Wednesday, 8 November 2017

विवाह और शादी में अन्तर -


विवाह एक तपस्या है , जिसमें पत्नी पति के लिये स्वयं को न्यौछावर कर  उसकी आजीवन उपासना करती है और पति अपनी पत्नी को  उस भूमि की तरह ग्रहण करता है , जिससे किसान अपने लिये अन्न प्राप्त करता है । एक किसान के लिये उसकी भूमि ही उसका सब-कुछ होती है,  ऐसे ही पति के लिये पत्नी होती है ।

  पतिव्रता -  में दो शब्द हैं -
१.पति  २.व्रता

किसी के लिये व्रत करने पर स्वयं को तपस्या में  तपना पड़ता है ।  जैसे हम सोमवार का , मंगल का , बृहष्पति का , शुक्र का  या फिर सत्यनारायण का , जो भी व्रत करते हैं , उस पूरे दिन में हमको  निराहार रहना पडता है , कईं नियमों का पालन करना पड़ता है ।  ऐसे ही एक पतिव्रता का  धर्म है , जो कि  एक आजीवन व्रत है ।  इस व्रत में पति ही एक स्त्री का  गुरु  , पति ही  देवता , पति का  परिवार ही  गुरुकुल होता है ।  और वो ये सब इसलिये पालन करती है , क्योंकि इसीसे उसके मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है, उसका आत्मकल्याण होता है । 

विवाह और शादी में अन्तर है । विवाह योगप्रधान है और शादी भोगप्रधान ।  विवाह उपासनाप्रधान है , शादी वासनाप्रधान । हमारी  उच्च कुलीन ब्राह्मण परम्परा में  "विवाह" होता  है , शादी नहीं होती ।

शादी- ये पाश्चात्यप्रभावित शब्द है , जबकि विवाह- ये हमारा सनातन  संस्कृत शब्द है ।

विवाह पवित्रता और मोक्ष प्रदान करने वाला वो संस्कारविशेष है , जिसमें दान  , व्रत  और उपासना का समावेश है ।  किन्तु शादी , जो कि आजकल फैल रही है ,  बस एक समझौताभर  है , जिसमें लोभ , विलास  और वासना  है ।

इसीलिये "विवाह" करने पर  पति और पत्नी का कभी  सम्बन्ध विच्छेद होता ही नहीं, कभी जीवन में परस्पर कोई मनमुटाव, कुण्ठा या फिर शिकायत रहती ही नहीं और  सम्बन्ध पूर्णता को प्राप्त हो जाते हैं  किन्तु शादी करने पर  भीतर ही भीतर परस्पर मनमुटाव , कुण्ठा, शिकायतें जन्म लेतीं हैं और कभी कभी तो  तलाक /डाइवोस जैसे नकारात्मक परिणाम भी निकल जाते हैं  और सम्बन्ध सदैव अधूरा ही रहता है ।  

आजकल लोगों की स्थिति ऐसी है कि हम क्या कर रहे हैं , क्यों कर रहे हैं  , क्या आवश्यकता है , क्या उद्देश्य है , कुछ पता नहीं ।  आप पूछोगे कि आप ऐसा क्यों करते हो  तो बोलेंगे - सब चल रहे हैं,  इसलिये हम भी चल रहे हैं  । जी इसलिये रहे हैं क्योंकि मौत नहीं आयी है , #भेड़चाल इसी को कहते हैं ।

इस अज्ञान से बचना चाहिये और   बुद्धिमान्  होकर चलना चाहिये , तभी जीवन लेना सफल है अन्यथा नहीं । ☝🌸

(यह लेख  पृष्ठसंचालक  द्वारा यद्यपि किसी विशेष उद्देश्य से लिखा गया था , किन्तु इसे जनसामान्य के लिये प्रकाशित कर दिया गया है ।)

।। जय श्री  राम ।

केवलाद्वैत(#अद्वैत) #सिद्धान्त_की_सर्वश्रेष्ठता -


#भ्रान्ति  - चारों वैष्णवाचार्य श्री आद्य शंकराचार्य  के अद्वैत सिद्धान्त का एक साथ मिलकर   खण्डन करते हैं , अतः  विरोधियोंं के संख्याबल  के प्राचुर्य  से ये सिद्ध है कि   श्री आद्य शंकराचार्य  का सिद्धान्त सर्वश्रेष्ठ नहीं है ।

#उन्मूलन - जो चारों वैष्णवाचार्य श्री आद्य शंकराचार्य  के सिद्धान्त का खण्डन  करने में प्रवृत्त होते  हैं , वे चारों पहले ही  परस्पर एक - दूसरे के सिद्धान्त से  स्वयं खण्डित हो जाते हैं । 

जो सिद्धान्त  स्वयं ही परस्पर  विखण्डित  हों , वे भला परस्पर मिलकर   श्री आद्य शंकराचार्य का किस बल से खण्डन करेंगे ?

श्री आद्य शंकराचार्य का अद्वैत सिद्धान्त  वेदों का अभेद्य  सिद्धान्त है । इस पर  केवल अनुचित आरोप ही होते हैं , खण्डन नहीं होता इसका । ये समस्त वेदों का सार- सिद्धान्त है ।

।। जय श्री  राम ।।

कुरान और शास्त्र में अन्तर -


कुरान कहती है तुम्हारी बीवियॉ तुम्हारी खेती हैं , जब जैसे चाहो अपने खेत में जाओ, जो चाहे अपने खेत के साथ  करो, वो तुम्हारा हक है  !

शास्त्र कहते हैं तुम्हारी पत्नी अवश्य   तुम्हारी  भूमि  है , उसमें सही समय पर सही उद्देश्य से जाओ ,  सदैव अपनी भूमि का संरक्षण करो ,  भूमि को कभी दुरुपयोग मत करना  , अन्यथा  वह तुम्हारी ही हानि होगी ।

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मनमर्जी करना  - ये  पशुता है , मनोरोग  है ।  शास्त्र   मानव की प्रवृत्ति निवृत्ति का नियामक है,  एक अनुशासन है , एक समुचित व्यवस्था है । 

शास्त्र का ही विकृतिकरण कुरान  है ।
धर्म का ही विकृतिकरण होता है  विधर्म   ।

आस्था के नाम पर मानवीय वासना से निर्गत  ग्रन्थ  अज्ञानियों को  धर्म जैसा ही लगता है,  पर वह धर्म के नाम पर केवल एक छल होता है । 

वासना तो पामर पशुओं का स्वभाव है ,  परमेश्वर में वासना की गन्ध भी नहीं है । ईश्वरीय उपदेश में  वासना की  प्रधानता नहीं होती वरन्  शुद्ध उपासना (तप) की प्रधानता होती है । वासनामय ग्रन्थ एक वासनापूरित व्यक्ति   की ही कल्पित रचनामात्र होती  है ।

।। जय श्री राम  ।।

Tuesday, 7 November 2017

सदाचरणे निरता की व्याख्या

ब्राह्मण--सत् आचरणे निरताः
सदा सत् आचरण में रत रहे।
क्षत्रिय=सदा सत् आचरण सह रणे निरताः।
वैश्य--सदा च चरणे विचरणे निरताः।
सदा सेवा और व्यवसाय के लिये विचरण करना।
शुद्र =सदा चरणे निरताः।
सदा सतमार्गियो की सेवा में रत रहे।।

Friday, 3 November 2017

यज्ञों में अनाचार से कर्मकांड की मर्यादाभंग पर लेखों की समस्त लींक --->

यज्ञों में अनाचार से कर्मकांड की मर्यादाभंग पर लेखों की समस्त लींक --->

१ - > https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=2052564608307557&id=100006621126470

२- https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=2062460367317981&id=100006621126470

३- https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=2063001633930521&id=100006621126470

४- https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=2063377570559594&id=100006621126470

५- https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=2049531881944163&id=100006621126470

६- https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=2032224853674866&id=100006621126470

७ - https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=2048156308748387&id=100006621126470

अन्न नहीं ये रिण है

जब एक ग्रास खाओ अन्न का तो ध्यान में रखना !  ये दाने नहीं , ये ऋण की पोटलियॉ हैं ! जो आप  खाने जा रहे हो !

ऋणी हो धरती के,  ऋणी हो देवताओं के , ऋणी हो हरेक उस प्राणी के जिसके लिये ये दाने बने हैं !

और ऋणी तो सबसे अधिक उस परमात्मा के हो जिसने  तुमको बनाया ,  और तुम्हारे लिये   सब को  बनाया !  

कैसे चुकाओगे ऋण इतना भारी ?

देखो !  परमेश्वर  की दयालुता ,     तुम कहीं ऋणी ना रह जाओ ,  तुम्हारे लिये  वेद का ज्ञान प्रगटाया , और    तुम ऋणों से उऋण हो सको , इसके लिये  तुमको  उसी वेद से  यज्ञ की विद्या  का  बोध कराया ! 

वेदों ने स्वयं को पता है क्या कहा है , वे कहते हैं कि हम  उस  सर्वात्मा सर्वेश्वर   परमात्मा  की सॉसें हैं ,  जो   तुम्हारे  लिये प्रगटे  हैं ! 

आहा ! कितनी करुणा , कितना प्रेम , कितना अपनत्व है परमेश्वर का कि उसनी अपनी श्वांसे ही तुम्हारे नाम कर दीं !   प्रीत की रीत रंगीलो ही जानै !

इसलिये हे अग्रजन्मा ब्राह्मण !

  भोजन करने से पूर्व सदैव पहले   #बलिवैश्वदेव_यज्ञ करो , और यज्ञ से ही इस यज्ञपुरुष परमेश्वर  की आराधना , जिसने तुम्हारे  लिये इतना विराट् अनुष्ठान  सम्पन्न किया है !

#यज्ञ -  यही तुम्हारा प्रथम धर्म है !

।। जय श्री  राम ।।

Wednesday, 1 November 2017

जाती कर्म से नहीं

जन्मना जायते शूद्रः संस्काराद् द्विज उच्यते।
वेदपाठाद् भवेद् विप्रः ब्रह्म जानाति ब्राह्मणः।।

इसके आधार पर यदि आप इसका ये अर्थ करतें हैं कि वर्ण कर्म के द्वारा कोई भी बदल सकता है । तो इस श्लोक का ये अर्थ बिल्कुल भी नहीं है ।

जन्मना जायते शूद्र: ....... से ये नहीं हो जाता कि जन्म से सभी शूद्र हैं |

यदि सभी जन्म से शूद्र होते हैं तो -
#वैदिकै: #कर्मभि: #पुण्यैर्निषेकादिद्विजन्मनाम्|
#कार्य: #शरीरसंस्कार: #पावन: #प्रेत्य_चेह_च ||

इस मनुस्मृति वचन की व्यर्थता होगी | क्योंकि यहां गर्भाधानादि संस्कार द्विजों के लिए विहित है|  नामकरण में भी मांगल्यं ब्राह्मणस्य स्यात् ........ इत्यादि | अपि च - शर्मवद् ब्राह्मणस्य स्यात् ..... आदि स्मृतिवचन भी व्यर्थ हुए | यत: नामकरण 10 वें दिन किया जाता है |

अत: इसका मनुस्मृति सम्मत अर्थ ऐसा करना चाहिए -

#जन्म_से_सभी_शूद्रवत_हैं , #अर्थात्_वेद_के_अनधिकारी_हैं_किन्तु_संस्कार_होने_से_द्विज_वेद_का_अधिकारी_होता_है ।

मनुस्मृति सम्मत अर्थ इसलिए करना चाहिए क्योंकि -

#मनुस्मृति_विरुद्धा_या_सा_स्मृतिर्न_प्रशस्यते कहा गया है , कोई भी स्मृति मनुस्मृति का बाध नहीं कर सकती |

#सर्वधर्ममयो_मनु:

नोट - यहां सत्य का मण्डन मात्र किया है | इसे विवाद से न जोडें | कलह मूर्ख का स्वभाव है | बुद्धिमानों का शास्त्रविनोद |

जय श्री राम

33 करोड़ देवता निर्णय

#तैंतीस_करोड़_देवता_कोटि_नहीं_हैं_  वास्तव में वैदिक दर्शन में "अनन्ता वै वेदा:" प्रमाण से "मंत्र ब्राह्मणयोर्वेद नामधेयम्...