Monday, 3 June 2019

सनातन-वैदिक-मान्यता-सिद्धान्त-सङ्ग्रह

सनातन-वैदिक-मान्यता-सिद्धान्त-सङ्ग्रह
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इन सनातन वैदिक सिद्धान्ताें मैं सभी सनातन वैदिक (हिन्दु) ओं काे सहमत हाेकर आगे बढना उचित दीखता है---

१. चार वेद ऋक्, यजु, साम, अथर्व की (शुक्ल कृष्ण दाेनाें प्रकार के यजुर्वेदाें की शाखासहित) सभी शाखाएँ अपाैरूषेय वेद हैं ।
२. एेतरेय, शतपथ, तैत्तिरीय, पञ्चविंश इत्यादि ब्राह्मणग्रन्थ भी अपाैरूषेय वेद हैं ।
३. वेदाें का परम प्रामाण्य है ।
४. जन्मना जाति और संस्कार तथा अाचार से जातित्व की पूर्णता मान्य है । जन्मना जाति व्यवस्था पुनर्जन्म के सिद्धान्त अनुरूप न्यायपूर्ण है ।
५. चार वर्ण (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र) ।
६. चार आश्रम (ब्रह्मचर्य, गार्हस्थ्य, वानप्रस्थ, सन्न्यास) ।
७. गृहस्थ-आश्रम की श्रेष्ठता और गुरुत्व तथा आचार्यत्व (गृहस्थ ब्राह्मण ही गुरु और आचार्य बन सकते हैं) ।
८. शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरूक्त, छन्दःशास्त्र, वेदाङ्गज्याेतिष-- इन छः वेदाङ्ग तथा मीमांसाशास्त्र के अनुसार का वेदार्थ ही सही है और उसके अनुसार आचार का ग्रहण करना चाहिए।
९. स्कन्दस्वामी, उद्गीथ, वेङ्कटमाधव, उवट, भट्टभास्कर, सायण, महीधर, मुद्गल आदि प्राचीन विद्वानाें से रचित वेदव्याख्याएँ प्रामाणिक हैं, ग्राह्य हैं । (वेदभगवान् के कथन-विधान के उपर अपनी स्वल्पबुद्धि से हिंसा-अहिंसा, अश्लील-अनश्लील, उचित-अनुचित इत्यादि समीक्षा करना अनुचित है)
१०. वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति--- सिद्धान्त । (वैदिक पशुबन्ध-साेमयागादि की --अग्नीषाेमीयं पशुमालभेत-- इत्यादि विधि से विहित पशुहिंसा अहिंसा ही है, तस्माद् यज्ञे वधाेऽवधः--- सिद्धान्त) ।
११. स्वशाखा-वेद का शास्त्रीय रूप में अदृष्टाेत्पादन के लिए अध्यापन का अधिकार गृहस्थ ब्राह्मण का है । अदृष्टफल के लिए अध्ययन का अधिकार भी ब्राह्मण का है । ब्रह्मचारी, गृहस्थ तथा वानप्रस्थ भी गुरु से वेद पढ सकते हैं । अन्य लाेग वेदाेक्त ज्ञान ब्राह्मणाें से प्राप्त कर सकते हेैं ।
१२. वेदाध्यायी शुद्ध ब्राह्मणाें काे दान देना बडा पुण्याेत्पादक कार्य है ।
१३. धर्मसूत्रविहित आचार अत्यन्त मान्य है ।
१४. स्मृतियाें की मान्यता है ।
१५. स्त्रीका पुनर्विवाह धर्म में अमान्य है ।
१६. स्व-शाखा श्राैतसूत्र-गृह्यसूत्र अनुसार कर्मकाण्डका अनुष्ठान करना चाहिए।
१७. श्राद्ध-कर्म-विषयक वैदिक मन्त्राें की गृह्यसूत्राेक्त व्याख्या तथा विनियाेग अत्यन्त प्रमाण हैं ।
१८. कान्यकुब्ज, सारस्वत इत्यादि ब्राह्मणाें का राेटी-बेटी का नियम शास्त्रानुकूल है ।
१९. सभी गृह्यसूत्राेक्त कर्मकाण्डपद्धतियाँ परम प्रमाण हैं (स्वशाखा का गृह्यसूत्र वेदतुल्य है) ।
२०. पुराण तथा इतिहास से वेदाें का उपबृंहण हाेता है । वेद, पुराण तथा इतिहास की कथाओं का तात्पर्य का ज्ञान करने का प्रयास करना चाहिए। सभी कथाओं का हितकारी अर्थ ग्रहण करना चाहिए । वेद, पुराण, इतिहास की कथाओं काे समस्या के रूप में नहीं देखना चाहिए ।
२१. वेदाध्ययनाधिकारहीन सनातनियाें के लिए पुराण (१८ पुराण) तथा इतिहास (रामायण-महाभारत) के अध्ययन की व्यवस्था है ।
२२. अधिकारिविशेष के लिए मूर्तिपूजा की ग्राह्यता है। मूर्तिपूजा से आत्मज्ञान की ओर आगे बढना चाहिए ।
२३. अधिकारिविशेष के लिए भक्तिमार्ग की ग्राह्यता है। ज्ञानमार्ग तथा कर्ममार्ग की ओर आगे बढना चाहिए ।
२४. कर्मानुसार पुनर्जन्म तथा माेक्षमार्गगमन शास्त्रानुसार मान्य है ।
२५. आत्मज्ञान से मुक्ति मान्य है ।
२६. अद्वैत-सिद्धान्त मान्य है ।
२७. वैदिक यज्ञाें की आत्मज्ञानाेपकारकता है ।
२८. ज्ञान- कर्म-समुच्चय (केवल ज्ञान अथवा केवल कर्म ही ग्राह्य नहीं, दाेनाें का अवलम्बन करने का) मार्ग श्रेष्ठ है ।
---- इत्यादि ।

Saturday, 1 June 2019

ईश्वर अल्लाह तेरो नाम का खण्डन

हिन्दुओं के  राम के नाम में अल्लाह की  मिलावट करने वालों की सच्चाई  ------
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तथाकथित  गंगा-जमुनी तहजीब वालों को एक  गीत गाते हुए प्रायः सुना होगा आपने -

रघुपति राघव राजा राम पतितपावन सीताराम ।
ईश्वर अल्लाह तेरो  नाम सबको सन्मति दे भगवान् ।।

पहली पंक्ति में सीताराम को पतितपावन कहा गया , पर दूसरी पंक्ति में   उनके  दो नाम  फैलाये गये  -

१-ईश्वर  ।

२- अल्लाह  ।

//ईश्वर अल्लाह तेरो नाम //

राम भगवान् विष्णु के अवतार थे,  भगवान् विष्णु के  हजार नामों  में   ईश्वर नाम तो  है ,  पर  अल्लाह नाम कहीं भी नहीं कहा गया ,    यथा  - ईश्वरो विक्रमी धन्वी मेधावी विक्रमः क्रमः। (श्रीविष्णुसहस्रनाम श्लोक सं०२२)

हॉ  किन्तु  भविष्यपुराण में    इस्लाम को  पैशाच धर्म अवश्य कहा गया है ।

राम के  नामों में  अल्लाह नाम की खोज करते हुए हमने  भगवान् श्री  राम के १०८ नाम और उनका अर्थ संगृहीत किया है  , जरा  कोई  हमें इसमें  #अल्लाह नाम खोजकर दिखाये   - 

१. ॐ श्रीराम:–जिनमें योगीजन रमण करते हैं, ऐसे सच्चिदानन्दघन श्रीराम और सीता-सहित राम।
२. रामचन्द्र:–चन्द्रमा के समान मनोहर राम।
३. रामभद्र:–कल्याणमय राम।
४. शाश्वत:–सनातन भगवान।
५. राजीवलोचन:–कमल के समान नेत्रों वाले।
६. श्रीमान् राजेन्द्र:–श्रीसम्पन्न और राजाओं के भी राजा।
७. रघुपुंगव:–रघुकुल में सर्वश्रेष्ठ।
८. जानकीवल्लभ:–जनककिशोरी सीता के प्रियतम।
९. जैत्र:–विजयशील।
१०. जितामित्र:–शत्रुओं को जीतने वाले।
११. जनार्दन:–सभी मनुष्यों द्वारा याचना करने योग्य।
१२. विश्वामित्रप्रिय:–विश्वामित्रजी के प्रिय।
१३. दान्त:–जितेन्द्रिय।
१४. शरण्यत्राणतत्पर:–शरणागतों की रक्षा में संलग्न।
१५. वालिप्रमथन:–वानर बालि को मारने वाले।
१६. वाग्मी–अच्छे वक्ता।
१७. सत्यवाक्–सत्यवादी।
१८. सत्यविक्रम:–सत्य पराक्रमी।
१९. सत्यव्रत:–सत्य का दृढ़तापूर्वक पालन करने वाले।
२०. व्रतफल:–सम्पूर्ण व्रतों के प्राप्त होने वाले फलस्वरूप।
२१. सदा हनुमदाश्रय:–हनुमानजी के हृदयकमल में सदा निवास करने वाले।
२२. कौसल्येय:–कौसल्याजी के पुत्र।
२३. खरध्वंसी–खर राक्षस का नाश करने वाले।
२४. विराधवधपण्डित:–विराध दैत्य का वध करने में कुशल।
२५. विभीषणपरित्राता–विभीषण के रक्षक।
२६. दशग्रीवशिरोहर:–दस सिर वाले रावण के मस्तक को काटने वाले।
२७. सप्ततालप्रभेत्ता–सात तालवृक्षों को एक ही बाण से बींध डालने वाले।
२८. हरकोदण्डखण्डन:–जनकपुर में शिवजी के धनुष को तोड़ने वाले।
२९. जामदग्न्यमहादर्पदलन:–परशुरामजी के महान् अभिमान को चूर्ण करने वाले।
३०. ताटकान्तकृत्–ताड़का नाम की राक्षसी का वध करने वाले।
३१. वेदान्तपार:–वेदान्त से भी अतीत, वेद भी जिसका पार नही पा सकता।
३२. वेदात्मा–वेदस्वरूप।
३३. भवबन्धैकभेषज:–संसार-बंधन से मुक्ति की एकमात्र औषधि।
३४. दूषणत्रिशिरोऽरि:— दूषण और त्रिशिरा नामक राक्षसों के शत्रु।
३५. त्रिमूर्ति:–ब्रह्मा, विष्णु और शिव–तीन रूप धारण करने वाले।
३६. त्रिगुण:–तीनों गुणों के आश्रय।
३७. त्रयी–तीन वेदस्वरूप।
३८. त्रिविक्रम:–वामन अवतार में तीन पगों से त्रिलोकी को नाप लेने वाले।
३९. त्रिलोकात्मा–तीनों लोकों के आत्मा।
४०. पुण्यचारित्रकीर्तन:–जिनकी लीलाओं का कीर्तन परम पवित्र है।
४१. त्रिलोकरक्षक:–तीनों लोकों की रक्षा करने वाले।
४२. धन्वी–धनुष धारण करने वाले।
४३. दण्डकारण्यवासकृत्–दण्डकारण्य में निवास करने वाले।
४४. अहल्यापावन:--अहल्या को पवित्र करने वाले।
४५. पितृभक्त:–पिता के भक्त।
४६. वरप्रद:–वर देने वाले।
४७. जितेन्द्रिय:–इन्द्रियों को वश में रखने वाले।
४८. जितक्रोध:–क्रोध को जीतने वाले।
४९. जितलोभ:–लोभ को परास्त करने वाले।
५०. जगद्गुरु:–अपने चरित्र से संसार को शिक्षा देने के कारण सबके गुरु।
५१. ऋक्षवानरसंघाती–वानर और भालुओं की सेना का संगठन करने वाले।
५२. चित्रकूटसमाश्रय:–वनवास के समय चित्रकूट पर्वत पर निवास करने वाले।
५३. जयन्तत्राणवरद:–जयन्त की रक्षा करके वर देने वाले।
५४. सुमित्रापुत्रसेवित:–सुमित्रानन्दन लक्ष्मण द्वारा सेवित।
५५. सर्वदेवाधिदेव:–सम्पूर्ण देवताओं के भी देवता।
५६. मृतवानरजीवन:–मरे हुए वानरों को जीवित करने वाले।
५७. मायामारीचहन्ता–मायावी मृग बनकर आए मारीच राक्षस का वध करने वाले।
५८. महाभाग:–महान सौभाग्यशाली।
५९. महाभुज:–बड़ी-बड़ी बांहों वाले।
६०. सर्वदेवस्तुत:–सम्पूर्ण देवता जिनकी स्तुति करते हैं।
६१. सौम्य:–शान्त स्वभाव वाले।
६२. ब्रह्मण्य:–ब्राह्मणों के हितैषी।
६३. मुनिसत्तम:–मुनियों में श्रेष्ठ।
६४. महायोगी–महायोगी।
६५. महोदार:–परम उदार।
६६. सुग्रीवस्थिरराज्यद:–सुग्रीव को स्थिर राज्य प्रदान करने वाले।
६७. सर्वपुण्याधिकफल:–समस्त पुण्यों के उत्कृष्ट फलरूप।
६८. स्मृतसर्वाघनाशन:–स्मरण करने मात्र से ही सम्पूर्ण पापों का नाश करने वाले।
६९. आदिपुरुष:–ब्रह्माजी को भी उत्पन्न करने वाले सबके आदिभूत परमात्मा।
७०. महापुरुष:–समस्त पुरुषों में महान्।
७१. परम: पुरुष:–सर्वोत्कृष्ट पुरुष।
७२. पुण्योदय:–पुण्य को प्रकट करने वाले।
७३. महासार:–सर्वश्रेष्ठ सारभूत परमात्मा।
७४. पुराणपुरुषोत्तम:–पुराणप्रसिद्ध क्षर-अक्षर पुरुषों से श्रेष्ठ लीलापुरुषोत्तम।
७५. स्मितवक्त्र:–जिनके मुख पर सदा मुसकान छाई रहती है।
७६. मितभाषी–कम बोलने वाले।
७७. पूर्वभाषी–पूर्ववक्ता।
७८. राघव:–रघुकुल में अवतीर्ण।
७९. अनन्तगुणगम्भीर:–अनन्त गुणों से युक्त एवं गम्भीर।
८०. धीरोदात्तगुणोत्तर:–धीर और उदात्त नायक के लोकोत्तर गुणों से युक्त।
८१. मायामानुषचारित्र:–अपनी माया का आश्रय लेकर मनुष्यों की-सी लीलाएं करने वाले।
८२. महादेवाभिपूजित:–भगवान शंकर द्वारा निरन्तर पूजित।
८३. सेतुकृत्–समुद्र पर पुल बांधने वाले।
८४. जितवारीश:–समुद्र को जीतने वाले।
८५. सर्वतीर्थमय:–सर्वतीर्थस्वरूप।
८६. हरि:–पाप-ताप को हरने वाले।
८७. श्यामांग:–श्याम विग्रह वाले।
८८. सुन्दर:–परम मनोहर।
८९. शूर:–अनुपम शौर्य से सम्पन्न वीर।
९०. पीतवासा:–पीताम्बरधारी।
९१. धनुर्धर:–धनुष धारण करने वाले।
९२. सर्वयज्ञाधिप:–सम्पूर्ण यज्ञों के स्वामी।
९३. यज्ञ:–यज्ञस्वरूप।
९४. जरामरणवर्जित:–बुढ़ापा और मृत्यु से रहित।
९५. शिवलिंगप्रतिष्ठाता–रामेश्वर नामक ज्योतिर्लिंग की स्थापना करने वाले।
९६. सर्वाघगणवर्जित:–समस्त पाप-राशि से रहित।
९७. परमात्मा–परम श्रेष्ठ, नित्य-शुद्ध-बुद्ध-मुक्त स्वभाव।
९८. परं ब्रह्म–सर्वोत्कृष्ट, सर्वव्यापी परेश्वर।
९९. सच्चिदानन्दविग्रह:–सत्, चित् और आनन्दमय दिव्यविग्रह वाले।
१००. परं ज्योति:–परम प्रकाशमय, परम ज्ञानमय।
१०१. परं धाम–साकेत धामस्वरूप।
१०२. पराकाश:–महाकाशस्वरूप ब्रह्म।
१०३. परात्पर:–मन, बुद्धि आदि से परे परमात्मा।
१०४. परेश:–सर्वोत्कृष्ट शासक।
१०५. पारग:–सबको पार लगाने वाले।
१०६. पार:–भवसागर से पार जाने की इच्छा रखने वाले प्राणियों के प्रातव्य परमात्मा।
१०७. सर्वभूतात्मक:–सर्वभूतस्वरूप।
१०८. शिव:–परम कल्याणमय ।

।। जय श्री राम ।।

सम्बन्ध क्या है ?

#आक्षेप -  जब आपसे व्यक्तिगत  परिचय ही नहीं है तो  बिना सम्बन्ध के  मत बोलिये ।

#उत्तर -    जब कोई वैदिक धर्म का  नाम लेकर  तत्सम्बद्ध विचार प्रस्तुत करता है , तो एक ही वैदिक  धर्म के  कारण सम्बन्ध स्वतः  स्थापित हो रहा है ।  सम्बन्ध का बोध होगा तो सम्बन्धी का भी  पता तो चल ही जायेगा ।  वे जब हमारे धर्म की धज्जियॉ उड़ाते हैं , तो  हमारे धर्म  के आधार पर सम्बन्ध तो उनसे  स्वतः बन जाता है  । विशिष्ट बुद्धि की नियामकता से सम्बन्ध की संस्थापना होती है कि   नहीं?

सुनिये !   ये सम्बन्ध है क्या ? 

वैयाकरण से पूछा जाये तो वो कहेंगे  दृष्टत्वे सति  विशेषप्रतीतिनियामकत्वम्,

नैयायिक कहते हैं, दृष्टत्व की कोई आवश्यकता नहीं है ,  आधेयत्व कहेंगे तो आधेयत्व सापेक्ष किसका होगा ? आधार का होगा ।  बिना आधार के आधेय  हो ही नहीं सकता । बिना वाचक के वाच्यत्व  नही आ सकता ।  तो  अपने आप बोलूंगा , उसके लिये दृष्टत्व मानने की कोई आवश्यकता नहीं है ।

इसीलिये उन्होंने क्या किया कि विशिष्टबुद्धिनियामकत्वं सम्बन्धत्वम् । याने विशिष्टबुद्धि का जो नियामक होगा , वो सम्बन्ध ही होगा ।

जैसे हम कहते हैं नीलो घटः । आप जब   परामर्श पढेंगे तो आप वहॉ पायेंगे  विशिष्टवैशिष्ट्यावगाहि ज्ञानम् । वहॉ  विशिष्ट बुद्धि को जानेंगे, तब तो  विशिष्टवैशिष्ट्यावगाहि बुद्धि को जानेंगे ! तो विशिष्ट बुद्धि क्या ?  जिसमें  एक विशेषण होगा और एक विशेष्य होगा और इन दोनों को जोड़ने वाला  कोई सम्बन्ध होगा ।   तभी जाकर हमें विशिष्ट बुद्धि होगी ।

तो जोड़ेगा कब   ?  जब विशेषण बनेगा !  जब तक विशेषण  का बोध नहीं होगा  , विशिष्ट बुद्धि नहीं बनेगी ।  जैसे  नीलो घटः , दण्डवान् पुरुषः । दण्डवान् पुरुषः कहते हैं , तो दण्डविशिष्टपुरुषः, दण्ड पुरुष में संयोग सम्बन्ध से रहेगा । ये दोनों को जो जोड़ रहा है, ये ही विशिष्ट बुद्धि का नियामक है सम्बन्ध । यही विशिष्टबुद्धि की नियामकता  सम्बन्ध की संस्थापना कर देती है ।

अच्छा आप थोड़ा आगे चलिये, विशिष्टवैशिष्ट्यावगाहि बुद्धि की बात कही जाती है , वह्निव्याप्यधूमवानयं पर्वतः इत्याकारकं ज्ञानं परामर्शः  (व्याप्तिविशिष्टपक्षधर्मता)

दण्डवान् पुरुषः तो था ही विशिष्ट बुद्धि , उसके साथ हमने जोड़ दिया  रक्तदण्डवान् पुरुषः , तो रक्त से विशिष्ट दण्ड और उस दण्ड की  विशिष्टता  कहॉ भासित हुई ?  पुरुष  में - यही विशिष्टवैशिष्ट्यावगाहि  बुद्धि । उसी तरह हम कहते हैं वह्निव्याप्यधूमवान् पर्वतः, वह्नि व्याप्य विशिष्ट कौन ? धूम , उस धूम का वैशिष्ट्य कहॉ भासित हो रहा है ? पर्वत में । इसी लिये विशिष्टवैशिष्ट्यावगाहि बुद्धि कही गयी ।

अतः  विशिष्ट बुद्धि में विशेषण भी आता है,  विशिष्टवैशिष्ट्यावगाहि बुद्धि में विशेषणतावच्छेदप्रकारकज्ञान कारण है ।

अब ये जो सम्बन्ध हमने उपर कहा  , इसके  दो प्रकार हम कहते हैं -

पहला तो है, वृत्तिता का नियामक सम्बन्ध ,  दूसरा,  वृत्तिता  का अनियामक सम्बन्ध ।

जहॉ हमको आधाराधेयभाव साक्षात् प्रतीत हो  जाये, उसे तो कहेंगे  वृत्तिता का नियामक सम्बन्ध  ।  और जहॉ हमें प्रतीति नहीं होगा । जैसे तादात्म्य सम्बन्ध ।

इसलिये संयोग, समवाय , कालिक और स्वरूप - ये सम्बन्ध चतुष्टय वृत्तिता का नियामक सम्बन्ध है ।

यहॉ भी  दो  सम्बन्ध  हैं , साक्षात् , परम्परा ।  साक्षात् सम्बन्ध में तो उक्त चार सम्बन्ध आ गये , परम्परा सम्बन्ध में रूपत्वव्याप्य-जातिमत्वान् पृथिवीत्वाद् , दण्डिमान् दण्डिसंयोगात् इत्यादि आते हैं ।   जैसे हम कहते हैं, घटकादि के प्रति  कपाल क्या है ?  सीधे समवाय सम्बन्ध से कारण हो जाता है, किन्तु दण्ड को जो कारण मानते हैं , वो साक्षात् सम्बन्ध नहीं होता  ।   तो   परम्परा सम्बन्ध, इनमें भी कुछ वृत्तिता के नियामक सम्बन्ध  होते हैं, कुछ अनियामक ।

कौन कौन नियामक होगा ?  उसके लिये भी हम सोचते हैं कि हमने जो संन्निकर्ष बनाया ,  लौकिक सन्निकर्ष छः बना दिया , इन  छः में संयोग को ग्रहण किया , संयुक्तसमवाय, संयुक्तसमवेत समवाय को ले लिया और समवाय को भी ले लिया , ये तो हैं , वृत्तिता का नियामक सम्बन्ध परम्परा सम्बन्ध । और उससे अतिरिक्त जितने भी परम्परा सम्बन्ध होंगे , वे  वृत्तिता के अनियामक सम्बन्ध  परम्परा सम्बन्ध होते हैं । इसमें भी मतविशेष है, जो  विषयता सम्बन्ध है , इसमें कुछ लोग वृत्तिता का नियामक सम्बन्ध मानते हैं, कुछ  लोग वृत्तिता का अनियामक सम्बन्ध भी मानते हैं ।

तो  सम्बन्ध को  लेकर   इतना आप न्यायशास्त्र का सामान्य ज्ञान रख लीजिये , फिर हम पर  अपने  उक्त  आक्षेप  का  विचार कीजिये ।

।। जय श्री राम ।।

Thursday, 30 May 2019

विदेशी धरती की अपवित्रता

विदेशी धरती   की अपवित्रता ------

जैसे रजस्वला स्त्री देखने में    सामान्य  स्त्री ही लगती है , वैसे ही समुद्र पार की विदेशी भूमि भी देखने पर  भारत  भूमि जैसी ही लगती है ।

किन्तु   क्या  रजस्वला के हाथ  का  बना भोजन खाने वाला   धार्मिक रूप में पवित्र होगा कि अपवित्र ?

जैसे रजस्वला स्त्री  से अपवित्र  रक्त निःसृत होता है , वैसे ही विदेशी धरती   का  अन्न जल  आदि    म्लेच्छ का  ही सृजन करती है  ,   वह धरती म्लेच्छों की ही वास स्थान है , म्लेच्छता  से  ही   पर्यवसित  होती है ।

जैसे श्मशान घाट की  धरती देखने पर   मन्दिर परिसर की धरती जैसी  ही  लगती  है , वैसे ही  समुद्र पार की विदेशी भूमि भी देखने पर सामान्य भूमि ही लगती है । 

किन्तु श्मशान घाट में  मांगलिक अनुष्ठान करने वाला   धर्म का  विद्वान् होगा कि धर्म का मूर्ख ?

  स्थूल नेत्रों से देखने पर तो  गंगा और कर्मनाशा  दोनो   नदियॉ   जल की धारा  ही  दिखती   हैं  ,   माता   और    अपनी पत्नी  का शरीर रक्त  मांस का   पिण्ड ही  दीखता  है  , परन्तु  क्या  दोनों समान रूप से भोग्य होते  हैं ?

ऐसे  ही  विदेश की धरती  में जाने  वाला, वहॉ  रहकर   अन्न जल  ग्रहण करने  वाला   प्रत्येक   कुलीन   घनघोर अशुद्ध  एवं  अपवित्र     ही होता  है ।

।। श्री राम जय राम जय जय राम ।।

मासिकधर्म के विधि विधान

मासिकधर्म  के  विधि- विधान   : हिन्दू  गौरव -

मासिक धर्म (माहवारी/पीरियड) के काल में जीर्ण-शीर्ण ( फटे- पुराने)  वस्त्र पहन कर  गोशाला में एकान्तवास करना - ये हिन्दू धर्म की महिलाओं का #पिछड़ापन नहीं वरन् #गौरव है , क्योंकि ऐसा करके वह #त्रिरात्रव्रत का पालन करती हैं और फिर  चौथे दिन आप्लवन  स्नान करके   बिना फटे हुए शोभित नूतन वस्त्र  पहनती हैं ।

इस विशेष व्रत के पालनकाल में स्त्री ना ही अलंकरण करती है , ना ही स्नान करती है , ना ही दिन में सोती है , ना ही दन्तधावन करती है , ना ही ग्रहादि का निरीक्षण करती है , ना हंसती है , ना ही कुछ आचरण करती है , ना ही अंजलि से जल पीती है  ना ही लोहे या कॉसे  के पात्र में भोजन करती है । वह सनातनधर्मिणी नारी   गोशाला में  भूमि पर शयन कर इस महान् व्रत को सम्यक्  परिपालन कर आत्मसंयम का अनूठा उदाहरण प्रस्तुत कर  आत्मशोधन  करती हुई  देवताओं को आनन्दित करती है ।

पाश्चात्यमुखी,  धर्ममूढ़,  अज्ञानी असुरों व विधर्मियों ने   हिन्दू महिलाओं के इस महान् व्रत को  हिन्दुओं का पिछड़ापन बताकर   हिन्दू मर्यादाओं  को तहस नहस करने का भारी प्रयास किया और कर रहे हैं ।

वस्तुतः स्त्रियों के  रजस्वला होने से पूर्वकाल में देवराज इन्द्र की विभाजित ब्रह्महत्या का इतिहास जुड़ा है ,  हिन्दू धर्म के विद्वान् मनीषी जानते हैं कि  उस दैवीय  विभाजन का ही एक भाग  स्त्रीजाति को भी प्राप्त हुआ था  , इस व्रत से उसी  ब्रह्महत्या-दोष का उपशमन होता है ।

#प्राणी_स्वकृत_कर्म_का_ही_भोग_करता_है - इस दार्शनिक  सिद्धान्त  से स्पष्ट है कि  वस्तुतः रजोधर्मप्रधान स्त्री देह के माध्यम से जीव वस्तुतः अपने ही पूर्वकृत  ब्रह्महनन दोष का ही  उपशमन करता है । इसीलिये गीतोक्त  #पापयोनयः विशेषण  का भाष्य  पापजन्मानः भगवान् भाष्यकार ने किया है ।

मात्र ब्राह्मण की हत्या ही  ब्रह्महत्या नहीं होती वरन् ब्राह्मण का अपमान भी ब्रह्महत्या ही होती है,  क्योंकि श्रेष्ठ पुरुषों का अपमान उन पर मृत्युदण्ड प्रहार ही होता है ।   इसीप्रकार,  शास्त्र का विकृतिकरण भी ब्रह्महत्या ही है । अतः सदैव  शास्त्रवचनों का अनर्थ , उनमें मनमानी व  कुतर्कों  के महान् पाप करने से बचना चाहिये ।

जो स्त्री रजस्वलावस्था में त्रिरात्रव्रत रूप धर्म का परिपालन नहीं करती , वह मृत्यु के अनन्तर नरकगामिनी होती है क्योंकि अनुपशमित पाप अंकुरित बीज की भॉति बढता हुआ दुख रूप महान् फलों को पैदा करता है । हमारे महान्  क्रान्तदर्शी तपोनिष्ठ ऋषि-मुनिजन   ये सनातन  रहस्य जानते थे , इसीलिये उन्होंने  इसका आचार -प्रचार किया था ।

वेदों के ये विधि- निषेध  मानव के  ही कल्याण के साधन होते हैं , किन्तु घोर  अज्ञान में डूबे होने व  घोर कुसंगति  के कारण उन  दुर्भागी  मानवों  को  ये  वैदिक विधान बोझ लगते हैं, जिनको धर्मपालन, ईश्वरभक्ति   व आत्मकल्याण से कोई लेना -देना नहीं ,केवल पशुओं  की तरह अन्धभोगमय जीवन यापन कर चौरासीलाख योनियों के चक्रव्यूह  में ही भटकते जाना है ।

।। जय श्री राम  ।।

Wednesday, 29 May 2019

शुद्ध जाति

भगवान् का अवतार जाति व्यवस्था  और आश्रम व्यवस्था की रक्षा के लिये होता है ,

क्योंकि उसी में समस्त विश्व का  लौकिक सुख  और आत्मकल्याण है ।

 
-श्री आद्य शंकराचार्य ।

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#जाति_व्यवस्था -

मनुष्य की पहचान, उसकी चार प्रधान  जातियॉ हैं -

१.ब्राह्मण  (ये ब्राह्मण माता व ब्राह्मण पिता की सन्तान होती है )

२.क्षत्रिय  (ये क्षत्रिय माता व क्षत्रिय पिता की सन्तान होती है )

३.वैश्य  (ये वैश्य माता व  वैश्य पिता की सन्तान होती है )

४.शूद्र  (ये शूद्र  माता व  शूद्र  पिता की सन्तान होती है )

इन चार जातियों के परस्पर सम्मिश्रण से  अनुलोम व प्रतिलोम  जातियॉ प्रकट होती हैं ।

इस संसार में मुख्यतः दो प्रकार के मानव हैं -

एक वो जो अपनी   उपर्युक्त  मूल पहचान खो चुके हैं ।

एक वो जो अपनी  उपर्युक्त   मूल  पहचान  के साथ  प्रसिद्ध हैं ।

#आश्रम_व्यवस्था -

मनुष्य को अपने अनुरूप शास्त्रीय मर्यादा में   इन चार आश्रमों का पालन करना है   -

१.ब्रह्मचर्य आश्रम (१-२५ वर्ष अनुमानित )

२. गृहस्थ आश्रम (२५-५० वर्ष अनुमानित)

३. वानप्रस्थ आश्रम (५०-७५ वर्ष अनुमानित)

४.संन्यास आश्रम (५०- १०० वर्ष अनुमानित )

यही है सनातन वैदिक हिन्दू धर्म , यही है आर्य सभ्यता , यही है ईश्वरीय प्रशासन , यही है आर्ष परम्परा , यही है मानव सभ्यता ।।

।। जय श्री राम ।।

33 करोड़ देवता निर्णय

#तैंतीस_करोड़_देवता_कोटि_नहीं_हैं_  वास्तव में वैदिक दर्शन में "अनन्ता वै वेदा:" प्रमाण से "मंत्र ब्राह्मणयोर्वेद नामधेयम्...