Saturday, 8 December 2018

स्मार्त प्रतीकोपासना की सिद्धि

स्मार्त प्रतीकोपासना की सिद्धि :-

=========== 👉 पञ्चदशी एवं वेदान्तसिद्धान्तमुक्तावली से  👈 ===========

आक्षेप :- मूर्ति के प्रति ईश्वरज्ञान करना भ्रम है, अतः मूर्तिपूजक अज्ञानी है ।

उत्तर :- ' तुष्यतु दुर्जन ' न्याय से हम यह आपत्ति स्वीकार करते है । इससे क्या निर्णय होगा ?

आक्षेप :- भगवदुपासना का फल - भगवद्प्राप्ति, मुक्ति इत्यादि नहीं मिलेगी ।

उत्तर :- यह कहना मूर्खतापूर्ण है, क्योंकि भ्रम दो प्रकार के है - संवादि भ्रम एवं विसंवादि भ्रम ।

संवादि भ्रम से वस्तुसिद्धि लोक में प्रसिद्ध ही है -

मणि की प्रभा को मणिज्ञान करना भ्रम है । किन्तु मणिप्रभा में भ्रम से मणिज्ञान कर उसे प्राप्त करनेकी इच्छा से धाबित हुई व्यक्ति को अन्त में मणि की प्राप्ति होती है । किसी ने किसी देश में वाष्प [भाप] को भ्रम से धूमज्ञान कर उस देश में अंगारों का अनुमान किया और वहाँ से अग्नि को लेने चल पड़ा । अब यदि दैवगति से उसे वहां अग्नि मिल जाय तो उसका वाष्प को धूमज्ञान करना संवादि भ्रम कहलाता है ।

शास्त्र में इसका प्रमाण मिलता है -

१. प्रतीकोपासना - // आश्रयान्तरप्रत्ययस्य आश्रयान्तरे प्रक्षेपः // किसी एक अवलंबनविषयक मनोवृत्ति की अन्य किसी अवलंबन पर प्रक्षेप करनेका नाम प्रतीकोपासना है । यथा - आदित्यादि ब्रह्मप्रतीक की ब्रह्मदृष्टि से उपासना - " आदित्यो ब्रह्मेत्यादेशः " ~ छान्दोग्य ३.१९.१, इत्यादि ।

चार प्रकार के प्रतीकोपासना है, जिसका लक्षण पद्मपुराणान्तर्गत शिवगीता में कहा गया -

सम्पदुपासना :-

अल्पगुणयुक्त वस्तु को अधिक गुणयुक्त ज्ञान कर चिन्तन का नाम है सम्पदुपासना -

अल्पस्य चाधिकत्वेन गुणयोगाद्विचिन्तनम् ॥
अनन्तं वै मन इति संपद्विधिरुदीरितः ॥

~ शिवगीता, अध्याय १२, श्लोक ११

यथा - किसी एक काल में किसी एक विषयमात्र पर व्याप्त होनेका सामर्थ्ययुक्त मन को अनन्तविषयक ज्ञान कर चिंतन - " मनोब्रह्मेत्युपासीत " ~ छान्दोग्य ३.१८.१ इत्यादि ।

आरोप उपासना :-

अंग में अंगी के संबंध का आरोप करना आरोपविधि है, इस विधि का आश्रय  लेकर उपासना का नाम आरोप उपासना है -

विधावारोप्य योपासा सारोपः परिकिर्तितः ॥
यद्वदोंकारमुद्‌गीथमुपासीतेत्युदाह्रतः ॥

~ शिवगीता, अध्याय १२, श्लोक १२

यथा - सामवेद के उद्गीथ नामक भक्ति अथवा अंश में प्रणव स्थित है - इस संबंध को लेकर प्रणव को उद्गीथ मानकर उपासना का नाम आरोप उपासना है ।

अध्यास उपासना :-

प्रत्यक्षजनित बाधज्ञान होनेपर भी शास्त्रोपदिष्ट अध्यासबुद्धिपूर्वक उपासना करने की विधि का नाम अध्यास उपासना है -

आरोपो बुद्धिपूर्वेण य उपासाविधिश्च सः ॥
योषित्यग्निमतिर्यत्तदध्यासः स उदाह्रतः ॥

~ शिवगीता, अध्याय १२, श्लोक १३

यथा - अभिगम्या नारी अग्नि नहीं है ऐसा प्रत्यक्षज्ञान के उपरान्त भी उसमें रेतःसेकरूप आहुति करनेके लिए शास्त्रोपदिष्ट अग्निबुद्धिकरण अर्थात् उसकी आवृत्ति अध्यासोपासनाविधि है ।

संवर्गोपासना :-

उपास्यवस्तु की क्रियासहित उसकी उपासना करनेका नाम संवर्गोपासना है -
क्रियायागेन चोपासविधिः संवर्ग उच्यते ॥
संह्रत्य वायुः प्रलये भूतान्येकोऽवसीदति ॥

~ शिवगीता, अध्याय १२, श्लोक १४

यथा - प्रलयकाल में जैसे संवर्ग वायु अन्य किसी वायु की सहायता के बिना ही समग्र भूतों को विनष्ट करते है, वैसे एकमात्र प्राणवायु अन्तःकरण एवं वहिःकरणरूप सभी इन्द्रियों को अपना वश में लाते है । इस प्रकार प्राण वायु को संवर्त वायु की वशीकरण क्रिया के साथ उपासना करने का नाम संवर्गोपासना है ।

उपरोक्त चार प्रकार की उपासना गुण, संबंध, शास्त्रोपदेश एवं क्रिया का ज्ञान के साथ होती है । इसलिए प्रतीकोपासना बाह्य है ।

अब आन्तर सगुण अहंग्रहोपासना का वर्णन करते है -

उपसंगम्य बुद्ध्या यदासनं देवतात्मना ॥
तदुपासनमन्तः स्यात्तद्वहिः संपदादयः ॥

~ शिवगीता, अध्याय १२, श्लोक १५

उपास्य देवता के साथ गुरुपलब्धज्ञान के बलपर अभेद / तादात्म्यचिंतन करते हुए उस सगुण देवता के स्वरुप में स्थिति का नाम आन्तर अहंग्रहोपासनाविशेष है -

ज्ञानान्तरानन्तरितसजातिज्ञानसंहतेः ॥
सम्पन्नदेवतात्मत्वमुपासनमुदीरितम् ॥

~ शिवगीता, अध्याय १२, श्लोक १६

इसका पर्यवसान निर्गुण अहंग्रहोपासना में होता है, जो मुमुक्षु की साक्षात् उपयोगी है ।

शास्त्रसिद्ध पुण्यतोया गोदावरी जल शुद्धिकारक माने जाते है । जो गोदावरीजल को भ्रमवशतः गंगाजल समझ कर उससे शुद्ध होनेके लिए प्रोक्षण करता है, वह भी शुद्ध हो जाता है । गोदावरी के जल को गंगाजल समझना यहाँ संवादि भ्रम है ।

ज्वरग्रस्त रोगी यदि रोगविकारवशतः नारायण का स्मरण भ्रम से भी करने लगे, तो वह मरण के बाद स्वर्गप्राप्त होता है । इसपर प्रमाण है -

हरिर्हरति पापानि दुष्टचितैरपिस्मृतः।
अनिच्छयाऽपि संस्पृष्टो दहत्येव हि पावकः॥

~ श्रीधरस्वामीकृत भागवत टीका ६.२.२९ में उद्धृत विष्णुधर्मोत्तर पुराणवचन

गोप्यः कामात् भयात् कंसः द्वेषात् चैद्यादयो नृपाः ।
सम्बन्धात् वृष्णयः स्नेहात् यूयं भक्त्या वयं विभो ॥

~ श्रीमद्भागवत, स्कंध ७, अध्याय १, श्लोक ३०

इसप्रकार प्रत्यक्ष, अनुमान तथा शास्त्रों में उक्त प्रकार के अनन्त संवादि भ्रम पाये जाते है । इसे स्वीकार न करनेपर उपनिषदविहित उपासनादि, यथा - " योषा वा अग्निर्गौतम " ~ बृहदारण्यक ६.२.१३ इत्यादि संगत कैसे हो सकता है ?

शास्त्रोपदिष्ट अथवा शास्त्रोनुपदिष्ट अयथार्थ वस्तुविज्ञान (वस्तु विषयक विपरीत ज्ञान) से अभीष्टफल की प्राप्ति काकतालीयन्याय (दैवगतिवशतः) से प्रसिद्ध है, तब यही संवादि भ्रम कहलाता है ।

आक्षेप :- शास्त्रलब्ध शालिग्राम इत्यादि में विष्णुमूर्ति इत्यादि विषयक ज्ञान का जब तक भावना के प्रभाव से इन्द्रियगोचरत्व न हो तब तक यह ज्ञान परोक्ष ही रहता है और परोक्षज्ञान मिथ्याअर्थात् भ्रम है ।

उत्तर - ज्ञान की परोक्षतामात्र से ज्ञान में कभी भ्रान्तिरूपता नहीं होती, अपितु विषय की असत्यता से ही भ्रान्तिज्ञान होता है । प्रमाणरूप शास्त्रद्वारा यथार्थरूप विष्णु इत्यादि की मूर्ति अवभासित होनेसे यह परोक्षज्ञान भ्रम नहीं है ।

आस्तिक पुरुष के लिए प्रतिमादि में पाषाणत्व, मृन्मयत्व इत्यादि का अपरोक्षज्ञान, परोक्ष ईश्वरज्ञान के प्रति बाधक नहीं बनता । विचार की अपेक्षा किये बिना ही शास्त्रोपदेश से शालिग्रामादि में विष्णुरूप परोक्षज्ञान का उदय होता है ।

आक्षेप :- नास्तिक पुरुष प्रतिमा में विष्णुत्व आदि लेकर विवाद करते है ?

उत्तर - श्रद्धावान पुरुषमात्र का ही वैदिक कर्म में अधिकार है, श्रद्धाहीन (नास्तिक) का नहीं । आप्तवाक्य में आस्तिक्यबुद्धि एवं उसका कार्य विश्वास - फलावश्यंभावनिश्चय - तद्रहित पुरुष के दृष्टान्त अग्राह्य है ।

इस प्रकार शास्त्रीय रीति से स्मार्त प्रतीकोपासक अधिकारी भेद अनुसार क्रमशः अध्यासोपासना, सम्पदुपासना, सगुण अहंग्रहोपासना, निर्गुण उपासना इत्यादि स्तर का अतिक्रमण करते हुए अन्त में सालोक्यादि, सायूज्य, क्रममुक्ति एवं निर्गुण ब्रह्मविज्ञान का उदय होकर सद्योमुक्ति भी लाभ करते है ।

यह पहले ही सविस्तार प्रतिपादन किया गया - https://www.facebook.com/photo.php?fbid=1967993659942934&set=a.251918044883846&type=3&theater

वेदान्त का सिद्धान्तानुसार ईश्वरचैतन्य जगत् का अभिन्न निमित्तोपादानकारण हैं, अतः सर्वव्यापी हैं । विचार करनेपर घटादि प्रत्येक जड़ वस्तु स्वयंप्रकाश निर्विशेष चैतन्यस्वरुप सिद्ध होता हैं ।

स्वयंज्योतिस्वभाव आनन्दघन असंग उदासीन आत्मचैतन्य ही अज्ञान के सम्बन्ध से द्वैताकार प्रतीत हो रहा हैं - यह #वेदान्तसिद्धान्तमुक्तावलीकार श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्य प्रकाशानन्द स्वामी ने तर्क द्वारा सिद्ध करते हैं ।
' अचेतन मूर्ति की पूजा ' - कहकर आक्षेप करनेवाले लोग क्या करते हैं ?

सर्वव्यापी ईश्वरचैतन्य में अज्ञान से मृन्मयत्वादि धर्मों का आरोप !

वास्तव में तो ' मूर्तिपूजा ' कभी होती ही नहीं, केवल चिन्मय भगवान् की पूजा होती हैं सर्वत्र । अग्नि सूक्ष्मतत्त्व के रूप में सर्वत्र वर्तमान होते हुए भी काष्ठादि में उनकी दाह्यशक्ति का विशेष प्राकट्य हैं, वैसे ही ईश्वर सर्वत्र समान रूप से व्याप्त होकर भी शास्त्रीय विधि से पूजित मूर्ति आदि में उनकी शक्ति की विशेष अभिव्यक्ति होती हैं ।

Thursday, 6 December 2018

वैदिक वर्षारम्भ कब होता है ?

देखेंगे कि ये वर्तमान में “हिन्दु पञ्चाङ्ग (कैलेण्डर)” में इस्तेमाल होने वाले सिद्धान्तों से किस प्रकार से अलग हैं। इस चर्चा से वर्तमान में “हिन्दु नया साल” के रूप में प्रसिद्ध चैत्र-शुक्ल-प्रतिपदा के दर्जे का भी ख़ुलासा हो गाएगा। इस चर्चा से यह भी ख़ुलासा हो जाएगा कि वैदिक ज्योतिष के अंतर्गत चैत्र शुक्ल प्रतिपदा पर मनाया जाने वाला “हिंदू नया साल” न ही वैदिक वर्ष की शुरुआत है और न ही बसंत ऋतु की।

इस लेख से स्पष्ट होगा कि वैदिक समय के गणना की प्रणाली न केवल प्रकृति के सिद्धान्त पर ही आधारित है, बल्कि यह मानव जीवन के मापदण्डों को दैवीय मापदण्डों के साथ सामजस्य रखने के सिद्धान्त पर भी आधारित है। वैदिक वर्ष इसी सामंजस्य का उदाहरण है । इस लेख में वैदिक वर्ष की शुरुआत, जो की “सौर-चान्द्र उत्तरायण” का पहला दिन है, का भी विस्तार से वर्णन किया जाएगा ।

शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द, और ज्योतिष — इन छः वेदांगों में ज्योतिष छठा वेदांग है। ज्योतिष का महत्त्व वेदांग-ज्योतिष में लगधमुनि द्वारा कुछ इस प्रकार समझाया गया है:

वेदा  हि यज्ञार्थमभिप्रवृत्ताः कालानुपूर्व्या विहिताश् च यज्ञाः ।

तस्मादिदं कालविधानशास्त्रं यो ज्योतिषं वेद स वेद यज्ञान्   ।। ३।।

अर्थात् वेद यज्ञों के लिए हैं और यज्ञ निर्धारित समय के अनुसार किये जाते हैं । (अत:) जो ज्योतिष को जानता है वही पूरी तरह से यज्ञ को समझने में सक्षम है।

सूरज पृथ्वी की सभी मौसमी गतिविधियों को प्रभावित करता है और सूरज के कारण पृथ्वी में होने वाले ऋतुपरिवर्तन को लोग आसानी से समझ सकते हैं। ऋतु के अतिरिक्त वैदिक परम्परा में चन्द्र-मास, तिथि और चन्द्र-नक्षत्र को भी बहुत महत्त्वपूर्ण माना जाता है ।

१. उत्तरायण क्या है?

पृथ्वी की धुरी का झुकाव (पृथ्वी के अपने अक्ष और कक्षा में घूमने के बीच का कोण) और इसकी सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाने की प्रक्रिया से पृथ्वी पर ऋतु-परिवर्तन होता है।  हर वर्ष सूर्य जिस दिन पृथ्वी के सापेक्ष दक्षिणी बिन्दु तक पहुँच कर उत्तर की ओर वापस आना शुरू करता है उस दिन उत्तरायण की शुरुआत होती है।  साथ-ही-साथ यह दिन पृथ्वी के उत्तरी गोलार्ध का सबसे छोटा दिन भी होता है ।  इसके अलावा उसी दिन से उत्तरायण के पूरे होने तक  दिन की लम्बाई तब तक बढ़ती रहती है जबतक सूर्य उत्तरी बिन्दु तक नहीं पहुँच जाता। इसे वेदाङ्ग-ज्योतिष में कुछ इस तरह से समझाया गया है:

घर्मवृद्धिरपां प्रस्थ: क्षपाह्रास उदग्गतौ ।
दक्षिणेतौ विपर्यासः षण्मुहूर्त्ययनेन तु ।। ८।।

अर्थात् – उत्तरायण में हरेक दिन की लम्बाई में (नाडिका यन्त्र, या पानी की घड़ी) में १ प्रस्थ (प्रस्थ आयतन की प्राचीन इकाई है) का इज़ाफ़ा और रात की लम्बाई में उतनी ही कमी होती है। दक्षिणायन में, इसके विपरीत, दिन की लम्बाई में १ प्रस्थ की कमी और रात की लम्बाई में उतनी ही बढ़ोत्तरी होती है। एक आयन में दिन की कुल बढ़ोत्तरी या कमी छः मुहूर्तों की होती है।

इससे यह साफ ज़ाहिर होता है कि वैदिक परम्परा में सौर उत्तरायण दिन की लम्बाई के अनुसार तय किया जाता है। हालाँकि कई अन्य पद्धतियाँ, जैसे छाया की लम्बाई को नापने वाली, भी उपलब्ध हैं जिसका वर्णन कौटिल्य के अर्थशास्त्र में भी किया गया है। पर आजकल निरयण पद्धति के प्रचलित होने की वजह से मकर संक्रान्ति को उत्तरायण की शुरुआत के रूप में मनाया जाता है। पर यह दरअसल उत्तरायण (२१ दिसंबर) से २३ दिनों के बाद आता है। हालाँकि वेदांग-ज्योतिष के ऊपर लिखे श्लोक से पहले के दो श्लोकों में अयन के शुरुआत के लिए ख़ास नक्षत्रों का भी ज़िक्र है। अवलोकन के आधार पर निर्धारित नक्षत्रों का उल्लेख पहले किया गया है जो कि वेदांग-ज्योतिषी के लिखे जाने के समय के लिए उपयुक्त थी। उसके बाद सभी समय के लिए अयनारम्भ संक्रान्ति की परिभाषा दी गई है। यह पूरी तरह से वैदिक परम्परा के अनुरूप है जिसके अन्तर्गत लोगों को अयन चलन जानकारी थी। (इस शृंखला में बाद के लेखों मे इसकी चर्चा की जाएगी)

२. क्या वेदों में और वैदिक परम्परा में सौरमास आदि का प्रचलन है?

वर्तमान पद्धति में हम देखते हैं कि राशि चक्र पर आधारित सौर महीने जैसे कि मकर मास, तुला मास आदि के साथ-साथ नक्षत्र पर आधारित चान्द्र मास के नाम जैसे माघ, फाल्गुन आदि का भी प्रयोग होता है।  कुछ क्षेत्रों में चन्द्रमा के महीनों के नाम, जैसे माघ, फाल्गुन इत्यादि, को भी राशि चक्र में सूर्य की स्थिति के आधार पर सौर महीनों के लिए उपयोग किया जाता है।  इस वर्तमान पद्धति ने इस गलत अवधारणा को प्रेरित किया है कि दोनों, सौर महीने और चान्द्र महीने, वैदिक हैं। यह भी भ्रम है कि वर्ष की शुरुआत मधुमास अथवा चैत्र से है और इसकी मान्यता भी वेदों से ही है। वैदिक वर्ष की शुरुआत, वसंत ऋतु ,तथा मधु, माधव इत्यादि माह के नामों को सौरमास मानने के बारे में भी गलतफहमी है क्योंकि वेदों में जहाँ कहीं भी महीनों के नामों की सूची की चर्चा है वहाँ मधु हमेशा पहला महीना होता है।

इसलिए सबसे पहले हम समझने का प्रयास करें कि वैदिक प्रणाली वास्तव में क्या कहती है। वेदों में दो प्रकार के नाम महीने के लिए प्रयोग किए गयें हैं । संहिताओँ में हम हमेशा मासनामों को मधु, माधव आदि के रूप में पाते हैं । ब्राह्मणों और कल्पसूत्रों (श्रौतसूत्र और गृह्यसूत्र) में नक्षत्र पर आधारित नाम जैसे चैत्र, वैशाख आदि का प्रयोग किया गया है, जो नाम के हिसाब से नक्षत्र के साथ सम्बन्ध दिखाते हैं। संहिताओँ में इस्तेमाल किए गए नाम हमेशा अंहसस्पति के साथ जुड़े है। अंहसस्पति साल के तेरहवें महीने का, यानी की अधिकमास का, वैदिक नाम है। और अधिकमास केवल चान्द्रवर्ष में ही हो सकता है, सौर में नहीं (अधिकमास का वर्णन इस लेख-शृंखला के बाद के भागों में किया जाएगा)।  इसके अलावा एक वर्ष में १२ महीने या १३ महीने होने का उल्लेख, और हर महीने के दो अर्धमास (पक्ष) में बँटे (इन को क्रमशः शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष कहते हैं) होने का वर्णन भी वेद के मधु, माधव इत्यादि महीनों का चान्द्र महीने होना ही सिद्ध करता है। इस प्रकार वेदों में पाए जाने वाले दो प्रकार के नामों को समानार्थक जाना जाता है। इसका प्रमाण वेदों के सभी भाष्यों और साथ ही साथ अन्य प्राचीन ग्रन्थों में, जहाँ-जहाँ भी इनकी चर्च हुई है, भी मिलता है। हालांकि वेदांग-ज्योतिष में सौर गणितीय मानों के संदर्भ में, “१२ सौर महीने / १२ सूर्य” (श्लोक २८) का उल्लेख है। लेकिन कहीं भी, वेदों में या वेदांग-ज्योतिष सहित परम्परा से प्रमाणित वेदांगो में, सौर महीनों का कोई भी नाम नहीं दिया गया है।  इस प्रकार आसानी से यह माना जा सकता है कि सौर महीनों के बारे में बयान सिर्फ़ गणितीय उद्देश्य के लिए है।  इसी प्रकार सुश्रुत संहिता (सूत्रस्थान ६/१०) और आयुर्वेद के सभी प्राचीन ग्रन्थों में चान्द्र महीनों के आधार पर ही ऋतुओं का उल्लेख किया गया है।  साथ ही साथ आयुर्वेद की ऋतुचर्या (आहार विहार) के लिए भी चाँद्र महीनों का ही इस्तेमाल किया गया है। इस से यह स्पष्ट है कि वैदिक महीने चान्द्र महीने ही हैं और वेदों में सौर महीने नहीं हैं ।

३. सौर-चान्द्र उत्तरायण क्या है और वैदिक वर्ष उसके पहले दिन के साथ क्यों शुरू होता है?

वैदिक प्रणाली में, जहाँ सम्पूर्ण व्यावहारिक महीने, ऋतु और वर्ष शुक्ल प्रतिपदा से ही शुरू होते हैं, सौर उत्तरायण संक्रान्ति के दिन को महीने या वर्ष के शुरुआत के रूप में नहीं इस्तेमाल किया जा सकता है। वेदांग-ज्योतिष में-

माघशुक्लप्रपन्नस्य पौषकृष्णसमापिन:।

युगस्य पञ्चवर्षस्य कालज्ञानं प्रचक्षते।। ५।।

कहकर काल के ज्ञान को माघ महीने के शुक्ल प्रतिपदा से शुरु होकर पौष महीने के अमावस्या में ख़त्म होने  वाले पाँच वर्षों के युग के रूप में बताया गया है (यह माघ वो नहीं है जो प्रचलन में है, जिसे नीचे समझाया जाएगा) । माघ को विभिन्न पुराणों में भी वर्ष के पहले महीने के रूप में दिखाया गया है:

वर्षाणामपि पञ्चानामाद्य: संवत्सर: स्मृत:।

ऋतूनां शिशिरश्चाऽपि मासानां माघ एव च ।। ब्रह्माण्डपुराण (पूर्वभाग २४।१४१) वायुपुराण (१।१५३।११३) लिङ्गपुराण (१।६१।५२) ।

अर्थात्- पाँच वर्षों में (वैदिक युग के ५ वर्षों में) संवत्सर पहला वर्ष है, ऋतु में (पहला है) शिशिर और महीनों में (पहला है) माघ।

अधिकमास या मलमास वैदिक प्रणाली में (केवल अयन के अन्त्य में) उपयुक्त फ़ासले (तीस या छत्तीस महीने के अन्तराल) पर जोड़ा जाता है। ऐसा इसलिए किया जाता है जिससे की पृथ्वी का सूरज के चारों ओर घूमने वाली सालाना गतिविधि की वजह से होने वाले ऋतु परिवर्तन और चाँद्र महीनों में सामंजस्य बना रहे।

इससे यह तात्पर्य निकलता है कि वैदिक माघ (तप:) का महीना हमेशा वास्तविक उत्तरायण संक्रान्ति के आसपास होता है। इस ऋतुबद्ध माघ (तप:) में वैदिक वर्ष की शुरुआत होती है, ऐसा ऊपर की चर्चा से स्पष्ट

है। साथ ही साथ वैदिक परम्परा में देवस की अवधारणा पुनः इस बात की पुष्टि करता है। यज्ञों के समय निर्धारण में ऋतुएँ स्पष्ट रूप से महत्त्वपूर्ण हैं। ऋतुओं का कृषि एवं खेती-बाड़ी से भी सीधा सम्बंध है। हालाँकि वर्तमान पद्धति में त्योहारों का समय ऋतु में आधारित वैदिक प्रणाली के विपरीत निरयण प्रणाली (नक्षत्र से सम्बद्ध प्रणाली) के अनुसार होता है, वैदिक प्रणाली का प्रचलन वसन्त पञ्चमी (सरस्वती पूजा) जैसे त्योहारों में देखा जा सकता है। वसंत पंचमी ज्यादातर वैदिक सौर-चान्द्र वसन्त ऋतु में ही (इस वर्ष १ फरवरी को) मनाया जाता है। जबकी वर्तमान प्रणाली के अन्तर्गत यह पर्व शिशिर ऋतु में माघ-शुक्ल पंचमी होना चाहिए। पर वास्तव में वैदिक प्रणाली के अनुसार मधु-शुक्ल-पञ्चमी (चैत्र-शुक्ल-पञ्चमी) ही वसंत पंचमी है ।

वेदों में जहाँ-जहाँ महीनों के नाम आते हैं वहाँ मधु (वसन्त ऋतु का पहला महीना) का पहले उल्लेख किया गया है। इस लिये भी यह भ्रम पैदा हुआ है कि यह वैदिक वर्ष का पहला महीना है । वास्तव में यह अग्न्याधान और संस्कारों के लिए अलग-अलग वर्णों के लिए निर्धारित ऋतु के क्रम से संबंधित है। वसन्त को प्रथम वर्ण अर्थात् ब्राह्मण वर्ण के लिए निर्धारित किये जाने से पहला उल्लेख वसन्त ऋतु का किया गया है । यह बात श्रौतसूत्र, गृह्यसूत्र और वेदाङ्ग-ज्योतिष की सोमाकर-भाष्य से भी स्पष्ट हो जाती है ।

४. मनुष्य के वर्ष को देवों का दिन क्यों कहा जाता है?

मानव उपयोग के लिए जो एक वर्ष होता है उसको वैदिक परम्परा में देवों का एक दिन अथवा अहोरात्र (अर्थात् दिन और रात) माना जाता है। उनके लिए उत्तरायण दिन होता है और दक्षिणायन रात । इस अवधारणा को वेदों, स्मृतियों और पुराणों में भी स्पष्ट रूप से बताया गया है:

देवों का एक दिन एक वर्ष होता है ।– तैत्तिरीयकृष्णयजुर्वेदब्राह्मण । (३/९/२२/१)

जब वह (सूर्य) उत्तर की ओर बढ़ रहा होता है, वह देवों के मार्ग में जा रहा होता है और देवों की रक्षा करता है ।– माध्यन्दिनीय-वाजसनेयि-शुक्लयजुर्वेद-शतपथब्राह्मण । ( २/१/३/३)

दैवे रात्र्यहनी वर्षम् प्रविभागस् तयो: पुन:।

अहस् तत्रोदगयनं रात्रि: स्याद्दक्षिणायनम् ।। मनुस्मृति (१/६७), महाभारत (१२/२३१/१७)

अर्थात्- एक दिव्य दिन और रात मानव उपयोग के लिए एक वर्ष है । दिन उत्तरायण और रात दक्षिणायन है ।

इसी श्लोक का उल्लेख ब्रह्माण्ड-पुराण आदि पुराणों में भी किया गया है।

क्योंकि वर्ष, अयन, ऋतु, महीना सभी व्यावहारिक उद्देश्यों के लिए शुक्ल प्रतिपदा से ही शुरू होते हैं, जैसा की ऊपर की चर्चा में स्पष्ट है,  दैव दिन और वैदिक वर्ष भी माघ शुक्ल प्रतिपदा से ही शुरू होता है। यह ज्यादातर वास्तविक सौर उत्तरायण के ठीक पहले की शुक्ल प्रतिपदा है (जिस वर्ष अधिकमास होता है, तब माघ शुक्ल प्रतिपदा सौर उत्तरायण के कुछ दिन बाद भी जा सकती है)। उदाहरण के लिए, वर्तमान वैदिक वर्ष ३० नवंबर २०१६ (उत्तरायण संक्रान्ति से २२ दिन पहले) प्रारम्भ हुआ, क्योंकि यह शुक्ल प्रतिपदा उस संक्रान्ति के ठीक पहले थी। और अगला वर्ष अधिकमास होने के कारण १८ दिसंबर २०१७ पर पड़ने वाली शुक्लप्रतिपदा को (सौर उत्तरायण दिन से ३ दिन पहले) प्रारम्भ होगा । हर १९ वर्षों मे ये दोनों (शुक्ल प्रतिपदा और उत्तरायण संक्रान्ति) एक ही दिन में पड़ते हैं ।

इस शृंखला के अगले लेख में, हम वैदिक समय माप करने की प्रणाली की इकाईयाँ, सौर वर्ष में वास्तविक उत्तरायण और सम्पात दिनों की पहचान करने के लिए व्यावहारिक प्राचीन विधि, और वैदिक अधिकमास पर चर्चा करेंगे।

टिप्पणी : इस लेख में उल्लिखित वेदाङ्ग-ज्योतिष की श्लोक संख्याएँ यजुर्वेदी वेदाङ्ग ज्योतिष की श्लोक संख्या को दिखाती हैं ।

शब्दावली

अयन = एक वर्ष का आधा जो सूर्य की स्पष्ट वार्षिक गति के आधार पर विभाजित है । उत्तरायण संक्रान्ति से छः महीनों में सूर्य उत्तर की तरफ जाता दिखाई देता है जिसे उत्तरायण कहा जाता है।  फिर अगले छः महिनों में सूर्य दक्षिणी बिन्दु पर वापस आता  दिखाई देता है जिसे दक्षिणायन कहते है । वैदिक पद्धति में इस्तेमाल किए जाने वाले सौर-चान्द्र उत्तरायण और दक्षिणायन क्रमश: इन बिन्दुओं के नजदीक पड़ने वाली शुक्ल प्रतिपदा से शुरू होते हैं ।

अयनचलन (संक्रान्ति / विषुव का चलन)  = संक्रान्ति / विषुव के समय पृष्ठभूमि बिन्दु का चलन (जहां सूर्य दिखाई देता है) । ऐसा इसलिए होता है क्योंकि नाक्षत्र वर्ष की तुलना में सौर वर्ष कम (लगभग 20 मिनट छोटा) होता है।

निरयण प्रणाली = अयनचलन को ध्यान न देकर सूर्य / चन्द्र की स्थिति (पृष्ठभूमि में स्थित नक्षत्र) के आधार पर महीनों / त्योहारों का निर्धारण करने की अर्वाचीन प्रणाली । सायन प्रणाली में अयन चलन को ध्यान में रखा जाता हैं।

शुक्ल-पक्ष =  अमावस के दूसरे दिन (शुक्ल-प्रतिपदा) से पूर्णिमा  तक का भाग। जहाँ चाँद का सूरज की रोशनी से उजाला भाग पृथ्वी से क्रमश: बढ़ता दिखाई देता है ।

कृष्ण-पक्ष = महिने में पूर्णिमा के अगले दिन(कृष्ण-प्रतिपदा) से अमावस तक का भाग(जिस दिन चन्द्रमा दिखाई नहीं देता है)

चान्द्रमास = वैदिक पद्धति में उस २९ या ३० दिनों का समय (वास्तविक अवधि लगभग २९ .५ दिन) को महीना कहा जाता है,  जो अमावस के अगले दिन (शुक्ल प्रतिपदा) से अगले अमावस के दिन (अमावस्या) तक का होता है । (इसे अमान्त मास कहते हैं । (अमावस को समाप्त होने वाले चान्द्र महीने ही वैदिक प्रणाली में मुख्य रूप में उपयोग किये जाते हैं)

प्रमुख आधारग्रन्थ

१. माध्यन्दिनीयवाजसनेयिशुक्लयजुर्वेद (मन्त्रसंहिता और शतपथब्राह्मण )

२. तैत्तिरीयकृष्णयजुर्वेदसंहिता और ब्राह्मण

३. मैत्रायणीयकृष्णयजुर्वेदसंहिता

५. पारस्करगृह्यसूत्रम्

६. वेदाङ्गज्योतिषम् – सोमाकरभाष्य तथा कौण्डिन्न्यायनव्याख्यान और हिन्दी अनुवाद सहित;

शिवराज आचार्य कौण्डिन्न्यायन, चौखम्बाविद्याभवन (२००५)

७. मनुस्मृति:

८. ब्रह्माण्डपुराणम्

९. वायुपुराणम्

१०.सुश्रुतसंहिता ।।

मंदिर में ढोल नगाड़े का महत्व

जिला प्रशासन की अनदेखी से आरती और पूजा के दौरान शहनाई और नगाड़ा वादन करने वालों के अस्तित्व को खतरा                लक्ष्मीनाथ मंदिर में आरती...