Friday, 15 May 2020

मरणाशौच कब से होता है?

*#प्रश्नावली_16_का_उत्तर*

मरणाशौच मुख्य रूपसे मृत्यु के तुरन्त बाद ही शुरू हो जाता है।

*#प्रमाण* -

*#मरणादेव_कर्तव्यं संयोगो यस्य नाग्निना ।*
*दाहादूर्ध्वमशौचं स्याद् यस्य वैतानिको विधि।।* (शातातप)

समस्त हिंदू समाजमें आशौचकी प्रवृत्ति मृत्युके बाद ही होनी चाहिए ।

परंतु जो द्विज #अग्निहोत्री हैं उनके आशौचकी प्रवृत्ति दाह के बादसे करनी चाहिए।

विद्वद्वरवरिष्ठ परम पूज्य गुरुदेव श्रीनर्मदेश्वर द्विवेदीजी के  कथनानुसार -
धर्मसम्राट स्वामी श्रीकरपात्रीजी महाराजने उस समय अग्निहोत्रियों की गणना पूरे भारतवर्ष में करवाई थी।

तो उस समय केवल 130 के लगभग अग्निहोत्री पूरे भारतवर्ष में थे, जिसमें से ज्यादातर दक्षिण के ही थे ।

तव स्वामीजी ने कुछ विद्वानोंको अग्निहोत्रकी दीक्षा दिलवाई थी और उनकी व्यवस्था भी की थी ।

तब से अब तक और ह्रास हो गया , दुर्भाग्यवश बहुत ही अल्प मात्रा में अग्निहोत्री भारतवर्ष में बचे हुए हैं ।

*#सारांश* -
तो केवल उन अग्निहोत्रिओं को छोड़करके , बाकी के हम सभी जो निरग्निक हैं अर्थात् अग्निहोत्री नहीं हैं,उन सभी को मरणाशौच मृत्युके तुरंत बाद शुरू हो जाता है ।

बहुत से पांडित्य करने वाले पंडितोंको भी यह भ्रम है कि मरणाशौच शवदाह के बाद लगता है।

*#हमारा_उद्देश्य* -
सभीसे करबद्ध प्रार्थना है कि - भ्रमनिवारण पूर्वक शास्त्रीय मार्गका ही सहर्षावलंबन करें।

नमः पार्वतीपतये हर हर महादेव।
राजेश राजौरिया वैदिक वृन्दावन।

Saturday, 9 May 2020

शास्त्रीय सार सिद्धान्त

शास्त्रीय सार सिद्धान्त --------->

(१) कर्म जाति का अधिष्ठान है तथा जाति जन्म का अधिष्ठान है ।
            जन्म
               ^
               |
            जाति
               ^
               |
             कर्म
अतः जाति कर्ममूलक होती है तथा जन्म जातिमूलक होता है । क्रियमाण कर्म से जाति का निर्माण इसलिये नहीं हो सकता क्योंकि क्रियमाण कर्म जब तक संचित होकर प्रारब्धोन्मुख नहीं हो जाते , वे निष्फल ही रहते हैं ।

(२) समस्त वैदिक शास्त्रों का प्रतिपाद्य  सारमत पंचायतनसिद्धान्त है, जिसके अनुयायी स्मार्त कहलाते हैं  । पञ्चायतन सिद्धान्त का अर्थ है कि एक ही निर्गुण परमात्मा गणेश, दुर्गा, सूर्य , शिव तथा विष्णु के रूप में सगुण साकार हैं ।

(३) समस्त शास्त्रों का परम  प्रतिपाद्य सिद्धान्त केवलाद्वैत(अद्वैत) सिद्धान्त है ।  श्री आद्य शंकराचार्य भी इसी सिद्धान्त  के एक मुख्य प्रचारक रहे । इस कलियुग में अद्वैत संन्यास परम्परा के परम संरक्षक एवं स्वयं भगवान् शिव के अवतार होने से वे  कलियुग के जगद्गुरु हैं ।

(४)  रामानन्द सम्प्रदाय को अग्रिम चार वैष्णव सम्प्रदायों (क)  रामानुज सम्प्रदाय (ख)  माध्व सम्प्रदाय  (ग) वल्लभ सम्प्रदाय (घ)  निम्बार्क सम्प्रदाय   --  इनमें से  रामानुज सम्प्रदाय के स्थान पर  गिनकर स्वीकार करना न्यायसंगत नहीं है ।

(५) समुद्रपार विदेश यात्रा सर्वथा अशास्त्रीय है । ऐसा  यात्री प्रायश्चित्त के उपरान्त भी  इस लोक में ' पतित ' ही बना रहता है ।

(६) गुरुवंश पुराण को महर्षि वेदव्याससम्पादित  अष्टादश पुराणों के तुल्य कदापि नहीं समझा जा सकता , ना ही उसकी फलश्रुति को ही प्रामाणिक समझा जा सकता है ।

(७) पुराणों से स्मृतियों के प्रमाण प्रबल होते हैं । स्मृतियों में श्री मनुस्मृति के प्रमाण सबसे प्रबल हैं ।

(८) कर्म और ज्ञान - ये दो ही  सनातन मार्ग हैं । कर्म मार्ग के अन्तर्गत उपासना होती है तथा ज्ञान मार्ग के अन्तर्गत भक्ति होती है । भक्ति उपासना का ही परिपक्व स्वरूप है । कर्म मार्ग ही  प्रवृत्ति मार्ग है । ज्ञान मार्ग ही निवृत्ति मार्ग है ।

(९) अंगहीन को न कर्म के अनुष्ठान  में अधिकार है , न दण्ड संन्यास में ।
वह मृत्युभय उपस्थित होने पर  केवल आतुर संन्यास मात्र ले सकता है , कदाचित् भय टल गया तो एक बार संन्यास का संकल्प कर चुकने के कारण  वह फिर आगे अलिंग संन्यासी के रूप में जीवन यापन करता है । दण्डसंन्यास का फिर भी वह अधिकारी नहीं होता ।

(१०) सोलह वर्ष से पूर्व की अवस्था वाले ब्राह्मण  को बालक  कहा जा सकता है , उसका सलिंगसंन्यास में अधिकार न होना केवल अनातुर (मृत्युसंकट न आना)  दशा में ही समझना चाहिये । एक बार  आतुर संन्यास (प्राण निकलने की दशा विशेष में लिया जाने वाला संन्यासविशेष)  लेने के उपरान्त वह बालक  यदि जीवित बच जाये  तो  यदि अंगहीन नहीं  है तो सलिंग अन्यथा अलिंग संन्यास का ही  वह अधिकारी होता है ।

Friday, 24 April 2020

राम जी ने सीता जी की अग्नि परीक्षा क्यों लीं

प्रश्न-
जगज्जननी माँ सीताजी की अग्निपरीक्षा का औचित्य क्या है?
सब कुछ जानते हुए भी श्रीराम ने ऐसा दुर्व्यवहार क्यों किया?

उत्तर-
भगवान् श्रीराम ने खर दूषणादि को मारकर एक दिन एकान्त में श्रीसीताजी को कहा कि अब अविलम्ब रावण भिक्षुक बनकर आपके पास आयेगा।(रावणो भिक्षुरूपेण आगमिष्यति तेन्तिकम्)।
अतः आप एकवर्षपर्यन्त अग्नि में निवास करो।(अग्नौ अदृश्यरूपेण वर्षं तिष्ठ ममाज्ञया)।

तुम्ह पावक महुं करहु निवासा।
जौ लगि करौं निसाचर नासा।।
निज प्रतिबिम्ब राखि तहं सीता।
तैसेइ सील रूप सुविनीता।।
प्रभुपद धरि हिय अनल समानी।
रा.च.मा. अरण्य 23 /2-3-4

और स्वमायारचित अपनी छायाकृति कुटिया में स्थापित करो।(त्वं तु छायां त्वदाकारां स्थापयित्वा उटजे विश)।
रावण वधोपरान्त आप हमको  पुनः प्राप्त करोगी।(रावणस्य वधान्ते मां पूर्ववत् प्राप्स्यसे शुभे)
सीताजी ने माया सीता को बाहर रखकर स्वयं पावक में प्रवेश किया।
मायासीतां बहिस्थाप्य स्वयमन्तर्दधेनले।
अध्यात्म रामायण अरण्यकाण्ड 7/2-3-4

युद्धकाण्ड...12 वां सर्ग
रावणान्त्येष्टि संस्कार संपन्न होने पर भक्तप्रवर विभीषणाभिषेकोपरान्त श्रीराम के मन में पावकस्थ सीताजी को प्राप्त करने तथा मायामय सीताजी को त्यागने का भाव आया।
मायासीतां परित्यक्तुं जानकीमनले स्थिताम्।आदातुं मनसा ध्यात्वा रामः प्राह विभीषणम्।।12/67

सीता प्रथम अनल महुं राखी।
प्रगट कीन्ह चह अन्तरसाखी।।
रा.च.मा.लंका का.108/14

अग्निदेव सीतामाता को अपनी गोद में लेकर प्रकट होते हैं तथा श्रीराम को सौंपते हैं।
विभावसुः ..
स्वांके समादाय विदेहपुत्रिकां..13/19
गृहाण देवीं रघुनाथ जानकीं,
पुरा त्वया मय्यवरोपितां वने।।13/20

अंकेनादाय पावकः.....एषा ते राम वैदेही पापमस्यां न विद्यते।।
बाल्मिकीय यु.का.118/5
प्रतिबिम्ब अरु लौकिक कलंक प्रचंड पावक महुं जरे।
धरिरूप पावक पानि गहि श्री सत्य श्रुति जग विदित जो।
जिमि क्षीरसागर इंदिरा रामहि समर्पी आनि सो।।
रा.च.मा.लं.का.108/छंदांश

दशरथ जी स्वयं सीताजी से कहते हैं- हे पुत्रि सीते तुम राम पर संशय मत करना।राम तुम्हारे हितैषी हैं।तीनों लोकों में तुम्हारी पवित्रता सिद्ध करने हेतु ही यह लीला की है।
रामेणेदं विशुद्ध्यर्थं कृतं वै त्वद्धितैषिणा।।
119/35 बा.यु.का.

सांसारिक स्वभाव में लीन संशयग्रस्त प्राणियों के विश्वासार्थ ही यह अग्निपरीक्षा का अभिनय किया गया।अन्यथा आप ही सोचें शिवशिवा ब्रह्मेन्द्राग्निवायु आदि देवगणों के सम्मुख, राक्षसेश विभीषण,वानरेश सुग्रीव जैसे राजाओं की साक्षिता होने पर भी यह संसारी व्यक्ति सीताचरित्र पर प्रश्नचिह्न लगा जाते हैं। कल्पना करो कि यह परीक्षा न होती तो न जाने कितने लोग क्या क्या न कहते सीता जी के विषय में।
और अंत में यदि श्रीराम का यह व्यवहार निंदायोग्य है,अस्वीकार्य है तो फिर प्रत्येक स्वर्णकार भी निंदित हो जो स्वर्ण को पीडा देकर गलाकर जलाकर नवाकार देता है।
चांद्रायण कृच्छ्र तप्तकृच्छ्र आदि व्रतोपदेष्टा गुरु शास्त्र संत सभी गलत होंगे जो कठोर प्रायश्चित्त का उपदेश करते हैं।
प्रत्येक वह माँ जो रुदनरत शिशु को बलात स्नानादि कराकर सजाती है।

श्रीराम चाहते हैं कि मेरी सीता पर कोई उंगली न उठे।इसीलिए सावधानी वरत रहे हैं।

Tuesday, 31 March 2020

शबरी शूद्रा नहीं थी

शबरी जी कदापि शूद्रा न थीं ~

(१) आक्षेप : परिचारिणी थीं, अतः शूद्रा हैं -

समाधान :  परिचारिणी शब्द के आधार पर शूद्रा समझे जाने पर राम के  अर्घ्य पाद्य गन्धानुलेपन विशेषणरूप आतिथ्य सत्कार  तथा मतंगमुनि-आश्रमवास आदि से विरोध होगा ।

छान्दोग्योपनिषद् की जबाला भी परिचारिणी  थीं (चरन्ती परिचारिणी यौवने) ,   किन्तु त्रिकालदर्शी महर्षि गौतम उनके पुत्र की  परीक्षा करके  ब्राह्मण ही बताते हैं  और समिधं सोम्याssहर कहकर उनका उपनयन संस्कार भी करते हैं । जाबाल मुनि के लिये ब्रह्मवैवर्तपुराण में वेदाङ्गवेदज्ञः विशेषण है, ये विशेषण उनको शूद्र समझने वालों का भी भ्रान्तिहरण कर रहा है ।

परिचर्या  का अभिप्राय उपासना (सेवा)  है । सेवा शूद्र का  स्वाभाविक कर्म अवश्य  है , किन्तु शूद्र ही सेवाचित्त वाला  हो सकता है , ये नियम नहीं है । लोक में ब्राह्मणी भी अपने पति की , अतिथि की ,  विदुषी ब्राह्मणियों की , सन्तों की , ईश्वर की सेवा करती है ।  

(२) आक्षेप : राम के चरण पकड़तीं हैं ,अतः शूद्रा हैं -

समाधान :  लोकाचार की दृष्टि से  ब्राह्मणी होकर क्षत्रिय अतिथि के  चरण पकड़ने का आचार ब्राह्मणी न होने का भले ही पोषण करे , किन्तु ब्राह्मणी नहीं थीं, तो शूद्रा ही थीं , ऐसा भी  एकान्त निर्णय नहीं करता , क्योंकि   राम शुद्ध  क्षत्रिय जाति के थे , ऐसी स्थिति में अनुलोम संकर क्षत्रिय , वैश्य आदि जातियों को भी चरण पकड़ने का  अवकाश प्राप्त है । हीनजातिसमुद्भवा, अधमजन्मा विशेषणों का समाधान पूर्व वक्तव्य  में हम कर आये हैं ।
अकथित अंश  से असम्भव होने की सिद्धि नहीं हुआ करती  , फलतः राम द्वारा नमन करने का प्रसंग प्राप्त न होना , उनके द्वारा  नमन न करने की भी सिद्धि नहीं करता ।

  शबरी जी के ब्राह्मणी पक्ष में - // दृष्ट्वा तु तदा सिद्धा समुत्थाय कृतांजलिः । पादौ जग्राह..// यहॉ  चरण पकड़ने वाली शबरी के लिये #सिद्धा विशेषण उनके   ब्राह्मणीपक्ष की रक्षा कर रहा है ।  क्योंकि लोक में सिद्ध प्राणियों में  आचारमर्यादा का अतिरेक दीखने पर भी उनमें  दोषप्राप्ति नहीं होती ।  (समरथ को नहिं दोष गोंसाई। रवि पावक सुरसरि की नाई।।) । वे  मतंग मुनि की शिष्या रहीं , उनके आश्रम में वास करतीं थीं ,  वहीं उन्होंने तपस्या साधना की ( जैसा कि राम के तपस्या , आहारादि विषयक  प्रश्नों से स्पष्ट है ) अतः शूद्रा नहीं कहा जा सकता । 

।। श्रीरामस्य जयोsस्तु ।।

Sunday, 29 March 2020

जाति और वर्ण एक ही अर्थ में प्रयुक्त हुए है

#प्रश्न - वर्ण और जाति - दोनों एक ही (समानार्थक)  शब्द हैं या अलग अलग ?

#उत्तर -   दोनों एक ही  हैं ।  वर्ण कहो  या जाति - एक ही बात है । 

ब्राह्मण , क्षत्रिय , वैश्य और शूद्र - ये चार  वर्ण मानव   की  प्रधान  जातियॉ हैं ।

श्री ब्रह्माजी नामक  ब्रह्मलोक के महान् देवता  के  दिव्य  मुखादि  अंगों से  सृष्टि के आरम्भ में   पैदा हुए - इसलिये इनको #जाति कहते हैं, परमात्मा  ने इन जीवों को इनके पूर्वजन्मों के  गुण -कर्मों से चुना था , इसलिये ये #वर्ण कहलाते हैं । 

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#प्रश्न -इन दोनों शब्दों का एकार्थ किस रीति  सिद्ध है , क्योंकि  वर्णऔर जाति  शब्द  तो अलग अलग हैं ?

#उत्तर - जैसे, -

#कानन  और #अरण्य    -ये परस्पर     पर्यायवाची शब्द है ।  दोनों शब्द जिस  वन  का  बोध कराते हैं, वो  बोध  एक ही है ।

इसी प्रकार, -

वर्ण और जाति - ये पर्यायवाची शब्द हैं । दोनों शब्द जिस  ब्राह्मणादि  का बोध कराते हैं, वो एक ही है ।

जैसे , -

कानन का अर्थ कस्य ब्रह्मणः  आननम्    इस प्रकार  ब्रह्ममुख आदि  भी  किया जा सकता है,  अथवा कं जलम् अननं जीवनम् अस्य इस प्रकार अन्यार्थ भी प्रयोग किये जा सकते हैं,

इसी प्रकार, -

वर्ण शब्द के अन्य भी अनेक अर्थ हो सकते हैं , किन्तु इन सब विविधार्थों के मध्य  अरण्य या वन अर्थ भी कानन का होता है, इसी प्रकार वर्ण शब्द का अर्थ जाति  होता है, इसमें  किसी भी प्रकार की  कोई विप्रतिपत्ति नहीं है ।

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#प्रश्न - तो फिर  हिन्दू धर्म की  जाति व्यवस्था का  तरह तरह  प्रकारों से  लोग विरोध क्यों करते हैं आजकल ?

#उत्तर -  सुनिये, -

जिनके बाप -दादे  अपने पुरखों की शुद्ध जाति परम्परा से गिर कर म्लेच्छ हो  गये हैं, ऐसे कुछ   स्वधर्मभ्रष्ट परिवारों  की सन्तानें  कहती हैं कि जाति व्यवस्था   हिन्दू धर्म का  कोई भी  अंग नहीं है ।

किन्तु जिनके बाप दादे अपने पुरखों की शुद्ध जाति परम्परा को सम्भालते हुए आये , ऐसे तपस्वियों की सन्तानें कहती हैं जाति व्यवस्था हिन्दू धर्म की आधारशिला है ।

धार्मिक जाति व्यवस्था का विरोध करना  वस्तुतः लोगों की  व्यक्तिगत / पारिवारिक समस्या की पहचान है ।

।। जय श्री राम ।।

शबरी का झूठे वेर खिलाने का खण्ड

हमने भी पर्याप्त  जंगली बेर खाये हैं, लेकिन चख के पता कभी नहीं करना पड़ा , रंग देख कर ही पता चल जाता है कि कैसा होगा ।

हो सकता है त्रेतायुग में कईं प्रजातियॉ रही होंगी, लेकिन प्रजाति का स्वाद  पता करने के लिये तो स्थालीपुलाकन्याय से  एक बार का एक ही बेर पर्याप्त है ।  वो भी उस स्त्री के लिये जिसने पूरा जीवन जंगल में ही काटा हो !

ये क्या कि मुंह के जूठे बेर काट काट के अतिथि देवता को खिलाये जायें ? चलो दुर्जनतोषन्याय से  हम तो फिर भी आपका कहा मान लेते हैं वो मतंगशिष्या  जंगली गंवार थी, पर क्या राम भी अनपढ़ थे क्या , जो किसी का जूठा खा लें ? वो राम , जो गुरुगृह गये पढ़न रघुराई । अन्तकाल विद्या सब पाई ।।

नोच्छिष्टं कस्यचिद् दद्यात् ।

उच्छिष्टमपि चामेध्यं भोजनं तामसप्रियम् ।

श्रुति स्मृति का उल्लंघन करने वाला न तो मेरा भक्त है, न  वैष्णव , ऐसा कहने वाले भगवान् ने स्वयं श्रौत- स्मार्ताचार को ताक पर रखकर भक्ति के नाम पर  जूठे बेर खा लिये - कितना झूठ फैला दिया गया ।

।। श्रीरामस्य जयोsस्तु ।।

शवरी ब्राह्मणी थी

शबरी जी :  शंका समाधान ----

अध्यात्म रामायण में शबरी जी के विषय में दो विशेषण हैं - 
(१) हीनजातिसमुद्भवा
(२) अधमजन्मा

और शबरी के  आचारकर्म के भी दो ध्यातव्य विशेषण हैं -

(१) अर्घ्यादिभिरादृता
  (२) सुगन्धैः सानुलेपनैः (सम्पूज्य)

अर्थात् शबरी हीन जाति में पैदा हुईं थीं , वे अधमजन्मा थीं  और उन्होंने अर्घ्य, पाद्य  से पूजन करके भगवान् राम को तिलक भी लगाया ।

अब जो लोग शबरी को शूद्रा समझते हैं , उनका विरोध अर्घ्य, तिलकादि पूजन कर देते हैं , क्योंकि शूद्रा स्त्री को क्षत्रिय को अर्घ्य , पाद्य देने और  स्पर्श करते हुए  गन्ध लेपन करने का कितना शास्त्रीय अधिकार है , ये सर्वविदित है ।

ऐसे में प्रश्न ये है कि फिर शबरी जी के लिये प्रयुक्त दो   जातिपरक  विशेषणों का क्या भाव है ?  इसका समाधान यह है कि शबरी जी के उक्त दो विशेषण  या तो उनकी स्त्री जाति होने के कारण ही प्रयुक्त हुए हैं (ब्राह्मणी पक्ष में) क्योंकि   जाति शब्द केवल वर्णगत ही नहीं प्रयोग  हुआ करता , वरन् योनिगत भी प्रयुक्त होता है , जैसे - मनुष्य जाति , पशु जाति , पक्षी जाति , स्त्री जाति , पुरुष जाति आदि । पुरुष जाति के सापेक्ष स्त्री जाति के  अवर होने के कारण ही उक्त दो विशेषणों का होना संगत है ।  शास्त्रानुसार स्त्री जाति को पापयोनि कहा गया है । ( मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येsपि स्युः पापयोनयः । स्त्रियो वैश्यस्तथा शूद्रास्तेsपि यान्ति परां गतिम् ।। )  अतः शबरी जी का स्वयं के स्त्री जाति होने के कारण ही स्वयं को हीनजातिसमुद्भवा कहा गया । यही संगत है ।
तभी तो गोस्वामी जी ने शबरीमुख से कहलवाया भी है - अधम ते अधम अधम अति नारी । तिन्ह मंह मैं मतिमन्द अघारी ।।
अथवा क्षत्रिय जाति से अवर जाति - अनुलोम संकर क्षत्रिय, वैश्य जाति आदि के कारण प्रयुक्त हुए   ।

श्री धर्मसम्राट् करपात्री जी महाराज ने रामायण मीमांसा ग्रन्थ में शबरी जी को ब्राह्मणी बताया है । 

कृतातिथ्य रघुश्रेष्ठम् - शबरी जी ने रघुकुल के राम चन्द्र का आतिथ्य किया था । कहा जाता है , भरत के अनुमोदन पर गिरि काननरूप  अरण्यभाग का शासन  राम ही कर रहे थे । राजा आतिथ्य का अधिकारी है । ऐसी स्थिति में शबरी जी का आचार शास्त्रोचित ही था ।
मर्यादा पुरुषोत्तम राम भला शास्त्रविरुद्ध आचार को अनुमोदन कर भी कैसे सकते थे !

राम वशिष्ठ ऋषि से शिक्षा पाये थे, वशिष्ठ धर्मसूत्र , वशिष्ठ स्मृति जन्मना वर्णव्यवस्था की ही पोषक है ।  स्वयं राम के पूर्वज महाराज मनु की मनुस्मृति जन्मना वर्णव्यवस्था का ही अनुमोदन करती है । अतः राम अपने गुरु , पिता - पूर्वजों के ही मार्ग पर चले थे, उन्हीं की मान्य आचार परम्परा को पोषित किये थे , ये सिद्ध है ।

।। श्रीरामस्य जयोsस्तु ।।

33 करोड़ देवता निर्णय

#तैंतीस_करोड़_देवता_कोटि_नहीं_हैं_  वास्तव में वैदिक दर्शन में "अनन्ता वै वेदा:" प्रमाण से "मंत्र ब्राह्मणयोर्वेद नामधेयम्...