Saturday, 19 May 2018

क्या अंगदान उचित है ?

क्या मृत्यु के बाद नेत्रादि अंगदान आदि उचित है ?

#उत्तर - कदापि नहीं ।   दधीचि ऋषि , राजा शैब्य या फिर  राजा अलर्क आदि  ने जीवितावस्था में अपना देह अथवा अंग दान किया था ।

#पुरुषाहुतिर्ह्यस्य_प्रियतमा  इत्यादि वचनों के अनुसार अग्नि में शव की  आहुति दी जाती है  #सूर्यं_ते_चक्षुर्गच्छतु आदि भी वाक्य हैं  हवनीय द्रव्य शव में अग्नि का अधिकार होने से उसे बुद्धिपूर्वक व्यङ्ग करने का  कोई औचित्य नहीं है ।

शव का कोई अंग काटने से अगले जन्ममेंजीवको वो अंग नहीं मिलता । इसी रीति से  शव में शल्य कार्य (पोस्टमार्टम) भी अशास्त्रीय. होने से  सर्वथा अनुचित  है ।

।। जय श्री राम ।।

Friday, 18 May 2018

ब्राह्मण का शूद्रीगमन फल,

जो देवद्विज - दो अर्थ में अर्थात् देवता और द्विजों की कोटी में देवतापद प्राप्त हैं वह भूदेव,विप्र,ब्राह्मण का द्रव्य - रूपये-पैसे, नानाविध-वस्तुओं का हरण करता हैं, जो द्विज अन्त्यजा का गमन करता हैं उसे मरणतुल्य पाण्डुरोग(कमळो)होता हैं -@कर्मविपाक-सं०सूर्यारुणसंवाद
#देवद्विजद्रव्यहारी_पाण्डुरोगी_भवेन्नरः।। २४/१।।
#अन्त्यजागमने_मर्त्यः_पाण्डुरोगो_प्रजायते।। २४/४।।

Wednesday, 16 May 2018

शुद्धि कब करें ?

सर्वेषामेववर्णानां सूतके मृतकेपि वा  । दशाहाच्छुद्धिरित्येष कलौ शास्त्रस्य निश्चयः ।। गरुड पुराण १३/१९।।

Tuesday, 15 May 2018

भोजन कब तक कर देना है ?

सायं सन्ध्योपासना का अंत याज्ञवल्क्यजी ने तारकोदय तक जप करने का कहा अतः तारे निकलने से पहले भोजन संभव नहीं, -- *जपन्नासीत सावित्रीं प्रत्यगातारकोदयात्।।*

तत्र - मत्स्य पुराणने सूर्यास्त के बाद के तीन मुर्हूत = २/२४ घं-मिनट को -- राक्षसीवेला सर्वकर्म में वर्ज कही हैं अतः सूर्यास्त के २/३० घंटे के बाद  या तारे उदित होने पर  कर सकतें हो -- "(सायाह्नस्त्रि मुर्हूतः स्याच्छ्राद्धं तत्र न कारयेत्। राक्षसीनामवेला गर्हिता सर्वकर्मसु।। मत्स्य पु०।।)"

तथापि - रात्रि के मध्य दो प्रहर की संधी की दो घडी ४८ मिनट से पहिले भोजन कर सकतें हैं -- *महानिशा द्वे घटिके रात्रौ मध्यमयामयोः। नैमित्तिकं तदा कुर्यात्काम्यं नैव कदाचन।। मार्कंडेय।।

उदाहरण - सूर्योस्त सामान्य ७ बजे हो तो ७+३+३-००/४८= २४/१२ तक भोजन कर सकतें हैं ।

Monday, 14 May 2018

सन्तों का अनुकरण या अनुसरण करें ?

#प्रश्न - सन्त के किये गये आचरण को  हमें अपने जीवन  में उतारना चाहिये या नहीं ?

#उत्तर - देखो ,  दो चीजें होती हैं - एक तो है अनुकरण , दूसरा है अनुसरण ।  अनुकरण का अर्थ  होता है  किसी के किये गये कार्यों की नकल करना और अनुसरण   का अभिप्राय  होता है कि उनके दर्शाये मार्ग अथवा उनकी बतायी शिक्षा का पालन करना ।

सन्तों के आचरण का #अनुसरण करना चाहिये न कि अनुकरण । तैत्तिरीय श्रुति  में  इस  सन्दर्भ में  बहुत  सुन्दर  वचन  है , जहॉ आचार्य  अपने  अन्तेवासी  से  कहता  है  कि   , हे  शिष्य  जो  हमारे  उत्तम  चरित्र  हैं  , केवल   उनकी  ही  तू  उपासना  करना  ,  उससे  अन्य  की  नहीं   -

यान्यस्माकं सुचरितानि तानि त्वयोपास्यानि नो इतराणि   ।।
(तैत्तिरीय उपनिषद्, शिक्षावल्ली, अनुवाक ११, मन्त्र ०२)

इसका प्रधान कारण ये है कि सन्त और हमारी स्थिति में अन्तर होता है  ।  निस्त्रैगुण्य अवस्था में अवस्थित महात्माजन शास्त्रीय विधि-निषेधों  से परे होते हैं ।  [निस्त्रैगुण्ये पथि विचरतः को विधिः को निषेधः ]  गुरुजी पुस्तक नहीं पढ़ते , ये सोचकर छात्र  भी  पुस्तक नहीं पढ़ेगा , तो उस छात्र की क्या दशा होगी , विचार कीजिये ।

उदाहरण हेतु, -  श्री आद्य शंकराचार्य से हम समझ सकते हैं ,  एक  प्रेतात्मक (अतः अपवित्र ) देह का  आश्रय लेकर  आचार्य उस शरीर से कामकलाओं  का अनुभव  करते हैं ,  इसका अनुकरण एक सामान्य संन्यासी को विहित नहीं है, वह करेगा तो पाप को प्राप्त होकर भ्रष्ट हो जायेगा ।

इसी प्रकार, श्री गोरखनाथ जी के सम्बन्ध  में एक बहुत  सुन्दर आख्यायिका सुनी जाती है  -

एक बार गुरु गोरखनाथ जी  भिक्षाटन हेतु निकले , तो उनके  पीछे -पीछे कुछ शिष्य भी  चले आ रहे थे । घटना यह घटती है कि   भिक्षाटन करते हुए    श्री गोरखनाथ  महाराज  एक शराब  व्यापारी  के पास पहुँचते हैं और  अलख निरञ्जन बोलकर भिक्षा पात्र आगे करते हैं , तो व्यापारी शराब ही उनके पात्र में डाल देता है, किन्तु श्रीमहाराज  अलख निरञ्जन बोलकर वही पी जाते हैं  ।  ऐसे में पीछ पीछे आ रहे चेलों की तो मानो पौ बारह हो जाती है , जब गुरुजी शराब पी गये तो चेलों को फिर क्या दोष ? हमें भी शराब  पीना ही धर्म है  ,  ये सोचकर सब एक एक कर  उस शराब वालो के पास जाकर शराब मॉगकर पीने लगते हैं  ।

अन्तर्यामी  श्री गोरखनाथ  जी महाराज चेलों का यह सब कृत्य  जान लेते हैं , तब वे पास ही एक अन्य प्रकार के व्यापारी के पास पहुंचते हैं और अलख जगाते  हैं, जो  उस  समय  शीशा  पिघला  रहा  होता है  ,  तो  महाराज  की  अलख  सुनकर   व्यापारी  पिघला गर्म  शीशा ही उनके पात्र में डाल देता है , परन्तु  महाराज  बिना  किसी  भी  प्रकार  से  विचलित  हुए   अलख निरंजन बोलकर वही पिघला हुई शीशा  ही  प्रसन्नतापूर्वक पान कर  जाते हैं ।

अब  तो  पीछे  -पीछे  अनुकरण  कर  रहे  चेलों के तो प्राणों पर बन आती है , और सभी कातर होकर श्री गोरखनाथ जी महाराज की शरण आने में  ही  अपनी  भलाई  दिखती  है । तब महाराज  कहते हैं कि मैं तो सामर्थ्यवान् हूं ,  शराब हो या  शीशा हो , सब पचाने की  मुझमें  सामर्थ्य  हाई , भौतिक पदार्थों के गुण दोष मुझ निर्लिप्त  को  प्रभावित  नहीं कर सकते किन्तु तुम्हारी   यह स्थिति नहीं , तुम्हें पदार्थ जन्य गुण दोषों का प्रभाव बांधेगा , अतः तुम्हें अपने हिताहित को  स्वयं विचार  कर   कार्य करना चाहिए  ।

शिष्यों  ने भिक्षा  तो न ली , पर गुरु से यह अनमोल शिक्षा  अवश्य ले ली , कि  गुरु  का  अनुसरण  करना  ही  धर्म  होता  है  और  फिर  चेलों ने अपने दोषों का प्रायश्चित्त किया ।

सन्तों का   मर्म -
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सन्तजन  सामर्थ्यवान् होते हैं , सांसारिक गुण-दोषों से  अलिप्त होते हैं ,  कर्मफल के चक्रव्यूह  से मुक्त हो कर जीवन्मुक्त हो चुके होते  हैं , वे कब,  कहॉ,  क्या , क्यों  और कैसे करेंगे ,  उनकी वाञ्छा, क्रिया और मुद्रा को बड़े - बड़े   विशेषज्ञ और देवता भी नहीं जान पाते  ।  

जैसे सूर्य , अग्नि एवं गंगा को  धरती के पंक (कीचड़) , पदार्थ और पाप का प्रभाव नहीं पड़ता , इसी प्रकार सामर्थ्यवान् सिद्ध सन्तों को संसार के  नाम, रूप, गुण, धर्म एवं संस्कार प्रभावित  नहीं करते । 

समरथ कहुँ नहिं दोषु गोसाई। रबि पावक सुरसरि की नाई।।
[श्रीरामचरितमानस १/६८/०८ ]

परमसिद्धों की स्थिति  तर्कों  से परे होती है , उनकी बुद्धि  कहीं भी लिप्त नहीं होती एवं उनमें अहंकृत भाव भी नहीं होता,  यही कारण है कि  इस स्थिति का महात्मा यदि तीनों लोकों का हत्यारा भी हो तो भी वह किसी का हत्यारा नहीं होता -

यस्य नाहङ्कृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते ।
हत्वाsपि स इमांल्लोकान् न हन्ति न निबद्ध्यते ।।
[श्रीमद्भगवद्गीता  १८/१७  ]

इसलिये  संसारियों का यह धर्म है कि उन्हें   विधि-निषेध प्रधान शास्त्रों का अनुशीलन करते हुए  ही  अपने अध्यात्म पथ पर आगे बढ़ना चाहिए , इसी  मार्ग  पर चलने से  ही  इस जन्म में या जन्मान्तर में एक दिन अवश्य उन्हें भी   अपना आध्यात्मिक  लक्ष्य प्राप्त हो जायेगा । 

।। जय श्री  राम ।।

विकास किसे कहते है

क्या है #विकास ?
( What is  #Development )

वेद मानव के विकास की चार संहिताऐं हैं । ब्राह्मण ग्रन्थ विकास की सिद्ध पद्धतियॉ हैं, आरण्यक ग्रन्थ विकास की  उच्चतर गहन  प्रक्रियाऐं और विवेचन  हैं  और उपनिषद् विकास के लक्षण ग्रन्थ हैं ।

गृह्यसूत्र विकास के पारम्परिक ग्रन्थ हैं, धर्मसूत्र विकास के सैद्धान्तिक ग्रन्थ, श्रौतसूत्र विकास के  सूत्र ग्रन्थ हैं, और शुल्वसूत्र विकास के ज्यामितिप्रधान ग्रन्थ ।

रामायण व महाभारत विकास  की  व्याख्याऐं  हैं और पुराण  विकास की अभिधारणाऐं  हैं  ।

ब्राह्मण विकास का सूत्रधार है ,  क्षत्रिय विकास का संरक्षक है , वैश्य विकास का परिपोषक है और शूद्र विकास का कार्यकर्ता ।

ब्रह्मचर्य, गृहस्थ , वानप्रस्थ और संन्यास - ये चार आश्रम विकास के वे  चार   क्रमशः  उत्कृष्ट  प्रायोगिक   कार्यस्थल हैं, जहॉ विकास की सारी  कार्यवाही सम्पादित की जाती है ।

सत्य को यदि  हजार अहंकारी भी मिलकर एक स्वर से  नहीं स्वीकार करेंगे  तो भी सत्य का  इस उद्घोष से  कुछ नहीं बिगडेगा ,

वे अहंकारी ही भोगेंगे  अपने अज्ञान के भयावह  परिणाम ।
साभार- आद्यशंकरसंदेश
।। जय श्री राम ।।

Sunday, 13 May 2018

सनातन सब का कल्याण करता है

सनातन धर्म में अधर्मी दुष्टों के भी हित की भावना है (सर्वे भवन्तु सुखिनः)  .......

...........इसीलिये  सनातन धर्म कहता है,  उनको   यथायोग्य दण्डित अवश्य  किया जाये  ।

क्योंकि सनातन धर्म ये मानता है कि पाप  जीव को सुखी नहीं करता , वरन् धर्म ही सुखी करता है ।

सनातन धर्म अधर्मी को धर्मी बनाकर ही छोड़ता है ,  या प्यार से या फिर मार से ,

हो सके तो   इसी जन्म में बने ,  अन्यथा  अपराधी का  सीधे अगले जन्म  का टिकट काट  दिया जाता है  , एक  उत्तम आशा सहित ।
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सनातन धर्म की भावना है कि अधर्मी स्वयं सुधर जायें , अन्यथा वह तो है ही सुधारने के लिये ।

आत्मवानों का अनुशासन गुरु करता है ।

दुष्टों का अनुशासन राजा करता है ।

गुप्त पापियों का अनुशासन यम करता है ।

सबका अनुशासन ईश्वर करता है ।

(सनातन धर्म = #अनुशासन  )
साभार - आद्यशंकराचार्य संदेश
।। जय श्री राम ।।

33 करोड़ देवता निर्णय

#तैंतीस_करोड़_देवता_कोटि_नहीं_हैं_  वास्तव में वैदिक दर्शन में "अनन्ता वै वेदा:" प्रमाण से "मंत्र ब्राह्मणयोर्वेद नामधेयम्...