ऋगादिमन्त्रावच्छिन्न चैतन्य ही वेद हैं । उसमें उत्पन्न विज्ञान ही ब्रह्मको बोधित करनेमें समर्थ हैं । अस्मद्वाक्यावच्छिन्न चैतन्य और वेदवाक्यावच्छिन्न चैतन्यमें वैसा ही फरक हैं जैसे घटावच्छिन्न और अन्तःकरणावच्छिन्न चैतन्यमें । लौकिकवाक्यावच्छिन्न चैतन्यमें सामान्यज्ञानकारणमात्रत्व हैं । मायावच्छिन्न चैतन्यमें जगत्कारणत्व हैं और वेदमें संसारनिरोधकविलक्षणविज्ञानहेतुत्वात्तदवच्छिन्न हैं । इसलिए वेदको शब्दब्रह्म कहा जाता हैं । लौकिक एवं वैदिक वाक्यमें शब्दरूप समानता होनेपर भी अनादि वेदवाक्यमें सविशेषत्व स्वभावसिद्ध हैं ।
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