जलं दद्यात्- (चषकपात्रे) ॐनमस्ते देवदेवेश सर्वतृप्तिकरं परम्| अखंडानंद सम्पूर्ण गृहाण जलमुत्तमम्|| भगवन् तज्जल प्राशितमिति भावयन् अंतःपटं कृत्वा ॐअन्नात् परिस्रुतो० ब्रह्मेशाद्यैः सरसभमितः सूपविष्टैः समन्तात् सिंजद्व्याल व्यजननिकरैः विज्यमानो  वयस्यैः||० आचमन- शीतलं मधुरं स्वच्छं पावनं वासितं लघु|| मध्ये स्वीकुरु पानीयं शिव मृत्युंजय प्रभो|| पुनः प्राणाद्यैः मुद्राभिः यथा शक्तिः ॐत्र्यम्बकं० इति मूलं संजप्य जलेन- ॐअमृतापिधानमसि स्वाहा- उत्तरापोशानादिकं दद्यात्
करोद्वर्तन,मुखवास,-अन्ते पुनराचमन, दक्षिणा, नीराजन,प्रदक्षिणा, मंत्रपुष्पाञ्जलिः, विशाषार्घ- चतुर्थयामे कदलीफलैः" विशेषार्घः-  ॐजाःफलिनी० ॐ किं न जानासि देवेश तावद्भक्तिं प्रयच्छ मे|| स्व पादाग्रे तले देव दास्यं देहि जगत्पते|| मया कृतान्यऽनेकानि पापानि हर शंकर|| शिवरात्रौ ददाम्यर्घ्यं उमाकांत नमोऽस्तु ते|| राजोऽपचारान्- ॐबृहस्पते श्छदि० इत्यनेन छत्रं "ॐतव व्वाय०  चामरद्वयं व्यजनद्वयञ्च” ॐआकेृष्णेन० दर्पणं ॐ प्रतिष्ठे स्थो विश्वतो मा पतम्|| इत्यनेन पादुके"  प्रार्थना*शार्दूल० वि० श्री काशीश्वर ईश्वरो गुण निधिः विश्वेश्वरो धर्मदः श्री रामस्य प्रिय श्री सुरेश्वर गुरु गंगाधरो त्र्यम्बक|| श्री गर्भो गिरिजापतिः पशुपति शूलि पिनाकी शिवः श्री शंभुः उमापति सुरगुरु श्रेयः कुरु योगिनाम्|| आत्मा त्वं गिरिजापति० कर चरण कृतं वा०  ॐ त्र्यम्बकं०  इति अष्टोत्तरशतं वा अष्टाविंशतिवारं जप्त्वा अर्घ्योदकमादाय ॐ गुह्याति गुह्य० तज्जलं देवदक्षिणकरं स्मृत्वा दद्यात्"

ॐएषते रुद्र० इति इषु योनि त्रिशूल पद्म कालकर्णिक धेनुमुद्रा इति षष्ठमुद्राः प्रदर्शयेत्"

इमारुद्रायेति कुत्स ऋषिः जगती छंदः एकोरुद्रो देवता पूजा निवेदने विनियोगः- अर्घोदकेन* यथा ज्ञानेन यथा मिलितोपचारद्रव्यैः शिवरात्रौ द्वितीययाम पूजन कर्मणा कृतेन भगवान्परमात्मा सपरिवारः(अमुक महादेव) मृत्युञ्जयः प्रीयताम् " द्रापे इत्यस्य परमेष्ठी ऋषिः उपरिष्ठाद् बृहती छंदः एकोरुद्रो देवता अष्टांग प्रणामे विनियोगः- उरसा शिरसा दृष्ट्या मनसा वचसा तथा| पद्भ्यां कराभ्यां जानुभ्यां प्रणामोऽष्टांग उच्यते|| ततो पूर्व स्थापित अर्घ्यपात्र मुत्थाप्य ॐत्र्यम्बकं० साधु वा ऽसाधु वा कर्म यद्यदाचरितं मया|| तत्सर्वं कृपया शंभो गृहाणाराधनं मम|| इति शिवोपरि भ्रामयित्वा श्री(अमुक महादेवाय) मृत्युञ्जयाय नमः पुनरर्घ्यं समर्पयामि इति देवस्य दक्षकरे समर्प्य..
शिवस्य सावयवानि दर्शनम्- शार्दूल०वि० प्रातर्लिंग मुमापते रहरहः संदर्शनात्स्वर्गदं मध्याह्ने हयमेध तुल्य फलदं सायंतने मोक्षदम्|| भानोरस्तमये प्रदोष समये पञ्चाक्षराऽऽराधनं तत्काल त्रय तुल्य मिष्ट फलदं सद्योऽनवद्यं दृढम्||
हस्ते पुनर्अर्घ्योदकं गृहीत्वा- ॐइतःपूर्वं  प्राण बुद्धि देह धर्माधिकारतो जाग्रत्स्वप्नसुषुप्त्यवस्थासु मनसा वाचा कर्मणा हस्ताभ्यां पद्भ्यामुदरेण शिश्ना यत्कृतं यत्स्मृतं यदुक्तं तत्सर्वं ब्रह्मार्पण मस्तु मां मदीयं सकलं श्रीमृत्युञ्जय (अमुक महादेवार्पण) मस्तु|| ॐतत्सत् इति चतुर्थ प्रहरपूजा......

विनियोग- अक्षिभ्यां इति षण्णां विवृहा ऋषिः अनुष्टुप् छंदः यक्ष्महा देवता"आपोहिष्ठेति तिसृणां सिन्धुद्विप ऋषिः गायत्री छंदः आपो देवता सर्वरोग शान्त्यै अभिषेकोदकेन मार्जने विनियोगः- अभिषेककृत निर्माल्योदकेन यजमानमूर्ध्नि अभिषेकः-
विनियोग- अक्षिभ्यां इति षण्णां विवृहा ऋषिः अनुष्टुप् छंदः यक्ष्महा देवता"आपोहिष्ठेति तिसृणां सिन्धुद्विप ऋषिः गायत्री छंदः आपो देवता सर्वरोग शान्त्यै अभिषेकोदकेन मार्जने विनियोगः- अभिषेककृत निर्माल्योदकेन यजमानमूर्ध्नि अभिषेकः- वैदिक आत्मसूचना - पद्धति~> अथर्ववेद०२/ ६/३३
ॐअक्षीभ्यां ते नासिकाभ्यां कर्णाभ्यां छुबुकादधि|
यक्ष्मं शीर्षण्यं मस्तिष्काज्जिह्वाया वि वृहामि ते||१||
हे रोगी मनुष्य! में तेरी दोनों आँखो,दोनों नथुनों,दोनों कानों,ठुड्डी,सिर जिह्वासे भी रोगोंको भगायें देता हूँ.

ॐग्रीवाभ्यस्त उष्णिहाभ्यः कीकसाभ्यो अनूक्यात्|
यक्ष्मं दोषण्यमंसाभ्यां बाहुभ्यां वि वृहामि ते||२||
हे व्याधिग्रस्त जीव! तेरे गलेकी १४:सूक्ष्म नाडि़योंके,हँसली, एवं वक्षःस्थलकी नाडि़यों,दोनों कन्धों,दोनों भुजाओं,और जिसमें क्रमशः सब हड्डियाँ निकलती हैं- इन सबके रोगोंको दूर करता हूँ.

ॐहृदयात्ते परि क्लोम्नो हलीक्ष्णात् पार्श्वाभ्याम्|
यक्ष्मं मतस्नाभ्यां प्लीन्हो यक्नस्ते वि वृहामसि||३||
हे रोगी! मैं तेरे हृत्कमलसे,पित्ताधारोंसे,दोनों बगलोंसे,गुर्दोंसे,प्लीहा और यकृत् से रोगका निवारण करता हूँ.

ॐआन्त्रेभ्यस्ते गुदाभ्यो वनिष्ठोरुदरादधि|
यक्ष्मं कुक्षिभ्यां प्लाशेर्नाभ्या वि वृहामि ते ||४||
हे व्याधिग्रस्त प्राणी! में तेरी आँतों,गुदाके चक्रों तथा नाड़ियों,उदर, दोनों कोखोंकी थेली और मांससे  स्नायुजालसे रोग निवृत्त करता हूँ.

ॐ ऊरुभ्यां ते अष्ठीवद्भ्यां पार्ष्णिभ्यां प्रपदाभ्याम्|
यक्ष्मं भसद्यं श्रोणिभ्यां भासदं भंससो वि वृहामि ते||५||
हे रोगग्रस्तजीव! में तेरी जंघाओं,घुटनों,एडि़यों,पैरोंके पँजों,कूल्हों,-- नितम्बों,कमर और गुह्यस्थानोंमें से रोगको दूर करता हूँ.

ॐअस्थिभ्यस्ते मज्जभ्यः स्नावभ्यो धमनिभ्यः|
यक्ष्मं पाणिभ्यामङ्गुलिभ्यो नखेभ्यो वि वृहामि ते||६||
हे रोगी! में तेरी हड्डियों,मज्जा आदि,पठ्ठों,नाड़ियों और हाथों,अँगुलियों तथा नखोंसे सब रोग दूर करता हूँ.

ॐअङ्गे अङ्गे लोम्नि लोम्नि यस्ते पर्वणि पर्वणि|
यक्ष्मं त्वचस्यं ते वयं कश्यपस्य वीबहेर्ण विष्वञ्चं वि वृहामसि||७||
हे रोगसे दुःखी प्राणी! तेरे उपर न कहे हुए प्रत्येक अङ्गमें,संपूर्ण रोमकूपोंमें और प्रत्येक जोड़में जो रोग हो गया हैं, उस रोगको में दूर करता हूँ.और तेरी त्वचामें जो रोग पहुँच गयें हैं.उन्हे दूर करता हूँ.तेरे नेत्र आदि संपूर्ण अङ्गोमें व्याप्त रोगको महर्षि कश्यपके विबर्ह मन्त्रसे दूर करता हूँ.ॐआपोहिष्ठा०जोवःशिवतमो० तस्माऽअरङ्ग०
भयके रोगसे मुक्ति और रक्षाका मन्त्र*-->
ॐअभयं मित्रादभयममित्रादभयं ज्ञातादभयं पुरो यः|
अभयं नक्तमभयं दिवा नः सर्वाः आशा मम मित्रं भवन्तु||अथर्व०१९/२/१५

कायेन वाचा मनसेन्द्रियै र्वा.... नारायणायेति समर्पयामि||
=====द्वितीयेह्नौ होमः======
शिवरात्रि प्रहरपूजाङ्ग होमः- द्वितीयेह्नौ प्रातः स्नात्वा नित्यकर्मं समाप्य" सुमुखश्चेत्यादि पठित्वा" संकल्पः- शिवरात्रौ प्रहरपूजाङ्गत्वेन श्री साम्बसदाशिव(अमुक महादेव) प्रीत्यर्थं यथाशक्तिः गुग्गुलयवतिलाज्य मिश्र द्रव्येण होमं करिष्ये, तदङ्गत्वेन स्थापित देवतानां एकतन्त्रेण षोडशोपचारैः पूजां करिष्ये... स्थंडिलं कृत्वा पञ्चभूसंस्कार पूर्वकं अग्निं संस्थाप्य" ऐशान्यां ग्रहवेद्यां आदित्यादि केवल नवग्रहान् आवाह्य च लाभोपचारैः सम्पूज्य" रुद्रकलशं विधिना संस्थाप्य तस्मिन् असंख्याता० अनेन मंत्रेण रुद्रं सम्पूज्य" पञ्चवक्त्रसूक्त जपः" ब्रह्मासनादि आधारावाज्यन्तानि कृत्वा रुद्रनामाग्नये नमः इत्यग्निं सम्पूज्य" वराहुतिं दत्वा- केवल नवग्रह मंत्रैः प्रतिग्रहं चरु तिल यव(समित्) आज्यद्रयैः अष्टाऽष्टवारं हुत्वा प्रधान उमामाहेश्वरौ- गुग्गुल यव तिलाज्य मिश्र द्रव्येण ॐ आयंङ्गौः० १०८"  ॐनमःशम्भवाय च इति सम्पूर्ण मंत्रेण १०८" ॐसद्योजातं प्रपद्यामि० १०८" ॐवामदेवाय नमो० १०८" ॐअघोरेभ्योऽथ० १०८" ॐतत्पुरुषाय वि० १०८" ॐईशानः सर्व विद्याना० १०८"
रुद्रपीठस्थ देवतानां तिलाज्येन १/१" हरिहरात्मक द्वादशलिंगतोभद्रमंडल देवतानां तिलाज्येन १/१" शेष पूर्णाहुत्यन्तं कृत्वा प्रोक्षणी पात्रोदकेन किंचिज्जलं गृहीत्वा " प्रहर पूजाङ्गत्वेन होम कर्मणा कृतेन साम्बसदाशिव (अमुक) महादेवः प्रीयताम्" संस्रवप्राशनादि निराजनान्तम् कुर्यात् "

ॐस्वस्ति||  शास्त्री पुलकित  || ॐ तत् सत् न मम

33 करोड़ देवता निर्णय

#तैंतीस_करोड़_देवता_कोटि_नहीं_हैं_  वास्तव में वैदिक दर्शन में "अनन्ता वै वेदा:" प्रमाण से "मंत्र ब्राह्मणयोर्वेद नामधेयम्...