Monday, 8 July 2019

वर्ण आश्रम का महत्व

जगद्गुरु भगवान् शिव ने  कहा है   कि     -

आलोड्य सर्वशास्त्राणि विचार्य च पुनः पुनः ।
इदमेकं सुनिष्पन्नं  योगशास्त्रं परं मतम्  ॥

अर्थात् समस्त शास्त्रों को बारम्बार आलोडन करके तथा  पुनः पुनः  विचार करके  ये निश्चय किया है कि  उनका उपदिष्ट  योगशास्त्र ही सर्वश्रेष्ठ है ।

प्राणी   जगद्गुरु भगवान् शंकर के उपदिष्ट योगसाधना के बिना विक्षिप्त की भांति इधर उधर भागते रहते हैं ।

और  भगवान् शंकर स्वयं ये सार सिद्धान्त कहते हैं कि  उनके उपदिष्ट योगमार्ग पर चलने वाला  एक योगसाधक  यदि संसार सागर को पार करना चाहता है  तो  उसे   वर्णाश्रम धर्म का निष्काम भाव से पालन करना  चाहिये ।

शिवावतार भगवान् जगद्गुरु श्री आद्य शंकराचार्य ने अपने  अपरोक्षानुभूति  ग्रन्थ में भी  यही  वैदिक - सिद्धान्त स्थिर करते हुए कहा है -

स्ववर्णाश्रमधर्मेण तपसा हरितोषणात् ।
साधनं प्रभवेत्पुंसां वैराग्यादि-चतुष्टयम् ।।

अन्यत्र भी कहा गया है -

आलोड्य सर्वशास्त्राणि विचार्य च पुनः पुनः ।
इदमेकं सुनिष्पन्नं ध्येयो नारायणः सदा ।।

अर्थात् समस्त शास्त्रों को बारम्बार आलोडन करके तथा  पुनः पुनः  विचार करके  ये निश्चय किया है कि सदैव भगवान् नारायण का  ही ध्यान बना रहे ।

तथा  अपने जीवन में उन भगवान्  नारायण के सदा ध्यान की   शास्त्रीय प्रक्रिया बताते हुए  भी शास्त्र ने यही सिद्धान्त स्थिर किया है कि  उनकी सन्तुष्टि हेतु अपने वर्णाश्रम का परिपालन करे , अन्य कुछ भी उनकी सन्तुष्टि का मार्ग नहीं है ।

स्व-वर्णाश्रमधर्मेण तपसा हरितोषणात्।
हरिराराध्यते पुंसां नान्यत्तत्तोषकारणम् ।।

अतः आप सभी लोग  आत्मकल्याणार्थ  श्री  भगवान् की प्रसन्नता हेतु अपने - अपने वर्णाश्रम धर्म का निष्काम भाव से परिपालन करें ।

वर्ण चार हैं - ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र ।

आश्रम भी चार हैं - ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ, संन्यास ।

उक्त चारों वर्णों एवं चारों आश्रमों के  धर्म का सविस्तार वर्णन समस्त श्रुति -स्मृतियों आदि में सविस्तार  से प्रतिपादित हुआ है ।

।। श्री राम जय राम जय जय राम ।।

Sunday, 7 July 2019

कैसे करें साधना

कैसे करें साधना ?

श्री आद्य शंकराचार्य कहते हैं , आपका चित्त है वस्त्र ।

कर्मकाण्ड #पानी है ,  कृष्णभक्ति #क्षार (रीठा/साबुन आदि)  है ।

जैसे पानी के साथ में   क्षार (रीठा/ साबुन आदि ) लगाने से वस्त्र अच्छी तरह  चमक जाते हैं, वैसे ही  कर्मकाण्ड के साथ में कृष्ण भक्ति करने पर चित्त शुद्ध हो जाता है ।

[वसनमिव क्षारोदैर्भक्त्या प्रक्षाल्यते चेतः।। - श्री आद्य शंकराचार्य ।]

केवल पानी से जमा मैल नहीं छूट पाता, साथ में क्षार की भी आवश्यकता पड़ती है , इसीलिये श्री आद्य शंकराचार्य कहते हैं शुद्ध्यति  हि नान्तरात्मा  कृष्णपदाम्भोजभक्तिमृते ; और यदि जल  नहीं लगायेंगे तो  केवल क्षारमात्र से मैल और बढ़ने की सम्भावना हो जाती है ।

इसलिये  जैसे  पानी  और क्षार दोनों से वस्त्र अच्छी तरह स्वच्छ होता है , वैसे ही  नित्य -नैमित्तिक -प्रायश्चित्त  कर्म  और  श्रीकृष्ण भक्ति  दोनों ही आवश्यक हैं   ।  

पहले पानी से  अच्छी तरह वस्त्र  भिगाइये,   क्षार (रीठा/साबुन आदि)  लगाकर   वस्त्र को खूब अच्छी तरह रगड़िये , फिर से पानी से धो लीजिये । जैसे  वस्त्र धोया जाता है ,  वैसे  ही चित्त भी शुद्ध किया जाता है ।

[नित्यकर्म - संध्या, स्वाध्याय आदि पंच महायज्ञ
नैमित्तिक कर्म - सोलह संस्कार आदि
प्रायश्चित्त कर्म - चान्द्रायणव्रत  आदि ]

#प्रतिलिपि(कॉपी-पेस्ट) सदैव स्वागत है ।

साभार - श्री आद्यशंकराचार्य

।। श्री राम जय राम जय जय राम ।।

Saturday, 6 July 2019

स्मार्त्त कौन होतें है ?

ये कट्टर स्मार्त्त कौन होते हैं ?
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जिस ब्राह्मण के घर पर  कोई भी धार्मिक कृत्य करने से पूर्व        समस्त वैदिक स्मृतियों के वचनों पर विचार हो और   स्मृतियों के ही अनुरूप  उनके विविध वचनों के    बलाबल  का   इस प्रकार से   सारभूत निर्णय हो , कि समस्त   वैदिक स्मृतियॉ    सार्थक हो जायें ,  और न्याय-मीमांसादि शास्त्र धन्य हो जाये ,  उसे कहते हैं स्मार्त्त  ब्राह्मण  ।।

और जब एक ब्राह्मण स्मृतियों के सार सर्वस्व  को पूर्ण निष्ठा से    स्वीकार करता है, तो उसे ही हम कहते हैं कट्टर स्मार्त्त ब्राह्मण ।

  गाणपत्य गणेश को ,  शाक्त  शक्ति को, सौर सूर्य को ,  शैव शिव को  और वैष्णव  विष्णु को ही एकमात्र    सर्वोच्च देवता बताते हैं ।

जो पॉचों देवताओं को एक ही  परमेश्वर , एक ही परमेश्वर को पॉचों देवताओं के रूप में देखे,  उसे कहते हैं स्मार्त्त मतानुयायी  ।

एक ही ईश्वर अपनी जिस माया शक्ति से एक नाम  रूप वाला है, उसी माया शक्ति से  वही  दूसरे , तीसरे,   चौथे,  ...अनन्त नाम रूपों  वाला होने में सर्वथा सक्षम है ।

ऐसे  एकधा , द्विधा , त्रिधा  प्रभृत् अनन्तपर्यन्त   नाम रूपों  वाले   'नाम- रूपवान्  परमेश्वर'  में जिसकी   पूर्ण निष्ठा है, उन धन्यभाग्यवानों  को कहते हैं  कट्टर स्मार्त्त मतानुयायी  ।

परमेश्वर के विष्णु रूप में निष्ठा होने पर वही स्मार्त्त  उर्ध्वपुण्ड्रधारी वैष्णव  दीखता  है,  शिव रूप में  निष्ठा होने पर वही त्रिपुण्ड्र धारी शैव  दीखता है  , जिस देवरूप में निष्ठा करता है,  उसी देवता के अनुरूप  शास्त्रीय मर्यादा में स्वयं भी  दीखता  है  ।   अपने ईष्ट रूप के अनुरूप ही वह   पंचायतन देवताओं की उपासना करता है -

गणेश पंचायतन । , शक्ति पंचायतन ।, सूर्य पंचायतन ।, शिव पंचायतन ।, विष्णु पंचायतन ।

पंचायतनोपासना की  अधिक जानकारी हेतु   देखें  पुस्तक -

नित्यकर्म पूजाप्रकाश ।
गीताप्रेस गोरखपुर ।।

।। जय श्री राम ।।

Friday, 5 July 2019

लिंग का रहस्य

#भगवान्_शिव_ की_दारुवन_कथा_ का_रहस्य -

यद्यपि शिवलिंग और उसकी पूजा अनादिकाल से ही है, तथापि उनके आविर्भाव का पुराणों में वर्णन है- ब्रह्मा, विष्णु दोनों ही ‘मैं बड़ा हूँ’ ऐसा कहकर परस्पर लड़ रहे थे। उनका विवाद मिटाने के लिये परमज्योतिर्मय लिंग का आविर्भाव हुआ। ब्रह्मा भगवान् के उस ज्योतिर्मयलिंग का पता लगाने के लिये हंस पर आरूढ़ होकर ऊपर की ओर गये और विष्णु वराहरूप धारण कर नीचे गये। हजारों वर्ष तक घोर परिश्रम करने पर भी दोनों को उसका कहीं आद्यन्त न मिला।

शिवलिंग के मस्तक रूप से गिरती हुई केतकी ने कहा कि ‘मैं दश कल्प से चलते यहाँ तक पहुँती हूँ, अभी कुछ ठिकाना नहीं कि कितना जाना पड़ेगा।’ इससे शिविलिंग की अनन्तता मालूम पड़ती है। दिव्यवाणी से भगवान ने ब्रह्मा, विष्णु दोनों ही को प्रबोध कराया। अन्यत्र पृथ्वी को पीठ और आकाश को लिंग कहा है। जैसे वेदी पर लिंग विराजता है वैसे ही पृथ्वी पर आकाश है। जैसे ब्रह्म का एक देश ह प्रकृति-संस्पृष्ट है, वैसे ही आकाशलिंग का भी एक देश ही पृथ्वीसंस्पृष्ट हैं। इसीलिये कहीं लिंग ठीक पुरुष के जननेन्द्रिय के समान ही होता है, कहीं ब्रह्माण्ड के आकार का, कहीं पिण्ड के आकार का। केदारेश्वर की नित्यसिद्ध स्वयम्भू मूर्ति कहीं भी लिंग के आकार की नहीं हैं। वही कारणावस्था या पिण्डावस्था का चिह्न ही लिंग समझना चाहिये। वस्तुदृष्टि से फिर भी वह लिंग ही है। आधुनिक वैज्ञानिकों की भी दृष्टि से आकाश वक्र है जैसा कि लिंग का स्वरूप है किं बहुना देश, काल, वस्तु सभी वक्र हैं, ब्रह्म को भी वक्र और स्तब्ध कहा है। फिर उससे उत्पन्न सबको वक्र होना ही चाहिये। अनन्तकोटि विश्व सब लिंगमय ही है। विश्वों से परे सगुण ब्रह्म का भी लिंग ही आकार है। शिवशक्ति के सहवास में अवकाश न मिलने से शुक्राचार्य ने उन्हे शाप दिया कि तुम योनिस्थ लिंग के रूप में पूजित होगे। एकबार शंकर दिगम्बर वेश से स्वलिंग अपने हस्त में लेकर दारुकवन में गये। उन्हें देखकर ऋषिपत्नियाँ मोहित हो गयीं। यह देखकर ऋषियों ने शंकर को शाप दिया कि तुम्हारा लिंग गिर जाय। ऐसा ही हुआ, किन्तु लिंग के पृथ्वी पर गिरते ही वह प्रज्वलित होकर अपने तेज से लोक को जलाने लगा। अन्त में शिवा ने उसे योनि में स्थापित किया और सब ऋषियों और देवताओं ने उसकी पूजा की । यहाँ लिंग योनि दिव्यप्रकृति और परम पुरुष ही है।

शिवशक्तिरूप लिंग-योनि को प्राकृत स्त्री-पुरुष के समान चर्मखण्ड मूत्रेन्दिय मात्र मान लेना बड़ा अपराध होगा। वही यह भी कथा है कि मुनियों के शाप से गिरा शिवलिंग अग्नि के समान जाज्वल्यमान होकर भूमि, स्वर्ग एवं पाताल में फिरा, सभी लोक बड़े दुःखी हुए।

ब्रह्माजी ने कहा कि- ‘गिरिजा की प्रार्थना करो, वही योनिरूप से परमज्योतिर्मय लिंग को धारण कर सकती है।’ फिर सब देवताओं एवं मुनियों ने जब आराधना को, तब भगवान् और गिरिजा प्रसन्न हुई और गिरिजा में शिव की प्रतिष्ठा हुई। क्या साधारण लिंग का गिरकर अग्निमय होकर सर्व लोकों में घूमना बन सकता है? और विष्णु, राम, कृष्ण तथा सभी देव, मुनि क्या केवल साधारण लिंग-योनि की ही पूजा करते थे? यदि यही बात थी, तो कृष्ण की उपमन्यु के यहाँ जाकर दीक्षापूर्वक घोर तपस्या करने की क्या आश्वकता थी? कुछ लोग कथा में आये हुए उक्त शिवलिंग को केवल ब्रह्माण्ड कहते हैं, उसी को हाथ में लिये हुए भगवान् लीलया दारुकवन में गये थे, वहीं मुनियों के शाप से उनके हाथ से लिंग गिर पड़ा। अतएव वहाँ उसका ‘गिरना’ कहा गया है, ‘कटना’ नहीं। उस ज्योर्तिलिंग ब्राह्म तेज का आधार पंचतत्वात्मिका प्रकृति ही योनि है। अतः पार्वती ने योनिरूप से उस लिंग को धारण किया अर्थात पंचतत्वात्मिका प्रकृति बनकर उन्होंने ब्रह्माण्ड को धारण किया। अग्निमय सर्वदाहक लिंग को योनि - प्राकृत चर्मखण्ड मूत्रेन्द्रिय - मे कौन धारण कर सकता था? "बाणरूपा श्रुता लोके पार्वती शिववल्लभा।" योनिरूपा का अर्थ ही बाणरूपा है। ‘बाण’ शब्द पाँच संख्या का बोधक होता है, पंचशर के अभिप्राय से काम में, पंचमुख के अभिप्राय से शिव में, पंचतत्वात्मिका की दृष्टि से पार्वती में ‘बाण’ शब्द का प्रयोग होता है। जैसे विद्युत-पुंज पंचतत्व में व्याप्त होते हुए भी जल और पर्वतश्रेणी में अधिकता से रहता है, वैसे ही पार्वती बाणरूपा हुईं अर्थात पर्वतश्रेणीरूपा हुईं और उन्हीं में वह तेजोमय लिंग समा गया। विद्युत्पुज यदि अपनी योनि पृथ्वी या जल में पडे, तो स्थिर होता है, अन्यथा वृक्ष, मनुष्य सबको भस्म ही करता है। यही बात शिवजी ने कही है- ‘‘पार्वतींच विना नान्या लिंग धारयितुं क्षमा। तया धृतंच मल्लिंग द्रुतं शान्ति गमिष्यति।।’’ अर्थातृ पार्वती के बिना कोई इसे नहीं धारण कर सकता, उनके धारण से वह शीध्र ही शान्त हो जायगा। ‘‘सतश्च योनिमतश्व।’’[1] ‘‘यो योनि योनिमधितिष्ठत्येकः।’’[2] ‘‘यच्च स्वभावं पचति विश्वयोनिः।’’[3] इत्यादि मन्त्रो से योनि का अर्थ मूत्रेन्द्रिय ही है, यह कहला अज्ञता ही है।

श्रीविष्णु आदि देवाधिदेवों का भी पूज्य योनिप्रतिष्ठित लिंग प्राकृत वस्तु कथमपि नहीं हो सकता। यदि विष्णुकर्तृक पूजा आदि को क्षेपक कहें, तब तो समस्त कथा को ही क्षेपक मान सकते हैं। अव्यक्त का लिंग (व्यक्त ब्रह्माण्ड) भृगु (प्रकृति) के आकर्षण-विकर्षण विशेष के तारतम्य से द्यावापृथ्वीरूप में दो टूक हो गया- ‘‘वायुरापश्चन्द्रमा इत्येते भृगवः।’’ ‘‘शंभोः पपात भुवि लिंगमिदं प्रसिद्धम्। शापेन तेन च भृगोर्विपिने गतस्य।।’’

श्रीशंकर ने भी विश्वेश्वर लिंग की प्रतिष्ठापना और पूजा ही है- ‘‘ब्रह्मण विष्णुना वापि रुद्रणान्येन केन वा। लिंगप्रतिष्ठामुत्सृज्य क्रियते स्वपदस्थितिः।। किमन्यदिह वक्तव्यं प्रतिष्ठां प्रति कारणम्। प्रतिष्ठितं शिवेनापि लिंग वैश्वेश्वरं यतः।।’’ ‘नारद पंचरात्र’ के तीसरे रात्र में, तो कि वैष्णवों का सर्वस्व है, लिखा है कि एक शंक्र के सिवा सभी स्त्रैण थे। ब्रह्मा, विष्णु, दक्ष आदि ने तपस्या से कालिका देावी को प्रकट किया। देवी ने कहा- ‘वर माँगो।’ देवों ने कहा कि ‘आप दक्ष-कन्या होकर शिव को मोहित करो।’ जगदीश्वरी ने कहा-‘शम्भु तो बालक है।’ ब्रह्मा ने कहा-‘शम्भू के समान दूसरा कोई पुरुष हो नहीं सकता।’ यह सुनकर दक्ष के यहाँ देवी सतीरूप से प्रकट हुईं। देवताओ ने विवाह कराया। सती-शिव के रमण से दोनों का तेज भूमण्डल मे पड़ा, वही पाताल, भूतल, स्वर्ग सर्वत्र योनिसहित शिवलिंग हुए। लिंगपूजा शाक्त, वैष्णव, सौर, गाणपत्य सभी के लिये है-

‘‘शाक्तो वा वैष्णवो वापि सौरो वा गाणपोऽथवा। शिवार्चनविहीनस्य कुतः सिद्धिर्भवेत् प्रिये।।’’

शिव की पूजा के बिना अन्य देवता की पूजा करने से वह देव शाप देकर चला जाता है- ‘‘अनाराध्य च मां देवि योऽर्चयेद्देवतान्तरम्। न गृह्लाति महादेवि शापं दत्वा व्रजेत् पुरम्।। यद्यपि शुद्ध दार्शनिक और आध्यात्मिक विवेचनो से शिवलिंग अनादि ही है, उसकी पूजा भी अनादि ही है तथापि अर्थवादरूप में अनेक प्रकार से शिवलिंग की उत्पत्ति ओर पूजा का आरम्भ लिखा गया है। जैसे यद्यपि नित्यसिद्ध ही राम, कृष्ण का अवतार मना जाता है, तथापि अवतार से पहले भी वे पूज्य थे ही, क्योंकि कल्प-कल्प में उनके अवतार होते रहते हैं, कोई अवतार नया नहीं है। वैसी ही बात शिवलिंग के विषय में भी समझनी चाहिये। नित्य होने पर भी भिन्न-भिन्न कल्प में उसके आर्विर्भाव के क्रम भिन्न हैं। समष्टि प्रजननशक्ति सम्पन्न शिवतत्व ही समष्टि लिंग है। उसी से समस्त व्यष्टि योनि और लिंगों का आविर्भाव हुआ है। यही सती-शिव के मैथुन से प्रादुर्भूत तेज से सयोनि लिंगों की उत्पत्ति का रहस्य है। प्रकृति-पुरुष का संयोग ही शिव-सती का मैथुन है। प्रकृति-मिश्रित अनन्त पुरुषों का प्रादुर्भाव ही उनका मिश्रित तेज है। समष्टि लिंग से ही उत्पन्न होकर व्यक्ति लिंग बनते हैं। अतः सभी व्यष्टि लिंगों की योनि भी समष्टि लिंग की ही योनि है। यही शिव के दारुका वन-विहार का रहस्य है।

।। जय श्री राम ।।

Monday, 1 July 2019

बाल कब काटें ?

बोधक लेख------

बाल कटवाना, नाखून काटना अथवा हजामत बनवाना आदि "क्षौर कर्म" कहलाते हैं -
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"भानुर्मासं क्षपयति तथा मार्तण्डूनु -

      भौमश्चाष्टौ वितरति शुभान् बोधन: पञ्चमासान् !

          सप्तैवेन्दुर्दश सुरगुरू: शुक्र एकादशेति

               प्राहुर्गर्गप्रभृतिमुनय: क्षौरकार्येषु नूनम् !!

                                                      -'वाराह संहिता'

अर्थात: रविवार को क्षौर कर्म कराने से एक मास की, शनिवार को सात मास की, भौमवार(मंगलवार) को आठ मास की आयु को, उस-उस दिन के अभिमानी देवता क्षीण कर देते हैं !

         इसी प्रकार बुधवार को क्षौर कर्म कराने से पांच मास की, सोमवार को सात मास की, गुरीवार को दस मास की और शुक्रवार को ग्यारह मास की आयु की उस उस दिन के अभिमानी देवता वृद्धि करते हैं ! पुत्रेच्छु(पुत्र की इच्छा रखने वाला) ग्रहस्थों एवं एक पुत्र वाले को सोमवार को तथा विद्या एवं लक्ष्मी के इच्छुक को गुरूवार को क्षौर कर्म नहीं कराना चाहिए !

         इसके अतिरिक्त'एकादशी, चतुर्दशी, अमावस्या, पूर्णिमा, संक्रांति, व्यतिपात, विष्टि(भद्रा), व्रत के दिन एवं मंगलवार तथा शनिवार को क्षौर कर्म वर्जित हैं !

         इसके प्रत्येक दिन क्षौर कर्म कराने से भिन्न-भिन्न फलों की प्राप्ति होती है -

* सोमवार के दिन बाल या नाखून आदि कटवाना संतान तथा स्वास्थ्य हेतु शुभ नहीं माना जाता !

* मंगलवार को दाढ़ी एवं नाखून आदि कटवाने से आयु क्षीण होती है !

* बुधवार को बाल एवं नाखून आदि कटवाने से बरकत होती है !

* गुरूवार को बालादि कटवाने से मान-सम्मान तथा प्रतिष्ठा की हानि होती है और धन हानि भी होती है !

* शुक्रवार को बाल कटवाने से धन लाभ तथा यश प्राप्ति होती है !

* शनिवार को बाल कटवानेे से 'अकाल मृत्यु' की सम्भावना बलवती होती है !

* रविवार को बाल कटवाने से धन, बुद्धि तथा धर्म का नाश होता है !

जय श्री राम

Friday, 21 June 2019

गो महिमा

ये कौन हैं जानते हो ?

ये वो  जगज्जननी भगवतियॉ  हैं , जिनके पीछे -पीछे  स्वयं पराम्बा भगवती  लक्ष्मी अपने आठ प्रकार के ऐश्वर्यों को  लिये  सेवा की कामना  से  जाती हैं  ! 

जिनके पीछे स्वयं    परात्पर  परब्रह्म  भी नन्हा सा  बालक बनकर चलता है कि मॉ की कुछ दया  मुझ पर भी हो जाये  !

जिनकी पदचाप से उड़ने वाली धूल के हर कण-कण में करोड़ों करोड़ो देवता अपने  बसने का  ठिकाना खोजते हैं !

ये वो  शक्तियॉ हैं जो अपनी हरेक  पदचाप में धर्म , अर्थ , काम और मोक्ष  की छाप छोड़ती जाती हैं !

ये वो राजरानियॉ हैं , जो  हरेक सन्त के,  हरेक महात्मा के,  हरेक पंडित के , हरेक विद्वान् के,  हरेक बुद्धिजीवी के,  हरेक योगी के , हरेक भक्त के  हृदय रनिवास पर  राज करती हैं !

............हॉ , ये  माऐं  है ,  ये गायें हैं  ! ✒️

गायें क्यों कहते हैं इन्हें  ,

........क्योंकि  स्वयं वेदों ने इन्हें ही गाया  है ,   स्वयं परमात्मा ने इन्हें ही गाया है , समस्त  ऋषियों ने इन्हें  ही गाया है ।   जो  हरेक  धर्मज्ञ, हरेक मनीषि  द्वारा गायी  जाये , वही ये  गायें हैं ।  ✒️

गाय तो गायन है , गोपाल, गोविन्द स्वरूप भगवान् मुरली मनोहर श्याम सुन्दर श्री कृष्ण  की  बंसी की हरेक स्वर- सरस्वती जगज्जननी भगवती स्वरूपा गायों  की महिमा ही गाती  हैं ।

गच्छतीति गौ - जो चलती जाती हैं , सदैव अनवरत । वर्तमान के समीपस्थ भूत और भविष्यत् की भी वर्तमान  संज्ञा होती है । गौ माता प्रवाहमाना हैं ,  जो अनवरत गतिमान हैं , वे गौं हैं अर्थात्  चेतना और यथार्थता की संगम यही हैं ।

 
इस संसार में जिसके पास भी आज सुख है  , शान्ति है,   धन सम्पदा , वैभव  और ऐश्वर्य है ,  ज्ञान है , गुण है , वे सब  का सब किसी न किसी जन्म की   किसी न किसी प्रकार की गो-सेवा का ही फल है ।

जो समस्त प्राणियों की माता हैं , जो समस्त सुखों को देने वाली हैं , वे यही गायें हैं ।

#मातरस्सर्वभूतानां_गावः_सर्वसुखप्रदाः।।

मॉ ! तेरे चरणों की  कुछ  धूल भी मिल जाये  !
हो जाऊं मैं धन्य तभी  जीवन ये संवर जाये  ।।

।। जय श्री  राम ।।

Wednesday, 19 June 2019

सचल शव और सचल शिव

सचल शव और सचल शिव ----

जिन धन्यात्माओं को महान् देवताओं के दर्शन /अनुभव  हैं, उन्हीं को देवताओं की चिन्ता और भय  भी होता है कि  मेरी परम्परा क्या है , मेरा  कुल गोत्र. मर्यादा क्या है,  मैं अमुक कर्म्म करूंगा तो अमुक अमुक देवता रुष्ट  होंगे या प्रसन्न होंगे । 

वही लोग ये चिन्ता करते हैं कि अमुक शास्त्रविधि का मुझे पालन करना है या अमुक निषेध से बचना है ।

वही लोग  ये प्रार्थना करते हैं कि अमुक अमुक  देवता मुझसे प्रसन्न हों ।  

ऐसे जो लोग शास्त्रीय विधि निषेधों की चिन्ता करते हैं ,  उनके अधीन स्वयं को  करने में धन्य अनुभव करते हैं, परम्परागत    मर्यादाओं  से आकर्षित होते हैं,  वे सचल शिव हैं ।

सोया हुआ , अचेत पड़ा हुआ प्राणी जाग्रत प्राणियों और उनके संसार  से भयभीत नहीं होता ।  उसे भय , चिन्ता होती भी है तो मात्र अपने ही स्वप्न जगत् से ।।

जागे हुए में ही  जाग्रत प्राणियों और  उनके जगत् से भय चिन्ता देखी जाती है ।

आजकल लोग शास्त्रों का तिरस्कार करते हैं तो  उसके पीछे प्रधान कारण ये है कि    वे अचेत  हैं । हम तो  ऐसे प्राणियों को   सचल शव  कहते हैं  ।

आजकल चारों ओर सचल शव बहुत  ही अधिक हैं, और  सचल शिव बहुत ही कम हैं ।

।। श्री राम जय राम जय जय राम ।।

33 करोड़ देवता निर्णय

#तैंतीस_करोड़_देवता_कोटि_नहीं_हैं_  वास्तव में वैदिक दर्शन में "अनन्ता वै वेदा:" प्रमाण से "मंत्र ब्राह्मणयोर्वेद नामधेयम्...